युवकों के लिए स्वामी विवेकानंद के उद्बोधन

सिद्घार्थ शंकर

7th January 2021

युगपुरुष एवं करोड़ों युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। स्वामी जी के जन्मदिवस पर प्रस्तुत है युवाओं को दिए उनके कुछ प्रेरणादायक विचार।

युवकों के लिए  स्वामी विवेकानंद  के उद्बोधन

मानव जीवन के फैलाव का महत्त्वपूर्ण समय है युवावस्था व्यक्ति की कई शक्तियों, प्रतिभाओं, क्षमताओं का इस समय पूर्ण उठाना होता है।

युवकों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिवर्तन की अपार सामर्थ्य होती है। स्वामी विवेकानंद ने भारत की युवा शक्ति को बलवान चरित्रवान, कर्म निष्ठï बनाने के लिए देश भर में तेज पूर्ण ज्ञान दिए थे। वे विचार अब भी भारत के युवक-युवतियों के लिए अनुकरण है।

स्वामी जी के कुछ प्रेरक वचन निम्नांकित हैं-

''तोते के बराबर बातें करना हमारा अभ्यास हो गया है।

व्यवहार में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। इसका कारण क्या है? शारीरिक दुर्बलता। कमजोर मस्तिष्क कुछ नहीं कर सकता।

हमको अपने मस्तिष्क को बलवान बनाना होगा- मैंने कुछ अनुभव प्राप्त किया है।

बलवान शरीर से अथवा खूब मजबूत स्नायुओं से तुम गीता को ज्यादा समझ सकोगे। शरीर में ताजा रक्त होने से तुम कृष्ण की महान प्रतिभा और महान तेजस्विता को अच्छी तरह समझ सकोगे।

जिस समय तुम्हारा शरीर तुम्हारे पैरों के बल मजबूत भाव से खड़ा होगा, जब तुम अपने को मनुष्य समझोगे, जब तुम उपनिषद और आत्मा की महिमा भली भांति समझोगे।"

''तुममें से प्रत्येक का भविष्य प्रकाशमान है। अपने आप पर गहरा दृढ़विश्वास रखो। वैसा ही विश्वास, जैसे मैं बाल्यकाल में अपने ऊपर रखता था और जिसे मैं अब कार्यान्वित कर रहा हूं। तुम सभी अपने आप पर विश्वास रखो। यह विश्वास रखो कि प्रत्येक की आत्मा में असीम शक्ति विद्यमान है। - वेदों में कहा गया है - 'बलवान, निरोग, तेज धारण-शक्ति वाले और उत्साहयुक्त मनुष्य ही ईश्वर के पास पहुंच सकते हैं।" तुम्हारे भविष्य को निश्चित करने का यही समय है।

इसीलिए मैं कहता हूं कि अभी इस भरी जवानी में इस नए जोश के जमाने में ही कामकरो, जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर काम नहीं होगा।

काम करो, क्योंकि काम करने का यही समय है। सबसे ज्यादा ताजे, बिना स्पर्श किए गए और बिना संूघे फूल ही भगवान के चरणों पर चढ़ाएं जाते हैं और वे उन्हें स्वीकार करते हैं। अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, देर न करो।"

''हर एक स्त्री को, हर एक पुरुष को और सभी को ईश्वर के ही बराबर देखो।

तुम किसी की सहायता नहीं कर सकते, तुम्हें केवल सेवा करने का अधिकार है।

प्रभु की संतान की, अगर भाग्यवान हो तो खुद प्रभु की ही सेवा करो।

अगर ईश्वर के दया से उसकी किसी संतान की सेवा कर सकोगे, तो तुम धन्य हो जाओगे अपने आप को काफी बड़ा धर्म समझो।

तुम धन्य हो क्योंकि सेवा करने का तुमको अधिकार मिला और दूसरों को नहीं मिला।

केवल ईश्वर पूजा के भाव से सेवा करो। दरिद्र व्यक्तियों में हमको भगवान को देखना चाहिए अपनी ही मुक्ति के लिए उनको निकट जाकर हमें उनकी पूजा करनी चाहिए।

अनेक दुखी और गरीब प्राणी हमारी मुक्ति के माध्यम है जिसमें हम रोगी, पागल, कोढ़ी, पापी आदि स्वरूपों में विचरते हुए प्रभु की सेवा करके अपनी मुक्ति करें। मेरे शब्द बड़े गंभीर है और मैं उन्हें फिर दोहराता हूं कि हम लोगों के जीवन का सबसे उत्तम आनंद यही है कि हम इन अलग-अलग रूपों में विराजमान भगवान की सेवा कर सकते हैं। प्रभुत्व से किसी का कल्याण कर सकने की धारणा व्याग दो जिस प्रकार पौधे के बढ़ने के लिए जल, मिट्टïी, वायु आदि पदार्थों को इकट्ठा कर देने से फिर वह पौधा अपनी प्रकृति के नियमानुसार जरूरी पदार्थों का ग्रहण अपने आप ही कर लेता है और अपने गुण के अनुसार बढ़ता जाता है, उसी प्रकार दूसरों की वृद्घि के साधन एकत्र करके उनकी भलाई करो।"

''संसार में ज्ञान के प्रकाश का विस्तार करो, प्रकाश, सिर्फ प्रकाश लाओ। प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करे।

जब तक सब लोग भगवान के निकट न पहुंच जाएं, तब तक तुम्हारा कार्य पूर्ण नहीं हुआ है गरीबों में ज्ञान का विस्तार करो, धनियों पर और भी ज्यादा प्रकाश डालो क्योंकि गरीबों की अपेक्षा धनियों को ज्यादा प्रकाश की जरूरत है। अनपढ़ लोगों को भी प्रकाश दिखाओ। शिक्षित मनुष्य के लिए और ज्यादा प्रकाश चाहिए क्योंकि इस समय शिक्षा का झूठा अभियान खूब प्रबल हो रहा है।"

इस देश में काफी पंथ या संप्रदाय हुए हैं। अब भी ये पंथ काफी संख्या में हैं और भविष्य में भी काफी संख्या में रहेंगे, क्योंकि हमारे धर्म की यह विशेषता रही है। उसमें व्यापक तत्त्वों की नजर से इतनी उदारता है कि अगर बाद में उनमें से अनेक संप्रदाय फैले हैं और उनकी बहु विधाशाखा-प्रशाखाएं फूटी हैं तो भी उनके तत्त्व हमारे सिर पर फैले हुए इस असीम आकाश के बराबर विशाल है, खुद प्रकृति की भांति नित्य और व्यवहार है। अत: संप्रदायों का होना तो स्वाभाविक ही है, लेकिन जिसका होना जरूरी नहीं है, वह है इन संप्रदायों के बीच के झगड़े- झमेले। संप्रदाय जरूर रहे, पर सांप्रदायिकता दूर हो जाए। सांप्रदाययिकता से संसार की कोई वृद्घि नहीं होगी, पर संप्रदायों के न रहने से संसार का कोई काम नहीं चल सकता। एक ही सांप्रदायिक विचार के लोग सब काम नहीं कर सकते। संसार की यह असीम शक्ति कुछ थोड़े से लोगों से परिचलित नहीं हो सकती यह बात समझ लेने पर हमारी समझ में यह भी आ जाएगा कि हमारे भीतर किस लिए यह संप्रदाय भेदरूपी श्रम - विभाग अनिवार्य रूप से आ गया है। अलग-अलग अध्यात्म शक्ति समूहों का परिचालन करने के लिए संप्रदाय स्थापित रहे। लेकिन जब हम देखते हैं कि हमारे प्राचीनतम शास्त्र इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि यह सब भेदभाव केवल ऊपर का है, देखने भर का है और इन सारी विभिन्नताओं के बावजूद इनको एक साथ बांधे रहने वाला परम मनोहर स्वर्ण सूत्र इनके भीतर पिरोया हुआ है, तब इसके लिए हमें एक दूसरे के साथ लड़ने - झगड़ने की कोई जरूरत नहीं दिखाई देती। हमारे प्राचीनतम शास्त्रों ने घोषणा की है - ''एक सद्विपा बहुधा वदन्ति" विश्व में एक ही सद्वस्तु विद्यमान है, ऋषियों ने उसी एक का अलग-अलग नामें से वर्णन किया है। अत: ऐसे भारत में, जहां हमेशा से सभी संप्रदाय बराबर रूप से सम्मानित होते आए हैं, अगर जब भी संप्रदायों के बीच ईर्ष्या-द्वेष और लड़ाई-झगड़े बने रहे तो धिक्कार है हमें, जो हम अपने को उन महिमान्वित पूर्वजों के वंशधर बताने का दुस्साहस करें।"

हमें ऐसे धर्म व सिद्घांत की जरूरत है, जिससे हम मनुष्य बन सकें। हमें ऐसे सिद्घांतों की जरूरत है, जिससे हम मनुष्य बन सकें। हमें ऐसी अवयव संपन्न शिक्षा चाहिए जो हमें मनुष्य बना सके, और यह रही सत्य की कसौटी। जो भी तुमको शारीरिक मानसिक और अध्यात्म नजर से कमजोर बनाएं उसे जहर की भांति त्याग दो। उसमें जीवनीशक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता। सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्र है, वह ज्ञान स्वरूप है। सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो हृदय के अंधकार को दूर कर दे, जो हृदय में स्फूर्ति भर दे। - अपने उपनिषदों का, उस बलप्रद, आलोकप्रद, दिव्य दर्शन शास्त्र का आश्रय ग्रहण करो। सत्य जितना ही महान होता है। उतना ही सहज एवं बोध गम्य होता है, खुद अपने अस्तित्व के बराबर सहज।

''उत्तिष्ठïत जाग्रत प्राव्य वरान्नि बोधत" उठो जागो और जब तक अभीव्सित वस्तु को प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक बराबर उसकी ओर बढ़ते जाओ उठो, जागो, शुभ मुहूर्त आ गया है। सब चीजें अपने आप तुम्हारे सामने खुलती जा रही है। हिम्मत करो और डरो मत।

केवल हमारे ही शास्त्रों में ईश्वर के लिए अभी निर्भय - विशेषण का प्रयोग किया गया है। हमें निर्भय होना होगा। तभी हम अपने कार्य में सिद्घि प्राप्त कर सकेंगे।"

यह भी पढ़ें -क्या है पारिजात के पौधे का इतिहास, क्यों है ये इतना खास

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