अध्यात्म की यात्रा- श्री श्री रविशंकर

श्री श्री रविशंकर

31st December 2020

ध्यान से देखें तो जीवन अपने में ही एक तपस्या है, आग में झुलसने जैसा है। जिनसे हम घृणा करते हैं, उनसे तो परेशान हैं ही, वास्तव में जिन्हें हम प्रेम करते हैं, उनकी ओर से भी कई तरह की परेशानियां झेलने को मिलती हैं। कैसी विडम्बना है? कोई मार्ग नहीं सूझता ना?

अध्यात्म की यात्रा- श्री श्री रविशंकर
आत्मा - यह शक्ति पुंज, इतना शक्तिशाली, इतना सक्ष्म है कि पर्वत भी हिला दे। इस शक्ति को पहचानो। यही शक्ति ही तो परमात्मा है, यही शक्ति दिव्यता है, यही शक्ति 'तुम' हो। यह प्रतीति हो जाने पर जीवन के विभिन्न प्रकार के कष्टों और दु:खों में भी तुम अपनी मुस्कान बनाए रख सकते हो। मुश्किलों में भी मुस्कुराना, यही तो तप है, यही तो अनुष्ठान है। अनुष्ठान से सहन शक्ति बढ़ती है; किसी कठिन वस्तु स्थिति या समस्या को झेलने की क्षमता बढ़ती है। सभी धर्मों में अनुष्ठान का आयोजन है। ध्यान, उपवास, प्रार्थना सब अनुष्ठान ही तो हैं। इससे शारीरिक पुष्टि और इन्द्रियों के अनुशासन को बल मिलता है। अत: अनुष्ठान से हमें अपनी ही कई आदतों से मुक्ति मिलती है, जीवन हल्का-फुल्का सा लगने लगता है और आत्मनिर्भरता आती है। मेरे कहने का अभिप्राय यह कदापि नहीं कि तुम अनुष्ठान के नाम पर सिर के बल खड़े हो जाओ, कीलों पर चलो या अंगारों पर चलो। पर हां, यदि जीवन कोई ऐसी स्थिति पैदा कर दे जो अवश्यम्भावी हो- पर अनुकूल न भी हो तो भी उसे मुस्कुराहट के साथ स्वीकार कर लो, झल्लाओ नहीं; तो यह सब तुम्हारे लिए हितकर होगा। ध्यान से देखें तो जीवन अपने में ही एक तपस्या है, आग में झुलसने जैसा है। जिनसे हम घृणा करते हैं, उनसे तो परेशान हैं ही, वास्तव में जिन्हें हम प्रेम करते हैं, उनकी ओर से भी कई तरह की परेशानियां झेलने को मिलती हैं। कैसी विडम्बना है? कोई मार्ग नहीं सूझता ना?
यात्री स्वाध्याय - यानि आत्मनिरीक्षण - अपने भीतर उठते भावों को देखना। उन भावों के साथ जुड़ी संवेदनाओं को शरीर में महसूस करना कि उस समय शरीर के तल पर क्या घट रहा है, उसे देखना यह शरीर तो पंचभूतों में विलीन होने ही वाला है। केवल समय का सब खेल है। यह शरीर कितना खोखला और खाली है। इसमें सभी कुछ ही खोखला और खाली है। विश्लेषण करें तो शरीर में 68 प्रतिशत तो आकाश तत्व ही है। यदि इसे किसी हाईड्रोलिक कम्प्रेसर से सिकोड़ा जाए तो यह सारा शरीर माचिस की डिब्बी में सिमट सकता है। गुब्बारे का फूलना और हवा निकलते ही सिकुड़ जाना - यही तो है यह काया। इसी आकाश तत्त्व की प्रधानता के कारण जब हम मंत्रोचारण करते हैं। अथवा मंत्रोचारण सुनते हैं तो वह नाद शरीर और हमारे अस्तित्व के एक एक कण में व्याप्त हो जाता है। इस नाद से प्रत्येक कण की शुद्धि हो जाती है। अत: शरीर का सारा विधान शुद्ध हो जाता है। सृष्टि की रचना वेद (श्रुति) से हुई - वेदों के नाद से। नाद ही सृष्टि का बीज है। हम वेदों की ऋचाएं सुनते हुए, उन्हें गाते हुए, उन मूल्यों का जीवन में स्फुरण करते हुए जीते आ रहे हैं। यह एक अमूल्य निधि है, अमूल्य परम्परा है। वेदों का अर्थ ज्ञान, नाद। नाद, जिसका हम उच्चारण करते हैं। 'ईश्वर प्रणिधान' अर्थात् - दिव्यता, परमात्मा के प्रति प्रेम - परमात्मा का सत्कार। यदि तुम प्रकृति के प्रत्येक रूप में परमात्मा के, दिव्यता के, दर्शन कर सको तो फिर अव्यक्त में भी उसे देख सकने में तुम सक्षम हो जाओगे। यदि साकार में उसके दर्शन नहीं कर पाए तो निराकार में उससे जुड़ने की तो बात ही भूल जाओ। तुम जीवन में रूप से, आकार से ही तो जुड़े रहते हो। अध्यात्म की यात्रा भी वहीं से तो आरम्भ करनी होगी, जहां तुम हो। अर्थात अपने आसपास प्रत्येक जीवन का सम्मान करना और उसे प्रेम देना, भगवान का ही रूप समझना; अन्यथा तुम अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुंच पाओगे। संभवत: इसीलिए जीसस ने भी कहा, 'यदि तुम परम पिता परमात्मा तक पहुंचना चाहते हो तो मुझसे होकर ही जाओगे'। और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

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