बांधवगढ़ नेशनल पार्क आएं, यादें ले जाएं

चयनिका निगम

15th November 2020

बांधवगढ़ नेशनल पार्क को पूरी दुनिया में बाघों के लिए ही जाना जाता है। आपको इस प्राकृतिक जगह आकर जरूर सुकून की अनुभूति होगी।

बांधवगढ़ नेशनल पार्क आएं, यादें ले जाएं

प्रकृति के करीब जाने का मन तब हर बार करता है, जब कहीं से कोई आशा की किरण न दिख रही हो। जैसा आज का समय है कोरोना ने हम सबकी जिंदगियों में मानो अंजाने डर को घोल दिया है। हम सब कुछ भी करने, बाहर निकलने और यहां तक कि दोस्तों से मिलने में भी कतरा रहे हैं। ठीक इसी समय हमें प्रकृति की शुद्धता अपनी ओर खींच लेती है। आप भी इसी मनः स्थिति में हैं तो प्रकृति के सबसे असल रूप बांधवगढ़ नेशनल पार्क आपका इंतजार कर रहा है। मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में इस नेशनल पार्क की अपनी अलग ही छटा है। यहां राष्ट्रीय पशु बाघ आराम फरमाता दिख जाएगा तो हरियाली इतनी दिखेगी कि मन खुश हो जाए। कुल मिलाकर यहां की आबोहवा आपको बिलकुल तरोताजा कर देगी। चलिए एक बार कराते हैं आपको

बांधवगढ़ के दर्शन-

32 पहाड़ियों वाला बड़ा नेशनल पार्क-

1968 में नेशनल पार्क बनाया गया बांधवगढ़ एक ऐसा पार्क है, जिसके आस-पास 32 पहाड़ियां हैं और इसका क्षेत्रफल 437 वर्ग किलोमीटर है। ये आपने आप में बड़ा लेकिन हरियाली से भरपूर नेशनल पार्क है। ये इतना बड़ा है कि आपको कई बाघ यूंही टहलते हुए मिल जाएंगे। आप जब भी जंगल जाएंगे तो हो सकता है हर राइड में यहां आपको बाघ के दर्शन हो जाएं। 

2000 साल पुराना किला-

बांधवगढ़ के अंदर 2000 साल पुराना किला बना है। माना जाता है किये रीवा राजाओं का था। 800 मीटर ऊंचे इस किले से जंगल और पूरे शहर का दृश्य देखा जा सकता है। इस किले पर बहुत सालों तक रीवा के राजाओं ने राज किया है। 

बांधवधीश लक्ष्मण-

इस किले के बारे में एक कहानी और प्रचलित है। माना जाता है कि इस किले को उन वानरों ने बनाया था, जिन्होंने भारत और श्रीलंका के बीच सेतुसमुद्रम बनाया था। बाद में जब राम, लक्ष्मण और हनुमान श्रीलंका से लौटे तो उन्होंने यहीं आराम किया था। बाद में श्रीराम ने इसे लक्ष्मण को देकर उन्हें बांधवधीश की उपाधि भी दे दी थी। 

 

नाम कैसे मिला-

इस पार्क को बांधवगढ़ क्यों कहा जाता है? जवाब काफी रोचक है। क्योंकि राम जी ने लंका से लौटकर ये किला लक्ष्मण को दिया था। फिर उन्हें बांधवधीश की उपाधि भी दी थी। भाई को बंधु भी कहते हैं। इसलिए इन नामों से प्रेरणा लेकर ही इस जगह का नाम बांधवगढ़ रखा गया। 

 

सबसे नजदीकी जगह-

यहां अगर सड़क रास्ते से आना चाहती हैं तो सबसे नजदीकी शहर जबलपुर है, जो यहां से 164 किलोमीटर दूर है। जबलपुर से बांधवगढ़ पहुंचने के लिए करीब 3 घंटे का समय लगता है। जबलपुर देश के सभी बड़े शहरों से रेल और हवाई मार्ग से जुड़ा है। खजुराहो से बांधवगढ़ के बीच की दूरी 237 किलोमीटर की है। इस दूरी के बीच केन नदी के कुछ हिस्से को क्रोकोडाइल रिजर्व भी बनाया गया है। ये भी यात्रियों के आकर्षण का केंद्र बनती है। 

 

250 प्रजातियां हैं यहां-

बांधवगढ़ नेशनल पार्क में पशु-पक्षियों की कई प्रजातियां देखी जा सकती हैं। यहां पशुओं की 22 और पक्षियों की 250 प्रजातियां देखी जा सकती हैं। इन सबको देखने का मौका आपको जीप की राइड लेकर मिल सकता है। 

 

सही समय-

बांधवगढ़ जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से जून के बीच का माना जाता है। फरवरी से अप्रैल के बीच अगर यहां आया जाए तो बेहद सुंदर लाल रंग के फूलों से ढका हुआ जंगल देखा जा सकता है। 

 

पेड़-पौधों से भरपूर-

इस नेशनल पार्क में पेड़ों की संख्या अनगिनत और बहुतायत है। यहां पर पूरा वन क्षेत्र फ्लोरा और फना की तरह-तरह की प्रजातियों से भरा हुआ है। आपको यहां आकर लगेगा मानो प्रकृति को बिलकुल करीब से देख रहे हैं। या कहें कि आप खुद स्वर्ग में पहुंच गए हों। सुख-शांति का ऐसा डोज आप यहां से लेकर जाएंगी कि लंबे समय तक आपको इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।

 

रखरखाव और राजा-

ये किला लंबे समय तक रीवा के राजाओं के अधीन ही रहा है। तब बांधवगढ़ के चारों ओर फैले जंगल को रीवा के राजा की शिकरगाह ही माना जाता था। राजा किले और उसके आस-पास के क्षेत्र से अक्सर चीतों का शिकार किया करते थे। राजा ने आखिरी बार 1951 में यहां से चीते का शिकार किया था। 

 

टाइगर प्रोजेक्ट-

साल 1993 में इस नेशनल पार्क को टाइगर प्रोजेक्ट के अंतर्गत लाया गया है। तब ये ये क्षेत्र देश-विदेश में भी टाइगर क्षेत्र के रूप में प्रचलित है। यहां बाघों की तादाद ज्यादा है और इन्हें कई दफा यूंहीं सड़कों पर टहलते हुए देखा जा सकता है। 

 

सफेद बाघ वाला बांधवगढ़-

माना जाता है कि सफेद बाग अब भारत में नहीं मिलते हैं लेकिन बांधवगढ़ में ये 8 बार देखे गए थे। रिकॉर्ड ये भी कहते हैं कि पहला सफेद बाघ यहीं देखा गया था। 1951 में रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह ने एक सफेद बाघ पकड़ा था। उनको बांधवगढ़ के ही बागरी फॉरेस्ट में ये बाघ मिला था। राजा ने इस बाघ को मोहन नाम दिया था। महाराजा मार्तंड ने बाद में इस एक नर बाघ से कई सारे दूसरे सफेद टाइगर भी ब्रीड किए और विदेश भी भेजे। इसलिए भारत में जो भी सफेद टाइगर थे, उन्हें मोहन का ही वंश माना जाता है। 

 

कैसे लेंगे राइड-

बांधवगढ़ पहुंचकर अंदर जाने और जंगल की दुनिया से रूबरू होने के लिए आपको कुछ नियमों का पालन भी करना होगा। यहां पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर टोकन बांटे जाते हैं। इसके बाद आपको जंगल ऑथारिटी की ओर से ऑर्थराइज जीपों में बैठ कर जंगल की सैर पर जाने का मौका मिलता है। अंदर आपको किसी भी चीज को छूने और साथ लाने की इजाजत बिलकुल नहीं होती है। आप दूर से ही जंगली जानवरों को देख सकती हैं। इस राइड की आपको पेमेंट भी करनी होती है। 

 

ये भी पढ़ें-

शांति और सुकून के लिए जाएं वियतनाम

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

ये हैं इंडिय...

ये हैं इंडिया के टॉप 10 वाइल्ड लाइफ डेस्टिनेशन...

रोमांच प्रेम...

रोमांच प्रेमी हैं तो कीजिए तेलंगाना के इन...

जंगल सफारी क...

जंगल सफारी के लिए फेमस- जिम कॉर्बेट

बच्चों को घु...

बच्चों को घुमाएं दिल्ली और मुंबई

पोल

आपको कैसी लिपस्टिक पसंद है

वोट करने क लिए धन्यवाद

मैट

जैल

गृहलक्ष्मी गपशप

समृद्धिदायक ...

समृद्धिदायक लक्ष्मी...

यू तो लक्ष्मी साधना के हजारों स्वरूपों की व्याख्या...

कैसे करें लक...

कैसे करें लक्ष्मी...

चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें...

संपादक की पसंद

कैसे दें घर ...

कैसे दें घर को फेस्टिव...

कैसे दें घर को फेस्टिव लुक

घर पर भी सबक...

घर पर भी सबकुछ और...

‘जब से शादी हुई है सिर्फ लाइफ मैनेज करने में ही सारी...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription