भारतीय संविधान का प्रतीक गणतंत्र दिवस

अनुज श्रीवास्तव

12th January 2021

गणतंत्र दिवस का नाम लेते ही हमारे मन मस्तिष्क में 26 जनवरी को राजपथ पर चलती परेड का दृश्य उभर आता है। जबकि इसका संबध हमारे देश के संविधान से है जो इस दिन पारित हुआ था। क्या है इस संविधान का इतिहास व महत्त्व आइए जानते हैं।

भारतीय संविधान का प्रतीक गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है जिसे पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसे प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 में भारत का संविधान लागू किया गया था। सन् 1930 में इसी दिन पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया गया था। भारत के संविधान का निर्माण स्वतंत्रता से पूर्व ही आरम्भ हो गया था। जिसे कई बुद्धिजीवियों ने मिलकर निर्मित किया था। भारतीय संविधान का निर्माण किस प्रकार हुआ, क्या है इसका उद्देश्य एवं विशेषताएं तथा इससे जुड़े कुछ अन्य रोचक तथ्य आइए जानते हैं-

संविधान का निर्माण

कैबिनेट मिशन योजना द्वारा सुझाए गए प्रस्तावों के तहत नवंबर सन्ï 1946 ई. में संविधान सभा का गठन किया गया। संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी। जिसमें 292 ब्रिटिश प्रान्तों के प्रतिनिधि 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि एवं 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे। संविधान निर्माण निकाय में प्रांतों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर था। हर प्रांत व देशी रियासतें अथवा राज्य को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आबंटित की जानी थी। प्रत्येक 10 लाख की जनसंख्या पर एक सदस्य निर्वाचित किया गया था। संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर, 1946 ई. को हुई। सभा ने अपने सबसे वरिष्ठï सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिंहा को अस्थाई अध्यक्ष चुना। 11 अगस्त 1946 को संविधान सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अपना स्थायी अध्यक्ष तथा एस. सी मुखर्जी को उप-सभापति नियुक्त कर लिया तथा सर बीएन राव को संविधान सभा का संविधानिक परामर्शदाता नियुक्त किया गया। संविधान के निर्माण हेतु संविधान सभा ने 22 समितियों का गठन किया। इनमें से 10 समितियां कार्यविधि संबंधी विषयों से संबंधित थीं तथा 12 समितियां मूल मामलों से संबंधित थीं।

इन समितियों द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्टों के आधार पर डॉ. भीम राव अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित एक सात सदस्यीय प्रारूप समिति ने संविधान का मसौदा तैयार किया। जिसे 1948 में प्रकाशित कर दिया गया विचार-विमर्श तथा विभिन्न सुझावों पर विचार करने के पश्चात संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को अंतत: अपना लिया गया तथा इस पर संविधान सभा के अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षर कर दिए गए। भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे। पूर्ण रूप से संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

संविधान के उद्देश्य

संविधान के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं

● भारत को एक स्वतंत्र, प्रभुसत्ता सम्पन्न गणराज्य घोषित करना, जिसमें संपूर्ण सत्ता जनता में निहित हो।

● एक लोकतांत्रिक संघ की स्थापना करना, जिसमें देश के सभी भागों को समान स्वशासन प्राप्त हो।

● वैसी राज्य व्यवस्था स्थापित करना जिसमें केन्द्र तथा राज्य जनता से शक्ति प्राप्त करेंगे।

● भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय प्रदान करना।

● अल्पसंख्यकों, पिछड़ी जातियों, जन जातियों क्षेत्रों तथा अन्य शोषित जातियों को उपयुक्त संरक्षण देना।

● गणराज्य की अखंडता को बनाए रखना तथा धरती, समुद्र व वायु क्षेत्रों की रक्षा करना।

● विश्व शांति को बढ़ाना देना तथा मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करना।

संविधान की विशेषता

विश्व का एक विस्तृत संविधान- भारत का संविधान विश्व के सबसे विस्तृत संविधानों में से एक है। जब भारत का संविधान बन कर तैयार हुआ था तब इसमें 395 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूची और 22 भाग थे। वर्तमान में संविधान में 448 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूची है।

कठोर तथा लचीलापन का मिश्रण-भारत का संविधान कठोर के साथ-साथ लचीलेपन के मिश्रण का एक अनोखा उदाहरण है। भारतीय संविधान के बहुत से ऐसे प्रावधान हैं जिन्हें संसद अकेले साधारण बहुमत से बदल सकती है। जबकि अन्य प्रावधानों को बदलने के लिए न केवल संसद के दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए बल्कि उसे आधे से अधिक राज्यों का भी समर्थन प्राप्त होना चाहिए।

संसदीय शासन व्यवस्था-भारत का संविधान देश में संसदीय व्यवस्था का प्रयोजन करता है जिसमें राष्टपति एक नाम मात्र का अध्यक्ष है तथा वास्तविक कार्यकारिणी शक्तियों का प्रयोग मंत्री परिषद द्वारा किया जाता है। संविधान निर्माताओं द्वारा संसदीय शासन व्यवस्था अपनाए जाने के अनेक कारण थे। प्रथम, देश में संसदीय व्यवस्था पहले से विद्यमान थी तथा भारत के लोग इसकी कार्य विधि से भली-भांति परिचित थे। दूसरा, देश के बड़े आकार तथा सांस्कृतिक विभिन्नता के कारण भी संसदीय सरकार को उचित समझा गया। तीसरा, विधान सभा के सदस्य कार्यकारिणी तथा विधायिका के मध्य होने वाले विवादों से बचना चाहते थे अत: उन्होंने संसदीय सरकार अपनाना उचित समझा।

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