पूर्ण संतुलन ईश्वर की वेदी है - परमहंस योगानंद

परमहंस योगानंद

8th January 2021

जब आप किसी कपड़े की दुकान पर जाते हैं, तो आप वह वस्त्र लेने का प्रयास करते हैं जो आपके अनुकूल हो जो आपके व्यक्तित्व को निखारता हो। आपको अपनी आत्मा के लिए भी ऐसा ही करना चाहिए। यह जो वेश चाहती है वही धारण कर सकती है।

पूर्ण संतुलन ईश्वर की वेदी है - परमहंस योगानंद

मानव जाति एक विशाल चिड़ियाघर के समान है- जहां इतने सारे लोग इतने भिन्न-भिन्न प्रकार का आचरण करते हैं, जिनमें से अधिकांश लोगों का अपने ऊपर कोई नियंत्रण नहीं होता। परन्तु अपने जीवन का सच्चा लक्ष्य प्राप्त करने से पहले मनुष्य को वह आत्मसंयम प्राप्त करना आवश्यक है। उसे संतुलन स्थापित करने का प्रयास करना आवश्यक है। पूर्ण संतुलन ईश्वर की वेदी है। इसके लिए प्रयासरत रहें और एक बार जब वह प्राप्त हो जाए तो इसे कभी न खोएं। जब सलीब पर क्राइस्ट को कीलें ठोकी जा रही थीं, तब भी उन्होंने इसे खोया नहीं। उन्होंने कहा, 'हे परमपिता, इन्हें क्षमा कर दो, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।' साधारण मनुष्य ऐसी परीक्षाओं का सामना नहीं कर सकता।

जब मैंने आध्यात्मिक पथ पर कदम रखा था, मैंने सोचा था कि मेरे साथ सब अच्छा ही होगा, पर मैंने देखा कि अनेक कठिन परिस्थितियां भी आईं। तब मैंने यह कहकर अपने आप को समझाया। क्योंकि मैं ईश्वर से इतना गहन प्रेम करता हूं, इसलिए मैंने उनसे कुछ अधिक ही अपेक्षाएं की हैं। परन्तु अब से आगे मैं सदा यही कहूंगा, प्रभो। आप की इच्छा पूर्ण हो। गंभीर परीक्षाएं आईं लेकिन मैं इसी विचार पर स्थिर रहा, आप की ही इच्छा पूर्ण हो। वे मुझे जो भी दे रहे थे उसी को मैं मन से स्वीकार करना चाहता था। और ईश्वर ने सदा ही मुझे यह दिखाया कि हर परीक्षा में किस तरह मैं विजयी हो सकता हूं।

आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति के लिए मुत्यु भी कुछ नहीं है। मैंने एक बार स्वप्न देखा कि मैं मर रहा हूं। परन्तु फिर भी मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। प्रभो। ठीक है, आपकी जो इच्छा। तब उन्होंने मुझे स्पर्श किया और मुझे इस सत्य का ज्ञान हुआ। मैं कैसे मर सकता हूं? लहर कभी नहीं मरती, वह तो केवल सागर में समा जाती है और फिर ऊपर आती है। लहर कभी नहीं मरती और मैं भी कभी नहीं मर सकता।

जब आप किसी कपड़े की दुकान पर जाते हैं, तो आप वह वस्त्र लेने का प्रयास करते हैं जो आपके अनुकूल हो और जो आपके व्यक्तित्व को निखारता हो। आपको अपनी आत्मा के लिए भी ऐसा ही करना चाहिए। आत्मा की कोई विशेष पोशाक नहीं होती, यह जो वेश चाहती है वही धारण कर सकती है। शरीर की सीमाएं हैं, किंतु आत्मा किसी भी प्रकार की मानसिक पोशाक, किसी भी प्रकार के व्यक्तित्व को धारण कर सकती है।

यदि आप किसी व्यक्ति के बारे में गहनता से सोचें, उसके इतिहास का अध्ययन करें और उसके व्यक्तित्व की सचेतन रूप से नकल करें, तो आप उस जैसा बनने लग जाएंगे और उस व्यक्तित्व के साथ अपनी एकरूपता स्थापित कर लेंगे। मैंने इसका अभ्यास किया है और मैं जिस भी व्यक्तित्व को चाहूं धारण कर सकता हूं। जब मैं ज्ञान रूपी व्यक्तित्व को धारण करता हूं तो ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ नहीं बोल सकता। जब मैं प्रभु के महान भक्त, श्रीचैतन्य के व्यक्तित्व को धारण करता हूं, तो मैं भक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं बोल सकता। और जब मैं जीसस के व्यक्तित्व के साथ अन्तर्सम्पर्क कर लेता हूं तो ईश्वर के विषय में जगन्माता के रूप में नहीं बोल सकता। बल्कि केवल परमपिता के रूप में बोल सकता हूं, जैसा कि वे बोलते थे। आत्मा कोई भी मानसिक वेशभूषा, जिसकी वह प्रशंसा करती है या इच्छा करती है, धारण कर सकती है और जब भी वह चाहे अपनी इच्छा अनुरूप वही वेशभूषा बदल सकती है।

जब आप किसी बहुत अच्छे व्यक्ति से मिलते हैं, तो क्या ऐसा नहीं चाहते कि आप भी उस जैसे होते? उन सब उत्कृष्ट गुणों के बारे में सोचें जो महान पुरुषों और स्त्रियों के हृदयों में हैं, आप भी उन सभी गुणों को अपने हृदय में धारण कर सकते हैं। आप विनम्र और बलवान बन सकते हैं या उस जनरल की तरह बहादुर बन सकते हैं जो एक न्यायसंगत कारण के लिए लड़ता है। आप चंगेजखान की विश्व विजेता बनने की इच्छाशक्ति को प्राप्त कर सकते हैं या सन्त फ्रांसिस की दैवी इच्छाशक्ति प्रेम और समर्पण को प्राप्त कर सकते हैं।

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