जिंदगी की एक नई शुरुआत-तलाक के बाद

मोनिका अग्रवाल

23rd October 2020

तलाक के बाद जिंदगी

जिंदगी की एक नई शुरुआत-तलाक के बाद

तलाक के बाद जिंदगी

तलाकनाम का यह 3 अक्षरों का शब्द किसे सुनना पसंद है। और जब यह शब्द किसी महिला के नाम से जुड़ा हो तो सैकड़ों बातें इस एक छोटे से शब्द के साथ जुड़ जाती हैं। बेटी के जन्म के साथ ही उसकी शादी के सपने बुनने शुरू हो जाते हैं। थोड़ी बड़ी होती है तो खेल-खेल में वो गुड्डी-गुड्डे की शादी कराती है। कहानियों में सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार आता है तो सयाना होते ही उस पर शादी का दबाव डाला जाता है। परिवार, परम्परा को उसकी जिम्मेदारी मान लिया जाता है। लेकिन, खूबसूरत मानी और बताई जाने वाली शादी उसके लिए खूबसूरत हो जरूरी नहीं। ऐसे में अगर वह खुद को आजाद करवा ले। तलाक, लेकर एक नई शुरुआत कर ले तो उसके लिए एक अजीब कसौटी तैयार की जाती है। तलाकशुदा महिला का जीवन सामान्य नहीं रह जाता। समाज से लेकर परिवार तक का बर्ताव महिला के प्रति पहले जैसा नहीं रह जाता।

तलाक अपने आप में कोई छोटी सी बात नहीं एक मुश्किल और कड़ा फैसला होता है। मुश्किल इसलिए क्योंकि हमारे इस पितृसत्तात्मक समाज में जो भी कदम महिला की तरफ से उठाया जाता है वह हमेशा प्रश्नों के घेरों में रहता है। एक औरत भले ही सारी जिंदगी मानसिक और शारीरिक अत्याचार से भी रहे लेकिन जिस दिन वह इस बंधन इस बंदिशों और जकड़न से निकलना चाहते हैं उसी दिन सवालों के बारूद पर खड़ी हो जाती हैं। 

इस फैसले को लेना उसके लिए आसान नहीं इतना बोझिल बना दिया जाता है जैसे कि उसने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। क्या अपने बेमाने इन बंधनों को तोड़कर अपनी आजादी की  चाह गुनाह है? यही चाह अगर पुरुष करें तो वह ऐसा फैसला लेने के लिए आजाद है! आखिर क्यों?क्योंकि तलाक तो सिर्फ़ एक स्त्री का होता है। शायद वैसे ही जैसे औरत का बलात्कार।

तलाक के बाद जिंदगी

रहती हैं संदेह में

कल तक जिन सहेलियों को उसके आने का इंतजार होता था आज तलाक के बाद उन्हें वक्त देखकर घर बुलाया जाता है। कुछ मामलों में वह वक्त मुनासिब माना जाता है जब घर पर सहेली का पति मौजूद न हो। सीधे शब्दों में कहें तो इसे सहेली से अपने पति की हिफाजत का फार्मूला बना लिया जाता है। तलाकशुदा सहेली के घर आने पर कई बार ससुराल वालों को बिना पूछे उसके आने का कारण बताया जाता है। कई बार लोग अपनी बेटियों को तलाकशुदा महिला से दूर रहने की नसीहत देते हैं ताकि उनकी बेटियां बागी न हो जाएं। 

नजरे पूछती हैं सवाल 

सात फेरों के बाद शुरू हुई जिंदगी से मिले घावों को भुलाकर आगे बढऩे वाली महिला को अक्सर उस वक्त के यादों में घसीटा जाता है जिसे याद करना उसके लिए सहज नहीं होता। तलाक के कारणों का डीएनए निकाला जाता है। साथ ही लोग जजमेंट देने में भी पीछे नहीं रहते। क्या? कब और कैसे? के सवाल पूछ कर उसको असहज किया जाता है। 

समाज करता है अलग-थलग 

तलाक के बाद जिंदगी की एक नई शुरुआत करनी होती है। सम्भलने के इस प्रयास में कई बार समाज आपको अलग-थलग कर देता है। जैसे- किराए पर मकान इस बात पर नहीं मिल पाता कि तलाकशुदा है। रोजगार मिलने भी परेशानी होती है भूल से मिल जाए तो कई बार फब्तियों का सामना करना पड़ जाता है। 

अपने ही घर में हो जाती हैं पराई 

बेटियों का घर नहीं होता। शादी के पहले मायका और बाद में ससुराल। तलाक के बाद? ससुराल से मायके आने पर जाने- अनजाने कई बार वह मेहमान बना दी जाती है। कई मामलों में वह बोझ बना दी जाती है जबकि तलाकशुदा बेटे को ऐसा कुछ महसूस नहीं कराया जाता।

चारित्रिक-विशेषता का मूल्यांकन

हमारे समाज की रूपरेखा कुछ इस प्रकार है कि एक औरत के लिए तलाक हमेशा पथरीली पगडंडी के समान है क्योंकि उसको बहुत से कानूनी दांव पेंचों से गुजरना पड़ता है। और जब हिम्मत करके कानून का दरवाजा खटखटाती हैं तो यह समाज उसका अपने अपने तरीके से चारित्रिक-विशेषता और चारित्रिक उपाधियां से नवाज ने लगता है। अधिकांश लोग जानना चाहते हैं कि तलाक के बाद क्या करेगी? कैसे गुजारा करेगी कैसे खाएगी? कमी हमेशा एक महिला के चरित्र में ही होती है और तलाक का कारण भी महिला ही होती है। घर, मोहल्ला, रिश्तेदार, समाज उसे 'वो बेचारी' या 'वो डिवोर्सी' नाम से संबोधित करता है और यही उसकी पहचान बन जाती है।   

तोड़ दो यह सारी वर्जनायें

मेरा मानना है कि बिना किसी समाज रिश्तेदार मुरली की परवाह किए आप अपने फैसले लेने के लिए खुद स्वतंत्र हैं यदि आप अपने वैवाहिक बंधन से खुश नहीं तो आगे पढ़िए यदि पुरुष तलाक का फैसला ले सकता है आप भी बेहिचक तलाक का फैसला लीजिए समाज कौन होता है आप की पवित्रता आप की वर्जिनिटी को निश्चित करने वाला जिंदगी आपकी है अपने तरीके से जियो। यदि यह समाज आपके लिएऔरतों के हिस्से के सारे फैसले उनकी तथाकथित 'पवित्रता' और वर्जिनिटी को देखकर लिए जाते हैं। औरतें तलाक के बाद जूठन हो जाती हैं और आदमी कुंवारे रहते हैं। जब सामाजिक रवायतों की बातें की जाती हैं तो कानूनी किताबों को संविधान की चौख़ट पर दफ़्न कर दिया जाता है। पुरुष हमेशा हर बार नयी शुरूआत कर सकता है क्योंकि तलाक सिर्फ़ महिलाओं का होता है।

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