शक्ति एवं आस्था की प्रतीक लक्ष्मी

गृहलक्ष्मी टीम

2nd November 2020

कभी मांगकर, कभी बिना मांगे ही वह दे देती हैं हमारी जरूरतों को इतनी शिद्दत से शायद ही कोई और समझ सकता है। संभवत: इसलिए हमने इनकी आराधना के लिए मातृरूप ही चुना है। अपनी असली जिंदगी में भी हमने स्त्री को कभी शक्ति, कभी लक्ष्मी तो कभी सरस्वती कहकर पुकारा है।

शक्ति एवं आस्था की प्रतीक लक्ष्मी

आदिम समाज में जीवन असुरक्षित था और नारियों पर संतति को पालने का भार था। ऐसे में नारी उर्वरता और मातृत्व का प्रतीक बनी और आद्यशक्ति नारी में है। यह भावना प्राय: विश्व की सभी प्राचीन संस्कृतियों में देखने को मिलती है। अदिति को ऋग्वेद में सार्वभौम भावना की देवी कहा गया है। आर्यों ने 'अदितिÓ को माता-पिता, पंचजन, देवता और आकाश सभी कुछ माना है। यही नहीं, उनकी दृष्टि में भूत और भविष्य सभी कुछ 'अदिति' था। वह संपूर्ण सृष्टि में व्याह्रश्वत है, ऐसा ऋग्वेद में कहा गया है।

ऋग्वेद की अदिति देवी की यूनान में 'अदेस', नार्वे में 'इदा' और यूरोप के अनेक देशों में 'अडोनिस' देवी के रूप में ऐसी प्रतिमाएं मिली हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि सृष्टि का अदिम ‘स्रोत मातृ देवी से है और उनमें जीवन या सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धांत अंतर्निहित रहता है। यही स्वरूप भारतीय शिल्प में श्री लक्ष्मी की प्रतिमा में प्राप्त होता है।

महाकाव्य काल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश 'त्रिदेव' की उपासना की लोकप्रियता ने इन तीन देवों के परिवार रचे और ब्रह्माणी, वैष्णवी व पार्वती की अवधारणा प्रचलित हुई। विष्णु के साथ उनकी पत्नी लक्ष्मी या श्री की लोकप्रियता अधिक हुई क्योंकि लक्ष्मी यश, वैभव, ऐश्वर्य व धनधान्य की प्रतीक थीं।

स्त्री शक्ति

शक्ति, ज्ञान और लक्ष्मी, ये तीनों हमारी मूलभूत जरूरतें हैं। इसलिए हम इन तीनों की आराधना करते हैं। आराधना के लिए हम कोई-न- कोई प्रतिमा गढ़ते हैं अपनी कल्पना से, अपनी क्षमता से। लक्ष्मी, सरस्वती और शक्ति-तीनों की प्रतिमा हमने स्त्री रूप में गढ़ी और कहा, मां...! स्त्री का सबसे ज्यादा सृजनशील, सबसे शक्तिशाली, सबसे विनम्र, सबसे समृद्ध, सबसे ज्यादा सहनशील, सबसे क्षमाशील, सबसे ममतामयी और सबसे ज्यादा समर्पित रूप मां...! हमने कहा, 'मां दुर्गे शक्ति दो।' 'मां लक्ष्मी धन दो'। 'मां सरस्वती ज्ञान दो।' वैसे ही जैसे हम अपनी मां से खाना, कपड़ा आश्रय और प्रारंभिक ज्ञान लेते हैं। कभी मांगकर, कभी बिना मांगे ही वह दे देती हैं हमारी जरूरतों को इतनी शिद्दत से शायद ही कोई और समझ सकता है। संभवत: इसलिए हमने इनकी आराधना के लिए मातृरूप ही चुना है। अपनी असली जिंदगी में भी हमने स्त्री को कभी शक्ति, कभी लक्ष्मी तो कभी सरस्वती कहकर पुकारा है। घर की बहू-बेटियों को लक्ष्मी कहा। बेटी पैदा हुई तो कहा लक्ष्मी आई। बहू आई तो कहा गृहलक्ष्मी यानी घर की लक्ष्मी आई। बौद्धों में लक्ष्मी श्री, यश एवं धन की देवी के रूप में प्रचलित हुइंर्। भरहुत, सांची, बोधगया व नागार्जुन कोंडा के स्तूप स्थापत्य में श्री लक्ष्मी का अंकन हुआ है। यहां कमलासना लक्ष्मी को गजाभिषेकयुक्त बताया गया है और अपने दोनों हाथों में कमल नाल व पूर्ण कुंभ लिए हुए उत्कीर्ण किया गया है। प्राचीन मूर्तिशिल्प में श्री देवी अथवा लक्ष्मी का चित्रण तीन रूपों में हुआ है। पहला, लक्ष्मी का श्री तथा कमलारूप, दूसरा गजलक्ष्मी रूप व तीसरा महालक्ष्मी रूप और प्राय: तीनों रूपों के लिए पुराणों में कथाएं दी गई हैं। विष्णु पुराण में कहा गया है कि

लक्ष्मी महर्षि भृगु की कन्या थीं। इनके धाता व विधाता नामक दो भाई थे। बाद में यही लक्ष्मी विष्णु की पत्नी के रूप में लक्ष्मी-नारायण स्वरूप में लोकप्रिय हुइंर्। इसी पुराण में कहा गया है कि लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन द्वारा हुई। देवों व असुरों द्वारा समुद्र मंथन के समय जो चौदह रत्न निकले, उनमें लक्ष्मी भी थीं।

महालक्ष्मी जगजननी हैं। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भी इन्हीं से प्रकट होते हैं तथापि ये अपने एक एक स्वरूप से ब्रह्मा, विष्णु आदि की सेवा में भी रहती हैं। इनकी अभिव्यक्ति श्रीरूप और लक्ष्मी रूप में देखी जाती है। ये दो होकर भी एक हैं तथा एक होकर भी दो। दोनों ही रूपों से यह भगवान विष्णु की अंकशायिनी हैं। श्री ही लक्ष्मी हैं जिन्हें भूदेवी भी कहा जाता है।

इस तरह लक्ष्मी का एक स्वरूप श्रीनारायण से अभिन्न होते हुए सदैव उनके वक्षस्थल में वास करता है तथा कभी उनसे अलग नहीं होता। दूसरा स्वरूप भौतिक अथवा प्राकृत संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी का है। यही श्रीदेवी या भूदेवी हैं। यह भी अनन्य भाव से भगवान विष्णु की सेवा में तत्पर रहती हैं। उक्त भौतिक या प्राकृत संपत्ति जड़ स्वरूप है लेकिन उसे भी श्री या लक्ष्मी कहा जाता है। इस औपचारिक प्रयोग वाली जड़ संपत्ति पर अलग-अलग समय में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों का अधिकार होता रहा है। यह कभी भी किसी एक की होकर नहीं रहती, कहीं भी स्थिर नहीं रहती। इसीलिए लक्ष्मी को चंचला, चपला, बहुगामिनी, सर्वभोग्या आदि भी कहा जाता है। सर जॉन मार्शल इनकी माया देवी की प्रतिमा से तुलना करते हैं। भीटा व थबसाढ़ से प्राप्त मुद्राओं पर लक्ष्मी का यही रूप अंकित हैं। अग्नि पुराण में लक्ष्मी को चतुर्हस्ता कहा गया है, जो अपने दाहिने हाथों में चक्र, शंख और बाएं में गदा व कमल धारण किए हैं। खजुराहो के विष्णु मंदिर में लक्ष्मी का जो अंकन हुआ है, वह भागवत में वर्णित कथा एवं स्वरूप को व्यक्त करता है। विष्णु की पादपीठिका के नीचे अनेक छोटी आकृतियों में लक्ष्मी का अंकन है। देवी कूर्म पर ध्यान मुद्रा में बैठी हैं। पार्श्व में सर्वपुच्छयुक्त दो नाग अंजलि मुद्रा में हाथ जोड़े खड़े हैं। मकरवाहिनी, जलदेवियों पूर्ण कुंभ लिए हैं। कूर्मासना लक्ष्मी को किन्नरगण वेणुगान सुना रहे हैं। कौशाम्बी, उज्जैयिनी और मथुरा से प्राह्रश्वत ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी की मुद्राओं पर लक्ष्मी का गजाभिषेक रूप अंकित मिलता है। पांचाल कुर्णिद, यौधेय और कुषाण सिक्कों पर भी लक्ष्मी का कमलासना, गजाभिषेक अंकन मिलता है।

भुवनेश्वर और जगन्नाथपुरी के मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य में लक्ष्मी का पौराणिक रूप अंकित हुआ है। लक्ष्मी प्रतिमा में प्रकृति पूजा के तत्त्व जल व कमल रूप में व पशु पूजा के तत्त्व गज के रूप में आत्मासात किए हुए, जिसमें कार्तिक अमावस्या के दिन नवान्न धान्य (खील-धानी, शर्करा, गन्ने) से पूजने का विधान हुआ। कृषि प्रधान भारत की यह लक्ष्मी ही यूनान पुराकथाओं में अफ्रोदीती के नाम से पूजनीय बनीं। लक्ष्मी से प्रकाश की प्रार्थना की गई है। इसलिए दीप पूजा गोवर्धन-पूजा भी इससे जुड़ गए।

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