सत्यनारायण व्रत का रहस्य

शशि शेखर शुक्ल

26th December 2020

हिन्दू जाति के अजर-अमर होने के अनेक कारण हैं। उनमें से प्रमुख कारण हैं- उनका व्रत-पर्व एवं त्योहार प्रिय होना। प्रतिवर्ष, प्रतिमास एवं प्रतिदिन व्रतों, पर्वों एवं त्योहारों को मनाने की ललक। ऐसा ही एक व्रत है श्री सत्यनारायण व्रत। जिसका हिन्दू धर्म में विशेष माहात्म्य है।

सत्यनारायण व्रत का रहस्य
यूं तो वर्ष भर में मनाये जाने वाले व्रतों, पर्वों तथा त्योहारों की लम्बी श्रंखला है, क्योंकि हमारा कोई भी मास, तिथि अथवा वार ऐसा नहीं है जिस दिन किसी व्रत, किसी पर्व या त्योहार मनाने का विधान न हो। पूर्णिमा, अमावस्या जैसी कई तिथियां तो ऐसी हैं कि अनेक व्रतों, पर्वों एवं त्योहारों का संगम हो जाता है। पूर्णिमा को सौभाग्यशाली महिलाएं सौभाग्य की अभिवृद्धि के लिये व्रत रखती हैं एवं सायंकाल में पूर्ण चन्द्र को अर्घ्य समर्पित करके व्रत की पारणा करती हैं। इनके अतिरिक्त व्यास पूर्णिमा, उपाकर्म एवं रक्षाबन्धन, महालयारम्भ, पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा एवं होली जैसे त्योहारों का सम्बन्ध भी इस तिथि के साथ है। परन्तु एक कार्य ऐसा है जो इस दिन, सारे विश्व में जहां-जहां हिन्दू-सनातनधर्मी निवास करते हैं, वहां-वहां पूरी निष्ठा के साथ ही सम्मान के साथ सम्पन्न किया जाता है। वह है श्री सत्यनारायण व्रत-कथा का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान। इस अनुष्ठान को बन्धु-बान्धवों सहित उत्सव की 
भांति मनाकर स्वयं को गौरवान्वित 
महसूस करते हैं।
नारायण ही हैं एकमात्र सत्य
महर्षि वेद व्यास ने विभिन्न पुराणों में सत्यान्नास्ति परो धर्म:, सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्, सत्येन लोकान्जयति, नास्ति सत्यात् परं तप:, इत्यादि वचनों द्वारा पदे-पदे सत्य की महिमा का प्राख्यापन किया है। स्थावर-जंगमात्मक इस नाना विधि सृष्टि में भगवान श्री मन्नारायण ही एकमात्र सत्य हैं। शेष समस्त प्रपन्च नामरूपात्मक होने से मिथ्याकल्प हैं। सकलशास्त्रानुमोदित इस सिद्धांत के अनुसार ही ब्रह्मïादि देवता गर्भस्तुति के समय भगवान श्री कृष्ण की सत्यरूप में वन्दना करते हैं। अर्थात् हे प्रभो! आप सत्य संकल्प हैं। सत्य ही आपकी प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है। सृष्टि के पूर्व , प्रलय के पश्चात एवं जगत की स्थिति के समय  इन असत्य अवस्थाओं में भी आप सत्य हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, एवं आकाश इन पांच दृश्यमान सत्यों के आप कारण हैं एवं उनमें अर्न्तयामी रूप से विराजमान भी आप हैं। आप ही मधुर वाणी एवं समदर्शन के प्रतीक हैं। आप इस दृश्यमान जगत के परमार्थरूप हैं। हे भगवन! आप तो साक्षात सत्यस्वरूप ही हैं। हम सब आपकी शरण में हैं।
नारायण शब्द का अर्थ
नारायण शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ भी तो इसी रहस्य की ओर संकेत करने वाला है- नार अर्थात् पंच महाभूत, उनमें अयन अर्थात् सत्यरूप से अवस्थित रहने वाले भगवान नारायण। अतएव सत्य एवं नारायण परस्पर अभिन्न हैं। दोनों में एकात्म्य संबंध होने के कारण सत्यश्रचासे नारायण: सत्य नारायण:, इस प्रकार कर्मधारय समास करने पर अथवा सत्ये नारायण: सत्यनारायण:, इस प्रकार तत्पुरुष समास द्वारा भी सत्य एवं नारायण में अपृथकभाव ही सिद्ध होता है। इसका फलितार्थ यह है कि मानव अपने जीवन-व्यवहार में यदि सत्य को प्रतिष्ठित करता है तो वह अर्थान्तर से अपने भीतर भगवद् गुणों का आधान करता है। इसके विपरीत सत्य से दूर रहने वाला व्यक्ति भगवदीय गुणों से हीन होने के कारण तमस स्वभाव वाला हो जाता है। पाप कर्मों में उसकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है एवं जिसके परिणामस्वरूप वह आजीवन नाना प्रकार के क्लेशों से घिरा हुआ रहता है।
सत्य नारायण व्रत की महिमा
मृत्यु लोक के प्राणियों की यही दुर्दशा देखकर देवर्षि नारद द्रवित हो उठे थे। श्री सत्यनारायण व्रत-कथा की भूमिका के निम्नांकित शब्द कितने मर्मस्पर्शी हैं और आज के संदर्भ में भी कितने यथार्थ प्रतीत हो रहे हैं।- 
'एकदा नारदो योगी परानुग्रहकांक्षया। पर्यटन विविधान् लोकान् मर्त्यलोकमुपागत:।। ततो दृष्टवा जनान् सर्वान् नानाक्लेशसमन्वितान्। नानायोनिसमुत्पन्नान् क्लिश्यमानान्स्वकर्मभि:।। 
यहां जनान् सर्वान् तथा आगे के श्लोकों में भी मर्त्यलोके जना: सर्वे नानाक्लेशसमन्विता: सर्वे जना: कहना महत्त्वपूर्ण है, जिसका अभिप्राय है कि इस मृत्यु लोक में देवर्षि नारद को एक भी प्राणी ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ जो सर्वथा क्लेशमुक्त हो। फिर जगतादिक प्राणियों के क्लेशों की अत्यंतिक निवृत्ति का उपाय क्या है? उपाय बहुत ही सरल एवं सभी के द्वारा आचरण में लाया जा सकता है। अन्धकार को दूर भगाने के लिये जैसे प्रकाश ही एकमात्र उपाय है, उसी प्रकार क्लेशों से मुक्ति पाने के लिये सत्यनारायण का आश्रय ही अमोघ उपाय है।:- नान्य: पन्था विद्यतेअयनाय। यह उपाय भी किसी सामान्य जन ने नहीं, अपितु स्वयं श्री विष्णु भगवान ने अपने श्री मुख से देवर्षि नारद जी को बताया है।
जीवन में सत्य को अपनाने का व्रत लीजिये और सद्य: सुख प्राप्त कीजिये। सद्य: का तात्पर्य है- तुरन्त, अविलम्ब या हाथों-हाथ। ज्यों ही आपने सत्य को अपने जीवन का अंग बनाया त्यों ही, उसी क्षण से आपको सुख मिलना प्रारम्भ हुआ। ऐसा चमत्कारी है सत्य व्रत। नारायण जैसे बिना किसी भेदभाव के प्राणिमात्र पर समानरूप से अपनी करुणा की वृष्टि किया करते हैं, उसी प्रकार सत्य भी तदू्रप होने के कारण सभी को क्लेश मुक्त कर शाश्वत सुख प्रदान करने वाला है।
व्रत से लाभ
सत्यनारायण की कथा में ऐसे उन सभी व्यक्तियों की कथाएं संग्रहित की गयी हैं जिन्होंने अपने कार्य-व्यवहार में सत्य को समाविष्ट करने का व्रत धारण किया था।  फिर चाहे वे समाज के किसी भी वर्ग से थे। यहां काशीपुर में रहने वाला दरिद्र ब्रह्मण हैं तो उल्कामुख एवं तुंगध्वज जैसे राजा भी हैं। इसी प्रकार गरीब लक्कड़हारा है तो चतुर चालाक साधु नामक बनिया भी यहां है। गोचारण करने वाले साधारण ग्वालों की कथा भी यहां है।
सत्य को अपनाने से जैसे ये सब प्रकार से सुखी एवं संपन्न हो गये, उसी प्रकार जो भी सुखी एवं समृद्ध होना चाहे वह इन्हीं की भांति सत्य को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाने का व्रत धारण कर ले। यहां किसी के लिये द्वार बन्द नहीं है। यही कारण है कि श्री सत्यनारायण व्रत- कथा में जिनकी कथाएं संकलित हैं, उन सभी ने सत्यव्रत धारण करने का संकल्प किया था, यही बारम्बार कहा गया है। श्री सत्यनारायण व्रत-कथा के अन्तिम अध्याय में फलश्रुति के अन्तर्गत यह बताया गया है कि सत्य का आश्रय लेने वालों को क्या लोकोत्तर लाभ हुये।
सत्य में छिपे देवत्व गुण
वाल्मीकि रामायण में जानकी जी को बचाने के प्रयास में रावण के भीषण प्रहारों से क्षत-विक्षत एवं मरणासन्न जटायु को देखकर श्री राम करुणार्द हो उठते हैं एवं नया शरीर धारण करने की उससे अभ्यर्थना करते हैं। लेकिन जीवन के प्रति उसकी अरुचि देखकर अन्तत: उसे दिव्य गति के साथ उत्तम लोक प्रदान करते हैं। यहां यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि मोक्ष प्रदान करने की सामार्थ्य तो केवल विष्णु भगवान में ही है, फिर मनुष्य रूप में विराजमान श्री राम ने जटायु को मोक्ष (उत्तम लोक) किस प्रकार दे दिया? यह तो मानव लीला से अलग विषय है।
इस जिज्ञासा का समाधान पूर्वाचार्य इस प्रकार करते हैं कि मानवीय गुणों में सत्य सर्वोपरि था एवं सत्यव्रत का पालन करने वाले व्यक्ति के लिये समस्त लोकों पर विजय पा लेना अतीव सहज हो जाता है। इसलिये श्री राम ने विष्णु होने के कारण से नहीं, अपितु मनुष्य को देवोपम बना देेने वाले अपने सत्यरूपी सद्गुण के आधार पर जटायु को मोक्ष प्रदान किया। इस प्रकार सत्य को नारायण मानकर अपने सांसारिक व्यवहारों में उसे प्रतिष्ठित करने का व्रत लेने वालों की है। श्री सत्यनारायण व्रत कथा।
हर मुहूर्त है शुभ
सत्य को अपनाने के लिये किसी मुहूर्त शोधन की भी आवश्यकता नहीं है। कभी भी, किसी भी दिन से यह शुभ कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है। बस, आवश्यकता है केवल व्यक्ति के दृढ़ निश्चय की एवं उसके परिपालन के लिये सम्पूर्ण समर्पण भाव की। इधर आपने सत्य को अंगीकार किया और उधर उसी पल से सुख एवं समृद्धि की वर्षा आप पर प्रारम्भ हुई।

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