पोंगल: एक कृषि उत्सव

श्वेता राकेश

12th January 2021

हिन्दू धर्म में परमेश्वर से लेकर प्रकृति और प्रकृति से लेकर पशुओं तक को पूजनीय माना जाता है और इसी संस्कृति एवं परंपरा का एक रूप है प्रसिद्ध उत्सव पोंगल।

पोंगल: एक कृषि उत्सव

दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार है पोंगल। तमिल हिंदुओं के साथ-साथ श्रीलंका, मॉरिशस आदि देशों में भी रहने वाले तमिल समुदायों द्वारा यह त्योहार उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। जहां 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर उत्तर भारत में 'मकर संक्रांति' के नाम से मनाया जाता है, वही केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे केवल 'संक्रांति' के नाम से जाना जाता है। इनको मनाने के दिन भी एक ही होते हैं। दोनों ही त्योहारों के केंद्र में सूर्य देव और प्रकृति की उपासना एवं धन्यवाद अर्पण है। बस इसे मनाने के तरीके और संस्कृति में फर्क है। 

पोंगल मुख्यत: कृषक समाज का त्योहार है। इसमें खेतिहर पशुओं का भी महत्त्व है। पोंगल का शाब्दिक अर्थ है 'अच्छी तरह से उबल जाना'। अत: इस दिन नवधान्य को दूध में उबाला जाता है और इसका प्रसाद बनाकर सूर्यदेव को अर्पित किया जाता है। जिसे 'पगल' कहते हैं। सूर्य देव की कृपा और आशीर्वाद से ही अच्छी धूप के कारण फसल अच्छी होती है। दक्षिण भारत में पोंगल का त्योहार अनादिकाल से मनाया जाता है। इतिहास की मानें तो इसकी शुरुआत संगम युग अर्थात् 200 ई.पू. से 300 ईस्वी से मानी जाती है। तमिल पंचांग के अनुसार पोंगल थाई माह यानी जनवरी के महीने में मनाया जाता है। इस मौसम के दौरान चावल, हल्दी, गन्ना आदि फसलों की कटाई होती है। तमिल पंचांग के अनुसार पोंगल के जनवरी माह के मध्य का समय अर्थात् 14-15 जनवरी का समय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। फसलों के लिए भी यह मौसम उत्तम माना जाता है। यह त्योहार सर्दियों के अंत एवं वसंत ऋतु के आगमन का भी सूचक है। यह मौसम मांगलिक कार्यों शादी-विवाह आदि के लिए भी शुभ माना जाता है। 

मान्यतानुसार भगवान शिव ने अपने प्रिय बैल 'वसव' को पृथ्वीलोक पर यह संदेश देने को कहा कि मनुष्य सूर्यदेव की आराधना करें, प्रतिदिन शरीर की तेल मालिश कर स्नान करें तथा माह में एक बार ही भोजन ग्रहण करें। वसव भूलवश पृथ्वीलोक पर जाकर उल्टा आदेश दे देता है। जब शिव को यह भूल मालूम हुई तो उन्होंने वसव को श्राप दिया कि वह सदा पृथ्वी पर ही रहेगा और मनुष्यों की खेत जोतने में सहायता करेगा ताकि फसल अच्छी हो। तभी से ये पशु मानव जाति के लिए कृषि में महत्त्वपूर्ण सहायक बन गए।

चार दिनों तक रहती है पोंगल की धूम

हिंदू धर्म में पोंगल को सबसे महत्त्वपूर्ण त्योहारोंं में से एक माना जाता है। अब यह उत्सव केवल कृषक समाज तक ही सीमित नहीं रह गया है। बल्कि अब यह तमिलनाडु के हर घर में मनाया जाता है। हर घर में इस उत्सव की तैयारी लगभग एक महीने पहले से शुरु हो जाती है। घर की मरम्मत से लेकर साफ-सफाई एवं साज-सज्जा पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

प्रथम दिवस 'भोगी त्योहार'-भोगी त्योहार के दिवस वर्षा और बादलों के राजा इंद्रदेव की आराधना की जाती है। कृषक इंद्रदेव को प्रर्याप्त बारिश कर अच्छी फसल प्रदान करने हेतु धन्यवाद अर्पित करते हैं। इस दिन घर की सफाई भी की जाती है और भोगी संताल भी मनाई जाती है जिसमें कण्डों एवं लकड़ियों को जलाकर घरों का कबाड़ जलाया जाता है। महिलाएं इस अलाव के ईद-गिर्द नृत्य एवं लोकगीत द्वारा अपना उल्लास और इंद्र देव के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करती हैं। मान्यता है कि भोगी त्योहार मनाने से घर में सुख-समृद्घि एवं शांति का निवास होता है।

दूसरा दिवस 'थाई पोंगल'- दूसरे दिन पारंपरिक तरीके से उबले हुए दूध में चावल डालकर पकाया जाता है। इसे ही 'पोंगल' कहते हैं। यह विशेष प्रकार की खीर होती है। इस त्योहार में दूध के उफान को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है। इस विशेष व्यंजन को मिट्टी  के बर्तनों में ही पकाया जाता है। इस दिवस को सूर्य पोंगल भी कहते हैं। घर के बाहर ही सूर्य के प्रकाश में दूध और चावल उबालकर प्रसाद बनाया जाता है और सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। यह प्रसाद नए धान से तैयार चावल से बनाया जाता है। भगवान सूर्य को गन्ना, नारियल और केले भी अर्पित किए जाते हैं। थाई पोंगल को कोलम अर्थात् पारंपरिक रूप से रंगोली बनाने की भी प्रथा है। महिलाएं श्वेत चावल के चूर्ण से अपने घरों के दरवाजे पर आकर्षक कोलम बनाती है। और संध्या के समय सभी नए वस्त्र पहन एक-दूसरे से मिलते हैं।

तीसरा दिवस 'मत्तू पोंगल'- यह दिन गाय-बैल आदि पालतू पशुओं को समर्पित होता है, जो खेती में अपना अहम् योगदान देते हैं। इस दिन कृषक वर्ग अपनी गायों एवं बैलों के गले में घंटियां बांधते हैं और उन्हें फूल-मालाओं से सजाते हैं, उनके सींगो को रंगते हैं। उन्हें अच्छी तरह से नहलाया-धुलाया जाता है। उनकी पूजा की जाती है और पोंगल नामक व्यंजन भी खिलाया जाता है। अपने सजे-धजे पशुओं को गांव में घुमाया जाता है। इन्हें बुरी नजर से बचाने के लिए इनकी आरती भी की जाती है। कुछ स्थानों पर बैलों को लेकर जलीकट्टू नामक खेल का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें बैल और इंसान आमने-सामने होते हैं। प्राय: मत्तू पोंगल का समापन एक भव्य प्रतिभोज के साथ होता है।

चौथा दिवस 'कन्नूम पोंगल'- पोंगल उत्सव का अंतिम दिन कन्नूम पोंगल कहलाता है। इस दिन हल्दी की एक पत्ती को धरती पर रख उसपर लाल एवं पीले रंग के चावल के दाने रखे जाते हैं और अंत में आरती की जाती है। घर की महिलाएं अपने परिवारों की सुख समृद्घि एवं शांति की कामना करती हैं। सभी एक साथ पर्व का आनंद लेते हैं। 

दक्षिण में पोंगल से ही नववर्ष का आरंभ माना जाता है। एक-दूसरे को मंगलमय वर्ष की शुभकामना देने के साथ उत्सव का आरंभ होता है और प्रकृति एवं देवताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर अपने जीवन में सुख-समृद्घि और शांति की मनोकामना करते हैं। 

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