पिंजरे के उस पार - गृहलक्ष्मी की कहानियां

गृहलक्ष्मी टीम

24th November 2020

'सुरीला मिट्ठूÓ नाम था उसका। आज मेले में उसके मालिक ने उसको एक नए मालिक को बेच दिया था। उसे आज एक नया घर मिलने वाला था, लेकिन पिंजरा वही पुराना था, यहां उसे लौट कर रोज़ वहीं कैद हो जाना था।

पिंजरे के उस पार - गृहलक्ष्मी की कहानियां

नया घर बहुत बड़ा और खुला था। वो $खुश हुआ वहां पर एक छोटी सी फुलवारी थी और कुछ अमरूद और अनार के पेड़ भी थे। वो $खुश हुआ कि यहां उसे बहुत अच्छा साथ मिलेगा अपने साथी पंछियों का।
नए घर में केवल उसके नए मालिक और उनकी पत्नी आनन्दी थी। बच्चों की कोई चहचहाहट नहीं थी। उससे उसका थोड़ा सा मन उदास हुआ। वहां पुराने घर में चाहे वो छोटा था, लेकिन बच्चों की चहचहाहट से हराभरा था, जो हर पल उससे बातें करते थे और गाने सिखाते थे तो उसे गाना भी आ गया, 'पिया आ जा...Ó इसीलिए तो उसे सब सुरीला मिट्ठू कहते थे।
मालिक तो सुबह ही काम पर चले जाते थे। नई माल्किन आनन्दी बहुत ही सुंदर, सौम्य और शांत थी। एक उदास सी मुस्कान चेहरे पर लिए सारा दिन घर का कोई ना कोई काम करती रहती थी। 
सुबह होते ही आंगन फुहारना, पेड़-पौधों को पानी देना और उनसे बातें करना। फिर वो उसको उदासी से मुस्कुरा देखती और बोलती, 'मिट्ठू मियां कैसे हो, $खुश हो, क्या खाओगे?'
सुरीला मिट्ठू का दिल किया वो गाए और गाने लगा, 'पिया आ जा, पिया आ जा... आनन्दी खुश होकर चहचहाने लगी, अरे मियां आप तो बहुत सुरीला गाते हो, तो मिट्ठू बोला, 'मैं सुरीला मिट्ठू!
कुछ दिनों में मिट्ठू ने महसूस किया, माल्किन तो सारा दिन घर की चार-दीवारी में बंद रह कर घर का कोई ना कोई काम खाना बनाना, कपड़े धोना, सिलाई करना, बर्तन सा$फ करना में निकाल देती और घर से बाहर पैर ना निकालती।
नया मालिक रोज़ रात को नशे में धुत होकर आता, उस पर खूब रौब झाड़ता और कभी-कभी हाथ उठाता। इसीलिए तो आनन्दी माल्किन की आंखें डबडबा जाती, जब वो उससे बातें करती।
थोड़े दिन बाद नए मालिक उसके लिए बहुत सुंदर सुनहरे रंग का चमचमाता पिंजरा ले आए। नया पिंजरा देखकर वो खुश हुआ और पंख फड़फड़ाने लगा। लेकिन कुछ रोज़ में उसे महसूस हुआ पिंजरा चाहे सोने का है, लेकिन उसकी उड़ान तो बंधी हुई है। वो पहले भी कैद में था और अब भी कैदी। 
एक महीने के अंतराल में अब आनन्दी और मिट्ठू की खूब दोस्ती हो गई। सुरीला मिट्ठू आनंदी को दी कह कर पुकारने लगा। जब भी आनंदी पास से गुज़रती या नज़र आती तो बोलता, दी...दी...दी... आ जा।Ó
धीरे-धीरे वो आनन्दी की पीड़ा को महसूस करने लग पड़ा था। उसे महसूस हुआ आनन्दी भी एक पिंजरे में बंद है। सोने के पिंजरे में कहने को जिसे मकान कहते हैं। उसे ना कहीं आने जाने या किसी से बात करने की इजाज़त है।
मिट्ठू ही उसका बस एक दोस्त था, जिससे वो बातें करके थोड़ा सा हंस मुस्कुरा लेती थी तो कभी-कभी आंखें भर लेती थी। मिट्ठू को एक और गाना याद आ गया और फिर गाता रहता, 'दी उड़ जा, दी जा उड़ जा। वो चाहता था आनन्दी उस पिंजरे को तोड़ कर कहीं भाग जाए।
आनन्दी आंसू भर कर आंख में बोलती, 'तुझे तो फिर भी इस पिंजरे से रिहाई मिल सकती है, लेकिन मुझे इस पिंजरे को तोड़ने की इजाज़त नहीं। आजीवन मुझे इसमें ही कैद रहना है।
सुरीला मिट्ठू आसमान की ओर डबडबाई आंखों से देखकर दिल में बोला, 'वो तो सोचता था कि इंसान बेज़ुबान पंछियों को ही $कैद करता है, लेकिन कई इंसान भी दूसरे इंसान को एक पंछी की तरह कैद कर लेते हैं।
'पिंजरे के उस पार की भी दुनिया एक बड़ा पिंजरा है।

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