'संत और सिपाही' गुरु गोबिंद सिंह

सिद्घार्थ शंकर

12th January 2021

सिखों के दसवें एवं अंतिम गुरु गुरु गोबिंद सिंह की जयंती हर्षोल्लास के साथ पूरे भारत में मनाई जाती है। बिहार के पटना साहिब में जन्में गुरु गोबिंद सिंह की स्मृति में यहां एक भव्य गुरुद्वारा भी स्थापित है, जहां सभी धर्मों के लोग दर्शन के लिए आते हैं।

'संत और सिपाही' गुरु गोबिंद सिंह

चिड़ियां ते मैं बाज लड़ाऊं, 

गीदड़ां ते मैं शेर बनाऊं 

सवा लाख ते एक लड़ाऊं, 

तबे गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।

1666 ई. को पटना में गुरु तेग बहादुर जी और माता गुजरी जी के घर में जन्में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी सिखों के दसवें व अंतिम गुरु थे। वीरता, निडरता और आत्मविश्वास से भरपूर गुरु जी की शिक्षा आनन्दपुर साहिब में हुई, जहां वे काजी पीर मुहम्मद से फारसी व पंडित हरजस जी से संस्कृत का ज्ञान लेते थे। राजपूत बनरसिंह जी ने उन्हें अस्त्र-शस्त्र चलाना व घुड़सवारी की शिक्षा दी। आगे चल कर वे गुरुमुखी, हिंदी। फारसी व संस्कृत के बहुत बड़े ज्ञाता बनें। बचपन से ही हथियार चलाना, साथियों की दो टोलियां बना युद्घ करना व अपने साथियों का नेतृत्व करते हुए शत्रु से युद्घ जीतने जैसे खेल वे खूब खेलते थे।

1675 में जब मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचारों से जनता त्रस्त हो रही थी तभी कश्मीरी पंडितों का एक जत्था गुरु तेग बहादुर जी के पास आया और उन्हें मुगल-अत्याचारों के बारे में बताया। उनकी बातें सुन कर उन्होंने अपने पुत्र गुरु गोबिंद सिंह जी को अपनी गद्दी सौंप दी और अपने साथियों के साथ दिल्ली चल पड़े जहां वे शहीद हो गए। नवंबर 1675 में जब गुरु गोबिंद जी गुरु गद्दी पर बैठे तभी से उन्होंने धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाया। 1699 में खालसा पंथ की स्थापना करने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी ने बैसाखी वाले दिन आनन्दपुर साहिब में पांच प्यारो को अमृत छकाया व स्वंय भी अमृत छका। इन सभी प्यारों के नाम के साथ 'सिंह' शब्द और पांच ककार यानि कृपाण, कंघा, केश, कच्छा, कड़ा आदि धारण करना आवश्यक कर दिया गया। इन्हें धारण किए बगैर खालसा वेश पूरा नहीं माना जाता। गुरु जी ने फारसी में 'जफरनामा' लिखा जिसमें औरंगजेब को उसके अत्याचारों के लिए फटकार लगाई गई थी। कहा जाता है कि जफरनामा पढ़ने के बाद औरंगजेब अपना मानसिक संतुलन खो बैठा। मुगलों के अन्याय के विरुद्घ आवाज उठाने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी ने 'सत श्री अकाल' का नारा भी दिया, खालसा पंथ की स्थापना के साथ उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिखों के गुरु घोषित किया। 

 

  • गुरु जी के ग्यारह मंत्र: जीवन को सफल बनाने हेतु गुरु जी ने हरेक इंसान को ग्यारह मंत्रों को अपने जीवन में पूरी ईमानदारी के साथ निभाने को प्रेरित किया-
  • धरम दी कीरत करनी अर्थात् ईमानदारी से अपनी जीविका चलाना।
  • दसवंड देना अर्थात् अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान में देना।
  • गुरुवाणी कंठ करनी अर्थात् गुरूबाणी को याद करना।
  • कम करन विच दरीदार नहीं करना अर्थात् किसी भी काम में लापरवाही न बरतना।
  • धन, जवानी तै कुल जात दा अभिमान नै करना अर्थात् धन जवानी व कुल पर घमंड न करना। 
  • दुश्मन नाल साम, दाम, दंड, भेद आदिक उपाय वर्तने अते उपरांत युद्घ करना अर्थात् दुश्मन से भिड़ने से पहले साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लें और अंत में आमने-सामने  युद्घ करें।
  • किसी दी निंदा चुगली अतै इर्खा नै करना अर्थात् निंदा व चुगली से बचें। 
  • परदेसी, लोरवान, अपंग मानुख दि सेवा करनी अर्थात् परदेसी, जरूरतमंद व अपंग मनुष्य की सहायता करना।
  • बचन करकै पालना अर्थात् अपने वचनों को निभाना।
  • शस्त्र विद्या अतै घोड़े दी सवारी दा अभ्यास करना अर्थात् खुद को सुरक्षित रखने के लिए व्यायाम और घुड़सवारी का अभ्यास करें।
  • जगत जूठ तंबाखू बिखिया दी तियाग करना अर्थात् किसी भी तरह के नशे का त्याग।

 

गुरु गोबिद ङ्क्षसहजी ने सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब जी को संपूर्ण किया व 'गुरु' रूप में सुशोभित किया। 'बिचित्र नाटक' को उनकी आत्मकथा माना जाता है। उनकी कृतियों के संकलन का नाम 'दसम ग्रन्थ ' है व उन्होंने कई और भी ग्रंथों की रचना की। इनकी रचनाओं में जपुजी साहिब, अकाल उस्तत, बिचित्र नाटक, चण्डी स्त्रोत, शास्त्र नाम माला, जफरनामा व खालसा महिमा शामिल हैं। वे विद्वानों के संरक्षक थे इसीलिए उनके दरबार में 52 कवि व लेखक हमेशा हाजिर रहते थे। हमेशा एकता व भाईचारे का मार्ग प्रशस्त करने वाले आप जी का अगर किसी ने अहित भी करना चाहा तो आप जी ने अपनी उदारता और सहनशीलता से उसे हरा दिया। उनका मानना था कि इंसान को न तो किसी से डरना चाहिए और न किसी को डराना चाहिए। अपनी वाणी में भी वे यही उपदेश देते है कि 'मैं काहू को देत नंहि, नहि भय मानत आन'।

गुरु गोबिंद सिंह जी के चार साहिबजादे थे- साहिबजादा अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह व फतेह सिंह, जिन्होंने मुगलों के विरुद्घ एक महत्त्वपूर्ण युद्घ में अपने जीवन का बलिदान दे दिया। जहां आप जी के दोनों बड़े बेटे जंग में लड़ते शहीद हो गए, वहीं दोनों छोटे साहिबजादों को दीवार में जिंदा दफना दिया गया था।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद गुरुजी ने बहादुरशाह को मुगल बादशाह बनाने में सहायता की क्योंकि इनके संबंध बहुत ही अच्छे थे। इनके रिश्ते को देख सरहंद का नवाब वजीर खां घबरा गया और उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिये। इन पठानों ने धोखे से गुरु जी पर घातक वार कर दिया जिससे 1708 में गुरुजी आंदेह साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। 

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