कामनाओं को पूरा करें महालक्ष्मी व्रत से

गृहलक्ष्मी टीम

2nd November 2020

हमारा देश ऋषि-मुनि व त्योहारों का देश है। व्रत व त्योहारों में विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर व्यक्ति इच्छित वर पा सकता है। हमारा देश तो व्रत व त्योहारों का सागर है। ऐसा ही एक व्रत है महालक्ष्मी का व्रत। लेख से जाने कि किस प्रकार आप महालक्ष्मी व्रत करके अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कर सकते हैं?

कामनाओं को पूरा करें महालक्ष्मी व्रत से

भारत ऋषियों, मुनियों के अतिरिक्त उत्सवों, त्योहारों व व्रतों का देश भी माना जाता है। फिर सनातन धर्म तो व्रत या तपस्या के आधार पर सारी अभिलाषित कामनाओं की पूर्ति करता है।

व्रतों की महिमा का वर्णन तो वेदों में भी आदर के साथ मिलता है। जब हम शास्त्रों, पुराणों में वॢणत व्रतों पर नजर डालते हैं तो अनेक व्रत मिलते हैं जिनसे विभिन्न प्रकार की कामनाओं को पूरा किया जा सकता है। फिर भारतीय समाज तो सागर है। इसमें धनी गरीब सभी प्रकार के लोग हैं। धनी होना, वैभव विलास पाना कौन नहीं चाहता? उसके लिए भी वेदों में अनेक मंत्रों व व्रतों का वर्णन है जिनकी पूजा विधियां भी अलग-अलग हैं। आर्थिक समृद्धि पाने के लिए व लक्ष्मी को प्राह्रश्वत करने के लिए एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण व्रत शास्त्रों में है जिसे 'महालक्ष्मी व्रत' के नाम से जाना जाता है।

शास्त्रों में व्रत का महत्त्व 'मनोभिलाषित व्रतानुवर्णनम्' ग्रंथ में दिए गए विवरण के अनुसार महालक्ष्मी व्रत कभी निष्फल नहीं जाता। स्कन्द जी ने एक बार पिता श्री शंकर जी से कहा- हे पिता श्री शंकर जी एक ऐसा व्रत बताइए जिसके करने से सभी कामनाओं की पूर्ति हो सके। तब शंकर जी ने कहा- बहुत ही उत्तम बात है, अनघ आपने पूछा है इसलिए व्रतों में मैं उत्तम व्रत सुना रहा हूं। जिसके करने से कोई मनुष्य कभी दुर्गति को नहीं प्राह्रश्वत हो सकता। दुभर्गा स्त्री भी सुभगा हो जाती है। विधवा कभी नहीं होती। जिससे नर और नारी सभी दुखों से छूट जाते हैं वह महालक्ष्मी का व्रत है। भाद्रपद शुक्लाष्टमी से आरंभ कर सोलह दिन तक चलने वाला यह व्रत आधी रात को अतिक्रमण करके बर्तन वाली अष्टमी में करना चाहिए। 'चन्द्रप्रकाश' में कहा गया है कि उत्तरा तिथि अर्धरात्रि का अतिक्रमण करके मनुष्यों को चाहिए कि महालक्ष्मी व्रत करें।

विधि व विधान- व्रत के पूर्व दिन सायंकाल में नित्यकर्मादि करके व्रत ग्रहण करें। व्रत के दिन स्नानादि नित्यकर्म को संपन्न कर संकल्प करें। अन्त में 'मम से करिष्येÓ तक जोड़ दें। उसके बाद सोलह तन्तुओं से सोलह ग्रंथियुक्त एक सूत्र निर्माण करें। विमल आसन पर महालक्ष्मी के आगे स्थापित कर दें। हाथ में अक्षत लेकर आह्वान करें। 'महालक्ष्मी से लेकर भी लक्ष्मी इहागच्छ' तक कहकर अक्षत छोड़ दें। उसके बाद सोलह दुर्वा, सोलह मालती पुष्प, कर्पूर, चंदन इत्यादि से

श्रीसूक्त से 'ऊँ महालक्ष्मै नम:' इस नाममन्त्र से पूजन कर प्रार्थना करें।

धन-धान्य से लेकर तथा वस पर्यन्त श्लोक पढ़कर दोरक (डोरे) को हाथ में बांधें। पुरुष दक्षिण में तथा स्त्री वाम भुजा में कण्ठ में धारण करें व कथा सुनें या श्री महालक्ष्म्यै नम: का जप करके भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार से कृष्णाष्टमी पर्यन्त प्रतिदिन उसी सूत्र को 'ऊँ लक्ष्मी देवि ग्रहण त्वं' इस मन्त्र से पूजित करके धारण करें। कृष्णाष्टमी को प्रात: रंगवल्ली से युक्त एक मण्डप में अष्टदल कमल पर इन्द्रादि को शक्तियों सहित स्थापित करके श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा, मिट्टी, लकड़ी इत्यादि से निॢमत चार भुजा वाली को स्थापित करें। उसके आगे पूर्वोक्त विधिनुसार नवीन सूत्र स्थापित करके पूजा करें। पुष्प चढ़ाकर अंगपूजा करें।

ये भी रहे ध्यान पुष्प में गन्ध लगाकर 'पूजयामि पर' संबंधित अंगों पर छोड़ें। इस प्रकार आवरण पूजा करके पूर्ववत षोडशोपचार से पूजन करके उस नूतन सूत्र को पहले के समान धारण करके सोलह बार नमस्कार करके पुराने दोरक (डोरे) को पूर्वोक्त मंत्र से लक्ष्मी के बगल में समॢपत करके ब्राह्मणों को पूजित करके वंशपात्र सूप में 16 दीपों, 16 गूहें के पुत्रों, 16 लड्डुओं को रखकर दें। उसके बाद मंत्र 'चतुर्द्धादश से प्रीतयेश्रिय' तक पढ़ें उसके बाद यदि चन्द्रोदय हो गया हो तो चन्द्रमा को पूजित करके अर्ध्य दें। मन्त्र 'नमस्तेऽस्तु से लेकर विधोममÓ तक पढ़कर अर्ध्य दें। उसके बाद भोज न करके रात्रि में जागरण करके प्रात: 'पंकज से त्वत्प्रसादत:' तक पढ़कर लक्ष्मी का विसर्जन करें। सूत्र को एक वर्ष तक धारण करें। इस प्रकार से सोलह वर्ष या सोलह माह तक व्रताचरण करें। असमथविस्था में सोलह दिन तक करके अंत में उद्यापन करें। उद्यापन विधि- संकल्प करें, उसके बाद गणेश पूजन से आरंभ करके आचार्य वरण तक कर्म करें। सर्वतोभद्र के ऊपर ताम्र कलश स्थापित करें। उसके बाद व उसके ऊपर स्वर्ण की या चांदी की महालक्ष्मी की प्रतिमा 'श्रीश्चते' मन्त्र से स्थापित करें। श्रीसूक्त से षोडशोपचार पूजन करके पूष्प पूजा के बाद नाम पूजन करें। नाम पूजन में नम: पर पुष्प छोड़ते जाएं। इस प्रकार से नाम की पूजा करके चंद्रमा को अर्ध्य दें। मन्त्र 'नमस्तेऽस्तु से विद्यो ममÓ तक है। हाथ में लाल फूल लेकर देवी की प्रार्थना श्रीरोदार्णव से लेकर अलक्ष्मीं त्वाशुनाशयÓ तक करें। इस प्रकार प्रार्थना करके रात्रि में जागरण करें। प्रात:काल स्नान करके पूर्ववत महालक्ष्मी को पूजित करके अग्नि को स्थापित कर आज्य भागांत कर्म के बाद प्रधान देवता को घृत, पायस, बिल्वफल इत्यादि से श्रीमहालक्ष्मी मंत्र से 108 बार हवन करके श्रीसूक्त की प्रत्येक ऋचाओं से एक-एक कमल द्वारा होम करें। उसके बाद मंडल देवताओं को एक-एक आज्याहुति देकर अवशिष्ट हवन को समाह्रश्वत कर आचार्य का पूजन करके सामग्री सहित लक्ष्मी जी की प्रतिमा और गौ को दें। उसके बाद षोडश जोड़ा वस्त्र इत्यादि से पूजा करके सूर्प में 16 जगह नाना प्रकार से भक्ष्य पदार्थ चन्दन, ताड़पत्र (ताड़ वाला पंखा) पुंगीफल इत्यादि को रखकर दूसरे सूर्य से उसको आच्छादित कर क्षीरोदार्ण मन्त्र को विष्णु वल्लभा तक पढ़कर दें। उसके बाद सोलह ब्राह्मïणों को संतुष्ट कर आशीर्वाद लेकर स्वयं भोजन करें।

इस प्रकार इस व्रत के संपूर्ण होने पर नर-नारी सभी प्रकार से संपन्न होते हैं व सौभाग्यशाली होकर जीवन व्यतीत करते हैं। जिसका जो मनोरथ होता है, उसे वही मिल जाता है, यह निश्चित है।

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