न आए दूरी मां और बेटी के रिश्ते में

मोनिका अग्रवाल

29th October 2020

ताकि रिश्ता बना रहे खूबसूरत सदा

न आए दूरी मां और बेटी के रिश्ते में

न आए दूरी मां और बेटी के रिश्ते में

मां एक शब्द जिसमें पूरी कायनात सिमट जाती है। मां वह अहसास है जो धरती पर भगवान सा है। पर कई बार बेटी की उम्र, जेनरेशन गैप सरीखें मसले जाने-अनजाने इस रिश्तें में कसैला पन ला देते हैं। एक खूबसूरत सा रिश्ता तकरार की गांठ में फंसा सा नजर आने लग जाता है। ऐसा आपके साथ न हो इसके लिए जरूरी है कि मां और बेटी एक-दूसरे को समझें। और अपने रिश्तें की खूबसूरती को बनाएं रखने के लिए साझा प्रयास करें ताकि धरती का सबसे प्यारा रिश्ता अनमोल बना रहे सदा के लिए। 

दीजिए प्यार की झप्पी 

बेटी सीखने की शुरुआत अपनी मां से करती है और यह भी उतना ही सही है कि वह दोनों सबसे अच्छी सेहलियां भी होती हैं। पर कई बार बेटी की बढ़ती उम्र में एक पड़ाव ऐसा भी आ जाता है कि जोर जबरजस्ती उस रिश्ते को बिगाड़ दे। ऐसे में रिश्ते को प्यार की झप्पी की जरूरत होती है। बच्ची को अपनी बात प्यार से समझाइए साथ ही अपने तर्क से उसे संतुष्ट कीजिए। आपका ऐसा करना उसे आपके नजरिए से रूबरू करवाएगा और आपका रिश्ता और भी मजबूत हो जाएगा।  

न आए दूरी मां और बेटी के रिश्ते में

समझे मनोदशा को 

मैं हमेशा सही और दूसरा गलत। यह सोच ही फसाद की जड़ है। मैं सही या तू से निकल कर यदी समस्या और उस दौरान एक दूसरे की मनोदशा को समझा जाए तो भतभेद होने की सम्भावना ही खत्म हो जाती है। यहां मां और बेटी दोनों की समझदारी काम आएगी। उन्हें इस बात का ख्याल रखना होगा कि उनका समय, सोच सब अलग है। ऐसे समझदारी ही रिश्ते की खूबसूरती की चाभी है। 

बीच का रास्ता है विकल्प 

बेटी और मां में कई बार अपनी-अपनी बातों को सही साबित करने में लग जाती हैं। मां को लगता है कि उसके पास तर्जुबा है तो बेटी को अपना नजरिया सही लगता है। सोच की इस जंग में अनजाने में ही सही रिश्ता कुछ कमजोर सा होने लग जाता है। ऐसे में दोनों को मध्यममार्गीय बनाना होता है। यानी बीच का रास्ता निकाल लेना बेहतर विकल्प है। आप इस बात पर एक राय बना सकती हैं कि इस बारी तेरी बात मानी जा रही है तो अगली बार मेरी सुननी होगी। ऐसे में दोनों को समझादी का परिचय देना होगा। ऐसा होने से मां का तर्जुबा बेटी के काम आएगा और बेटी का नजरिया मां को बहुत कुछ सीखा जाएगा। 

हद करें निर्धारित  

लोग अक्सर कहते हैं कि बेटी-मां की परछाई सी होती है पर यह भी सही है कि वो एक नहीं हैं। तो दोनों ही एक दूसरे को स्पेस दें। अपनी सोच किसी पर भी न थोंपे। इस बात को ध्यान में रखें कि ज्यादा दखनदाजी किसी भी रिश्तें के लिए अच्छी नहीं। मां को पता होना चाहिए कि उसे कितनी रोका-टोकी करनी है और बेटी को भी इस बात का अहसास होना चाहिए कि कहीं उसके चलते मां की इच्छाएं न मर जाएं।

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