वर्चुअल दुनिया सिकोड़ने लगी रिश्तों का दायरा

सोनल शर्मा

1st January 2021

तकनीकी साधन-संसाधन हमेशा से मनुष्य की उन्नति का परिचायक रहे हैं। विकास के साथ आगे कदम बढ़ाता मनुष्य रोज नई खोज करता है, नये गैजेट्स ढूंढता है। लेकिन जब यही साधन हमारे रोजमर्रा के जीवन और रिश्तों पर बुरा असर डालने लगते हैं तो सवाल मन में कुलबुलाते हैं कि इनका होना फायदेमंद है या हानिकारक?

वर्चुअल दुनिया सिकोड़ने लगी रिश्तों का दायरा
लॉकडाउन की वजह से पिछले कुछ महीनों से थम-सी गई जिंदगी ने अब धीरे-धीरे अनलॉक होने की प्रक्रिया को अपनाना शुरू किया है। हालांकि अभी भी सारे संस्थान और प्रतिष्ठान खुले नहीं हैं। कई लोग अब भी वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। बच्चे और युवा भी स्कूल बंद होने के कारण अभी घरों पर रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। कहीं ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है तो कहीं परीक्षाएं ऑनलाइन हैं। इन सबके बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है इंटरनेट और मोबाइल, टैबलेट तथा लैपटॉप जैसे साधन। इसी बीच कई सारे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने वेब सीरीज़ से लेकर गेम्स तक नई चीजें लांच कर डालीं और लोग बड़ी संख्या में इनमें मशगूल होने लगे, बिना ये सोचे समझे कि इससे उनके रोजमर्रा के जीवन और रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है।
एक मल्टीनेशनल में काम करने वाले प्रिया और अभिषेक को लॉकडाउन शुरू होते ही घर से काम करने के लिए कहा गया। 'मैं बहुत खुश हो गई। क्योंकि मल्टीनेशनल कम्पनी में साथ जॉब करते हुए भी महीनों हम बात तक नहीं कर पाते थे। दोनों प्रोजेक्ट हेड हैं। इसलिए वीकेंड पर कभी मेरी मीटिंग होती तो कभी अभिषेक की। दफ्तर से घर आने के बाद इतनी थकान होती थी कि वीकेंड का एक दिन तो लगभग सोते हुए ही गुजरता था। बाकी बचा समय घर के सारे काम, ग्रॉसरी, शॉपिंग और किसी परिचित के यहां जाने में बीत जाता। जब लॉकडाउन में घर से काम करने का मौका मिला तो लगा कम से कम अब वीकेंड तो साथ गुजरेगा। लेकिन अभिषेक तो जैसे इसी समय के लिए उधार बैठे थे। उन्होंने सारे वीकेंड्स वेबसीरीज और मूवीज़ देखते हुए गुज़ार दिए। उन्होंने अपने मोबाइल फोन में कई ओटीटी प्लेटफॉर्म डाउनलोड करके रख लिए और जैसे ही काम से थोड़ा भी वक्त मिलता, वो मोबाइल से चिपक जाते। घर के काम में मदद करनी पड़ती तो चिड़चिड़ाने लगते या टालते रहते। मेरी तो डबल मुसीबत हो गई थी। साथ समय बिताना तो दूर की बात उल्टे हमने कई दिन बहस और झगड़ों में गंवा दिए। अब ऑफिस खुल चुके हैं और लगता है ठीक ही हुआ। कम से कम अब हमारे पास चिढ़ने और बहस करने के लिए वक्त नहीं है। और मोबाइल का यूज अब सिर्फ जरूरत के लिए ही होता है।
असल में वर्चुअल सुविधाओं की दुनिया से घिरे हम कई बार ये भी भूल जाते हैं कि हम जीते-जागते इंसान हैं और हमें अपने जैसे ही इंसानों की जरूरत होती है न कि आभासी दुनिया के काल्पनिक लोगों की। 
जिस समय कोरोना काल का कहर शुरू हुआ था, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों की व्यस्तता और जिम्मेदारियां दोनों ही और बढ़ गई थीं। डॉ. सुरेश के साथ भी यही हुआ। घर पर उनकी पत्नी दिव्या पर भी दुगुनी जिम्मेदारियां आ गईं। बाकी काम तो जैसे-तैसे मैनेज हो जाते लेकिन दो टीन एजर बच्चे जिन्हें पहले पति-पत्नी दोनों मिलकर संभाल लिया करते थे और स्कूल के अलावा जो म्यूजिक क्लास और स्पोर्ट एकेडमी से भी जुड़े हुए थे, वो दोनों बच्चे एकदम खाली हो गए। दिनभर घर के काम संभालने के अलावा अब दिव्या पर एक और जिम्मेदारी थी, दोनों बच्चों को व्यस्त रखना और वो भी सही तरीके से। जाहिर था कि ये एक मुश्किल टास्क था और लिहाजा मुश्किल बढ़ी ही क्योंकि लाख कोशिश करने के बाद भी दिव्या बच्चों पर पूरी तरह नजर नहीं रख पाई। बच्चों को जब कोई रोकने-टोकने वाला नजर नहीं आया तो उन्होंने सबसे पहला काम मोबाइल पर उन गेम्स को डाउनलोड करके खेलने का किया जिसके लिए उनके पैरेंट्स की मनाही थी। दिव्या का ध्यान इस तरफ तब गया जब एक दिन उसके मोबाइल पर उसके बैंक अकाउंट से एक बड़ी रकम के डेबिट होने का मैसेज आया। वो घबरा गई। पता चला बच्चों ने ऑनलाइन गेमिंग के चक्कर मे फंसकर किसी जालसाज को पैसे दे डाले। आनन-फानन दिव्या ने अपने भाई को कॉल करके सारी बात बताई, बैंक अकाउंट को तुरन्त फ्रीज करवाया। अच्छी बात यह रही कि डॉ. सुधीर की ड्यूटी ठीक उसी समय खत्म हुई और वो भी घर पर ही क्वारेन्टाइन होकर रहने आ गए। बात समय पर संभाल ली गई और बच्चों को भी समझाया गया। बच्चे भी इससे काफी डर गए थे लेकिन शुक्र है कि कोई बड़ी बात होने से पहले स्थिति को संभाल लिया गया। 
ये या ऐसे ही कई किस्से हमारी दुनिया में आम हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि ये हादसे कोरोना महामारी के पहले नहीं हुआ करते थे लेकिन समस्या यह है कि कोरोना महामारी के इस काल में वर्चुअल दुनिया से लोगों की निकटता इतनी बढ़ गई कि वे खुद से और अपनों से, दोनों से ही दूरियां बना बैठे। समस्या तो तब है जब लोग यह सोचने लगे हैं कि वे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं यानी वे सोशल लाइफ जी रहे हैं। लेकिन ऐसा कतई नहीं है, वर्चुअल लाइफ में रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश में लोग असल जिंदगी में रिश्तों के बीच की दूरियां बढ़ा रहे हैं। अब तो यह आलम है कि करीब होने पर भी स्मार्टफोन के कारण अपने पार्टनर से दूर महसूस करने लगे हैं क्योंकि उनका ध्यान अपनों से ज्यादा अब स्मार्टफोन की स्क्रीन पर होता है। इसमें कोई शक नहीं कि बार-बार मोबाइल चेक करने की आदत, हर बार के लिए व्हाट्सऐप इमेज की जुगाड़, स्टेटस कितनों ने देखा कितनों ने कमेंट किया, इसकी चिंता किसी बीमारी से कम नहीं हैं। कई सर्वे में सामने आ चुका है कि लोगों में बिना जरूरत के मोबाइल चेक करते रहने की प्रवृति बढ़ी है। सोशल नेटवॄकग से हर समय जुड़े रहने की आदत से उनका तन और मन तनाव मुक्त नहीं हो पा रहा है। देर तक किसी का मैसेज न आना या फिर पोस्ट पर कोई कमेंट न मिलना तनाव और एन्जाइटी का शिकार बना रहा है। एक अध्ययन में सामने आया है कि अगर दो या दो से ज्यादा लोग एक-दूसरे से बातचीत कर रहे हैं, तो उस समय मोबाइल हाथ में थामे व्यक्ति के प्रति दूसरे व्यक्तियों में नकारात्मक भावना का संचार होता है। हर चीज मोबाइल में सुरक्षित रखने की आदत चीजों को याद करने की क्षमता को नुकसान पहुंचा रही है। मल्टी टास्किंग की प्रवृति बढ़ गई है जिससे लोग हर समय दो से ज्यादा काम करते हैं, जो कि स्वास्थ्य के लिए कतई अच्छा नहीं है। 
जरूरी है कि अब वर्चुअल दुनिया की बजाय अपने आस-पास मौजूद अपनों की अहमियत समझी जाए। इस मामले में कुछ टिप कारगर हो सकते हैं-
  • सबसे पहले घर में सबके लिए मोबाइल, कम्प्यूटर आदि सम्बन्धी कुछ नियम बनाएं। जैसे कितनी देर गेम खेलना है या व्हाट्सएप पर चैट करना है या कोई वेब सीरीज़ कब देखनी है, आदि। इसमें बच्चों और बड़ों सभी को शामिल करें। ये नियम सबके लिए समान हों और सब इसका पालन करें, यह भी सुनिश्चित करें। जाहिर है कि नियम बनाने का काम मुख्यत: बड़े ही करेंगे लेकिन बच्चों से भी इसके लिए राय जरूर लें। 
  • बच्चों के साथ बड़े भी अपने सोने और जागने का समय जरूर तय करें। इससे आपको कई फायदे होंगे। चूंकि बच्चों के स्कूल अभी खुले नहीं हैं, लेकिन ऑनलाइन क्लासेस चल रही हैं और पैरेंट्स भी अपने रोज के रूटीन में व्यस्त हैं। ऐसे में पूरे परिवार को साथ गुजारने के लिए थोड़ा समय मिले यह जरूरी है। जल्दी सोने और उठने से आपको यह समय मिल सकेगा। साथ ही इससे आपकी सेहत पर भी अच्छा असर पड़ेगा। 
  • जब तक इमरजेंसी न हो मोबाइल, टैबलेट जैसे गैजेट्स को रात में अपने साथ लेकर न सोएं। इसकी लत या लालच आपको देर तक जगाए रख सकती है, आपकी नींद खराब कर सकती है और आपकी आंखों के साथ ही पूरे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
  • दिन का थोड़ा समय किसी व्यायाम या रचनात्मक गतिविधि को भी दें। वीकेंड में इसमें पूरे परिवार को शामिल करें। भले ही यह आधा घन्टे के लिए हो लेकिन इस समय को साथ में बिताएं। 
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फिजूल मैसेज फॉरवर्ड करने की बजाय हफ्ते में एक बार अपने परिचित मित्रों को कुछ देर की कॉल कर उनकी कुशलक्षेम पूछें। हर हफ्ते के लिए कुछ लोगों की एक लिस्ट बना लें। इससे आपके रिश्ते भी बने रहेंगे और सामाजिकता भी।
  • घर मे यदि पति-पत्नी दोनों ही हैं तो यह समय एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताने में खर्च करें। अगर आप कोई मूवी देखना चाहते हैं या गेम खेलना चाहते हैं तो भी उसके लिए एक निश्चित समय रखें। बाकी समय में साथ मिलकर घर के काम में हाथ बटाएँ या रचनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लें।

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