राजनेताओं को मूल्य देना बंद करो - ओशो

ओशो

12th January 2021

तुमने पूछा है राजनैतिक लुच्चे-लफंगों से देश का छुटकारा कब होगा?

राजनेताओं को  मूल्य देना बंद करो - ओशो

बहुत कठिन है। क्योंकि प्रश्न राजनैतिकों से छुटकारे का नहीं है, प्रश्न तो तुम्हारे अज्ञान के मिटने का है। तुम जब तक अज्ञानी हो, कोई-न-कोई तुम्हारा शोषण करेगा। कोई-न-कोई तुम्हें चूसेगा-पंडित चूसेंगे, पुरोहित चूसेंगे, राजनेता चूसेंगे। तुम जब तक जाग्रत नहीं हो, तब तक लुटोगे ही। फिर किसने लूटा, क्या फर्क पड़ता है? किस झंडे की आड़ में लूटा, क्या फर्क पड़ता है? मंदिर में लुटे कि मस्जिद में, समाजवादियों से लुटे कि साम्यवादियों से, क्या फर्क पड़ता है? तुम लुटोगे। लुटेरों के नाम बदलते रहेंगे और तुम लुटते रहोगे।

राजनीति तो झूठ का खेल है। जब तक तुम सच को न पहचानने लगोगे तब तक तुम झूठों के हाथ में पड़ते ही रहोगे।

ऐसा मत पूछो कि राजनैतिक लुच्चे-लफंगों से देश का छुटकारा कब होगा? यह प्रश्न अर्थहीन है। ऐसा पूछो कि मैं कब इतना जाग सकूंगा  कि झूठ को झूठ की तरह पहचान सकूं। और जब तक सारी मनुष्य-जाति झूठ को झूठ की भांति नहीं पहचानती, तब तक छुटकारे का कोई उपाय नहीं है।

हम सिर्फ अपने कंधों के बोझ बदलते रहते हैं। मरघट तुमने देखा है, लोग अर्थी ले जाते हैं। एक कंधा थक जाता है, तो फिर अर्थी को दूसरे कंधे पर रख लेते हैं। कुछ अर्थी का बोझ कम नहीं हो जाता कंधा बदलने से। लेकिन थका कंधा, थोड़ी राहत ले लेता है, गैर-थका कंधा थोड़ा सम्हाल लेता है। फिर जब वह कंधा थक जाएगा, फिर कंधा बदल लेंगे।

बस ऐसे ही एक राजनेता को हटाते हो दूसरे को बिठलाते हो; कंधा थक जाता है, फिर तीसरे को बिठा लोगे। यह खेल चलता रहता है...सदियां बीत गईं। आदमी के भीतर कहीं कोई किरण की कमी है, कहीं कोई रोशनी की कमी है। झूठ नहीं पहचान पाता। और कैसे झूठ तुमसे बोले जाते हैं, फिर भी तुम नहीं पहचान पाते! राजनेता ऐसे झूठ बोलते हैं, जिसको कोई भी पहचान ले, बच्चा भी पहचान ले कि यह झूठ है। लेकिन फिर तुम भ्रम में आ जाते हो। तुम उनके आश्वासनों को फिर मान लेते हो। 

राजनीति तो झूठ पर चलती है।

ढब्बू जी ने एक नेता जी से पूछा: एक झूठ बोलकर तो दिखाइये बिना सोचे। नेताजी ने कहा: मैं झूठ नहीं बोलता। ढब्बू जी ने कहा: शाबास! आपने सोचने में जरा भी वक्त नहीं लिया।

नेताजी और झूठ न बोलें, तो नेताजी बोलेंगे क्या!

श्रीमती जी ने यह सुनकर कि आज उनके मित्रों को उनके पतिदेव ने, जो कि एक राजनेता हैं, खाने पर बुलाया है...। तो नेताजी आनन-फानन उठे और घर-भर की छतरियां तथा हैट उठाकर भंडार घर में छिपा आये। श्रीमती जी ने जरा चकित होकर पूछा कि क्या आपको डर है कि मेहमान लोग छतरियां और हैट चुरा ले जाएंगे? यह बात नहीं, नेताजी ने खोपड़ी खुजाते-खुजाते कहा, मुझे यह डर है कि वे लोग अपनी वस्तुएं पहचान न लें।

नेताओं की जिंदगी तो झूठ और चोरी पर ही चलेगी। और फिर ज्यादा-से-ज्यादा तुम बदलाहट कर सकते हो-एक चोर की जगह दूसरा चोर। और चोर वहीं के वहीं हैं। चोरी वही की वही है। छाप तुम कोई भी लगा लो।

तुम देखते हो, एक ही तरह के चोर इस मुल्क की छाती पर सवार हैं। इस पार्टी से उस पार्टी में चले जाते हैं; उस पार्टी से इस पार्टी में चले जाते हैं; चोर वही के वही!

मुल्ला नसरुद्दीन केमिस्ट की दुकान पर गए और दुकानदार से बोले: याद है, कल मैं आपके यहां से एक स्याही के दाग दूर करने वाली दवा ले गया था? दुकानदार ने कहा: हां, क्या नसरुद्दीन, दूसरी शीशी चाहिए, मुल्ला ने कहा कि नहीं, अब उस दवा के दाग को मिटाने वाली दवा हो तो दे दीजिए।

एक राजनैतिक पार्टी नुकसान करती है। फिर उसको सुधारने के लिए दूसरी को लाओ; वह और नुकसान करती है। फिर तीसरी को लाओ।... यह जारी रहा है। आदमी की छाती पर शोषण जारी रहा है। और जारी रहेगा। कसूर तुम्हारा है। तुम जागो। कसूर राजनैतिक का नहीं है। राजनैतिक तो सिर्फ अवसरवादी है। वह तो अवसर का फायदा ले रहा है। वह देखता है कि तुम राजी हो सीढ़ियां बनने को तो तुम्हारी सीढ़ियां बनाकर चढ़ जाता है। उसे कुर्सी तक पहुंचना है। तुम कुर्सी को जब तक आदर दोगे, तब तक कुछ लोग तुम्हें सीढ़ियां बनाकर कुर्सी पर पहुंचते रहेंगे। कुर्सी को आदर देना बंद करो। कोई जरूरत क्या है? अगर प्रधान मंत्री गांव में आ जाएं, तो सारे गांव को वहां मूढ़ों की तरह इक होने की आवश्यकता क्या है? आने दो, जाने दो; तुम चिंता छोड़ो। तो कुर्सी का जो मूल्य बन गया है, वह नीचे गिरे।

कुर्सी का मूल्य गिराओ। कुर्सी को नीचे हटाओ। कुर्सी को इतने नीचे हटा दो कि कुर्सी पर बैठने का मजा ही न रह जाये। जब तक कुर्सी पर बैठने का मजा है, तुम चले पूजा करने: तुम चले फूलमालाएं लेकर। और मजा यह है कि वे ही नेता जब तक पद पर नहीं थे, तुम्हारे गांव में आये तो तुम्हें कोई चिंता न थी। जैसे ही वे पद पर पहुंच जाते हैं, तुम एकदम दीवाने हो जाते हो, जैसे उनमें कोई ईश्वरीय शक्ति का अवतरण हो जाता है! कुर्सी का इतना समादर करोगे, तो फिर लाखों लोग कुर्सी तक पहुंचने के लिए तड़फेंगे। और जब लाखों लोग तड़फेंगे, तो संघर्ष छिड़ेगा, महत्वाकांक्षा होगी, गलाघोंट प्रतिस्पर्धा होगी। फिर उनमें जो सबसे ज्यादा चालबाज होगा, वही पहुंच पायेगा।

पद के मूल्य को गिराओ। हर चीज का मूल्य बढ़ रहा है, कम-से-कम एक चीज का मूल्य मत बढ़ने दो। कुर्सी का मूल्य मत बढ़ने दो। उसका मूल्य-हृास करो। जैसे रुपये की कीमत गिरती जाती है, ऐसे ही कुर्सी की कीमत गिराते जाओ। एक घड़ी ऐसी आ जाये कि जिसको तुम कुर्सी पर बिठा दो, वह बैठा ही रहे, न कोई फूल माला लाये, न कोई शोरगुल मचाये, न कोई जय-जयकार करे। तब तुम पाओगे कि राजनीति में दूसरी तरह के लोग उत्सुक होंगे, जो कुछ सेवा करना चाहते हैं। तब! नहीं तो चोर और लफंगे और लुच्चे ही उत्सुक होंगे, जो ताकत में होना चाहते हैं।

लेकिन अखबारों में राजनेता की चर्चा है पहले पृष्ठ से लेकर आखिरी पृष्ठ तक। गांव में उसकी चर्चा है, होटलों में उसकी चर्चा है, चौपालों में उसकी चर्चा है। जहां देखो वहां राजनीति की चर्चा है। सुबह से उठे नहीं कि बस अखबार की तरफ दौड़ते हो। चाय भी पीछे, पहले अखबार पीते हो। जरा खाली समय मिला कि रेडियो पर बैठ जाते हो कि लगा लिये कान दिल्ली पर।

तुम जिस चीज को मूल्य देते हो, लोग उसी तरफ जाने लगते हैं। तुमने देखा, पुराने जमाने में हम संन्यासियों को मूल्य देते थे, तो हर आदमी के मन में एक कामना होती थी कि कभी-न-कभी संन्यासी होना है। होना ही है। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, मगर एक दिन वह सौभाग्य की घड़ी जरूर आयेगी, जब मैं भी संन्यस्त हो जाऊंगा। लोग सपना देखते थे संन्यासी होने का! छोटे बच्चे संन्यासी होने का सपना देखते थे। संन्यासी का मूल्य था, क्योंकि सम्राट भी संन्यासी के चरण छूते थे। तो संन्यास की एक हवा थी।

अब छोटे बच्चे ही नहीं, बूढ़े भी सोचते हैं कैसे फिल्म के नेता हो जाएं अभिनेता हो जाएं। अगर नेता नहीं हो सकते तो कम-से-कम अभिनेता हो जाएं। मगर दो ही चीजें होती हैं लोगों को या तो नेता या अभिनेता। बच्चे एकदम बंबई की तरफ भागते हैं या दिल्ली की तरफ। और किसी चीज का कोई आकर्षण नहीं मालूम होता। किसी को फिकिर नहीं है कि कुछ और भी जीवन में है-बस अभिनेता या राजनेता। क्योंकि दोनों को खूब सम्मान मिल रहा है, खूब आदर मिल रहा है, खूब प्रशंसा मिल रही है, फूलमालाएं मिल रही हैं।अहंकार जहां तृप्त होता है उस तरफ लोग दौड़ने लगते हैं।

बदलो इस मूल्य को। अगर आदर ही देना हो तो उन चीजों को आदर दो जिनकी तरफ लोग दौड़ेंगे तो जीवन का सौंदर्य बढ़े। संगीतज्ञ को आदर दो। उस साधक संगीतज्ञ को आदर दो जो आठ घंटे रियाज करता है और वर्षों के बाद कभी कुशल हो पाता है। उसे आदर दो। उस मूर्तिकार को आदर दो जो पत्थर को तोड़ता है और पत्थर में प्राण डालता है, कि एक दिन पत्थर बोलने लगता है, सजीव हो उठता है। उस कवि को आदर दो, जिसके गीत आकाश की कुछ खबर लाते हैं। उस ऋषि को आदर दो जो वर्षों ध्यान में डूब-डूबकर एक दिन अपने शून्य को प्रगट करता है।

आदर ही देना है तो कुछ ऐसी चीजों को आदर दो, जो लोगों के जीवन में बढ़े तो जगत सुंदर बने, मनोरम हो, यह पृथ्वी स्वर्ग बने। राजनेता निश्चित नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि राजनीति का मौलिक आधार ही बेईमानी है, जालसाजी है, चालबाजी है।

एक दुख-स्वप्न चल रहा है और सदियों से चल रहा है। इस दुख-स्वप्न को तोड़ना है। मनुष्य की महत्वकांक्षा को कुछ ऊंचाइयां दो। परमात्मा पाने की अभीप्सा दो, पद पाने की नहीं। ध्यान की तलाश दो, धन की तलाश नहीं। दूसरों को जीतने का प्रलोभन मत दो, स्वयं को जीतने का विचार जन्माओ।

राजनीति का अर्थ होता है: दूसरों को कैसे जीत लूं? धर्म का अर्थ होता है: स्वयं को कैसे जीत लूं? इसलिए धर्म और राजनीति बड़े विपरीत हैं। धर्म फैले तो राजनीति अपने-आप सिकुड़ जायेगी और अगर धर्म न फैला तो राजनीति फैलती ही रहेगी। आदमी जीतेगा तो... जीतने की आकांक्षा आदमी के प्राणों में है। अगर अपने को नहीं जीतेगा तो दूसरों को जीतेगा।

धन्यभागी हैं वे जो स्वयं को जीतते हैं, क्योंकि स्वयं को जीतकर ही परमात्मा के मंदिर का द्वार खुलता है, शाश्वत जीवन उपलब्ध होता है। और अभागे हैं वे, जो दूसरों को ही जीतने में लगे रहते हैं क्योंकि दूसरों को तो जीत ही नहीं पाते, दूसरों को जीतने की चेष्टा में स्वयं को भी गवां बैठते हैं।

 

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