रेकी: एक संपूर्ण आध्यात्मिक उपचार पद्धति

सीताराम गुप्ता

14th January 2021

रेकी चिकित्सा पद्घति में इलाज हाथों के स्पर्श द्वारा किया जाता है लेकिन कुछ परिस्थितियों में डिस्टेंस हिलिंग द्वारा किया जाता है। आइए रेकी चिकित्सा पद्घति के बारे में लेख से विस्तारपूर्वक जानें।

रेकी: एक संपूर्ण आध्यात्मिक उपचार पद्धति

रेकी अपेक्षाकृत नई लेकिन एक अत्यंत लोकप्रिय वैकल्पिक उपचार पद्धति है। एक ओर यह आध्यात्मिक चिकित्सा से जुड़ती है तो साथ ही इसे स्पर्श-चिकित्सा की श्रेणी में भी रखा जाता है। शारीरिक व्याधियों के उपचार के अतिरिक्त लक्ष्य प्राप्ति अथवा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अन्य विधियों की तरह रेकी से भी सहायता ली जाती है। इसमें रेकी ऊर्जा का आह्वान कर हम अपनी इच्छा ही व्यक्त करते हैं। इस अवस्था में जैसे हमारे मनोभाव होंगे वही अवस्था स्थायी रूप ग्रहण कर लेगी। इस प्रकार एक संपूर्ण आध्यात्मिक उपचार पद्धति है रेकी।

क्या है रेकी?

रेकी जापानी भाषा का शब्द है जो 'रे' और 'की' दो शब्दों से मिलकर बना है। 'रे' का अर्थ है 'सर्वव्यापी' अर्थात ओम्नीप्रेजेंट तथा 'की' का अर्थ है 'जीवनीशक्ति' या 'प्राण' अर्थात् लाइफ फोर्स एनर्जी। इस प्रकार रेकी वह ईश्वरीय ऊर्जा, दिव्य ऊर्जा अथवा आध्यात्मिक ऊर्जा है जो इस समस्त ब्रह्मïड में हमारे चारों ओर व्याप्त है। हम सब इसी  जीवनीशक्ति को लेकर पैदा होते हैं और इसी के द्वारा जीवन जीते हैं। 

समय के साथ-साथ अनेक कारणों से जब हमारे शरीर में इस ऊर्जा का प्रवाह कम हो जाता है अथवा संतुलन बिगड़ जाता है तभी हमारा शरीर रोगों की ओर आकर्षित होता है। इस जीवनीशक्ति का सुचारू और संतुलित प्रवाह हम सभी को जीवित और स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है। रेकी उपचार अथवा साधना में हम इसी सर्वव्यापी  जीवनीशक्ति का उपयोग अपने लाभार्थ करते हैं।

रेकी की खोज

रेकी एक अनादि ऊर्जा शक्ति है। भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध तथा ईसा मसीह में यह उपचारक शक्ति विद्यमान थी जिससे वे किसी भी व्यक्ति अथवा अन्य प्राणी को अपने स्पर्श मात्र से व्याधिमुक्त कर देते थे। इसके पर्याप्त प्रमाण हमें मिलते हैं। कालांतर में यह शक्ति क्षीण होती चली गई और लुप्तप्राय हो गई। वर्तमान काल में इसकी खोज अथवा इसको पुन: स्थापित करने का श्रेय जापान के क्योटो विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक डॉ. मिकाओ उसुई को जाता है।

डॉ. उसुई ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में इसको पुन: स्थापित किया। डॉ. मिकाओ उसुई के नाम पर इस पद्धति को उसुई शीकी रिओहो अथवा उसुई सिस्टम ऑफ नेचुरल हीलिंग अर्थात् प्राकृतिक उपचार की उसुई पद्धति भी कहा जाता है। डॉ. मिकाओ उसुई विश्वविद्यालय में क्रिश्चियन विद्या के प्राध्यापक थे। एक दिन उनके एक छात्र ने पूछा कि क्या ईसा मसीह की तरह मात्र स्पर्श द्वारा रोगों को दूर करना संभव है? डॉ. उसुई इस तथ्य से सहमत तो थे कि स्पर्श द्वारा उपचार संभव है' क्योंकि बाइबल में यह लिखा है लेकिन वे उपचार की इस विधि से अनभिज्ञ थे। 

इस घटना के बाद डॉ. उसुई ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया तथा बिना दवा के स्पर्श द्वारा उपचार की इस पद्धति को खोजना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। इस सिलसिले में वे अमेरिका, जापान, चीन, तिब्बत तथा भारत में आए और अनेक ग्रथों का अध्ययन किया तथा अनेकानेक लोगों से मिले। अंत में एक संस्कृत ग्रंथ 'कमलसूत्र' में उन्हें इसकी जानकारी तो मिली लेकिन वह आध्यात्मिक ऊर्जा नहीं जिससे वे उपचार कर सकते। 

जापान में कुरायामा पर्वत पर इक्कीस दिन की तपस्या या साधना के बाद उन्होंने वह शक्ति खोज ली जिससे स्पर्श द्वारा उपचार संभव हो सके और इसके प्रचार-प्रसार में जुट गए। उन्होंने भिखारियों की बस्ती में जाकर नि:शुल्क उपचार कार्य प्रारंभ किया लेकिन उन्हें अनुभव हुआ कि बिना मांगे और वो भी मुफ्त में मिली वस्तु का कोई महत्त्व नहीं होता अत: उन्होंने दो प्राथमिक नियम बनाए।

जो व्यक्ति रेकी की शिक्षा प्राप्त करना चाहे अथवा रेकी उपचार लेना चाहे केवल उसे ही सिखाया जाए या उसका उपचार किया जाए।

रेकी सीखने वाले या रेकी उपचार लेने वाले व्यक्ति से अपनी सेवा के बदले कुछ न कुछ अवश्य लिया जाए।

डॉ मिकाओ उसुई ने डॉ चुजीरो हयाशी को रेकी का प्रशिक्षण देकर अपने बाद रेकी के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी। डॉ. चुजीरो हयाशी के बाद सुश्री टकाटा हवायो नामक महिला उनकी उत्तराधिकारिणी बनीं तथा सन् 1970 व 1980 के मध्य उन्होंने इक्कीस रेकी शिक्षकों को तैयार किया जो अब तक लाखों रेकी शिक्षक तैयार कर चुके हैं। भारत में सबसे पहले रेकी सीखने और उसका प्रचार-प्रसार करने वालों में दो नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं: अहमदाबाद के प्रवीण डी पटेल तथा मुंबई की श्यामल दुर्वे।

रेकी उपचार की प्रकृति

रेकी उपचार में हाथों की हथेलियों से छूकर उपचार किया जाता है अत: यह पद्धति स्पर्श चिकित्सा, की श्रेणी में आती है। रेकी उपचारक के हाथों की दोनों हथेलियों से रेकी ऊर्जा प्रवाहित होती है जो छूने पर स्वयं उसको या दूसरे व्यक्ति को उपचार में सहायता पहुंचाती है।

रेकी चिकित्सक

रेकी शिक्षक वह व्यक्ति है जो किसी भी व्यक्ति को रेकी सिखाता है तथा उपचार करता है। रेकी सीखने वाला स्वयं का तथा दूसरों का उपचार तो कर सकता है लेकिन रेकी सीखा नहीं सकता। रेकी की शिक्षा देने के लिए कम से कम रेकी मास्टर की डिग्री की आवश्यकता है। रेकी मास्टर दूसरों को रेकी चिकित्सक बना सकता है तथा रेकी ग्रांड मास्टर रेकी मास्टर बना सकता है।

रेकी कैसे कार्य करती है?

कोई भी व्यक्ति जो रेकी का प्रारंभिक प्रशिक्षण लेता है रेकी चैनल या माध्यम कहलाता है। रेकी उसके शरीर में ऊर्जा तरंगों के रूप में बहती है जो उसकी हथेलियों के माध्यम से उत्सर्जित या प्रवाहित होकर उपचार में मदद करती है। रेकी कैसे कार्य करती है इसको सही जानने के लिए शरीर के प्रमुख सात चक्रों अथवा ऊर्जा केंद्रों की जानकारी आवश्यक है। ऊपर से नीचे की ओर स्थित सात चक्र क्रमश: निम्नलिखित हैं:

हमारे शरीर में ऊर्जा का प्रवाह इन्हीं चक्रों के माध्यम से होता है। रेकी उपचार प्रक्रिया में रेकी ऊर्जा हमारे सहस्रार अथवा क्राउन चक्र से प्रविष्ट होकर आज्ञा चक्र, विशुद्ध चक्र, हृदय चक्र तथा हाथों से होती हुई दोनों हाथों की हथेलियों से उत्सर्जित या प्रवाहित होती है। इसके लिए किसी बाह्य प्रयास की आवयश्कता नहीं होती। मात्र सोचने और हथेलियां रखने से उपचार की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। जरूरत है तो सिर्फ एक बार रेकी शिक्षक से प्रशिक्षण लेने की।

रेकी सुसंगतता अथवा शक्तिपात

रेकी शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान ऊपर के चारों चक्रों को अट्यून कर रेकी ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित तथा अवरोधमुक्त कर देता है। इस प्रक्रिया को सुसंगतता अथवा शक्तिपात कहते हैं। इस प्रक्रिया को गुप्त रखा जाता है। मात्र पढ़ने से इसकी शक्ति 

प्राप्त नहीं होती। इसके प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं :-

स्पर्श, दृष्टि, मंत्रोच्चारण, प्राणप्रवाह (प्राणाहुति) तथा संकल्प।

एक बार शक्तिपात हो जाने के बाद जीवनभर ये आध्यात्मिक ऊर्जा आपके चाहने मात्र से तुरंत प्रवाहित होकर उपचार में सहायक हो जाती है।

रेकी की सुचारुता

रेकी ऊर्जा का प्रयोग करने वाला व्यक्ति ऊर्जा का वाहक मात्र होता है स्रोत नहीं इसलिए प्रयोग के कारण रेकी उपचारक की अपनी ऊर्जा कम नहीं होती अपितु जब वह दूसरे की चिकित्सा करता है तो उसकी स्वयं की चिकित्सा भी साथ-साथ हो जाती है। एक रेकी चैनल जब स्वयं की अथवा दूसरों की चिकित्सा नहीं भी करता है तब भी न्यूनाधिक मात्रा में ऊर्जा का प्रवाह उसकी हथेलियों के माध्यम से बना रहता है जो उसके चारों ओर एकत्रित होकर उसके आभामण्डल अर्थात् नतं को मजबूत तथा विस्तृत करता है। 

व्यक्ति का आभामण्डल जितना मजबूत तथा विस्तृत होगा व्यक्ति उतना ही अधिक ऊर्जस्वित, स्वस्थ और निरोग होगा। ऐसे व्यक्ति के निकट संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी उससे स्वाभाविक रूप से लाभान्वित होते हैं। ऐसे व्यक्ति के पास बैठना आनंददायक प्रतीत होता है। साधु-संतों, बच्चों, पशु-पक्षियों अथवा पेड़-पौधों के पास बैठना बड़ा आनंददायक लगता है क्योंकि इन सब में ऊर्जा का प्रवाह पर्याप्त होने के कारण इनका आभामण्डल विस्तृत और ऊर्जस्वित होता है और स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता है तथा आनंददायक और उपचारक भी होता है।

रेकी द्वारा उपचार कैसे किया जाता है?

जब रेकी द्वारा उपचार करते हैं तो हथेलियों को शरीर के विभिन्न भागों पर क्रमश: तीन-तीन मिनट तक रखते हैं। पूरे शरीर को उपचारित करने के लिए रेकी गुरुओं ने चौबीस से तीस के बीच स्थान निर्धारित किये हैं। इसमें 72 से 90 मिनट तक का समय अपेक्षित है। समयावधि आवश्यकतानुसार कम ज्यादा की जा सकती है। किसी विशेष भाग में अधिक पीड़ा या रोग होने पर उस विशिष्ट अंग को ज्यादा समय तक रेकी देते हैं। सात चक्रों का रेकी में विशेष महत्त्व है अत: यदि पूरे शरीर को रेकी दे पाने में समय की कमी या अन्य कठिनाई है तो सातों चक्रों को अवश्य रेकी दें। स्वयं के सहस्रार को रेकी नहीं दी जाती. क्योंकि ऐसा करने से रेकी ऊर्जा का प्रवेश बाधित हो जाएगा। दूसरे को रेकी देते समय उसके सहस्रार को भी रेकी दी जा सकती है। रेकी प्रारंभ करने वाले व्यक्ति को रेकी सीखने के बाद शुरू में कम से कम इक्कीस दिन पूरे शरीर की नियमित रूप से हीलिंग करनी चाहिए।

 

स्पर्श चिकित्सा तथा दूरस्थ चिकित्सा

स्पर्श चिकित्सा में हम स्वयं की अथवा दूसरों की हथेलियों के स्पर्श  द्वारा चिकित्सा करते हैं लेकिन दूरस्थ चिकित्सा में रोगी के शरीर को छूए बिना और देखे बिना दूर बैठ कर उपचार करते हैं। यह दूरी कुछ इंचों से लेकर हजारों मील तक की हो सकती है। इसमें रेकी प्रतीक चिह्नों अर्थात् रेकी सिम्बल का उपयोग किया जाता है जो रेकी की दूसरी डिग्री में सिखाया जाता है। रेकी प्रतीक चिह्नों के उपयोग से रेकी ऊर्जा का प्रवाह चार-पांच गुना अधिक हो जाता है जिससे समय की समस्या भी हल हो जाती है। रेकी प्रतीक चिह्न वास्तव में उपचारक की एकाग्रता में अत्यंत सहायक होते हैं। इनसे उपचार की प्रक्रिया फौरन तीव्र हो जाती है।

क्या रेकी मात्र एक रोगोपचारक पद्धति है?

रेकी मात्र एक रोगोपचारक पद्धति नहीं है अपितु संपूर्णता के साथ जीवन जीने की एक कला है। रेकी एक सम्पूर्ण उपचार पद्धति है। व्याधि को समूल नष्ट करने की पद्धति। रेकी न केवल भौतिक शरीर में उत्पन्न विभिन्न व्याधियों को दूर कर आरोग्य प्रदान करती है अपितु भावनात्मक संतुलन तथा आध्यात्मिक अभ्युदय अथवा चेतना के स्तर में वृद्धि द्वारा व्यक्ति को निरंतर स्वस्थ, सकारात्मक तथा उत्साहपूर्ण बनाए रखने में सहायक है। अधिकतर रोगों की प्रकृति मनोदैहिक अर्थात् psychosomatic होती है। 

अधिकतर व्याधियों का मूल कारण होता है मन की स्थिति या सोच। अत: रोगों का मूल कारण है तनाव, चिंता, भय, क्रोध, निराशा, अवसाद, घृणा, उत्तेजना, प्रावरोध, कुंठा, सुस्ती और आलस्य, राग-द्वेश व अहंकार आदि नकारात्मक चित्तवृतियों से उत्पन्न मन:स्थिति। रेकी स्वयं में एक सम्पूर्ण ध्यान पद्धति अथवा मेडिटेशन तकनीक है। अत: रेकी ध्यान द्वारा उपचार की अन्य सभी विधियों की तरह उपरोक्त नकारात्मक चित्तवृत्तियों से मुक्ति प्रदान कर सम्पूर्ण स्वास्थ्य की ओर अग्रसर करती है। रेकी सम्पूर्ण रूपांतर की प्रक्रिया है। आंतरिक और बाह्य रूपांतरण। शारीरिक और मानसिक कायांतर क्योंकि रेकी शरीर में व्याप्त दूषित अथवा नकारात्मक ऊर्जा को हटाकर उसके स्थान पर स्वच्छ सकारात्मक ऊर्जा भर  देती है अत: रेकी का सबसे पहला कार्य मन को निरोग और स्वस्थ बनाना है।

जब मन स्वस्थ होगा तो शरीर भी स्वस्थ होगा और' मानसिक स्वास्थ्य से शारीरिक स्वास्थ्य तथा शारीरिक स्वास्थ्य से मानसिक स्वास्थ्य' एक बार यह प्रक्रिया शुरू होने की देर है फिर देखिए कैसे शीघ्र ही हम सम्पूर्णता के तीसरे आयाम अथवा आध्यात्मिक उन्नति अर्थात् संपूर्ण स्वास्थ्य की ओर अग्रसर होने लगते हैं। अपनी स्व की चेतना से जुड़ कर परा चेतना तथा ईश्वरीय चेतना से जुड़ जाते हैं। ईश्वरीय चेतना अर्थात् ईश्वरीय ऊर्जा अर्थात् दिव्य ऊर्जा जो स्वयं रेकी है उससे जुड़ जाते हैं। यह रेकी द्वारा रेकी से जुड़ने अथवा ऊर्जा द्वारा ऊर्जा से जुड़ने की प्रक्रिया ही है। सम्पूर्ण रेकीमय अथवा सम्पूर्ण ऊर्जामय होना ही रेकी उपचार है।

आचार्य शंकर का अद्वैतवाद कहता है 'ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या, जीवो ब्रह्मव नापर:' अर्थात् ब्रह्म सत्य है संसार माया, जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है। ब्रह्म और जीव अथवा ईश्वर और हम अभिन्न हैं। मैं यही निष्कर्ष निकालता हूूं कि हम सबने न तो ईश्वर को देखा है और न रेकी को। दोनों ही ऊर्जास्वरूप हैं तो फिर क्यों न हम कहें कि ईश्वरीय ऊर्जा अथवा रेकी एक ही हैं। यही सत्य है, संसार सत्य नहीं, संसार रेकी से भिन्न नहीं, रेकी ही ब्रह्म है। क्यों न रेकी से एकाकार होने का प्रयास करें? संक्षेप में रेकी रोगों के उपचार के साथ-साथ आपसी संबंधों में सुधार करने, लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता करने तथा आत्मज्ञान प्राप्त करने का भी एकमात्र स्रोत है। जप-तप और साधना ही नहीं योग-ध्यान अथवा मेडिटेशन तथा प्रार्थना के तत्त्व भी इसमें समाहित हैं। इस प्रकार जीवन जीने की कला अथवा वास्तविक या शुद्ध धर्म ही है रेकी। 

रेकी सीखने-सिखाने तथा उपचार करने की पात्रता

कोई भी व्यक्ति, स्त्री या पुरुष, किसी भी आयु में रेकी सीख सकता है तथा रेकी द्वारा उपचार कर सकता है। रेकी सीखना और रेकी द्वारा उपचार करना इतना सरल है कि छोटा बच्चा भी इसे सीखकर लाभ उठा सकता है। रेकी का संबंध किसी भी राष्ट, धर्म अथवा संप्रदाय से नहीं है अत: किसी भी धर्म, संप्रदाय अथवा विचारधारा को मानने वाला व्यक्ति रेकी ऊर्जा के उपयोग से लाभान्वित हो सकता है।

कुछ लोग रेकी से पूर्ण रूप से लाभान्वित नहीं हो पाते क्यों?

रेकी से पूर्ण रूप से लाभान्वित नहीं होने का कारण है विश्वास की कमी या सीमित विश्वास, श्रद्धा और समर्पण का अभाव, संशय की प्रधानता तथा अभ्यास में शिथिलता। कहा गया है कि 'श्रद्धावान् लभते ज्ञानम' तथा 'संशयात्मा विनश्यति'। मिर्जा गालिब का एक शेर याद आ रहा है:

मुझ तक कब उनकी बज्म में आता था दौरे-जाम, साकी  ने  कुछ  मिला न  दिया  हो शराब  में।

कहने का अर्थ ये है कि जब तक संशय का दौर समाप्त नहीं होगा तब तक हम किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ सकते। श्रद्धा, समर्पण तथा असंशय या संशय रहित होने के साथ-साथ जीवन में स्थितियों और घटनाओं को स्वीकारना भी महत्त्वपूर्ण है। जितना अधिक हम वाद-विवाद में उलझेंगे, तर्क -वितर्क या कुतर्क करेंगे उतना ही आध्यात्मिक ऊर्जा से वंचित रहेंगे। परिणाम की चिंता भी बेमानी है। जैसे ही हम परिणाम की चिंता में ग्रस्त होते हैं हमारा आध्यात्मिक स्तर कमजोर पड़ जाता है। जीवनी शक्ति के प्रवाह में रुकावट आ जाती है। कर्त्ता भाव का त्याग करके निष्काम कर्म तथा स्वार्थ व प्रेम की महत्ता सभी ने स्वीकार की है। एक रेकी साधक को भी इन पर आचरण करना चाहिये। रेकी की सुचारुता में वृद्धि हो इसके लिए रेकी के प्रथमाचार्य डॉ. मिकाओ उसुई ने रेकी के पांच सैद्धांतिक नियम बनाए हैं। प्रत्येक रेकी साधक को इनका पालन करना चाहिए।

 

रेकी के पांच सैद्धांतिक नियम

  1. just for today don't worry.
  2. just for today don't anger.
  3. Earn your living honestly.
  4. show gratitude to everything
  5. Respect your elders, teachers & parents and love your youngers.

इन सिद्धातों का पालन करना रेकी उपचार में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है। वैसे भी यदि मात्र इन सिद्धातों का जीवन में पालन किया जाए तो भी मनुष्य को एक नई जीवन दृष्टि प्राप्त होती है। रेकी के इन पांचों सिद्धातों को आत्मसात किया जा सके इसके लिए मैंने इन्हें स्वीकारोक्ति के रूप में निम्न रूप में प्रस्तुत किया है:

  • आज मैं पूर्ण रूप से प्रसन्न हूं।
  • आज मैं प्रेम से परिपूर्ण हूं।
  • मैं ईंमानदारी से अपनी आजीविका कमाता हूं।
  • मैं हर वस्तु और स्थिति के लिए कृतज्ञ हूं तथा प्रत्येक स्थिति को यथावत स्वीकार करता हूं।
  • मुझे हर वस्तु में श्रद्धा तथा विश्वास है तथा मैं अपने माता पिता, गुरुओं तथा सभी बड़ों का आदर करता हूं एवं सभी छोटों को प्यार करता हूं।

मैं अपने रेकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उपरोक्त नियमों को आत्मसात कराने का प्रयास करता हूं। रेकी में इन सिद्धातों का वही स्थान है जो 'योग' में यम और नियम का। योग के आठ अंग हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि। मात्र आसन करना संपूर्ण योग नहीं है। यम अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मïचर्य तथा अपरिग्रह व नियम अर्थात् शौच, संतोष, तपस, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान इनके बिना योग अधूरा है। इसी तरह रेकी में उपरोक्त पांच सिद्धातों का आत्मसात करना उचित तथा अनिवार्य है। यदि भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग से रेकी के सिद्धातों की तुलना करें तो काफी समानता दृष्टिगोचर होती है। बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग है सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् जीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि, सम्यक् संकल्प तथा सम्यक् दृष्टि।

क्या रेकी के साथ अन्य चिकित्सा पद्धति भी अपनाई जा सकती है?

यदि रोगी का एलोपैथी या अन्य चिकित्सा पद्धति से इलाज चल रहा हो तब भी उसको रेकी दी जा सकती है और देनी भी चाहिए। रेकी से ऊर्जा के स्तर में वृद्धि तथा ऊर्जा का संतुलन होने से दवाओं का असर अपेक्षाकृत त्वरित और शीघ्र होता है। दवाओं की मात्रा क्रमश: कम होती चली जाती है। यदि रोगी को दी जाने वाली दवा और भोजन को रेकी दी जाए तो उसके परिणाम भी बहुत अच्छे होते हैं। स्वास्थ्य लाभ शीघ्र संभव होता है। वैसे भी रेकी आध्यात्मिक ऊर्जा है इसमें प्रार्थना के तत्त्व भी समाहित है।

आप सब जानते हैं कि प्रार्थना अपने आप में एक उपचार पद्धति है। प्रार्थना अपने ईष्ट देव से की जाती है। रेकी ईश्वर का ही दूसरा नाम है अत: रेकी के माध्यम से उपचार प्रार्थना का ही दूसरा रूप है। दूरस्थ उपचार अथवा दूरस्थ चिकित्सा क्या है? रेकी के माध्यम से प्रार्थना ही तो है। अंतर इतना है कि इसमें रेकी प्रतीक चिह्नों की मदद ली जाती है जिससे प्रार्थना के समय एकाग्रता अपने चरम पर होती है। वैसे आपने एक डायलॉग सुना होगा। दवा जो काम कर सकती थी कर चुकी अब बस दुआ कीजिए। और आपने दुआओं का असर होते भी देखा होगा। तो फिर दवाओं के साथ भी और दवाओं के बिना भी जहां तक संभव हो प्रार्थना रूपी रेकी का उपयोग प्रारंभ कर दें।

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