देसी घी यानी एक संपूर्ण औषधि

नीलम

13th January 2021

घर की रसोई से लेकर पूजा घर तथा धार्मिक अनुष्ठïानों में प्रयोग होने वाला घी स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभदायक है। क्या है घी तथा ये किस प्रकार हमें निरोग बनाए रखने में सहायक है? जानने के लिए पढ़ें ये लेख।

देसी घी यानी एक संपूर्ण औषधि

भारत में घी का विशेष महत्त्व है। प्राचीन काल में घी का उपयोग संपन्नता और वैभव का प्रतीक होता था तथा बहुमूल्य पोषक पदार्थ होने के कारण आज इसकी अहमियत है। घी मिला हुआ भोजन पवित्र भी माना जाता है। यही कारण है कि उत्तम प्रकार के रसोई और मिष्ठानों में घी डाला जाता है। भारत में घी खाने का खास तौर पर प्रचलन है। यह वातावरण को पवित्र रखने में अहम भूमिका निभाता है। इसी कारण हरेक पूजा, यज्ञ, हवन और धार्मिक तथा सामाजिक अनुष्ठान इसको शामिल किए बिना सम्पन्न नहीं हो सकते।

आयुर्वेद में देसी घी को रसायन कहा गया है। देसी घी में गाय का घी सर्वोत्तम होता है। आयुर्वेद के अनुसार समुचित मात्रा में देसी घी का सेवन किसी टॉनिक से कम नहीं है। यह दिमागी ताकत और नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला, उम्र में वृद्धि करने वाला तथा विषनाशक होता है। यह शरीर में ओज और तेज की बढ़ोतरी कर, अंग-अंग को स्वस्थ व सुंदर बनाता है। देसी घी के सेवन से वात, पित्त और कफ के असंतुलन से होने वाली बिमारियों से बचाव होता है।

घी क्या है?

घी एक प्रकार का वसा है, जिसका उपयोग भोजन पकाने और तलने के लिए किया जाता है। भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए वसा को शामिल करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे भोजन स्वादिष्ट व उम्दा बनता है। चरक घी को सभी स्निग्ध पदार्थों में श्रेष्ठ मानते हैं। सुश्रुत इसको विषनाशक मानते हैं। वाग्भट्ट इसको संतान-दाता और यौवन को स्थिर रखने वाला मानते हैं।

घी के विभिन्न नाम 

घी को संस्कृत में 'घृत', 'हवि', 'सर्पि', बांग्ला में 'घी' और 'घृत', तमिल में 'तूल', तेलुगू में 'नेई', गुजराती में 'घी', असमिया में 'समन', फारसी में 'रेगनेजर्द', अंग्रेजी में 'क्लेरिफाइट बटर' और लैटिन में 'ब्यूतीरम डेप्यूरेरम' कहा जाता है। 

घी बनाने की तीन विधियां हैं

घी तीन तरीकों से बनाया जाता है। पहला, मक्खन को किसी बर्तन में रखकर आग पर पकाकर बनाया जाता है। दूसरा, दूध से निकाली गई मलाई को हाथ से अच्छी तरह फेंटने के बाद किसी बर्तन में रखकर आग पर खौलाकर तैयार किया जाता है और तीसरा, दही की मलाई को मथनी से मिलाकर बनाया जाता है, जिसे लौनी घी कहते हैं। यह घी सबसे उत्तम गुण वाला होता है।

पुरातन पद्धति ही सर्वोत्तम

परंपरागत ग्रामीण भारतीय पद्धति में दूध को मिट्टी के बर्तन में मंद-मंद आंच पर गर्म किया जाता है, जिससे दूध पर मलाई की अपेक्षाकृत मोटी परत पड़ती है और अपने साथ अधिकारिक मात्रा में लिनोनेनिक एसिड को मलाई के साथ एकत्रित कर लेती है। फिर इस दूध को जमाकर जब दही बनाया जाता है तो यह गाढ़ा वसा अम्ल लौनी के साथ बंधा रह जाता है। यही कारण है कि दही की मलाई से प्राचीन ग्रामीण पद्धति द्वारा तैयार किया गया घी बहुत ही उम्दा किस्म का होता है।

घी की विशेषताएं

स्वास्थ्य के लिए घी का समुचित मात्रा में सेवन परम हितकारी है, क्योंकि इसके सेवन से शरीर की सात धातुओं रस, रक्त, मांस, मेरु, अस्थि, मज्जा और वीर्य में वृद्धि होती है। फलस्वरूप शरीर बलवान बनता है, मस्तिष्क शांत रहता है, गर्मी दूर होती है और रक्त शुद्ध होता है। 

  • घी रक्त के शुद्धिकरण की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है।
  • यह वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को शांत रखता है। 
  • घी के सेवन से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
  • थोड़ी मात्रा में भी घी को मिलाने से कई खाद्य-पदार्थों के दोष नष्ट हो जाते हैं।
  • विटामिन 'ए', 'डी', और 'के' केवल वसा में ही घुलनशील होते हैं। इसलिए आहार में मौजूद विटामिन, घी में घुलकर शरीर के सभी भागों में तंतुओं के रूप में पहुंचते हैं और अनेक बिमारियों से हमारी रक्षा करते हैं।
  • समुचित मात्रा में घी का सेवन करने वाले को अलग से विटामिन लेने की जरूरत नहीं पड़ती है।
  • घी, कैंसर रोधी है। यही कारण है कि जो लोग घी का सेवन नियमित करते हैं, उन्हें कैंसर होने की संभावना नहीं रहती है। 
  • जो लोग शारीरिक मेहनत अधिक करते हैं, उनके लिए घी का सेवन बहुत लाभकारी है।
  • घी में घाव को भरने का विशेष गुण है। यही कारण है कि सभी प्रकार के मरहमों की अपेक्षा पुराना घी अधिक गुणकारी माना गया है। कई वर्षों के पुराने गाय के दूध से बना घी स्वयं में एक उत्तम मरहम है। 
  • गाय के घी का दीया सुबह-शाम नियमित रूप से जलाने पर आस-पास के वातावरण में मौजूद हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और वातावरण पवित्र हो जाता है। इसलिए पूजा, यज्ञ और हवन में गाय का घी इस्तेमाल किया जाता है। 

घी से रोगोपचार

घी का प्रयोग सदियों से रोगोपाचार में होता आया है। ताजा घी जहां खाने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है, वहीं पुराना घी रोगों के इस्तेमाल के लिए सबसे उपर्युक्त माना जाता है। आमतौर पर एक साल तक रखा घी 'पुराना घी' माना जाता है, लेकिन कई आयुर्वेद चिकित्सक दस वर्ष तक रखे घी को 'पुराना घी' कहते हैं। ग्यारह वर्ष पुराने घी को 'कुंभिसर्प', 100 वर्ष पुराने घी को 'क्रोंच' और 1100 वर्ष पुराने घी को 'महाघृत' कहते हैं। पुराना घी वात, कफ और पित्त तीनों के दोषों को दूर करता है। यह बेहोशी, कोढ, विष, उन्माद, हिस्टीरिया, जुकाम आदि रोगों को दूर करता है। यह नजर की कमजोरी को मिटाता है, घावों को जल्दी भर देता है और कीड़ों को नष्ट करता है।

कैंसर में कारगर

गुजरात ग्रामीण प्रबंध संस्थान के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों के आधार पर स्पष्ट किया है कि 'लिनोलेनिक एसिड' दूध में छितराई हुई अवस्था में रहता है। लेकिन जब दूध को जमाकर दही बनाते हैं तो इस फैटी एसिड की अधिकांश मात्रा घी के साथ जुड़ जाती है जो ग्रामीण विधि से निकाले गए घी यानी लौनी घी के साथ निकल आती है।

प्रसूता के लिए विशेष गुणकारी

गर्भवती महिलाओं में अक्सर विटामिन डी और कैल्शियम की कमी हो जाती है। नतीजा, गर्भवती महिलाएं और उनके गर्भ में पल रहे शिशु 'ओस्टियोमलेशिया' नामक रोग से ग्रस्त हो सकते हैं। इस रोग के कारण हड्डिया कमजोर पड़ जाती हैं। यही कारण है कि हमारे देश के गांव-कस्बों में गर्भवती महिलाओं को गर्भ धारण करने के प्रथम महीने से ही भोजन के रूप में कुछ-न-कुछ घी व्यंजन दिया जाता है, ताकि गर्भ का पूर्ण रूप से पोषण हो और डिलीवरी सफलतापूर्वक हो जाए। फिर घी शरीर की रोगों से जूझने की क्षमता को बढ़ाता है।

 

  • सिर दर्द- यदि किसी व्यक्ति को सोते-सोते रोजाना रात को अचानक तेज सिर दर्द होता है तो उसे रात को सोने के पहले अपने पैर के तलवे में घी की मालिश करनी चाहिए। ऐसा रोज तीन-चार दिनों तक करने से उस व्यक्ति को सिर दर्द की शिकायत से मुक्ति मिल जाती है। 
  • नजर की कमजोरी- घी का सेवन आंखों के लिए हितकारी है। गाय के घी में मिश्री मिलाकर खाने से आंखों की ज्योति बढ़ती है। 
  • रतौंधी- त्रिफला के काढ़े में घी मिलाकर सेवन करने से रतौंधी रोग में लाभ होता है।
  • पित्ती- घी और सेंधा नमक मिलाकर शरीर पर मालिश करने बाद कम्बल ओढ़कर कुछ देर के लिए बैठ जाएं। ऐसा करने से शरीर से पसीना निकलने के साथ-साथ जुलपित्ती भी मिट जाती है। 
  • विष का प्रभाव- जिसने विष खाया हो या जिसे सांप ने काटा हो, उसे सिर्फ आधा पाव गाय का घी या देसी गाय के दूध के साथ पिलाने से सब प्रकार के विष शरीर के बाहर निकल आते हैं। 
  • नशा- दो चम्मच गाय के घी में इतनी ही चीनी मिलाकर पिलाने से शराब का नशा उतर जाता है। शराब पीने के बाद तुरंत खांड और घी मिलाकर चटाने से तीव्र शराब का ज्वर भी नहीं चढ़ता है। 
  • बेहोशी- यदि किसी को बेहोशी छाने की समस्या हो तो उसे दस वर्ष पुराना गाय का घी सेवन काराएं तथा उसके माथे पर इसकी मसाज भी करें। कुछ दिनों के प्रयोग से लाभ होगा।
  • जलन- घी की तासीर ठंडी होती है। इसलिए आग से जले व्यक्ति के शरीर पर घी लगा देने से आराम मिलता है। 
  • छाले पड़ना- रात को सोते समय छालों पर घी लगाने से आराम मिलता है। 
  • पुरानी खांसी- गाय का घी और सेंधा नमक मिलाकर छाती पर मालिश करने से पुरानी खांसी ठीक हो जाती है। 
  • हिचकी आना- थोड़ा-सा गाय का गुनगुना घी पीने से हिचकी बंद हो जाती है। 
  • चेहरे के दाग-धब्बे- रात को सोते समय रोजाना चेहरे पर घी की मालिश करने से चेहरे के दाग-धब्बे मिट जाते हैं। 
  • बिवाइयां- घी और नमक मिलाकर बिवाइयों पर लगाने से त्वचा कोमल हो जाती है और बिवाइयां ठीक हो जाती हैं। जाड़े के दिनों में हाथ-पैर पर घी लगाने से हाथ-पैर की त्वचा फूटती नहीं है। घी में थोड़ा-सा नमक मिलाकर होठों और नाभि पर लगाने से होंठ फटना बंद हो जाते हैं। 

 

किसका घी कितना फायदेमंद ?

गाय द्वारा प्रदत्त प्रत्येक वस्तु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवम् उपयोगी है। यदि हम गाय के दस ग्राम घी से हवन, अनुष्ठान यज्ञ करते हैं तो इसके परिणामस्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। गौ घृत (घी) में मनुष्य के शरीर में पहुंचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता है। अग्नि में देशी गाय के घी की आहूति देने से उसका धुआं जहां तक फैलता है वहां तक का सारा वातावरण प्रदूषण और आधुनिक विकिरणों से मुक्त हो जाता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक चम्मच गौ घृत को अग्नि में डालने से एक टन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती है जो अन्य किसी भी उपाय से संभव नहीं है।

देसी गाय के घी में वैक्सीन एसिड,ब्यूट्रिकऐसिडबीटा कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रि मौजूद होते हैं जिसके सेवन से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है।  

भैंस का घी- स्वादिष्ट, शीतल, कफ कारक, वीर्य वर्धक, पाचन में भारी, वात और पित्त के असंतुलन को दूर करने वाला तथा रक्त विकारों से छुटकारा दिलाने वाला होता है।

बकरी का घी- पाचन शक्ति बढ़ाने वाला, आंखों के लिए लाभदायक, बलवर्धक तथा फेफड़ों संबंधी बिमारियों में लाभ देने वाला होता है।

भेड़ का घी- हड्डियों का विकास करने वाला, आंखों के लिए लाभदायक, पाचनशक्ति को बढ़ाने वाला, पथरी, शुगर व वात के कारण उत्पन्न रोगों को दूर करने वाला होता है।

सावधानियां

  • वसा होने के कारण घी, जल में अघुलनशील और कार्बनिक घोलकों में घुलनशील होता है। यही कारण है कि घी देर से पचता है। लिहाजा, हमें अपने भोजन में घी अधिक मात्रा में नहीं लेना चाहिए। 
  • मोटे लोगों को अन्य चिकनाई वाले खाद्य पदार्थों की तरह घी का सेवन भी कम मात्रा में करना चाहिए। अधिक मात्रा में इसके सेवन से मोटापे में वृद्धि होती है। 
  • घी जितना गुणकारी है, न पचने पर उतना ही हानिकारक भी। घी के न पचने पर दस्त, पेचिश, ज्वर, हृदय रोग, क्षय रोग आदि हो सकते हैं। इसलिए घी उतनी ही मात्रा में खाना चाहिए, जितना कि आसानी से पच जाए। 
  • वृद्धों, बालकों और कम शारीरिक मेहनत करने वालों को घी अधिक मात्रा में नहीं पचता है। ऐसे लोगों को घी कम मात्रा में खाना चाहिए।

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