अष्टांग योग संपूर्ण उपचार पद्धति

सीताराम गुप्ता

6th January 2021

यूं तो स्वास्थ्य और निरोगी रहने के कई तरीके हैं, पर योग उसमें सबसे अहम और कारगर है क्योंकि इसके कोई दुष्परिणाम भी नहीं होते। अष्टांग योग, योग का ही एक हिस्सा है जो कि अपने आप में एक पूर्ण उपचार पद्ति है, कैसे? आइए जानते हैं।

अष्टांग योग संपूर्ण उपचार पद्धति

योग एक संपूर्ण चिकित्सा-पद्धति, एक रूपांतरण-प्रक्रिया है इसमें संदेह नहीं, लेकिन मात्र कुछ आसन या श्वास-प्रक्रियाएं संपूर्ण योग नहीं है। योग के आठ अंग हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। चिकित्सा-पद्धति के रूप में अथवा रूपांतरण के लिए येाग के इन सभी आठों अंगों का महत्त्व है अत: आवश्यकतानुसार सभी अंगों का अभ्यास अनिवार्य है। एक प्रसिद्ध योगाचार्य अपने नियमित कॉलम में प्रत्येक रोग के उपचार के लिए कुछ योगासन तथा प्राणायाम के अभ्यास बताते हैं। योगाचार्य जी डायबिटीज के उपचार के लिए कुछ आसन, कुछ श्वास के अभ्यास तथा अन्य क्रियाएं सुझाते हैं। क्रियाओं की विधि बतलाने से पूर्व वे कहते हैं कि हर अभ्यास इस भाव से करें कि 'मेरा पेंक्रियाज स्वस्थ हो रहा है तथा मधुमेह एवं मधुमेह के कारण उत्पन्न अन्य रोग भी मिट रहे हैं। बालों की खूबसूरती के लिए योगाचार्य जी योगासन तथा प्राणायाम के कतिपय अभ्यासों के बाद दोनों हाथों के नाखून रगड़ने का परामर्श भी देते हैं और साथ ही ये भी बताते हैं कि नाखून रगड़ते समय मन में ये भाव रखें कि मेरे बालों का पोषण हो रहा है। यहां शारीरिक अभ्यास क्रम के साथ-साथ मानसिक अभ्यास क्रम को भी जोड़ दिया गया है।

अब प्रश्न उठता है कि शारीरिक अभ्यास क्रम महत्त्वपूर्ण है या मानसिक अभ्यास क्रम? 

हमारा शरीर तथा हमारा व्यक्तित्व वास्तव में हमारी भाव प्रक्रिया द्वारा निर्मित होता है। जैसा हम लगातार चिंतन करते अथवा सोचते हैं वैसे ही हम हो जाते हैं अत: हमारी विचार प्रक्रिया का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य अथवा रोग पर भी पड़ता है। यही विचार प्रक्रिया या भाव या आत्म-संसूचन अथवा स्वीकारोक्ति या प्रतिज्ञापन (एफर्मेशन) रोग के उपचार में भी सबसे महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। यानी अपने मन में उठने वाले भाव या विचार से मस्तिष्क को प्रभावित करना है। यहां मन महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

जैसा हम चाहते हैं अथवा अभीप्सा करते हैं वह मन-मस्तिष्क की अल्फा अवस्था या कहें तुरीयावस्था में ही पूरा होना संभव होता है जो 'योगनिद्रा' जैसी ही अवस्था है। योग के अभ्यास क्रम में इसकी भूमिका 'शवासन' जैसी ही है।

शवासन का अभ्यास प्राय: दो आसनों के बीच विश्राम के लिए किया जाता है, जिसकी अवधि प्राय: अल्प समय की ही होती है, अत: उपचार के लिए योगासन और प्राणायाम के बाद प्रत्याहार, धारणा और ध्यान की अवस्थाएं उत्तम हैं। इसमें विचार को देखकर उसे अनपेक्षित स्थिति से हटाना तथा अपेक्षित स्थिति पर केन्द्रित करना है। रोग क्योंकि एक गलत विचार या भाव मात्र है, अत: पहले इसे देखना है फिर गलत विचार को हटाकर सही विचार को स्थापित करना है। मानना है और मन को मनाना है। मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो पहले मन की कंडीशनिंग को देखना है उसका विश्लेषण करना है, जो गलत कंडीशनिंग है उसकी डिकंडीशनिंग करनी है और उसके स्थान पर उपयोगी विचार, भाव, इच्छा या अभीप्सा की रीकंडीशनिंग करनी है, संकल्प लेना है। गलत इबारत को मिटाकर सही इबारत को पुन: लिखना है।

अब प्रश्न उठता है कि यदि मन का ही सारा खेल है तो फिर आसन और प्राणायाम की आवश्यकता ही क्या है? 

वस्तुत: शारीरिक क्रियाएं और श्वास के अभ्यास भौतिक शरीर को मन से जोड़ने और मन को अपेक्षित दशा में ले जाने के लिए अनिवार्य हैं। जैसे रोटी बनती तो आटे से ही है लेकिन रोटी बनाने से पूर्व आटे में पर्याप्त मात्रा में पानी डालकर उसे गूंधना और उसमें लोच देना अनिवार्य है, जिससे रोटी सही आकार की और खाने में अच्छी बने, वैसे ही मन को अल्फा अवस्था में ले जाने के लिए योगासन और प्राणायाम का अभ्यास अनिवार्य है। ये सीढ़ी के शुरू के डंडे हैं। यदि व्यक्ति का मन अत्यधिक चंचल नहीं है और आसानी से एकाग्रता प्राप्त कर लेता है तो उसके लिए आसन और प्राणायाम का अधिक अभ्यास अपेक्षित न भी हो लेकिन अपेक्षाकृत चंचल चित्त वालों के लिए योग के इन बहिरंगों का पर्याप्त अभ्यास अनिवार्य है। यदि आपका मन अपेक्षाकृत कम चंचल है अथवा आपने पहले ही पर्याप्त अभ्यास किया है तो शरीर को सही आसन में रखकर दो-चार गहरे सांस लेने पर ही आप अल्फा अवस्था में पहुंच जाएंगे और इस अवस्था में पहुंचकर आप जैसा विचार करेंगे अथवा जैसी भावधारा आपकी होगी वही भौतिक जगत में वास्तविकता ग्रहण कर लेगी।

जब हम साधना करते हैं या योग-साधना करते हैं तो कोई न कोई भाव तो हमारे मन में व्याप्त होता ही है। मन के कई स्तर हैं। चेतन या जाग्रत अवस्था में भी भाव तो होता है लेकिन वह वास्तविकता में परिवर्तित नहीं होता। वस्तुत: चेतन मन द्वारा अवचेतन मन को प्रभावित करना ही वास्तविक उपचार-प्रक्रिया है और एकाग्रता और ध्यान के बिना यह असंभव है। एकाग्रता और ध्यान से हम अपेक्षित अल्फा लेवल में पहुंच जाते हैं या कहें अल्फा लेवल में पहुंच कर ही एकाग्रता और ध्यान की प्राप्ति हो सकती है। अल्फा अवस्था कहिये या ध्यान और एकाग्रता की अवस्था इसी अवस्था में चेतन मन अवचेतन मन को प्रभावित करता है। सामान्य अवस्था में सोचे हुए विचार घनीभूत होकर वास्तविकता में परिवर्तित हो जाते हैं।

यदि आप ध्यानावस्था के बिना दोहरा रहे हैं कि मैं स्वस्थ हो रहा हूं तो उस अवस्था में आपके विचार, संकल्प या स्वीकारोक्ति के विरोधी विचार भी उत्पन्न हो जाते हैं। ध्यान या एकाग्रता की अवस्था में ही किसी मनचाहे विचार को अक्षुण्ण रखा जा सकता है। यहीं द्वंद्व से मुक्ति संभव है। द्वंद्वातीत अवस्था ही उपचार की आदर्श अवस्था है और द्वंद्वातीत अवस्था के लिए मन की गहराई में उतरना या अल्फा लेवल में पहुंचना अनिवार्य है। यही वह अवस्था है जहां हम रोग को निर्मूल कर सकते हैं या रोग की पीड़ा से मुक्त हो सकते हैं। 

मन की शक्ति द्वारा रोग को समाप्त करते हैं अथवा व्याधि मुक्त हो जाते हैं तो यह मन की शक्ति द्वारा उपचार की प्रक्रिया में आता है और जब मन की शक्ति द्वारा रोग की पीड़ा से मुक्त हो जाते हैं, दर्द से निरपेक्ष हो जाते हैं तो यह उपचार से आगे की प्रक्रिया है जिसे आध्यात्मिक उत्थान कहा जा सकता है। रामकृष्ण परमहंस जैसी अवस्था। गले में कैंसर का ट्यूमर लेकिन रोग से निरपेक्ष, रोग की पीड़ा से निरपेक्ष। जब रोग से उत्पन्न कष्ट की पीड़ा ही नहीं तो इसका अर्थ है सब कुछ स्वीकार्य है। अदृश्य सत्ता के प्रति पूर्ण समर्पण है। यही उपचार की चरमावस्था है जो वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति का द्योतक है। यह वह अवस्था है जब व्यक्ति सब कुछ पाने में समर्थ है लेकिन पाने की इच्छा से निरपेक्ष हो चुका है। सुख-दुख, लाभ-हानि, आय-व्यय, राग-द्वेष, मानापमान से ऊपर उठकर समता में स्थित हो जाना ही वास्तविक उपचार है। यहीं ध्यान से समाधि की ओर अग्रसर होने का मार्ग प्रशस्त होता है। यही योग की चरमावस्था है। इसी में योग की पूर्णता है।

श्री अरविंद का 'समग्र योग' (इंटीग्रल योग) इच्छा, इच्छा के विरोधी भावों का त्याग तथा समर्पण इन तीन अंगों पर आधारित है लेकिन क्या पतंजलि के अष्टांग योग के आठों अंग इन तीनों में समाहित नहीं हैं? अवश्य हैं। बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग जिसमें सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् जीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि, सम्यक संकल्प और सम्यक् दृष्टि ये आठ अंग हैं अब यदि इन आठ अंगों को शील, समाधि और प्रज्ञा इन तीन प्रक्रियाओं में समेट दें, जैसा बुद्ध ने स्वयं किया है, तो क्या इन आठों अंगों का अनुपालन अपेक्षित नहीं होगा? अवश्य होगा। शील, समाधि और प्रज्ञा इन तीनों प्रक्रियाओं में ही समाहित है बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग। यही तथ्य योग या पतंजलि येाग के विषय में भी उतना ही सही है। मात्र योगासन योग नहीं है अत: आठों अंगों का अभ्यास जरूरी है। इसके अभाव में अपेक्षित परिणाम अथवा रूपांतरण की प्रक्रिया संभव ही नहीं है।

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