स्कूल में मिले सेक्स ऐजुकेशन

मोनिका अग्रवाल

1st November 2020

सेक्स ऐजुकेशन

स्कूल में मिले सेक्स ऐजुकेशन

10 से 15 वर्ष की आयु उम्र का ऐसा दौर होता है जब बच्चे खास निगरानी में होते हैं। नाजुक उम्र तो कहते हैं इसे लेकिन इसे संभालना कैसे है ये कई दफा लोग समझ नहीं पाते। माता पिता कई दफा झिझक के कारण आगे नहीं आ पाते वहीं स्कूल इसकी जिम्मेदारी उठाने से कतराता है। लेकिन सही उम्र में सही जानकारी और उसका सही तरीका ही अच्छे भविष्य का निर्माण कर सकता हे। शिक्षकों को समझने की जरूरत है कि माता पिता जानकारी देने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते लेकिन स्कूल में प्रशिक्षण के बाद शिक्षक समान रूप से ये जानकारी बच्चों को दे सकते हैं।

रिप्रोडक्शन की मूल जानकारी

जीव विज्ञान के पाठ की तरह ही छात्रों को रिप्रोडक्शन की मूल जानकारी देनी चाहिए। जिससे इस बारे में उनकी जागरुकता को शांत किया जा सके। ऐसा करने से कुछ बच्चे गलत तरीकों से जानकारी लेने से बच सकेंगे। ये जानकारी एक विषय की तरह ही होनी चाहिए जिसमें शिक्षक के शब्दों का चयन संयमित हो।

शारीरिक और मानसिक चुनौतियां

किशोवस्था के आते ही हार्मोन्स में तेजी से बदलाव होता हे। इस दौरान बच्चों में अपने शरीर को लेकर खासा जिज्ञासा होती है। साथ ही उनका सेक्स की तरफ भी उनका झुकाव बढ़ने लगता है। ऐसे में उनको उनके शरीर में होने वाले बदलावों के कारण बताना जरूरी है जिससे वो अपने अंदर के बदलावों को आसानी से स्वीकार कर सकें। साथ ही उनमें भावात्मक बदलाव भी तेज होते हैं। ऐसे में एक दूसरे के प्रति झुकाव और भावात्मक संघर्ष एक आम बात होती है। इस उम्र में बच्चे अक्सर भावनों की चरम पर होते हैं। ऐसे में उन्हें सही दिशा देने के लिए जरूरी है कि वो अपनी भावनाओं के उतार चढ़ाव को समझदारी से संभाल सकें।

आत्म नियंत्रण और संयम

बदलावों के दौर में पांव फिसलने का खतरा बना ही रहता है। ऐसे में सही मार्गदर्शन कदमों को साधे रख सकते हैं। एक शोध बताता है कि करीब पचास प्रतिशत किशोर कम उम्र में ही यौन संबंध बना चुके होते हैं। ऐसे में बच्चों को आत्म नियंत्रण का गुर देना बेहद जरूरी हो जाता है। उन्हें बताना चाहिए कि कम उम्र में यौन संबन्ध बनाने या हस्तमैथून से उन्हें किस प्रकार के शारीरिक नुक्सान हो सकते हैं। बच्चों को किसी अन्ये के भटकाने पर कैसा बर्ताव करना है ये भी उन्हें सिखाने की जरूरत है।

मूल्यों का निर्माण 

मूल्यों से ही समाज बनता है। किशोरावस्था में आने के बाद बच्चे प्रकृति के नियमों को थोड़ा बहुत समझने लगते हैं। उन्हें समझाने की जरूरत है कि समाज ने इन नियमों को मूल्यों से बांधा हुआ है। ऐसे में सिर्फ खुद की खुशी ही मायने नहीं रखती है। किसी की बिना इच्छा के उससे संबन्ध बनाना गलत है और इसके क्या नुक्सान हैं ये पाठ पढ़ाने की जरूरत है। साथ ही उन्हें खुद को सुरक्षित रखने और विपरीत सेक्स को आदर देना सिखाने की भी जरूरत है।

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