भारत में सूर्योपासना एवं सूर्य मन्दिर

सुशील सरित

13th January 2021

जीवन का आधार एवं शक्ति प्रदाता सूर्य है, ऐसा वर्णन करती अनेक ऋचाएं वेदों में आती हैं। भारतीय महाद्वीप में भी सूर्य उपासना की युगों पुरानी परंपरा के दर्शन सूर्य मंदिरों में होते हैं।

भारत में सूर्योपासना एवं सूर्य मन्दिर

सूर्य सम्भवत: ऐसी शक्ति है जिसकी उपासना विश्व की लगभग प्रत्येक संस्कृति में सभ्यता के प्रारम्भ से ही थी। वेदों में भी सूर्य को प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत माना गया। भारत में सूर्य उपासना एवं आराधना के महत्त्व को दर्शाते कई ऐतिहासिक मंदिर हैं- 

दिव्यतम सूर्य मंदिर है- कोणार्क

उड़ीसा के सागर तट पर स्थित पुरी के जगन्नाथ मंदिर से लगभग पैंतीस कि.मी. उत्तर-पूर्व में कोणार्क में प्रसिद्घ सूर्य मंदिर की भव्यता (काफी भाग ध्वस्त हो जाने के बावजूद) कलिंग स्थापत्य कला का ऐसा जीवंत उदाहरण है जिसमें मानव जीवन के हर रूप को बखूबी शामिल किया गया है। 'कोण' एवं 'अर्क' शब्दों के मेल से बना है कोणार्क। 'कोण' का अभिप्राय संभवत: कोना या किनारा होगा और अर्क का अर्थ है सूर्य।

यह मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है जिसे स्थानीय भाषा में 'बिरंचि नारायण' कहते थे। सूर्य देव का यह मंदिर गंग वंश के तत्कालीन सामंत राजा नृसिंह देव द्वारा बारहवीं शताब्दी में बनावाया गया। समय चक्र को इस मंदिर में बड़े ही कुशल तरीके से पिरोया गया है। सम्पूर्ण मंदिर स्थल को बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुए निर्मित किया गया है जिसमें सूर्य देव को विराजमान दर्शाया गया है।

ये बारह चक्र वर्ष के बारह महीनों के प्रतीक हैं। प्रत्येक चक्र में आठ आरे (तीलियां) हैं जो दिन के आठ प्रहरों को दर्शाते हैं। सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों के प्रतीक हैं। 

पौराणिक संदर्भों के अनुसार कृष्ण जी के पौत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हो गया। साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में बारह वर्षों तक तप किया और सूर्यदेव को प्रसन्न कर अपने रोग से मुक्ति पाई। चंद्रभागा नदी में ही उन्हें देव शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा निर्मित सूर्यदेव की एक मूर्ति प्रात हुई। उन्होंने इस मंदिर का निर्माण कर उस मूर्ति को इसमें स्थापित किया।

लाल रंग के बालुआ पत्थर एवं काले ग्रेनाइट से निर्मित इस मंदिर का मुख्य भाग तीन मंडपों में विभाजित है किन्तु इनमें से दो मंडप ध्वस्त हो चुके हैं और तीसरा ध्वस्त होने से बचाने के लिए अंग्रेजों द्वारा बंद करवा दिया गया था।

सूर्यदेव की बाल्यावस्था, युवावस्था एवं प्रौढ़ावस्या को दर्शाती तीन प्रतिमाएं, प्रवेश द्वार पर नट मंदिर (जहां नर्तकियां नृत्य किया करती थीं), पूरे मंदिर की दीवारों पर उकेरे जीवन की घटनाओं के जीवंत चित्र इस प्रकार एक लय में पिरोए लगते हैं मानो सूर्य आराधना का पूरा वैदिक-विधान यहां एकरूपित हो गया हो।

यह मंदिर मात्र आठ सौ वर्षों में ही ध्वस्त हो गया। इस मंदिर के ध्वस्त होने के पीछे भी अनेक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें वास्तुदोष केंद्रीय चुम्बकीय पत्थर का मुस्लिम नाविकों द्वारा निकाल लिया जाना तथा सन् 1508 में काला पहाड़ का आक्रमण आदि मुख्य हैं।

स्थापत्य कला, अध्यात्म मूर्तिकला और भारतीय वैदिक चिन्तन की दृष्टि से इस मंदिर की कला आधे-अधूरे रूप में भी ऐन्द्रजालिक प्रभाव रखती है। यह शिल्पकला का ऐसा नमूना है, जिसे देखते मन नहीं भरता। संक्षेप में कहा जाए तो कभी सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रहा यह स्थल आज भी सूर्य की सप्तरंगी ऊर्जा का वाहक प्रतीत होता है। पर्यटक हो, श्रद्घालु हो या आम जिज्ञासु सभी के लिए कोणार्क का यह सूर्य मंदिर आनन्द, ऊर्जा और शांति प्रदान करने वाला केन्द्र है।

 

देव सूर्य मंदिर- औरंगाबाद (बिहार)

करीब सौ फुट का यह सूर्य मंदिर स्थापत्य एवं वास्तुकला का अद्वितीय उदाहरण है। छठी से आठवीं शताब्दी के मध्य निर्मित बिहार के औरंगाबाद का देव सूर्य मंदिर देवार्क के नाम से भी प्रसिद्ध है। सम्भवत: यह एक मात्र सूर्य मंदिर है जो पश्चिमाभिमुख है।

एक किंवदंति के अनुसार अयोध्या के राजा इच्छवाकु के पुत्र, जो किसी कारण वश अयोध्या से निर्वासित कर दिए गए थे, इस देव धाम में शिकार करने आए। वे भी कुष्ठï रोग से पीड़ित थे। एक पुराने पोखर के जल का पान एवं स्नान मात्र से उन्हें इस रोग से मुक्ति मिली। उन्हें स्वप्न हुआ कि उस पोखर में त्रिदेव की मूर्तिया हैं। स्वप्न संदेश का अनुसरण कर उन्होंने तलाश की तो उन्हें वास्तव में मूर्तियां मिलीं। उन्होंने इस सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया और सूर्य देव के साथ-साथ इन त्रिदेवों की मूर्तियों को भी मंदिर में स्थापित किया।

देव मंदिर के प्रांगण में सात रथों में सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनो रूपों (उदयाचल, मध्याचल एवं अस्ताचल) में आज भी विद्यमान हैं। कोणार्क के सूर्य मंदिर की प्रतिकृति सा लगता यह मंदिर पूर्णतया जाग्रत है। वसंत पंचमी के दूसरे दिन यहां एक-दो दिवसीय उत्सव आयोजित किया जाता है। देव सूर्य महोत्सव के नाम से विश्व-प्रतिष्ठित यह उत्सव सूर्यदेव का जन्मोत्सव है। वसंत पंचमी पर देव कुंड पर भव्य आरती इस उत्सव का अतिरिक्त आकर्षण है। इस दिन पूरा शहर पहली दिवाली मनाता है। यह उत्सव सन 1998 से प्रारंभ हुआ जो अब विशाल रूप ले चुका है। सूर्य सप्तमी के दिन रथ यात्रा का आयोजन भी होता है। छठ पूजन के अवसर पर तो पूरा बिहार इस मंदिर में पूजा हेतु उमड़ पड़ता है।

सूर्य पहर मंदिर- असम 

असम के गोलपाड़ा के निकट सूर्य पहर मंदिर अपेक्षाकृत नवीन मंदिर है। इस मंदिर में एक गोलाकार चौकी पर सूर्य की 12 प्रतिमाएं गोलाकार रूप में ही स्थापित की गयी हैं तथा बीच में आदित्य के पिता कश्यप की मूर्ति है। कालिका पुराण के अनुसार सूर्य पर्वत सूर्य का अस्थिर निवास स्थल है। पहाड़ी के निचले भाग में पत्थरों को काटकर बनायी गयी शिव प्रतिमाएं दर्शनीय हैं।

 

तमिलनाडु में कुंबकोणम के निकट सूर्यनार मंदिर-

कुंबकोणम एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्र को मंदिरों का क्षेत्र माना जाता है। इस सुप्रसिद्ध मंदिर में सूर्य, काशी विश्वनाथ, विशालाक्षी को स्थान दिया गया है। साथ ही चन्द्रन, अंगारकन, बुधन, बृहस्पति, शुक्रन, राहू एवं केतु नक्षत्रों की प्रतिमाओं को भी स्थापित किया गया है। यह मंदिर 800 वर्ष प्राचीन है और इसका संरक्षण चोल राजाओं द्वारा किया गया। 

यह मंदिर पंचायतन मंदिर है क्योंकि यहां आदित्य मध्य में और चारों ओर गणेश, शिव-पार्वती तथा विष्णु चार कोनों पर हैं। यहां इन्द्र की मूर्ति भी है। लोक विश्वास है कि दृष्टि एवं त्वचा रोगों से ग्रस्त रोगी यदि यहां प्रार्थना करे तो स्वस्थ हो जाएंगे क्योंकि सूर्य स्वास्थ्य के देवता हैं।

दक्षिणार्क सूर्य मंदिर- गया

13वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के आन्ध्र-प्रदेश के वारंगल के प्रतापरूद्र द्वारा गया के दक्षिणार्क मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण कराया गया था। मंदिर के सामने सूर्यकुण्ड का दक्षिणा मानस ताल है। कहा जाता है कि मध्य एशिया के अग्नि पूजकों से ही सूर्य उपासना की परम्परा का प्रारम्भ हुआ था। सम्भवत: इसी कारण इस मंदिर में सूर्य का विग्रह जो ग्रेनाइट से निर्मित है, ईरानी शैली का है। इस मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर है और यह सुप्रसिद्ध विष्णु पद मंदिर (जहां विष्णु के पदचिन्ह बने हैं) के निकट स्थित है। मंदिर के अन्दर मुख्य कक्ष के सामने एक बड़ा सा सभा मंडप बना हुआ है जिसके स्तम्भों पर शिव, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और दुर्गा की प्रतिमाओं का निर्माण किया गया है।

 

गुजरात के मोधेरा का सूर्य मंदिर- 

सन् 1026 में निर्मित इस विशाल मंदिर में भी कोणार्क के सूर्य मंदिर के समान ही जब वर्ष में दो बार सूर्य भूमध्य रेखा के ऊपर होता है और दिन और रात्रि समान होते हैं (आम तौर पर 20 मार्च एवं 22 सितम्बर) तो सूर्य की किरणें इस मंदिर की सूर्य प्रतिमा पर पड़ती हैं। यद्यपि यह मंदिर काफी ध्वस्त हो चुका है किंतु आज भी इसके भग्नावेश आकर्षक हैं। यद्यपि शिखर अब बिलकुल लुप्त हो चुका है। किंतु सामने वाले सभागार के स्तम्भ और अन्दर दीवारों पर उकेरे गये भित्ति चित्र इस मंदिर की भव्यता के प्रमाण है। यह मोधरा नृत्य उत्सव का गृह जनपद माना जाता है। यहां भी गया के सूर्य मंदिर के समान सूर्य प्रतिमा ईरानी शैली की है। मंदिर के सामने एक विशाल ताल है।

इसके अतिरिक्त अहमदाबाद (गुजरात), उन्नाव (म. प्रदेश), रणकपुर (उदयपुर), अनंतनाग (कश्मीर) आदि कई स्थानों पर ऐतिहासिक सूर्य मंदिर स्थापित हैं, जो स्थापत्य कला में बेजोड़ हैं और सूर्य को सर्वमान्य देवता स्वीकार करते हैं।  

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