गुरू नानक देव जी

Jyoti Sohi

9th November 2020

बचपन से ही इनमें आध्यात्मिक, विवेक और विचारषील जैसी कई खूबियां मौजूद थीं। गुरु जी ने जन कल्याण व समाज सुधार के लिए चार उदासियाँ की। पहली उदासी पूरब दिशा की तरफ संवत 1556-1565 तक की व दूसरी उदासी दक्षिण दिशा की और संवत 1567-1571 तक की। यहीं तक गुरु जी नहीं रुके, उनकी अगली उदासी उत्तर दिशा की तरफ संवत 1571 में प्रारम्भ हो गई तथा चौथी उदासी संवत 1575 के साथ यह कल्याण यात्रा समाप्त हो गई।

गुरू नानक देव जी
           
        सतिगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होआ 
        जिउ कर सूरज निकलिआ तारे छपे अंधेर पलोआ
चारों ओर ज़ोर ज़बरदस्ती और कमज़ोर लोगों पर अत्याचारों की चीख पुकार सुनाई दे रही थी। उसी क्षण दुख दर्द से दो चार हो रही सृष्टि को संवारने के लिए अकाल पुरख ने गुरु नानक देव जी के रूप में अवतार धारण किया। जलते हुए संसार की रक्षा करने के लिए माता तृप्ताजी की कोख से महिता कालू चंद बेदी खत्री के घर राये भोये की तलवंडी (ननकाना साहिब) में संवत १५२६ उनका जन्म हुआ। गुरुनानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु हैं। इनके दो पुत्र श्रीचंद और लख्मी चंद थें। गुरू नानक देव जी का विवाह सोलह साल की आयु में सुलक्खनी नाम की कन्या के साथ हुआ था। बचपन से ही इनमें आध्यात्मिक, विवेक और विचारषील जैसी कई खूबियां मौजूद थीं। गुरु जी ने जन कल्याण व समाज सुधार के लिए चार उदासियाँ की। पहली उदासी पूरब दिशा की तरफ संवत 1556-1565 तक की व दूसरी उदासी दक्षिण दिशा की और संवत 1567-1571 तक की। यहीं तक गुरु जी नहीं रुके, उनकी अगली उदासी उत्तर दिशा की तरफ संवत 1571 में प्रारम्भ हो गई तथा चैथी उदासी संवत 1575 के साथ यह कल्याण यात्रा समाप्त हो गई।
जब गुरु नानक जी 12 वर्ष के थे उनके पिता ने उन्हें 20 रूपए दिए और अपना एक व्यापर शुरू करने के लिए कहा ताकि वे व्यापर के विषय में कुछ जान सकें। पर गुरु नानक जी नें उस 20 रूपये को गरीब और संत व्यक्तियों को खाना खिलने में खर्च कर दिया। जब उनके पिता नें उनसे पूछा तुम्हारे व्यापर का क्या हुआ? तो उन्होंने उत्तर दिया मैंने उन पैसों का सच्चा सौदा किया। जिस जगह पर गुरु नानक जी नें उन गरीब और संत व्यक्तियों को भोजन खिलाया था। वहां सच्चा सौदा नाम का गुरुद्वारा बनाया गया है।
गुरू जी ने इस प्रकार लंगर की परंपरा चलाई, जहां सभी जातियों के लोग  एक पक्ति में बैठकर भोजन करते थे। आज भी सभी गुरूद्वारों में गुरू जी की षुरू की गई लंगर की प्रथा कायम है। लंगर में बिना किसी भेदभाव के संगत लंगर ग्रहण करती है।  
एक कथा के अनुसार गुरु नानक देव जी एक गरीब बढई के घर में ठहरे है। उसी गांव में ऊँची जाति का एक धनवान व्यक्ति मलिक भागो रहता था। उसने अपने यहाँ दूर-दूर से साधू-संतो को बुलाकर एक भव्य भोज का आयोजन करवा रखा था। उन्होंने नानक को भोज में बुलाया किन्तु उन्होंने वहां जाने से इंकार कर दिया। आखिर भागो ने उनसे अपने यहाँ न खाने का कारण जानना चाहा तो नानक ने कहा- मैं ऊँच-नीच में भेदभाव को नहीं मानता, लालो मेहनत से कमाता है जबकि तुम गरीबो, असहायों को सताकर दौलत कमाते हो। उसमे मुझे गरीबो के छीटें नजर आते है। जब नानक जी ने एक हाथ से लालो की सूखी रोटी और दूसरे हाथ से भागो के घर का पकवान और जब दोनों हाथांे को निचोड़ा तो लालो की रोटी से दूध निकला तो वही भागो की रोटी से खून निकला। यह देखकर भागो और अन्य लोग भौचक्के रह गये। 
नानक ने अपनी यात्रा में मक्का और मदीना की भी यात्रा की। कहते है की एक बार भूलवश नानक जी जब लेटे थे, तो उनका पैर काबा की तरफ था।एक व्यक्ति ने उनसे कहा की वे अपने पैर काबा की तरफ करके क्यों लेटे है तो नानक ने कहा की तुम मेरे पैर को उधर घूमा दो जहां काबा नहीं है। वह व्यक्ति जिधर पैर घूमाता, उधर काबा ही नजर आता है। अंत में उस व्यक्ति ने नानक जी से माफी मांगी।
श्री गुरु नानक जी से जुड़े कुछ प्रमुख गुरुद्वारा साहिब
1. गुरुद्वारा कंध साहिब- गुरुदासपुर के बटाला में बने इस गुरूद्वारे में गुरु नानक देव जी का विवाह संपन्न हुआ था। गुरु नानक की विवाह वर्षगाँठ पर यहां प्रतिवर्ष उत्सव मनाया जाता है।
2. गुरुद्वारा हाट साहिब- कपूरथला में बने इस गुरूद्वारे के स्थान पर गुरुनानक ने सुल्तानपुर के नवाब के यहाँ नौकरी प्रारंभ की। यहीं से नानक को ‘तेरा' शब्द के माध्यम से अपनी मंजिल का आभास हुआ था।
3. गुरुद्वारा गुरु का बाग- कपूरथला में बने इस गुरूद्वारे में यह गुरु नानक देव जी का घर था, जहाँ उनके दो बेटों बाबा श्रीचंद और बाबा लक्ष्मीदास का जन्म हुआ था।
4. गुरुद्वारा कोठी साहिब- कपूरथला में नवाब दौलतखान लोधी ने हिसाब-किताब में गड़बड़ी की आशंका में नानक देव जी को जेल भिजवा दिया। लेकिन जब नवाब को अपनी गलती का पता चला तो उन्होंने नानक देव जी को छोड़ कर माफी ही नहीं माँगी, बल्कि प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन गुरु नानक ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
5. गुरुद्वारा बेर साहिब- सुल्तानपुर लोधी अर्थात् कपूरथला जब एक बार गुरु नानक अपने सखा मर्दाना के साथ नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए, जहाँ पर कि उन्होंने ईश्वर से साक्षात्कार किया। सभी लोग उन्हें डूबा हुआ समझ रहे थे, लेकिन वे वापस लौटे तो उन्होंने कहा- एक ओंकार सतिनाम। गुरु नानक ने वहाँ एक बेर का बीज बोया, जो आज बहुत बड़ा वृक्ष बन चुका है।
6. गुरुद्वारा अचल साहिब- गुरुदासपुर अपनी यात्राओं के दौरान नानक देव जी यहाँ रुके और नाथपंथी योगियों के प्रमुख योगी भांगर नाथ के साथ उनका धार्मिक वाद-विवाद यहाँ पर हुआ। योगी सभी प्रकार से परास्त होने पर जादुई प्रदर्शन करने लगे। नानकदेवजी ने उन्हें ईश्वर तक प्रेम के माध्यम से ही पहुँचा जा सकता है, ऐसा बताया।
वे हिंदू मुस्लिम एकता के भारी समर्थक थे। धार्मिक सद्भाव की स्थाप्ना के लिए उन्होनें सभी तीर्थों की यात्राएं की। साथ ही सभी धर्माें के लोगों को अपना षिश्य बनाया। 25 वर्श के भ्रमण के बाद गुरू नानक देव जी करतारपुर में ही बस गए और वहीं रहकर उपदेष देने लगे। उनकी वाणी आज भी गुरू ग्रंथ साहिब में संग्रहित है।
गुरू नानक देव जी ने इन तीन शिक्षाओं पर ज़ोर दिया।
नाम जपना यानि दैनिक पूजा करो और सदैव भगवान का नाम लेते रहो।
किरत करो यानि ईमानदारी से अपना कार्य करो।
वांड के शको यानि परोपकार और सेवा की भावना बनाए रखो। साथ ही अपनी आय का कुछ हिस्सा गरीब लोगों में बांटो। 
गुरू जी के प्रमुख उपदेश
ईश्वर की मौजूदगी हर जगह है। सबके साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहिए।
अपने हाथों में परिश्रम करें, लोभ को त्याग कर एंव न्यायोचित साधनों से धन का अर्जन करना ही उचित है। कभी भी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए।
अपनी कमाई का दसवंद परोपकार के लिए एंव अपने समय का प्रभु सिमरन अथवा ईष्वर के लिए लगाना चाहिए।
गुरू जी ने चिंता मुक्त रहकर कर्म करने को उत्तम कहा है। 
गुरु नानक देव पूरे संसार को एक घर मानते थे जबकि संसार में रहने वाले लोगों को एक ही परिवार का हिस्सा। 
अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। इसलिए अहंकार कभी नहीं करना चाहिए बल्कि विनम्र होकर सेवाभाव से जीवन गुजारना चाहिए। 
तनाव मुक्त रहकर अपने कर्म को निरंतर करते रहना चाहिए तथा सदैव प्रसन्न भी रहना चाहिए।
 संसार को जीतने से पहले स्वयं अपने विकारों और बुराईयों पर विजय पाना अति आवश्यक है।
                                        

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