साधना का मार्ग, अनुभव का मार्ग है - आचार्य महाप्रज्ञ

आचार्य महाप्रज्ञ

8th January 2021

जिसने कभी अध्यात्म का स्पर्श ही नहीं किया, वही बाहर सुख की कल्पना कर सकता है। जिसने एक बार भी अध्यात्म के सुख का स्पर्श कर लिया, उसे बाहर में कभी सुख नहीं लगता। भीतर में जब सुख के स्पंदनों की अनुभूति होने लगती है तब साधक आत्मविभोर होकर उसी में खो जाता है।

साधना का मार्ग, अनुभव का मार्ग है - आचार्य महाप्रज्ञ

जो व्यक्ति अध्यात्म की चेतना में प्रवेश करता है, अध्यात्म की चेतना के जागरण का प्रयास करता है, वह अपने पर बहुत उत्तरदायित्व लेता है। इतना बड़ा दायित्व कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति उतना बड़ा दायित्व नहीं उठाता। एक पूरे साम्राज्य को चलाने वाले सम्राट पर भी उतना दायित्व नहीं होता जितना बड़ा दायित्व होता है उस साधक पर, जो चेतना के जागरण में लगा हुआ है। यह कैसे? एकांत में, एक कोने में बैठकर अपने भीतर झांकने वाला, अपने-आपकी साधना करने वाला बड़ा दायित्व कैसे लेता है? यह तर्क-संगत नहीं, किंतु विरोधी बात है।

साधना का मार्ग तर्क का मार्ग नहीं है, अनुभव का मार्ग है, देखने का मार्ग है, दर्शन का मार्ग है।

साधक का दायित्व गुरुतर कैसे है?- इसे हम समझें। प्रत्येक व्यक्ति सुख-दुख का दायित्व दूसरों पर डालता है। चाहे सम्राट हो या अन्य कोई सब अपने-आपका बचाव करते हुए दायित्व दूसरों पर डाल देते हैं। सारा दोष दूसरों में देखते हैं, स्वयं निलिप्त रह जाते हैं। किंतु अध्यात्म की साधना करने वाला, चेतना के जागरण की साधना करने वाला, सारा दायित्व अपने पर लेता है। चाहे वह सुख का दायित्व हो या दुख का, वह दायित्व अपने पर लेता है, दूसरों पर नहीं थोपता। 

अध्यात्म साधना की पहली परिणति है- दायित्व को ओढ़ने का बोध, दायित्व को लेने का साहस। अध्यात्म साधक की भ्रांतियां सबसे पहले टूटती हैं। वह असत्य से दूर और सत्य के निकट होता है। सामान्यता आंखें बंद करने का अर्थ होता है- नहीं देखना, सो जाना। बाहरी दुनिया में आंखें बंद करने के दो ही अर्थ होते हैं, सो जाना या नहीं देखना। अध्यात्म के क्षेत्र में ये अर्थ बदल जाते हैं। ठीक विपरीत हो जाते हैं। साधक की भ्रांति टूट जाती है। उसके लिए आंखें बंद करने का अर्थ होता है- जागना। आंख बंद करने का अर्थ होता है- भीतर झांकना, भीतर की गहराइयों को देखना अर्थ बदल जाता है।

जो बाह्यï जगत में जीता है, वह मानता है कि सुख बाहर में है। अध्यात्म साधक की वह भ्रांति टूट जाती है। वह मानने लगता है कि सुख बाहर नहीं, भीतर है। जिसने कभी अध्यात्म का स्पर्श ही नहीं किया, वही बाहर सुख की कल्पना कर सकता है। जिसने एक बार भी अध्यात्म के सुख का स्पर्श कर लिया, उसे बाहर में कभी सुख नहीं लगता। साधक जब भीतर का थोड़ा मार्ग तय करता है तब उसे लगता है कि जो सुख के स्पंदन यहां हैं, वे बाहर दुर्लभ हैं। जो रंग यहां दिखते हैं, उनका अस्तित्व बाहर है ही नहीं। भीतर में जब सुख के स्पंदनों की अनुभूति होने लगती है तब साधक आत्मविभोर होकर उसी में खो जाता है। उसका सारा संपर्क अध्यात्म से होता है, बाहर से सारे संपर्क टूट जाते हैं। वह उसमें इतना तन्मय हो जाता है कि अपना भान ही भूल जाता है। जिस व्यक्ति ने भी जाने का प्रयास ही नहीं किया, जिसने भीतरी द्वार का उद्ïघाटन ही नहीं किया, वह कभी यह अनुभव नहीं कर सकता कि भीतर में क्या कुछ घटित हो रहा है। जो इस मार्ग से नहीं गुजरा है, उसके सामने तर्क व्यर्थ हैं, मौन श्रेयस्कर है। इस जगत का सबसे बड़ा सार तत्त्व हमारे शरीर के भीतर है। उसके दर्शन से जैविक-रासायनिक परिवर्तन होते हैं, अन्त:स्रावी ग्रंथियों के रसायन बदलते हैं। नाड़ी-संस्थान पर नियंत्रण स्थापित होता है। मूर्च्छा टूटती है और चैतन्य जागृत होता है। आत्मा का अवस्थित किसी शरीर के माध्यम से ही प्रकट होता है। जो शरीर को देखना नहीं जानता, उसके अंतर्राभाव में अवस्थित चैतन्य-केंद्रों का दर्शन करना नहीं जानता, वह अपने अस्तित्व को भी नहीं जानता। जिसे अपने अस्तित्व का बोध नहीं होता, उसे दायित्व का बोध नहीं होता।

 

यह भी पढ़ें -आत्मसंयम का अभ्यास

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