संस्कृत साहित्य में रामकथा

योगेश चन्द्र शर्मा

28th December 2020

संस्कृत साहित्य में रामकथा का प्रतिपादन सर्वप्रथम आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित 'रामायण' शीर्षक ग्रंथ में किया गया है। प्राचीन कथाओं के अनुसार सृष्टि के रचयिता ब्राह्मण ने स्वप्न में महर्षि वाल्मीकि को दर्शन देकर उन्हें रामायण की रचना के लिए प्रेरित किया तथा यह आश्वासन भी दिया कि वे अपने काव्य में राम के चरित्र का निर्माण जिस प्रकार से करेंगे राम अपने जन्म के पश्चात् उसी प्रकार का आचरण करेंगे। इस प्रकार राम के जन्म से पूर्व ही इस ग्रंथ का निर्माण वाल्मीकि द्वारा किया गया। ऐसी मान्यता है, यद्यपि आदि कवि ने राम के चरित्र की कल्पना सभी गुणों आगार, कौशिल्या के परमप्रिय, हिमालय के समान धैर्यवान, समुद्र की भांति गंभीर, पृथ्वी की भांति क्षमाशील, चन्द्रमा के समान कांतिमान तथा विष्णु के समान बलवान रूप में की तथापि मूल रूप से उन्हें नारायण का चरित्र न देकर नर श्रेष्ठ के रूप में ही प्रस्तुत किया-

संस्कृत साहित्य में रामकथा
आलान मानुषं मन्ये रामं दशरथाताज
यद्यपि बालकांड एवं उत्तरकांड में राम के परब्रह्म स्वरूप का प्रतिपादन करने वाले अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं, किंतु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। वाल्मीकि की अहिल्या राम के चरणों का स्पर्श पाकर पाषाणी से मानवी या दैवी रूप धारण नहीं करती बल्कि गौतम द्वारा अभिशप्त होने पर लोक लज्जा के कारण वह लोगों की दृष्टि से दूर एक निर्जन स्थान पर रहती है जहां जाकर राम व लक्ष्मण उनका चरण स्पर्श करके मुनि विश्वामित्र की प्रेरणा से उसे सामाजिक मान्यता प्रदान करते हैं। बाद में महर्षि गौतम उसे पुन: स्वीकार कर लेते हैं। परशुराम संवाद में भी यहां अलौकिकता का अभाव है। इस प्रकार वन गमन, लक्ष्मण शक्ति तथा युद्घ में लक्ष्मण के घायल हो जाने व इसी प्रकार के अनेक प्रसंगों में वाल्मीकि के राम में मानव सुलभ दुर्बलताएं भी दृष्टि गोचर होती हैं। कुल मिलाकर एक आदर्श शासक तथा अनुकरणीय मानव के रूप में राम का चरित्र गढ़ा गया है। किंतु इसके विपरीत संस्कृत साहित्य के सर्वाधिक विशाल ग्रंथ 'भुशुष्डि रामायण' में जिसे इसके ग्रंथकार ने आदि रामायण कहकर संबोधित किया है।
राम वेदों के लिए आगोचर, सगुण-निर्गुण भेदाभेद सहित परमतत्व है। उनका संस्थान चिदानंद व परम स्थान चिन्मयानंद पूर्ण सीता लोक है। पृथ्वी पर कौशलपुरी ही उनका त्रिलोक है। वे ही विमोक्ता व फल प्रदाता है। गोपियों द्वारा अनन्य भाव सीता की आराधना करने पर वे प्रमोदवन लीला में उन्हें प्रविष्ट कराकर महारास करते हैं। जिसे देखने स्वयं शिव वहां जाते हैं किंतु गोपियों द्वारा अवज्ञा करने पर राम के वियोगजन्य दुख से पीड़ित होने का श्राप देते हैं। इस श्राप से मुक्ति प्राप्ति के लिए 'रामगीता' के माध्यम से 18 अध्यायों में तत्वज्ञान का उपदेश दिया गया है। कुल मिलाकर भागवत की कृष्णलीला इसमें रामलीला के रूप में वर्णित है। ऐतिहासिक दार्शनिक एवं धार्मिक दृष्टियों से यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें कुल 37000 श्लोकों में राम के चरित्र का वर्णन किया गया है।
महर्षि वेद व्यास ने 18 पुराणों तथा 'महाभारत' नामक विशाल ग्रंथ की रचना की जिसमें समस्त पुराणों में ब्रह्मांड  पुराण के अन्तर्गत जिन अध्यायों में राम के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन किया गया है उसे 'अध्यात्म रामायण' का नाम दिया गया है। श्रीमद्भागवत के नवम् स्कंध के दसवें अध्याय में राम के अवतरण से राज्याभिषेक तक की घटनाएं कुल 55 श्लोकों में प्राय: इत्ति वृत्तात्मक ढंग से वर्णित है।
अथर्ववेदीय राम पूर्व तापनीय उपनिषद 'राम' शब्द के विविध अर्थ प्रस्तुत करती है-
रमन्ते योगिनोय स्मिन
नित्यानंद चिदात्मनि।
इति राम पदेना सौ परब्रह्मïभि धीयते॥
इसी प्रकार- 'रीति राजते वा ही स्थिति: सन इति राम:'
संस्कृत की 'रा' धातु का अर्थ है दान देना। राम की उदारता के कारण 'रा' धातु का 'रा' तथा मही पर अवतीर्ण होने से मही का 'म' मिलाकर 'राम' शब्द बनता है। इसी प्रकार 'राज' धातु का अर्थ चमकना चूंकि राम मही पर अत्यंत प्रतापी रूप व कर्म सौंदर्य के ज्वलंत रूप थे अत: 'राज्' का 'रा' तथा मरण का 'म' मिलकर 'राम' शब्द इनके लिए निश्चित हुआ। इसी प्रकार वे राक्षसों के मरण बनकर अवतीर्ण हुए। अर्थात राक्षस का 'रा' तथा मरण का 'म' मिलाकर 'राम' शब्द बना। अपने रूप सौंदर्य से वे राहु के समान मनसिज (चन्द्रमा) के सौंदर्य को नष्टï कर देते थे। अत: राहु का 'रा' तथा मनसिज का 'म' लेकर 'राम' शब्द बना। इसी प्रकार वे राक्षसों को दंडित करने के लिए मनुष्य के रूप में अवतरित हुए। अत: राक्षस का 'रा' व मनुष्य का 'म' लेकर 'राम' शब्द का अविर्भाव हुआ। अन्त में 'राम' शब्द दार्शनिक विवेचना करते हुए यह उपनिषद कहता है कि, 'शाश्वत आनंद स्वरूप, समस्त चैतन्य के केंद्र जिसे सनातन धर्म में लीन होकर योगीजन परमानंद में रमण करते हैं वही परमात्मा पृथ्वी पर 'राम के नाम से जाना जाता है। राम के 'र' वर्ण में उत्पत्ति, पालन व संहार की त्रिशक्तियों ब्रह्मï, विष्णु व रुद्र का निवास है। बिंदु, नाद व बीज से उत्पन्न रौद्री, ज्येष्ठा व बामा शक्तियों 'र' से ही प्रसूत है। यह राम वाची वर्ण है। तंत्र शास्त्र में इसे अग्नि रूप माना गया है। 'आ' वर्ण अनंत वाची है। अत: 'र' और रा से युक्त 'रा' अनंत जो मय अग्नि स्वरूप 'राम' का प्रतीक है। 'म' वर्ण को तंत्रशास्त्र में चन्द्रमा या स्त्री शक्ति से गर्मित माना गया है। यह शांति एवं शीतलता का प्रतीक है। ज्योतिष भी चन्द्रमा को स्त्री ग्रह मानता है। अत: 'म' वर्ण सौम्यकांति व शीतल स्वभाव से युक्त चन्द्रमुखी सीता का प्रतीक है। इस प्रकार राम की उपासना करने पर प्रकृति-पुरुष रूपी सीताराम की ही उपासना होती है इसमें राम यंत्र के माध्यम से विश्व की संपूर्ण शक्तियों की अमेदोपासना की गई है। संक्षेप में इस उपनिषद के नाम अपने अनंत से तेजोमय अग्नि रूप 'रा' तथा अनंत शीतलता युक्त बीज 'म' से युक्त होकर चराचर जगत की उत्पत्ति के मूल स्रोत हैं। सीताराम की प्रकृति व आल्हादिनी शक्ति है। वे प्रकृति रूपा, परम चैतन्य मयी, परमानंददायिनी, परमेश्वरी हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण है तथा प्रलयावस्था में संपूर्ण विश्व सूक्ष्म रूप से उन्हीं में समाविष्टï हो जाता है।
राम पूर्व तापनी योप निषद के ही समान रामोत्तर तापनी योपनिषद मंत्र शास्य की दृष्टिï से 'राम' शब्द की व्याख्या करते हुए इसे र+आ+म् वर्णों से युक्त मानता है। इसमें 'र' अग्नि बीज है, 'आ' वायु बीज है तथा 'म' आकाशबीज है। प्रकृति का जब अपने स्वरूप में लय होने लगता है तब, पृथ्वी व जल अग्नि में अग्नि वायु में तथा वायु आकाश में लीन होता है। आकाश अपने मूल तत्त्व में ब्रह्मï में लीन होता है। अत: ब्रह्मï तक पहुंचाने की क्षमता अग्नि, वायु तथा आकाश के बीजाक्षरों से युक्त 'राम' मंत्र में ही सन्निहित है। इस उपनिषद के अनुसार 'गाण पत्येषु, शैवेषु, शाक्त, सौरंष्व भीष्टï ।
वैष्णवेष्वपि सर्वेशु 'राम' मंत्र फल:। (रामोत्तर तापनीयोपनिषद) उक्त दोनों उपनिषदों के समान ही 'राम रहस्योपनिषद' भी केवल 'राम' इस मंत्र को ही सर्वोच्च शक्ति से युक्त तथा प्राणि मात्र को मोक्ष प्रदान करने एवं उसका उद्घार करने वाला मानता है:- 
'राम' एवं परब्रह्मï, 'राम' एवं परंतप:।
राम एवं परतत्त्व श्री रामो ब्रह्मï तारकं॥ (राम रहस्योपनिषद)
इसके अनुसार काशी पर मरने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है परंतु ज्ञान के बिना मोक्ष संभव नहीं है। अत: काशी में मरने वाले प्रत्येक प्राणी के कानों में भगवान सदाशिव स्वयं तारक मंत्र का उपदेश देते हैं यह तारक मंत्र श्री राम का नाम ही है।
'पायं पायं श्रवण पुटके राम नामामिरामं। ध्यायन् ध्यायन् मनसि सतत तारक ब्रह्मï रुपम॥
जल्पन् जल्पन् प्रकृति विक्रतौ प्राणिनां कर्णमूले। वीथ्यां महति कोपि काशी निवासी॥
इस प्रकार राम का गुणगान करने वाले अन्य संस्कृत ग्रंथों में स्वर्गीय श्री रामदास जी गौड़ ने हिन्दुत्व नामक पत्रिका में 18 रामायणों का उल्लेख किया है।
1. संवृत रामायण, 2. अगस्त्य रामायण, 3. लोमक्ष रामायण, 4. मंजुल रामायण, 5. सौपय रामायण, 6. महामाला रामायण, 7. सौहार्द रामायण, 8. मणिरत्न रामायण, 9. सौर रामायण, 10. चान्द्र रामायण, 11. मैंद रामायण, 12. स्वायं मुव रामायण, 13. मुब्रल रामायण, 14. सुवर्चस रामायण, 15. देव रामायण, 16. श्रावण रामायण, 17. दुरंत रामायण तथा चम्पू रामायण। इसके अतिरिक्त, 'रामचरितम्' शीर्षक से संस्कृत में आठ महाकाव्य उपलब्ध है जिनके रचयिता क्रमश: काशीनाथ, अभिनंद, संध्याकार, नंदिन, कामाक्षी, देवविजय, रामवर्मन तथा गो दवर्मन हैं। इनमें 'अभिनंद' का नाम काफी विख्यात हुआ। कवि सोढढल ने उदय सुंदरी कथा में महाकवि अभिनंद की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि, 'राजा हर वर्ष उनसे इतने अधिक प्रभावित थे कि वे उन्हें बैठने के लिए स्वयं अपना सिंहासन प्रस्तुत करते थे इनके काव्य का प्रभाव अनेक परवर्ती काव्यों में भी देखने को मिलता है। इसमें कवि ने अपने आश्रयदाता राजा हर वर्ष का उल्लेख किया है। श्री के. एस. रामास्वामी इसे बंगाल के राजा धर्मपाल का पुत्र देवपाल हरपाल ही मानते हैं। इनके ननिहाल में नाम के बाद 'वर्ष शब्द का प्रयोग करने की प्रथा थी।
अत: संभवत: ननिहाल में प्रवास के दौरान ही उसे 'हरवर्ष' का नाम प्राप्त हुआ होगा। इसका समय भी 9वीं तथा10वीं शताब्दी का ही है जो महाकवि अभिनंद का समय है। इसके अतिरिक्त रघुवंश महाकाव्य का उल्लेख यहां किया ही जा चुका है। महाकवि भवभूति द्वारा रचित 'उत्तर राम चरित' भी रामकथा का प्रमुख काव्य है। महाकवि भवभूमि तथा वाक्पति जैसे विद्वानों के आश्रयदाता महाराज यशोवर्मा ने भी 'रामाश्युदयम्' नामक एक नाटक की रचना की थी जो उत्तर रामचरित से प्रभावित प्रतीत होता है। 
5वीं सदी में विजयनगर के राजा सालवनर सिंह देव ने 'रामाश्युदयम' नामक महाकाव्य की रचना की। इसमें 24 सर्गों में रामकथा का उल्लेख है। 16 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के राजा रघुनाथ के राजकवि चूड़ामणि दीक्षित ने 'रामकथा' नामक ग्रंथ का प्रणयन किया। इसी काल में सम्राट अकबर द्वारा वाल्मीकि रामायण का फारसी में अनुवाद कराया गया जो अनेक चित्रों से सुसज्जित है। ये चित्र मुगलकला की अनुपम धरोहर है। इसी प्रकार 17वीं सदी में मेवाड़ के राणा जगत सिंह ने महात्मा हीरानंद जी द्वारा श्री वाल्मीकि की एक प्रतिलिपि तैयार करवाई जिसे 'आर्य रामायण' का नाम दिया गया। इसमें उनके राज चित्रकारों मनोहर लाल तथा साहबदीन द्वारा निर्मित 400 सुनहले चित्र हैं जो राजस्थानी शैली की महत्त्वपूर्ण कृतियां हैं। संपूर्ण रचना 29 पृष्ठों में है। इसी प्रकार रीवा श्री विश्वनाथ सिंह जू देव ने 'संगीत रघुनंदनाम्, 'आनंद रघुनाटकम्, 'रामगीता' तथा 'गीता काव्य' नामक ग्रंथों का प्रणयन किया। 17वीं शताब्दी में ही मांडा के राजा जसवंत सिंह जी के आश्रित बाबा झामदास ने अपने नाम से ही झामदास रामायण की रचना की। इन्हीं राजा जसवंत सिंह की परंपरा में 18वीं शताब्दी में रुद्रप्रताप सिंह ने 528 सर्गों में निबद्घ एक विशाल रामायण की रचना की जो सात कांडों में निबद्घ है। इसमें अध्यायों की पौराणिक परंपरा तथा सर्गों की रामायणी परंपरा दोनों का निर्वाह किया गया है। कांडों को 'पथ' की संज्ञा दी गई है। इसके सात पथ इस प्रकार हैं- 1. मिथिला पथ, 2. कोशल को 'पथ' , 3. अटवी पथ, 4. किष्किंधा पथ, 5. दूत पथ, 6. युद्घ पथ, 7. राज पथ।
19वीं शताब्दी के प्रारंभ में दक्षिण भारत के राज परिवारों में संस्कृत साहित्य के प्रचार व प्रसार के साथ ही रामकथा की परंपरा का विकास भी निरंतर चलता रहा। कोटु-फड्ल्लूर राज परिवार के राजकुमारों रामवर्मन तथा गोदवर्मन दोनों ने ही 'रामचरितम् शीर्षक से महाकाव्यों की रचना की तथा परवर्ती साहित्य में भी रामकथा की भगीरथ निरंतर प्रवाहित होती रही तथा होती रहेगी क्योंकि लोक कल्याण के लिए राम को लोकोत्तर चरित्र निरंतर प्रेरणादायक, कल्याणकारी तथा मार्गदर्शक है। यूं तो राम के संपूर्ण चरित्र का यथावत् वर्णन कदापि भी संभव नहीं है क्योंकि कहा है- 'हर अनंत हरि कथा अनंता। साथ ही हरिकृपा के बिना इस रहस्य को समझ पाना भी संभव नहीं है। अत: गोस्वामी जी के शब्दों में- 'सीय- राममय सब जगजानी, करहुं प्रणाम जोरी जुग पानी।

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