हर्ष, उमंग एवं सदभावना का त्योहार- लोहड़ी

बलविन्दर 'बालम'

12th January 2021

लोहड़ी की बात करते ही आंखों के सामने छा जाती है आग, मूंगफली और रेवड़ी की तस्वीर और साथ ही उभर आता है ढोल और भंगडे का शोर, क्यों? आइये जानते हैं।

हर्ष, उमंग एवं सदभावना  का त्योहार- लोहड़ी

लोहड़ी शब्द 'लोही' से बना है जिसका अभिप्राय है वर्षा होना, फसलों का फूटना। एक लोकोक्ति है अगर लोहड़ी के समय वर्षा न हो तो कृषि का नुकसान होता है। परंपरा के गुलशन से ही जन्म लेता है लोहड़ी का त्योहार। यह त्योहार मौसम के परिवर्तन, फसलों का बढ़ना तथा कई ऐतिहासिक तथा मिथ्यहासिक दंत कथाओं से जुड़ा हुआ है। मुख्यतौर पर भारत का प्रसिद्ध राज्य पंजाब कृषि प्रधान राज्य है। इसी वजह से किसानों, जिमींदारों एवं मजदूरों की मेहनत का पर्यायवाची है लोहड़ी का त्योहार। यह त्योहार हर्ष तथा सद्ïभावना को सर्दी की अल्हड़ ऋतु में कीर्तिमान करता है। लोहड़ी समस्त मजहबों, धर्मों के लिए एकता का प्रतीक तथा सांस्कृति का एक भव्य उपहार है।

लोहड़ी का महात्म्य

लोहड़ी माघ महीने की संक्रांति से पहली रात को मनाई जाती है। किसान सर्द ऋतु की फसलें बो कर आराम फरमाता है। जिस घर में लड़का पैदा हुआ हो उसकी शगुन एवं हर्ष से लोहड़ी पाई जाती है। बैंड-बाजे बजाए जाते हैं। बाजीगरनें एवं भंड रिश्ते-नातों के गीत सुनाकर हास्य-व्यंग्य के विनोद-गायन सुनाकर अपने बनती लोड़ी (बधाई) बटोरकर ले जाते हैं। इस दिन प्रत्येक घर में मूंगफली, रेवड़ियां, गजक, भुग्गा, तिलचौली, मक्की के भुने दाने, गुड़, फल इत्यादि लोहड़ी बांटने के लिए रखे जाते हैं। गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है। दही के साथ इस का स्वाद अपना ही होता है। जिस नवजन्में बच्चे के लिए लोहड़ी पाई जाती है उस के रिश्तेदार उसके लिए सुंदर वस्त्र, खिलौने तथा जेवरात इत्यादि बनवा कर लाते हैं।

इस दिन घरों के आंगनों, संस्थाओं, मुहल्लों, बाजारों इत्यादि में खड़ी लकड़ियों के ढेर बना कर या उपलों का ढ़ेर बनाकर उस की अग्नि से सेंक का लुत्फ लिया जाता है। चारों ओर बिखरी सर्दी तथा रूई की भांति फैली धुंध में अग्नि के सेंक का अपना ही आनंद होता है। इस अग्नि में तिल इत्यादि फेंकते हैं। घरों में समस्त परिवार बैठ कर हर्ष की अभिव्यक्ति के लिए गीत गायन करते हैं। देर रात तक ढोलक की आवाज, ढोल के फड़कते ताल, गिद्दों-भांगड़ों की धमक तथा गीतों की आवाज सुनाई देती रहती है। रिश्तों की सुरभि, मोह-ममता तथा प्यार का नजारा चारों ओर देखने को मिलता है। एक संपूर्ण खुशी का आलम।

पर्व से जुड़ी कथा

लोहड़ी के त्योहार के साथ जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध डाकू दूल्ला भट्टी  ने एक निर्धन ब्राह्मïण की दो बेटियों सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ा कर उनकी शादियां कीं तथा उनकी झोली में शक्कर डाली। उन निर्धन बेटियों की शादियां कर के पिता के फर्ज निभाए। इस संबंध में एक लोक गीत अब भी प्रचलित है जैसे- 'सुंदर मुंदरिए-हो तेरा कौन बेचारा-हो, दुल्ला भट्टी  वाला-हो, दुल्ले ने धी बेआही-हो, सेर शक्कर पाई-हो, कुढ़ी दे बोझे पाई-हो, कुढ़ी दा लाल पटाका-हो, कुढ़ी दा शालू पाटा-हो, शालू कौन समेटे हो, चाचा गाली देसे-हो, चाचे चूरी कुट्ट-हो, सेर शक्कर पाई-हो, जिमींदारी लुट्ट-हो, जिमींदारी सदाओ-हो, गिन-गिन पोले लाओ-हो, इक पोला घर गया, जिमींदार बहुटी लै के नस्स गया, हो-हो-हो-हो-हो-हो-हो-हो।'

लोहड़ी वाले दिन बुजुर्ग लोक सुंदरी-मुंदरी की कथा भी सुनाते हैं किस तरह दुल्ला भट्ट डाकू ने निर्धन लड़कियों का विवाह कर के अपना धर्म निभाया। 

 

लोहड़ी के गीत

लोहड़ी के कई परंपरावादी गीत प्रचलित हैं जैसे-लोहड़ी बई लोहड़ी, दिओ गुड़ दी रोड़ी, कलमदान विच घिओ, जीवे मुंडे दा पिओ, कलमदान विच कांना, जीवे मुुंडे दा नाना, कलमदान विच कांनी, जीवे मुंडे दी नानी। लड़के-लड़कियां भी इस दिन लोहड़ी मांगते हैं। ग्रुप बनाकर लोहड़ी मांगने का अपना ही एक मजा होता है। बेशक लोहड़ी के गीत अलोप होते जा रहे हैं परंतु वृद्ध-जनों को आज भी यह गीत जुबानी याद हैं जैसे- 'कोठी हेठ चाकू, गुड़ दऊ मुुंडे दा बापू। कोठी उत्ते कां, गुड़ दऊ मुंडे दी मां।' विवाहित जोड़ों (दम्पति) की भी लोहड़ी पाई जाती है। इस पर एक लोक गीत है- 'टांडा नी लकड़ियों टांडा सी, इस टांडे नाल कलीरा सी, जुग जीवे नी बीबी तेरा वीरा सी, इस वीरे दी वेल वदाई सी, घर चूड़े ते बीढ़े वाली आई सी, चूड़ा बीढ़ा वज्जे नी, शरीकनियां नूं सद्दे नी, शरीकनियां मारे बोल, तरा निक्का जीवे, तेरा वड्डïा जीवे, वड्डïा वड़ेरा जीवे, गुड़ दी रोड़ी देवे, भाईयां  दी जोड़ी जीवे।'

लोहड़ी वाले घर से अगर जल्दी लोहड़ी न मिले तो लड़कियां यह गीत कहती हैं- 'साड़े पैरां हेठ रोढ़, सानूं छेती-छेती तोर, साड़े पैरा हेठ दहीं, असीं मिलना वी नईं, साड़े पैरां हेठ परात, सानूं उत्तों पै गई रात।' लड़का पैदा होने पर लड़कियां व्यंग्य-विनोद में उस के परिवार को इस गीत से संबोधन करती हैं- 'गीगा लकड़ी दा शाबा, वे लड़ाका तेरा बाबा, गीगा तत्ता-तत्ता घिओ, वे लड़ाका तेरा पिओ, गीगा गोरी-गोरी गां, वे लड़ाकी तेरी मां।' इस तरह कुछ और गीत जैसे- 'कुपिए नी, कुपिए, असमान ते लुहिए, असमान पुराना, छिक्ï बन्ना साना लंगरी 'च दाल, मार मत्थे नाल, मत्था तेरा वड्ड, लेआ लकड़ियां दा गठ्ïठा। लोहड़ी के दिन लड़के स्वांग बन कर नाचते गाते भी लोहड़ी मांगते हैं।'

 

माघ की महत्ता

लोहड़ी के दूसरे दिन माघी का पवित्र त्योहार मनाया जाता है। माघ माह को शुभ समझा जाता है। इस माह में विवाह शुभ माने जाते हैं। इसी माह में पुण्य दान करना, खास करके लड़कियों की शादी करना शुभ माना जाता है। इस माह में नवयुवकों को खूब खुराक खानी चाहिए। ठिठुरती सर्दी में रजाई का आनन्द, गन्ने का रस, मूली, गाजर इत्यादि खाने का मजा भी इसी महीने आता है। चावल की खिचड़ी, सरसों का साग, मक्की की रोटी और मक्खन खाने का जायका भी कमाल का होता है।

माघी का मेला अनेक शहरों में मनाया जाता है। खास करके मुक्तसर (पंजाब) में। सिक्खों के पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव जी ने माघ माह की 'बारह माह बाणी' में प्रशंसा की है: माघ मंजन संग साधुआं धूढ़ी कर स्नान इत्यादि। श्री कृष्ण भगवान ने गीता के आठवें अध्याय में भी माघ माह का अति सुंदर वर्णन किया है: 'अग्नि, ज्योतिरह शुक्ल, वण्मासा उत्तरायणन।' माघ माह से लेकर छ: माह का समय 'उत्तरायणयम' कहलाता है, जिस में ब्रह्मा  को जानने वाले लोग प्राणों का त्याग कर मुक्त हो जाते हैं। प्रयाग तीर्थ में महात्मा लोग प्रकल्प करते हैं। लोहड़ी का त्योहार भारत में ही नहीं विदेशों में भी धूम-धाम से मनाया जाता है। 

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