"रेत की दीवार"

अर्चना त्यागी

18th November 2020

"यह लड़का अपने शहर का ही रहने वाला है रीना। स्वभाव का भी बहुत अच्छा है। हमारी फैक्ट्री के पास जो कैमिकल प्लांट है उसी में काम करता है। फैक्ट्री के किसी काम से मुझसे मिलने आया था।परिचय हुआ तो मैं अपने साथ घर ले आया। तुम्हे मिलकर अच्छा लगेगा। अपने शहर से वैसे भी यहां कोई आता नहीं है।"

"रेत की दीवार"

संदीप फैक्ट्री से आ गए थे। उनके साथ एक नवयुवक भी था। उसी का परिचय दे रहे थे। मैं ड्रॉइंग रूम में आ गई। उसको बिठाया। थोड़ी बहुत औपचारिक बातें की और रसोई में आ गई। उसके व्यवहार में शालीनता थी। अपने परिवार के बारे में उसने ज्यादा कुछ नहीं बताया।

स्कूल के समय से ही वह हॉस्टल में रहा था। खाना खाते ही वह वापस चला गया। किट्टू और सक्षम अपने गृहकार्य में व्यस्त थे, इसीलिए अंकुश से नहीं मिल पाए। उन्होंने पूछा जरूर कि कौन आया था घर पर ? सुनकर खुश भी बहुत हुए कि हमारे शहर से ही कोई आया था। अंकुश कभी कभी घर पर आ जाता। बच्चों के साथ भी घुल मिल गया। मिलनसार तो बहुत नहीं था परन्तु व्यावहारिक था। जितनी देर घर पर होता, परिवार के सदस्य की तरह ही रहता। ज्यादा समय किट्टू और सक्षम के साथ व्यतीत करता। आने से पहले फोन करके पता कर लेता कि वो दोनो घर पर हैं या नहीं।

घर से इतनी दूर, दूसरे प्रदेश में कोई अपने गृहनगर का मिल जाए तो परिवार के सदस्य जैसा ही लगता है। आखिरकार हैं तो हम मनुष्य ही। परिवार और समाज से जुड़े रहना हमारी प्रवृति होती है।

एक दिन संदीप ने बताया कि अंकुश कि शादी होने वाली है। अंकुश भी शादी का कार्ड लेकर घर आया। बड़ी आत्मीयता से उसने निमंत्रण दिया। आंटी, किट्टू और सक्षम तीनों को जरूर आना है शादी में। अंकल के अकेले आने की मै गिनती नहीं करूंगा। उसने जाते जाते कहा।
उसकी शादी में शामिल होने के लिए हम सभी उत्साहित थे। सारी तैयारियां भी हो गई थी। शादी से ठीक एक दिन पहले संदीप के एक मित्र जो विदेश में रहते थे, परिवार सहित घर पर आ गए। चाहकर भी हम लोग शादी में नहीं जा पाए। मन मारकर रह गए। अंकुश को फोन करके बता दिया सब।

अंकुश शादी के अगले हफ़्ते वापस आ गया। उसकी पत्नी अभी पढ़ रही थी। अपनी परीक्षाओं के लिए उसे वापस जाना था इसलिए अंकुश भी वापस लौट आया। शादी की मिठाई लेकर अंकुश घर आया। हमारे नहीं आ पाने का कारण उसे मालूम था इसलिए कुछ नही बोला। हां एक बात मुझे थोड़ी खटकी। उसके चेहरे पर नए दूल्हे जैसी रौनक नहीं थी। वो खुशी नहीं थी जो नई नई शादी होने पर चेहरे पर झलकती है। चहकता तो वह पहले भी नहीं था बस यही सोचकर मैंने कुछ नहीं पूछा। संदीप को जरूर बताया। वह भी मुस्कुराकर यही बोले, "अंकुश का व्यक्तित्व बहुत संतुलित है। अपनी भावनाओं को काबू में रखना उसको भली भांति आता है।" उनकी बात से मैं भी सहमत थी। 

संदीप ने बताया कि अंकुश के घर वाले आएंगे उसकी पत्नी स्नेहा को लेकर। हमे भी जाना पड़ेगा उनके स्वागत के लिए। मेरे पास भी अंकुश का अलग से फोन आया। "चाची आप जरूर आना। स्नेहा आपसे मिलकर बहुत खुश होगी।" मैंने उसको आश्वासन दिया जरूर आने का। वैसे भी स्नेहा से तो मिलना ही था। शादी में भी नहीं जा पाए थे।

शनिवार शाम का कार्यक्रम बना। बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं था। अंकुश से दोनों को ही बहुत लगाव था। शनिवार तक किट्टू रोज तैयारी करती रही। उसका उत्साह देखने लायक था। मेरे कपड़े, अपने कपड़े, भैया और पापा के कपड़े सब उसने पहले ही निकालकर रख लिए।  शनिवार शाम को निर्धारित समय पर हम लोग अंकुश के घर पहुंच गए। दरवाजा अंकुश ने ही खोला। ड्रॉइंग रूम में पहुंचे तो स्नेहा भी आ गई। इतने अपनेपन से मिली कि लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे थे।

स्नेहा हमारे पास ही बैठ गई। "मम्मी पापा कहां है ?" मैंने उससे पूछा। उसने अंकुश की और  देखा। "वो दोनो पार्क में गए थे। आते ही होंगे। मैं फोन कर देता हूं।" कहकर अंकुश ने फोन मिला लिया। स्नेहा कभी मुझसे कभी बच्चों से लगातार बातचीत कर रही थी। संदीप अंकुश के साथ खड़े थे। कुछ देर बाद अंकुश के माता पिता आ गए। उनके स्वागत के लिए मैं खड़ी हुई परन्तु जैसे ही सामने देखा मेरे पैरों के नीचे जमीन खिसक गई। देवेन्द्र और सुनयना के रूप में मेरा कड़वा अतीत मेरे सामने खड़ा था। "तो ये अंकुश के माता पिता हैं ?" मैंने स्वयं को ही बताया।

वो दोनों हमे देखकर मुस्कुरा रहे थे। परन्तु मेरा चेहरा भावहीन था। "हे ईश्वर कौन सी परीक्षा ले रहा है?" मैनें मन ही मन भगवान को याद किया। संदीप देवेन्द्र के साथ बातों में व्यस्त थे। सुनयना बात को समझकर अंदर चली गई थी नाश्ते के इंतजाम के बहाने। स्नेहा को उसने मेरे पास भेज दिया। परन्तु अब तो स्नेहा की बातों से मेरा मन हट चुका था। बस इंतजार कर रही थी कि कब यहां से निकलें। घर जाऊं और अपने आप को व्यवस्थित कर पाऊं। देवेंद्र और सुनयना दोनों अंकुश के पिता और मां की तरह ही व्यवहार कर रहे थे। आज पहली बार मैं चाहती थी कि देवेंद्र की मुझसे कोई बात ना हो। वो सुनयना तक ही सीमित रहे।

संदीप पूरी कोशिश कर रहे थे कि मैं सामान्य हो जाऊं। उन्हें लग रहा था जैसे उनकी किसी बात से मैं परेशान थी। उन्होंने चाय बनाकर लाने का प्रलोभन भी दिया। मैं उठकर कोई बात नहीं करना चाहती थी, इसलिए सोने का बहाना करके लेटी रही। रात भर उथल पुथल चलती रही मन में। एक के बाद एक दृश्य आंखों के सामने घूमते रहे। दस साल पहले की जिंदगी चलचित्र की भांति मस्तिष्क पटल पर घूमने लगी। एक दुर्घटना में मम्मी पापा की मृत्यु के बाद भाभी के लगातार दबाव में भाई ने मेरी  शादी  का मन बनाया। जल्दी ही अच्छा लड़का भी मिल गया। भाभी को शादी की ज्यादा ही जल्दी थी इसलिए लड़के के बारे में ज्यादा खोजबीन नहीं की गई।


शहर में बहुत से संबंधी। वैसे भी पैसा हो तो संबंध बन ही जाते हैं। घर में काम करने वाले नौकर चाकर। उस वैभव में खोकर कुछ समय तक तो माता पिता अपना घर भूल ही गई थी। रिश्तेदार भी चर्चा करते मेरी किस्मत की। भाई ने कितनी अच्छी जगह भेजा है अपनी बहन को। साथ की लड़कियां मन ही मन जलन करती मेरी किस्मत से। मैं भी एक अलग ही दुनिया में थी। जो सपने आंखों ने देखने की हिम्मत नहीं की, वो सच हो गए थे।

देवेन्द्र का केवल व्यक्तित्व ही प्रभावशाली नहीं था, पढ़ने लिखने में भी वो चारों भाइयों में अव्वल थे। खेल कूद में अत्यधिक रुचि होने के कारण उन्होंने शारीरिक शिक्षा की ही पढ़ाई की थी। घर के पास एक प्राईवेट स्कूल में शारीरिक शिक्षक के पद पर नियुक्त थे। विद्यालय से आने के बाद भी शाम को दो घंटे स्टेडियम में अभ्यास के लिए जाते थे। विद्यालय घर के पास ही था इसलिए  बीच में खाना खाने घर आ जाते।

शादी के बाद कुछ महीने दावतों में ही निकल गए। देवेन्द्र विद्यालय में सभी को प्रिय थे इसलिए सबने ही खाने पर अपने घर आमंत्रित किया। रिश्तेदारों ने भी अपने अपने घर बुलाया। समय पंख लगाकर उड़ रहा था। महसूस करती थी जैसे किसी दूसरी दुनिया में जी रही हूं। कभी सोच नहीं सकती थी कि ये बस कुछ ही दिनों की खुशियां हैं। रेत की दीवार है। हवा के एक झोंके में ढह जाएगी। यह भी कभी नहीं सोचा था कि जिसके साथ सात जन्मों का बंधन होता है वो एक साल में ही बदल जाएगा। या फिर असली रूप में आ जाएगा।

रात के दो बज रहे थे। नींद आंखों से कोसों दूर थी। दस साल में घटित घटनाएं चलचित्र की भांति मस्तिष्क पटल पर घूम रही थी। देवेन्द्र के विद्यालय की एक महिला शिक्षिका ने एक बार नहीं, दो दो बार खाने पर अपने घर आमंत्रित किया। देवेन्द्र ने बताया कि उसका अपने पति से तलाक हो चुका था। पंद्रह साल का एक बेटा भी था। उसकी परवरिश उसकी जिम्मेदारी थी। पति का घर छोड़कर वह अपनी मां के घर में रह रही थी।
पहली बार तो औपचारिक बातें ही हुई। लेकिन दूसरी बार उसने अपने वैवाहिक जीवन के कड़वे अनुभव के बारे में विस्तार से बताया। शराबी पति और जालिम सास ससुर से पीछा छुड़ाकर वह अपने बेटे को लेकर अपने मायके आ गई थी। तलाक का केस चल रहा था। मायके में भी अकेली मां ही थी। पिता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। दूसरा कोई भाई बहन भी नहीं था। उसकी कहानी सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ। उससे सहानुभूति भी हो गई। परन्तु उस अपनेपन के पीछे की कुटिलता नहीं जान पाई। गांव की सीधी सादी लड़की सोच ही नहीं पाई कि एक दिन वो बेचारी मुझे बेचारी बना देगी।

जैसे जैसे समय बीतता गया, देवेन्द्र घर से दूर होते चले गए। अब तो हफ़्ते में दो दिन घर होते तो चार दिन बाहर। कहां रहते थे, नहीं बताते। सासूजी ने अपने गुप्तचरों से पता लगवाया। जो सामने आया वह सच चौंकाने वाला था। उस महिला शिक्षिका ने अपना एक घर किराए पर लिया था। बेटे को मां के पास ही छोड़ दिया। देवेन्द्र उसी के घर में रहते थे। 

शादी के एक साल होते होते देवेन्द्र महीने में एक दो दिन घर में होते बाकी दिन सुनयना के साथ। मैंने एक दिन पूछ ही लिया कि मुझमें क्या कमी है। हंसकर बोले कुछ भी कमी नहीं है। तुम्हारे साथ विवाह इसलिए किया था कि मां को एक सुशील बहू चाहिए थी। सुनयना को वो कभी स्वीकार नहीं करेंगी। तुम इस स्थिति में रह सकती हो तो रहो नहीं तो अपना रास्ता चुन सकती हो। सासूजी ने पूछा तो उन्हें भी वही उत्तर मिला।

मैंने फिर से करवट बदली। संदीप थके हुए थे इसलिए गहरी नींद में थे। उस दिन भी पैरों के नीचे से जमीन ऐसे ही खिसक गई थी जैसे आज उन दोनों को सामने देखकर खिसकी  थी। सासूजी ने भाई भाभी को घर बुलाकर स्थिति से अवगत कराया। मुझसे भी पूछा गया इस बार। मेरी परवरिश भले ही गांव में हुई थी परन्तु अपने अस्तित्व को भुलाकर जीना मुझे नहीं सिखाया गया था। भले ही रानी बनने का अवसर मिल जाए। और वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। आपसी सहमति से तलाक हो गया।

उन्होंने शादी में को हमारा खर्च हुआ था, वापिस कर दिया और साथ साथ मुझे भी। उसके बाद छह महीने कैसे बीते मेरे और मेरे भगवान के सिवा कोई नहीं जानता। रिश्तों से पूरी तरह विश्वास उठ गया था। परन्तु जिन्दगी अकेले कैसे काटी जायेगी? ऐसा मैं नहीं सब सोचते थे और कहते भी थे। मां बाप नहीं थे इसलिए सबकी चर्चा का विषय मेरे भविष्य की चिंता ही था उन दिनों। पढ़ाई भी ज्यादा नहीं की थी। इसलिए फिर एक बार विवाह जैसे सामाजिक बंधन में बंधने को मजबूर होना पड़ा।

संदीप हमारी दूर की रिश्तेदारी में ही थे। तीन महीने पहले बच्चे के जन्म के समय ज्यादा खून बह जाने के कारण उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। तीन महीने का उनका बेटा भी था। इसीलिए वो लोग जल्दी शादी करना चाहते थे कि बच्चा अपनी मां के रूप में मुझे ही जानेगा। एक अनजान बच्चे की ममता ने मुझे ऐसा खींचा कि मैंने तुरंत शादी के लिए हां कर दी। संदीप से मेरी शादी हो गई। शादी के समय संदीप नौकरी कर रहे थे। परन्तु नौकरी उन्हें जमीं नहीं और अपना काम शुरू कर दिया और एक साल बाद मैं और सक्षम भी उनके पास आ गए। अपने शहर से दूर। उन सभी बातों से दूर। उन बातों से जुड़े लोगों से दूर।

सक्षम तीन साल का हुआ तो स्कूल जाने लगा और उसकी बहन किट्टू भी ने जन्म लेकर हमारे परिवार को पूरा कर दिया। समय के साथ साथ सभी कुछ बदल गया। घर भी, परिवार भी। धीरे धीरे बच्चों कि परवरिश में इतना खो गई कि सब भूलने लगी थी। अचानक अंकुश ने हमारी जिंदगी में आकर बीते कल को सामने लाकर खड़ा कर दिया।

सोचते सोचते रात बीत गई। नींद तो जैसे रूठ गई थी आंखों से। अगले दिन रविवार था। इसलिए उठने कि जल्दी नहीं थी। संदीप ने भी जगाया नहीं मुझे। आंखें खुली तो ग्यारह बज चुके थे। संदीप, किट्टू और सक्षम नहाकर नाश्ता कर चुके थे। संदीप अपने अखबार में व्यस्त थे। किट्टू और सक्षम टी वी देखने में व्यस्त थे। मैंने उठकर नहा धोकर पूजा की और चुपचाप दोपहर के खाने की तैयारी में जुट गई। संदीप रसोई में आए। "तुम्हारी तबीयत अगर ठीक नहीं है तो खाना मैं बना देता हूं।" उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा। "नहीं अब मैं बिल्कुल ठीक हूं। आप अखबार पढ़ो। बस आधा घंटे में खाना तैयार हो जाएगा।" जैसी तुम्हारी सुविधा।" कहकर फिर से लॉबी में जाकर पेपर पढ़ने लगे।

एक दो दिन में सब लगभग सामान्य हो गया। तभी संदीप ने बताया कि अंकुश के माता पिता वापस चले गए हैं। मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। कुछ दिन रुकते तो संदीप उन्हें घर पर जरूर बुलाते। एक बड़ा सा पत्थर सर पर गिरते गिरते बचा। ऐसा ही महसूस कर रही थी मैं। पर जिस स्थिति से हम बचकर निकल जाना चाहते हैं वही हमारा पीछा नहीं छोड़ती। अंकुश और स्नेहा को घर बुलाने के लिए संदीप, सक्षम और स्नेहा तीनों बहुत जिद कर रहे थे। मैं टालना चाहती थी लेकिन बच्चों की जिद के सामने झुकना पड़ा। मैं भी चाहती थी कि अतीत के अंधेरे से निकलकर वर्तमान के सवेरे में आ जाऊं। मेरे साथ जो भी हुआ उसमे अंकुश का कोई योगदान नहीं था।

अगले रविवार उनके घर पर आने का दिन निर्धारित हुआ। नियत समय पर वो लोग आ पहुंचें। खाना खाकर संदीप को अपनी जरूरी मीटिंग के लिए निकलना पड़ा। अंकुश और स्नेहा थोड़ी देर और रुक गए बच्चों की ज़िद के कारण। स्नेहा बच्चों के कमरे में चली गई उनके साथ। अंकुश टी वी देख रहा था। मैं वहीं बैठ गई। बातों बातों में मैंने उसके दादा दादी के बारे में पूछा। यानि मेरे भूतपूर्व सास ससुर। अंकुश थोड़ा असहज हुआ। लेकिन फिर उसने बताना शुरू किया। मेरे दादा अब नहीं हैं। दादी गांव में हैं। कुछ ही दिनों में स्नेहा और मैं उनको अपने पास लेकर आएंगे। मुझे आश्चर्य हुआ। "तुम सुनयना के साथ नहीं रहते हो ?" मैंने जानना चाहा। "नहीं आंटी, देवेन्द्र अंकल की मम्मी ने मुझे अपने घर पर रखने को मना कर दिया था। इसलिए हॉस्टल में रहता था, पढ़ाई पूरी होने तक। मेरे पापा को टी बी की बीमारी थी। उनके जाने के बाद दादी की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। इसलिए मै दादी के पास ही जाता था मेरी छुट्टी होने पर। छोटे भाई के होने के बाद मम्मी देवेन्द्र अंकल के घर पर ही रहने लगी।"

उसकी बातें सुनकर अच्छा नहीं लगा मुझे। ऐसा ही महसूस हुआ जैसे मैं और अंकुश एक ही स्थिति में थे। उस घर से जुड़े जरूर पर अपनी जगह वहां नहीं बना पाए। मेरी मन की स्थिति अंकुश ने पढ़ ली। "आप तो अब बिल्कुल ठीक हैं आंटी। मैंने आपको देखा तो बहुत अच्छा लगा। संदीप अंकल बहुत अच्छे हैं। मैंने पहले ही दिन उनको अपने बारे में सब कुछ बता दिया था। फिर भी उन्होंने घर पर आने को कहा। आपने मुझे नहीं पहचाना पर मैंने आपको पहचान लिया था।" आज पहली बार अंकुश को बिना हिचकिचाहट के बोलते हुए सुन रही थी। "मैं तुम्हे नहीं पहचान पाई बेटा।" मैंने भाव विहवल होकर कहा। उसने बोलना जारी रखा। "मैं आप लोगों के साथ जुड़े रहना चाहता हूं। स्नेहा भी बहुत खुश है आप सबसे मिलकर। पुरानी बातें भूल जाइए आंटी। मेरी दादी आएंगी। आप उनसे मिलने जरूर आना। अपनी मम्मी की ओर से मैं आपसे माफ़ी मांगता हूं।" उसने भावुक होकर कहा।

आज कोई दूसरा ही अंकुश था मेरे सामने। उसकी बात सुनकर मेरी भी आंखों में आंसु आ गए। मैंने महसूस किया रिश्तों की एक रेत की दीवार जो मेरे मन में बनी थी, आज ढह गई। बहुत हल्का महसूस कर रही थी अब। मैंने खुद को संभाला। अंकुश की ओर देखा। वो मेरे जवाब का इंतजार कर रहा था। स्नेहा भी तब तक वहीं आ गई थी। "तुम पहले दिन ही हम सबसे जुड़ गए थे अंकुश। किट्टू और सक्षम के बड़े भाई के जैसे हो तुम। कभी पराया नहीं समझना खुद को और हां, दादी को लेने जाओगे तो मुझे बताकर जाना। उन्हें पहले यहीं लेकर आना। नहीं तो मैं बुरा मान जाऊंगी।" मैं एक सांस में सब बोल गई। अंकुश को आज पहली बार मैंने हंसते हुए देखा था। संदीप भी आ गए थे। जानने की कोशिश कर रहे थे कि मैं आज इतनी खुश क्यूं थी ?

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