नेत्र रोगों के कारण, लक्षण और निवारण

हनुमान प्रसाद उत्तम

8th January 2021

हमारे शरीर का सबसे संवेदनशील अंग है हमारी आंखें। आज नेत्र रोगों के मरीजों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। छोटे-छोटे बच्चों को भी आज आंख से जुड़ी समस्याएं हैं।

नेत्र रोगों के कारण, लक्षण और निवारण

हमारी आंख एक कैमरे के समान है। जिस प्रकार कैमरे में शक्तिशाली लैंस होता है, जो बाहरी वस्तु से आने वाले प्रकाश को संकेन्द्रित करके उस वस्तु का चित्र फोटोग्राही प्लेट पर बनाता है, ठीक उसी प्रकार सामान्य दृष्टि वाले मनुष्य में दूर की वस्तु का चित्र आंख की संवेदनशील परत पर बनता है।

निकट दृष्टि दोष

निकट दृष्टि दोष वह नेत्र रोग है, जिसमें किसी भी दूर की वस्तु का चित्र आंख की संवेदनशील परत के सामने या उसके आगे बनता है, जिससे मनुष्य दूर की वस्तु देखने में असमर्थ होता है  और वह केवल निकट की वस्तु देखने में समर्थ होता है। ऋणात्मक पावर के लेंस को चश्मे में लगाने से यह दोष दूर होता है।

दूर दृष्टि दोष

दूर दृष्टि दोष भी एक प्रकार का नेत्र रोग है, जिसमें दूर की वस्तु का चित्र आंख की संवेदनशील परत के पीछे बनता है और मनुष्य पास की किसी भी वस्तु को देखने में असमर्थ होता है, इस दृष्टि को धनात्मक पावर का लेंस चश्मे में लगाने से दूर किया जा सकता है।

ऐस्टीगमैटिज्म

इस दृष्टि दोष में किसी भी दूर की वस्तु का प्रतिबिम्ब आंख की संवेदनशील परत पर नहीं बनता। प्रतिबिम्ब का कुछ हिस्सा पीछे बनता है और मनुष्य किसी भी वस्तु को ठीक प्रकार से नहीं देख सकता। इस दोष को बेलनाकार लेंस चश्मे में लगाकर ठीक किया जा सकता है।

विच्छेदित संवेदनशील परत

हमारी आंख की संवेदनशील परत है रैटीना, जिसकी सहायता से हम किसी भी वस्तु के चारों ओर देख सकते हैं। यह परत आंख की अन्य परतों पर चारों ओर से चिपकी हुई होती है तथा जिस तरफ से यह परत विच्छेदित हो जाती है, उसके दूसरी तरफ का हमारी आंख नहीं देख सकती। अगर यह दाएं से विच्छेदित होती है, तो हम बाएं का और अगर बाएं से विच्छेदित होती है, तो दाएं का हम नहीं देख सकते।

लैंस क्या होता है?

जिस प्रकार कैमरे में एक प्रकार का शक्तिशाली लैंस होता है, जो बाहरी वस्तु से आने वाली प्रकाश की किरणों को संकेंद्रित करके उसे फोटोग्राही प्लेट पर प्रतिबिंबित करता है, इसी प्रकार आंख में एक शक्तिशाली लैंस होता है, जो आंख की संवेदनशील परत पर बाहरी वस्तु का प्रतिबिंब बनाने में सहायता करता है, जहां से आंख तंत्रिका (नेत्र तंत्रिका) इसे दिमाग तक पहुंचाती है तथा हम किसी भी वस्तु को देख सकने में समर्थ होते हैं। यह लैंस आंख की काली पुतली के पीछे स्थित होता है।

मोतियाबिन्द

मोतियाबिन्द वृद्धावस्था में होने वाली आंखों की आम बीमारी है। किंतु कभी-कभी युवक, बच्चे और यहां तक कि नवजात शिशु भी इसके शिकार हो जाते हैं। यह आंख की उन थोड़ी-सी बिमारियों में से है, जिसका यदि सही समय पर उपचार कर लिया जाए, तो इससे पूरी तरह से छुटकारा मिल जाता है और मनुष्य अपनी सही दृष्टि दोबारा पा सकता है।

मोतियाबिंद क्या होता है?

हमारी आंखों का लैंस प्रोटीन व जल का बना होता है। यह प्रोटीन इस तरह से व्यवस्थित होती है कि प्रकाश की किरणें इससे पार हो जाती हैं। मोतिया होने की दशा में यही प्रोटीन अव्यवस्थित होकर कई जगह एकत्र होने लगती है तथा धीरे-धीरे लैंस को सफेद बनाने लगती है जिससे लैंस अपनी पारदर्शिता खो देता है। इसी को मोतियाबिंद बनना कहते हैं। लैंस की पारदर्शिता खोने की तुलना दूध के दही बनने से की जा सकती है। जिस प्रकार दूध के दही बनने के बाद उसे फिर से दूध नहीं बनाया जा सकता, उसी प्रकार मोतिया बनने पर उसे फिर किसी तरह से नहीं रोका जा सकता है। 

मोतियाबिंद के कारणों का अभी तक पूरा पता नहीं है। इसके मुख्य कारणों में वृद्धावस्था खुराक में प्रोटीन तथा विटामिन की कमी, सूर्य की पराबैंगनी किरणें और कुछ दवाइयों का गलत प्रयोग है। मधुमेह जन्मजात गर्मी (सिफलिस) उसे बढ़ाने में सहायक होते हैं। आंखों में सूजन  तथा चोट के कारण किसी भी आयु में मोतियाबिंद हो सकता है। बच्चों की आंखों में आनुवांशिकता के कारण या गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में माता को जर्मन खसरा निकलने के कारण मोतियाबिंद हो सकता है।

मोतियाबिंद के चिह्न व लक्षण

मोतियाबिंद का प्रारंभिक लक्षण पास और दूर की नजर का धुंधला होना हो सकता है। धीरे-धीरे दूर की नजर निरंतर कम हो जाती है। शुरू में लैंप या रोशनी अथवा चन्द्रमा जैसी एक से अधिक दिखाई देती हैं। कुछ वर्ष बीतने के बाद नजर ज्यादा खराब हो जाती है और रोगी को घर से निकलने में भी दिक्कत होती है। कम दिखाई देने के कारण वह अक्सर ठोकर खा जाता है। फिर एक समय आता है, जब वह केवल लैंप या टार्च की रोशनी ही देख सकता है। यह दशा मोतियाबिंद का पक जाना कहलाती है। यदि समय पर उपचार न किया जाए, तो मोतियाबिंद के ज्यादा पक जाने की अवस्था में आंखों में काला पानी आ सकता है तथा सूजन भी हो सकती है।

ऑपरेशन: एकमात्र उपचार

अब तक मोतियाबिंद का किया जाने वाला एकमात्र उपचार ऑपरेशन है। इस ऑपरेशन में मोतियाबिंद से ग्रस्त लैंस निकाल देते हैं। ऑपरेशन के बाद मरीज पूरी तरह देख सकता है। इस प्रकार का ऑपरेशन बड़ी सरलता से हो जाता है। ऑपरेशन योग्य नेत्र विषेशज्ञ द्वारा आंख के अस्पताल अथवा इस प्रकार का काम करने वाली एजेंसियों द्वारा लगाए गए कैंप में ही कराना चाहिए। ऐसे नीम-हकीमों से कभी नहीं कराना चाहिए, जो  गांवों में घूमते-फिरते हैं।

ऑपरेशन के बाद सावधानी

अब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऑपरेशन करवाने के बाद मरीज को सीधे नहीं लेटना पड़ता। जिस तरफ ऑपरेशन न किया हो, उस ओर करवट बदल सकता है। पहले दो दिन केवल मुलायम भोजन ही करना चाहिए। खांसी अथवा छींक रोकनी चाहिए। जमीन से कोई चीज उठाने के लिए सिर को झुकाना नहीं चाहिए। पाखाना करते समय जोर नहीं लगाना चाहिए। कोई भी सख्त चीज नहीं खानी चाहिए। अस्पताल छोड़ने के बाद उपरोक्त सभी सावधानी बरतनी चाहिए। दवाइयों आदि के संबंध में एहतियातों का पालन करना चाहिए ।

काला पानी या काला मोतिया

काला मोतिया आंखों का वह रोग है, जिसमें मरीज की आंखों का दाब निरंतर बढ़ा रहता है, जो कि आंखों की तंत्रिका (नेत्र तंत्रिका) को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता रहता है तथा मरीज अंधेपन का शिकार हो जाता है। 

नेत्र तंत्रिका क्या है?

नेत्र तंत्रिका लगभग दस लाख नसों का वह समूह है, जो कि संवेदनशील परत रैटीना को हमारे मस्तिष्क से जोड़ता है। सामान्य दृष्टि के लिए सामान्य तंत्रिका का होना आवश्यक है।

नेत्र तंत्रिका के लिए घातक

काफी लोगों को आंखों में दाब बढ़ने के कारण काला मोतिया की शिकायत उत्पन्न होती है। आंख के अग्र भाग में एक कोपढ़ होता है, जिसे एंटीरियर चैंबर कहते हैं। इसी चैंबर में एक तरल पदार्थ लगातार रक्त में आता और जाता रहता है तथा ऊतकों को आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराता है।

यह पदार्थ का विसर्जन एंटीरियर चैंबर के कोण से होता है, जहां कॉर्निया तथा आइरिस मिलते हैं। जब यह पदार्थ कोण पर पहुंचता है, तब यह एक स्पंजी जलनुमा ऊतकों के समूह से होकर आंख में विसर्जित होता है।

इस मोतिया के नाम से आशय है कि वह कोण, जहां से यह तरल पदार्थ विसर्जित होता है, उसका मुख खुला हुआ होता है। किंतु कुछ अज्ञात कारकों से वह ऊतकों के जालनुमा समूह से देर से विसर्जित होता है, जिसके कारण आंख का दाब बढ़ जाता है और जब तक यह दाब निरंतर में नहीं आता, तब तक यह नेत्र तंत्रिका को नुकसान पहुंचाता रहता है तथा दृष्टिपात होता रहता है।

साधारणतया इस दशा में मरीज का ऑपरेशन करना ही उचित रहता है। कुछ समय अगर मरीज चाहे तो उसका दाब दवाइयों से नियंत्रित किया जाता है व नियंत्रण में आने पर शल्य चिकित्सा ही उचित होती है। यह शल्य चिकित्सा दृष्टि तो नहीं बढ़ाती, किंतु दृष्टिपात होने से बचाती है।

बचाव के तरीके

अगर आप काला मोतिया के रोगी हैं, तो आपके लिए चेतावनी है कि अपनी दवाइयां नियमित रूप से प्रयोग करें तथा नियमित रूप से ही अपने चिकित्सक की सलाह लें।

अपने परिवार की भी आप मदद कर सकते हैं। जिनकी उम्र, 50 वर्ष से अधिक है तथा जिनमें काला मोतिया उत्पन्न होने के अवसर अधिक हैं। उन्हें आप दो साल में नेत्र चिकित्सक से जांच कराने की सलाह दें।

मधुमेह व नेत्र रोग

मधुमेह शरीर का वह रोग है, जिसमें शरीर में शर्करा की मात्रा ज्यादा हो जाती है तथा यही अधिकता शरीर के विभिन्न अंगों पर अपना कुप्रभाव डालती है। जैसे हृदय जनित रोग, गुर्दे के विभिन्न रोग उत्पन्न होना, चर्म रोग उत्पन्न होना, तंत्रिका तंत्र और यह अंधता भी उत्पन्न कर देती है। मधुमेह जनित नेत्र रोग को हम अंधापन होने से पहले ही नियंत्रण में कर सकते हैं।

मधुमेह जनित नेत्र रोग

इसमें वे नेत्र रोग आते हैं, जो मधुमेह जनित होते हैं तथा अंधापन उत्पन्न करते हैं-

मधुमेह जनित रैटीनोपैथी-आंख की संवेदनशील परत तथा रक्त वाहिनियों को नुकसान पहुंचाना।

सफेद मोतिया- मोतियाबिंद उत्पन्न होना।

काला मोतिया- आंख का दाब बढ़ना।

सामान्यत: मधुमेह जनित नेत्र रोग 

सामान्यत: मधुमेह जनित नेत्र रोग है डायबिटीज रैटीनोपैथी, जिसमें आंख की संवेदनशील परत की रक्त वाहिनियों में सूजन उत्पन्न हो जाती है तथा वे रक्त को रोक पाने में असमर्थ होती है, जिससे कि विभिन्न तरल पदार्थ उनमें से बाहर आने लगते हैं। नई रक्त वाहिनियां भी संवेदनशील परत पर उत्पन्न होने लगती हैं तथा धीरे-धीरे मनुष्य को दृष्टिपात लगता है।

रोग के लक्षण

इस रोग में मनुष्यों को दृष्टि के कमी का तब तक पता नहीं चलता, जब तक कि यह रोग काफी फैल न चुका हो।

1- धुंधलापन हो सकता है, अगर मैक्यूला तक रोग फैला हो। यह संवेदनशील परत का वो भाग है, जो दृष्टि को पैनापन प्रदान करता है। यह मैक्यूला में सूजन उत्पन्न करता है।

2- अगर नई रक्त वाहिनियां संवेदनशील परत पर उत्पन्न हो गई हों, तो वे रक्तबहाव कर सकती हैं, जिससे कि पूरा दृष्टिपात उत्पन्न हो जाता है। किंतु अधिक मरीज को तभी पता चलता है जब आंख में यह रोग काफी फैल चुका हो।

नियमित जांच आवश्यक

आंखों की पुतली फैलाकर संवेदनशील परत की विस्तृत जांच करने पर इस रोग का पता चलता है।

डायबिटीज रैटीनोपैथी का उपचार

इसका उपचार है लेजर चिकित्सा:

1. लेजर चिकित्सा के जरिए एक बहुत तीव्र प्रकाश की किरणें संवेदनशील परत पर डाली जाती है, जो नई रक्त वाहिनियों को नष्ट कर देती है, जिससे कि 90 प्रतिशत दृष्टिपात होने से बचा जा सकता है।

2. लेजर चिकित्सा से मैक्यूला की सूजन भी कम की जा सकती है। इसमें उन रक्तवाहिनियों का इलाज होने से बचा जा सकता है, जिनके बहाव की वजह से मैक्यूला की सूजन उत्पन्न हुई।

डायबिटीज रोग की रोकथाम

रोकथाम पूरी तरह तो नहीं, किंतु कम की जा सकती है। मधुमेह नियंत्रण विसंगति परीक्षणों से पता चलता है कि मधुमेह नियंत्रण करने से डायबिटीज रैटीनोपैथी की शुरुआत तथा उसका बढ़ना दोनों कम किया जा सकते हैं।

मधुमेह के नियंत्रण करने से न सिर्फ आंख, अपितु शरीर के अन्य अंगों की विकृतियों को भी रोका जा सकता है।

दृष्टिपात रोकने के उपाय

इस रोग का शुरुआती दौर में ही पता करना तथा जल्दी से जल्दी इसका नियमित उपचार शुरू करना ही मधुमेह जनित दृष्टिपात रोकने का एकमात्र उपाय है। 

 

यह भी पढ़ें -डिप्रेशन को कैसे पहचानें? टिप्स

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