नामानुसार लक्ष्मी के रूप

गृहलक्ष्मी टीम

30th October 2020

विश्व में लक्ष्मी के विविध रूपों को पूजा जाता है। मां लक्ष्मी विभिन्न रूपों में अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। लक्ष्मी के सभी रूपों व नाम का विशिष्ट अर्थ है। लेख से जानें अपने किस रूप में मां लक्ष्मी किस प्रकार अपने भक्तों पर कृपा करती हैं।

नामानुसार लक्ष्मी के रूप

ज्योतिर्लक्ष्मी

सिंधु सभ्यता के उत्खनन में ज्योतिर्लक्ष्मी की मूर्ति मिली जिसे दीप लक्ष्मी कहा जाता है। दीपावली की रात्रि में नारियां स्वयं ज्योतिर्लक्ष्मी बनकर भवन-आंगन, मंदिर, कूप, नदी, सरोवर आदि स्थानों में दीप जलाकर तमसो मा ज्योतिर्गम्य की कल्पना को साकार करती हैं।

अन्नपूर्णा लक्ष्मी

अन्न ही प्राण हैं। विश्व खाद्यान्न से ही जीवित है। अन्नपूर्णा लक्ष्मी विश्व का भरण-पोषण करती हैं। पश्चिम बंगाल में इन्हें लक्खी मां यानी लक्ष्मी माता कहा जाता है। यह धान की अधिष्ठात्री हैं। कार्तिक मास में घरों में धान की फसल आने लगती है। गांवों में लक्ष्मी माता नावान्न धान की पूजा होती है। आधुनिक नारियां अन्नपूर्णा का साक्षात् रूप हैं। विवाह मंडप में नववधू पर धान की खील अर्पित की जाती है। ससुराल आने पर यही नववधू अन्नपूर्णा पार्वती बनकर रसोई घर का संचालन कर परिवार को भरपेट भोजन कराती है। लोक परंपरा में उन्हें रसोई घर की लक्ष्मी कहा जाता है।

गृहलक्ष्मी

समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी और चन्द्रमा एक साथ उत्पन्न हुए थे। चन्द्रमा लक्ष्मी के भाई हैं इसलिए बच्चे चन्द्रमा को चन्दा मामा कहते हैं। लक्ष्मी क्षीर समुद्र में विष्णु के संग रहती हैं। लक्ष्मी को श्रीमती भी कहा जाता है। नारियां विवाह के बाद अपने नाम के पहले श्रीमती लिखती हैं। विवाह के बाद प्रत्येक नारी लक्ष्मी होती है। विवाह के बाद जब दुल्हन अपने ससुराल आती है तब दूल्हे को लक्ष्मी पूजा करनी होती है। उन्हें गृहलक्ष्मी के नाम से सम्मानित किया जाता है।

दीप लक्ष्मी

घर-आंगन और मन्दिर में दीप जलाने वाली लक्ष्मी को दीप लक्ष्मी कहा जाता है। ज्योति को लक्ष्मी की झलक कहा गया है। लक्ष्मी अग्नि की बेटी भी है। रोम में इन्हें 'वेस्ताÓ कहा जाता हैं। इनके मन्दिर में कुंआरी लड़कियां वेदी में आग जलाती हैं। 'वेस्ताÓ का संबंध रसोई घर से भी है। आज भी नारियों का वर्चस्व रसोईघर एवं पाकशाला में विद्यमान है। यूरोप की डायना ज्योति लक्ष्मी हैं। इन्हें चन्द्रपरी कहा जाता है।

क्षीरदा

लक्ष्मी क्षीर सागर में निवास करती हैं इसलिए वे क्षीरदा हैं। क्षीर का अर्थ दूध होता है, जिस प्रकार लक्ष्मी रूपा नारियां अपने बच्चों को स्तनपान के जरिए दूध पिलाकर उन्हें निरोगी और दीर्घायु बनाती हैं। ठीक उसी प्रकार आदि गो सुरभि लक्ष्मी जन-जन को दूध प्रदान करती हैं। गाएं क्षीरदा और क्षीर भवानी कहलाती थीं। गोपाष्टमी के दिन सुरभि लक्ष्मी की प्रतीक गायों का पूजनोत्सव मनाया जाता है। इन्द्र ने सुरभि लक्ष्मी की पूजा क्षीरदा (दूध) और धनद (धन) के रूप में कर देश में डेयरी उद्योग के विकास के लिए संदेश दिया है। गोबर से बिजली उत्पादन भी होता है। गोबर लक्ष्मी की महिमा अपार है। वह कृषि की ऊर्जा हैं।

नागलक्ष्मी

अतल, वितल, सुतल, महातल, तलातल, रसातल और पाताल में नागलक्ष्मी निवास करती हैं। इन्हें पाताल लक्ष्मी कहा जाता है। ये रत्नों और मणियों के आभूषणों से सुसज्जित होकर महलों में नृत्य और संगीत का आयोजन करती हैं। इन पातालों में हेमवती

नदी बहती है जिनके सिकता कणों में स्वर्ण पाया जाता है, इस प्रकार रत्न-मणि-स्वर्ण के अलंकारों से विभूषित होकर नाग कन्याएं सदा दीपावली मनाती हैं।

अलक्ष्मी

अलक्ष्मी और लक्ष्मी दोनों सगी बहनें हैं। दोनों का जन्म समुद्र से हुआ था। अलक्ष्मी को दरिद्रा भी कहा जाता है, जो अशांत, कलह प्रिय और नास्तिकों के परिवार में निवास करती हैं। लक्ष्मी धार्मिक, आस्तिक, परोपकारी और सात्त्विक विचार वालों के संग रहती हैं। काला बाजारी घूस, घोटाला, भ्रष्टाचार और शोषण

से अर्जित धन को अलक्ष्मी कहते हैं।

शुभ लक्ष्मी

लक्ष्मी पूजन से ऐश्वर्य, पुत्र, कीर्ति, धन आदि की प्राह्रिश्वत होती है। ऐसी शुभ लक्ष्मी की पूजा सर्वप्रथम नारायण ने वैकुण्ठ में की थी। द्वितीय बार ब्रह्मïा और तृतीय बार शंकर ने शुभ महालक्ष्मी की पूजा की थी। इसी क्रम में विष्णु ने पृथ्वी पर क्षीर सागर और नाग-गन्धर्वों ने पाताल में जाकर शुभ लक्ष्मी की उपासना की थी। ब्रह्मïांड में शुभ लक्ष्मी विराजमान रहती हैं। वह सब की झोली में वैभव और संपदा डाल देती हैं। वह नारियों का भाग्य श्री करती हैं।

वैदिकी लक्ष्मी

यह लक्ष्मी सोने के रंग की हैं। वह सोने-चांदी के हार पहनती हैं। वह चन्द्र मुखी हैं। वह दारिद्रहारिणी हैं। वैदिकी लक्ष्मी के कारण देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। देश धन-धान्य से समृद्ध था। इस प्रकार विश्व में लक्ष्मी देदीह्रश्वयमान रही हैं।

धन के लिए लक्ष्मी की पूजा ही क्यों?

बल और बुद्धि के घोड़े पर सवार चतुरता, चालाकी के साथ आजीविका के लिए मनुष्य येन-केन-प्रकारेण प्रयास करता है और यदि उससे पूछा जाए कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है तो अधिकांशत: यही उत्तर प्राप्त होगा कि जीवन में अधिक से अधिक धन की प्राप्ति करना, ऐश्वर्य की प्राप्ति करना। मनुष्य धन की अधिष्ठात्री लक्ष्मी के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाता है, इसीलिए वर्तमान समय में विषमता, ईर्ष्या वैमनस्य, लूटमार, धोखाधड़ी, ठगी का ही वातावरण चल रहा है।

यहां पर मूल रूप से कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं, जिन्हें समझना अत्यंत आवश्यक है- क्या लक्ष्मी का तात्पर्य केवल धन प्राप्ति ही है? क्या धन प्राप्ति से जीवन की सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है? क्या धन प्राप्ति के लिए कोई भी मार्ग अपनाना उचित है?

यही प्रश्न हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषि-मुनियों के मन में भी अवश्य आया होगा तभी उन्होंने लक्ष्मी की पूर्ण व्याख्या की। प्रारंभ में लोक में यही विवरण आया है कि लक्ष्मी जो श्री से भिन्न होते हुए भी श्री का ही स्वरूप हैं, जो पालनकर्ता विष्णु के साथ रहती हैं, जिनके चारों ओर सारे नक्षत्र विचरण करते हैं, जो सारे लोकों में विद्यमान हैं, उस 'श्री' को मैं वन्दन करता हूं।

अर्थात् 'श्री' ही मूल रूप से लक्ष्मी हैं और इसीलिए हमारी संस्कृति में मिस्टर की जगह श्री लिखा जाता है अर्थात् वह व्यक्ति जो 'श्री' से युक्त है, उसी के नाम के आगे 'श्री' लगाकर संबोधित किया जाता है।

'श्री सूक्त' जिसे लक्ष्मी सूक्त भी कहा जाता है, उसमें लक्ष्मी की 'श्रीÓ रूप से ही प्रार्थना की गई है, उस लक्ष्मी की प्रार्थना की गई है, जो वात्सल्यमयी हैं, धन-धान्य, संतान देने वाली हैं, जो मन और वाणी को दीह्रश्वत करती हैं, जिनके आने से दानशीलता प्राप्त होती है, जो वनस्पति और वृक्षों में स्थित हैं, जो कुबेर, इन्द्र और अग्नि अर्थात् तेजस्विता प्रदान करने वाली हैं, जो जीवन में परिश्रम का ज्ञान कराती हैं, जिनके कारण आकर्षण शक्ति स्थित होती है, जिसकी कृपा से मन में शुद्ध संकल्प और वाणी में सत्यता आती है, जो शरीर में तरलता और पुष्टि प्रदान करने वाली हैं, उस 'श्रीÓ का जीवन में स्थायी स्थान के लिए बार-बार प्रार्थना और नमन किया गया है। यहां भी इस सूक्त में धन के साथ शुद्ध संकल्प, शुद्ध विचार, शारीरिक पुष्टता, आर्द्रता, प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ तेज की प्रार्थना है।

इस श्लोक में एक विशेष बात यह कही गई है कि लक्ष्मी की ज्येष्ठ भगिनी अर्थात् अलक्ष्मी अर्थात् दरिद्रता है जो भूख और ह्रश्वयास के साथ दुर्गन्धयुक्त है, अर्थात् यदि जीवन में धन तो है, लेकिन तृष्णाएं यथावत हैं, मानसिक रूप से विकारों में मलिनता है तो वह लक्ष्मी 'श्रीÓ रूपी लक्ष्मी नहीं हैं और वह लक्ष्मी स्थायी रह भी नहीं सकती हैं। जो 'श्रीÓ रूपी लक्ष्मी हैं, वही जीवन में स्थायी रह सकती हैं और इस श्री रूपी लक्ष्मी की नौ कलाओं का जब जीवन में पदार्पण होता है तभी जीवन में पूर्णता आ पाती है।

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