धन के लिए लक्ष्मी की पूजा ही क्यों?

Grelaxmi Team

3rd November 2020

ईर्ष्या वैमनस्य

धन के लिए लक्ष्मी की पूजा ही क्यों?
बल और बुद्धि के घोड़े पर सवार चतुरता, चालाकी के साथ आजीविका के लिए मनुष्य येन-केन-प्रकारेण प्रयास करता है और यदि उससे पूछा जाए कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है तो अधिकांशत: यही उत्तर प्राप्त होगा कि जीवन में अधिक से अधिक धन की प्राप्ति करना, ऐश्वर्य की प्राप्ति करना। मनुष्य धन की अधिष्ठात्री लक्ष्मी के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाता है, इसीलिए वर्तमान समय में विषमता, ईर्ष्या वैमनस्य, लूटमार, धोखाधड़ी, ठगी का ही वातावरण चल रहा है।
यहां पर मूल रूप से कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं, जिन्हें समझना अत्यंत आवश्यक है- क्या लक्ष्मी का तात्पर्य केवल धन प्राप्ति ही है? क्या धन प्राप्ति से जीवन की सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है? क्या धन प्राप्ति के लिए कोई भी मार्ग अपनाना उचित है?
यही प्रश्न हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषि-मुनियों के मन में भी अवश्य आया होगा तभी उन्होंने लक्ष्मी की पूर्ण व्याख्या की। प्रारंभ में लोक में यही विवरण आया है कि लक्ष्मी जो श्री से भिन्न होते हुए भी श्री का ही स्वरूप हैं, जो पालनकर्ता विष्णु के साथ रहती हैं, जिनके चारों ओर सारे नक्षत्र विचरण करते हैं, जो सारे लोकों में विद्यमान हैं, उस 'श्री' को मैं वन्दन करता हूं।
अर्थात् 'श्री' ही मूल रूप से लक्ष्मी हैं और इसीलिए हमारी संस्कृति में मिस्टर की जगह श्री लिखा जाता है अर्थात् वह व्यक्ति जो 'श्रीÓ से युक्त है, उसी के नाम के आगे 'श्रीÓ लगाकर संबोधित किया जाता है।
'श्री सूक्त' जिसे लक्ष्मी सूक्त भी कहा जाता है, उसमें लक्ष्मी की 'श्री' रूप से ही प्रार्थना की गई है, उस लक्ष्मी की प्रार्थना की गई है,  जो वात्सल्यमयी हैं, धन-धान्य, संतान देने वाली हैं, जो मन और वाणी को दीह्रश्वत करती हैं, जिनके आने से दानशीलता प्राप्त होती है, जो वनस्पति और वृक्षों में स्थित हैं, जो कुबेर, इन्द्र और अग्नि अर्थात् तेजस्विता प्रदान करने वाली हैं, जो जीवन में परिश्रम का ज्ञान कराती हैं, जिनके कारण आकर्षण शक्ति स्थित होती है, जिसकी कृपा से मन में शुद्ध संकल्प और वाणी में सत्यता आती है, जो शरीर में तरलता और पुष्टि प्रदान करने वाली हैं, उस 'श्री' का जीवन में स्थायी स्थान के लिए बार-बार प्रार्थना और नमन किया गया है। यहां भी इस सूक्त में धन के साथ शुद्ध संकल्प, शुद्ध विचार, शारीरिक पुष्टता, आर्द्रता, प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ तेज की प्रार्थना है।
इस श्लोक में एक विशेष बात यह कही गई है कि लक्ष्मी की ज्येष्ठ भगिनी अर्थात् अलक्ष्मी अर्थात् दरिद्रता है जो भूख और ह्रश्वयास के साथ दुर्गन्धयुक्त है, अर्थात् यदि जीवन में धन तो है, लेकिन तृष्णाएं यथावत हैं, मानसिक रूप से विकारों में मलिनता है तो वह लक्ष्मी 'श्री' रूपी लक्ष्मी नहीं हैं और वह लक्ष्मी स्थायी रह भी नहीं सकती हैं। जो 'श्री' रूपी लक्ष्मी हैं, वही जीवन में स्थायी रह सकती हैं और इस श्री रूपी लक्ष्मी की नौ कलाओं का जब जीवन में पदार्पण होता है तभी जीवन में पूर्णता आ पाती है।

क्या अर्थ है शुभ-लाभ का?
शुभ-लाभ का शाब्दिक अर्थ वही है जो आप समझते हैं। किन्तु दो बातें आपको सोचनी होगी। पहली यह कि सभी देवताओं से हम अपने शुभ-लाभ की प्रार्थना करते हैं, परंतु उनके साथ या उनके नाम के आगे-पीछे शुभ-लाभ क्यों नहीं लिखते। यहां तक कि लक्ष्मी जी जो ऐश्वर्य की ही देवी मानी जाती हैं उनके नाम के साथ शुभ-लाभ नहीं जोड़ते।
अत: गणेश जी के साथ शुभ-लाभ जोड़ने का विशेष कारण अवश्य होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि प्रत्येक देवाधिदेव के साथ में उनकी शक्ति, प्रिया अथवा भार्या यानी पत्नी का नाम उनके नामों के पूर्व या बाद में जोड़ते हैं। लेकिन पार्वती नंदन श्री गणेश जी की एक नहीं दो पत्नियां हैं। ब्राह्मïण या पुरोहित गणपति पूजन कराते समय प्राय: उच्चारण करते हैं, रिद्धि सिद्धि सहिताय महागणाधिपतये नम:। किंतु उनमें से शायद ही कोई जानता हो कि उक्त कथन का वास्तविक अर्थ क्या है। आप पूछेंगे तो बता देंगे कि रिद्धि तथा सिद्धि को प्रदान करने वाले महागणेश को नमस्कार करता हूं। यह पूर्ण अर्थ नहीं है और न हो सकता है।
वास्तव में श्रीगणेश जी की दो पत्नियां हैं और उनमें से एक का नाम रिद्धि और दूसरी का नाम सिद्धि है। इसीलिए रिद्धि सिद्धि सहिता श्रीमन महागणाधिपतये नम: कहा जाता है। परम पूज्या रिद्धि-सिद्धि सहित श्रीमान्य महागणों के स्वामी विनायक या गणेश जी को नमस्कार है। अब तक आपने नहीं जाना तो अब आप जान लें कि श्रीगणेश जी की दो पत्नियां हैं और दोनों सगी बहनें हैं। उनमें से एक का नाम रिद्धि और दूसरी का नाम सिद्धि है।
अब शुभ-लाभ शब्दों को केवल गणेश जी के नाम के साथ ही क्यों प्रयुक्त किया जाता है यह भी समझ लें।
श्री गणेश जी की दो पत्नियां हैं तो उनके दो पुत्र भी हैं। एक का नाम क्षेम है और दूसरे का नाम लाभ है। क्षेम का ही नाम शुभ हुआ। वैसे भी क्षेम का अर्थ कुशलता, रक्षा करना, रक्षा होना, शुभत्व है। वहीं गणेश जी के एक पुत्र क्षेम ही शुभ हैं और एक पुत्र लाभ हैं। कहीं-कहीं क्षेम-लाभ या लाभ-क्षेम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।
सारांश में शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार जब गणेश जी को विवाह करने की इच्छा हुई और उनके माता-पिता पार्वती-शंकर जी ने इस विषय पर गंभीरता से विचार किया तो प्रजापति विश्वरूप ने अपनी दिव्यस्वरूपा, सर्वांग शोभना रिद्धि तथा सिद्धि नामक दोनों कन्याओं से श्रीगणेश जी का विवाह कर दिया। गणेश जी की उन दोनों पत्नियों से एक-एक दिव्य पुत्र हुए। उनमें से सिद्धि नामक पत्नी से क्षेम पुत्र पैदा हुआ और रिद्धि नामक पत्नी से लाभ नामक
पुत्र पैदा हुआ। ये दोनों पुत्र अत्यंत योग्य एवं सर्वसुख प्रदान करने वाले हुए।
शुभ-लाभ या क्षेम-लाभ नामक इन बालकों को महाशक्तिस्वरूपा पार्वती जी का तथा देवाधिदेव महादेव शंकर जी का प्रेम स्नेह एवं आशीर्वाद तो प्राप्त था ही, साथ ही अपनी दोनों माताओं रिद्धि तथा सिद्धि का रूप सौंदर्य तथा गुण भी प्राप्त हुआ। पिता श्री गणेश रुद्रगणों मे गणाध्यक्ष थे और अत्यंत पराक्रमी थे, अत: उनको शक्ति पराक्रम एवं वीरत्व भी प्राप्त होना स्वाभाविक था। अत: ये दोनों क्षेम तथा लाभ नामक गणेश के पुत्र उन्हें परमप्रिय हैं।
यही कारण है कि रिद्धि-सिद्धि, संहिताएं महागणाधिपतये नम: के साथ प्रत्येक शुभ अवसर पर दुकानों, तिजोरियों, बही-खातों आदि में शुभ-लाभ लिखा जाता है। इस प्रकार उपरोक्त विवरण से आप समझ सकते हैं कि शुभ-लाभ का अर्थ क्या होता है और इसका हमारे धर्म में कितना अधिक महत्त्व है।

यह भी पढ़ें -अथ देवी कवच

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