तेज़ाब - गृहलक्ष्मी कहानियां

जसविंदर शर्मा

18th January 2021

तेज़ाब से किसी चेहरे को बिगाड़ देने जैसी हरकत वे लोग करते हैं, जो कभी भी अपनी शख्सियत को संवार नहीं पाते। क्या वाकई तेज़ाब का असर किसी के बुलंद हौसलों से ज़्यादा होता है, जानिए इस सशक्त कहानी द्वारा-

तेज़ाब  -  गृहलक्ष्मी कहानियां

मेरा चेहरा पहले ऐसा नहीं था। मैं बहुत सुंदर थी। मेरी जल्दी शादी होने के पीछे वही मेरा प्लस प्वाईंट था। 23 साल की उम्र में एक दिन मुझे पता चला कि एक बड़े घर से मेरा रिश्ता आया है। मेरी मम्मी और पापा के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वे बस एक ही बात की रट लगा रहे थे कि इतने बड़े घर के लोगों ने खुद अपने घर की बहू बनाने के लिए मेरी मांग की थी। कितनी किस्मत वाली थी मैं।

लड़का  नेवी में था। आमदनी अच्छी थी। घर को अन्य जगहों से भी आय थी। मेरे मां-बाप अपने रिश्तेदारों को बताते थकते नहीं थे कि मेरे भावी ससुरालवालों ने कहां-कहां जायदाद बना रखी है।

सगाई होने के एक महीने के अंदर ही मेरी शादी भी हो गई। सब कुछ जैसे किसी फिल्म का सीन था। मुझे मिस से मिसेज बनने में केवल महीने भर का समय लगा। मैं खुश थी या उत्साहित अधिक थी, मुझे सही नहीं पता, मगर जितनी तेजी से यह ज्वार चढ़ा, उतनी ही तेजी से सारा उफान उतर भी गया। शादी की रात ही मुझे समझ आ गया था कि अब इस तूफान से उबर पाना मुझ नादान के बस का नहीं है। ससुराल पहुंचते ही मुझे अहसास हुआ कि मेरे लिए गलत पति चुन लिया गया है।

मेरा पति सुंदर था और आकर्षक भी, मगर शराब का बेहद शौकीन था। मेरा अनुमान गलत निकला कि मैं उसे अपनी सुंदर अदाओं के बल पर ठीक कर लूंगी। दो महीने की शादी के दौरान ही मेरा जीना मुश्किल हो गया। मैं अपने मम्मी-पापा के पास आ गई। मैंने उनसे साफ कह दिया कि मैं अपने पति के साथ नहीं रह सकती। मुझे अपनी सारी जिंदगी बर्बाद नहीं करनी।

मेरे मम्मी-पापा ने विस्तार से मेरे मोहभंग का कारण पूछा। मेरे पास कई कारण थे, मगर वे हर बात को झुठलाते, मेरे पति की तरफदारी करते। बस मेरी एक बात पर उनकी जुबान बंद हो जाती, जब मैं कहती कि मेरा पति सेक्सुअली पर्वट है और यह कि उसे नॉर्मल सेक्स करना नहीं आता। शराब पीकर वह सारी रात बेसुध सोया रहता है।

मेरी एक ही जिद थी कि मुझे तलाक चाहिए। यह शब्द सुनते ही मेरे माता-पिता भड़क जाते। कहते कि अभी तो मेरा पति विदेश में है। उसके आने पर कुछ सोचा जा सकता है। आठ महीने तक मैं अनिश्चय की स्थिति में रही। मेरे पेरेंट्स ने दबाव बढ़ाया कि मैं ससुराल जा कर रहूं, मगर मैं अपने फैसले से टस से मस न हुई। मेरे ससुराल वालों ने मेरे खिलाफ प्रचार करना शुरू कर दिया, मगर मैंने उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी ग्रेजुएशन के बाद वकालत करने की ठान ली। मेरे फैसले से मेरे रिश्तेदार परेशान हो गए और मेरे माता-पिता को कई तरह की सलाहें देने लगे। मेरे पड़ोसी भी मुझ पर कई तरह के सवाल उठाने लगे।

हर किसी का कहना था कि मुझे अपनी शादी को किसी तरह बचाना चाहिए। उसके लिए समझौता करना चाहिए। शादी को बचाना हर आदर्श पत्नी की पहली जिम्मेदारी है। मेरे पेट में बच्चा पल रहा था। कम से कम उसके लिए ही मुझे अपनी शादी खराब नहीं कर लेनी चाहिए। तलाक शब्द सुनते ही सब बिदकने लगते। वे कहते कि समझदार औरतें तलाक की बात नहीं करती। कोई भी हमदर्द नहीं था मेरा। मेरी परेशानी सुनने को कोई तैयार नहीं था। कोई भी मेरे पति की असहनीय हरकतों के बारे में बात करने को तैयार नहीं था। कारण एक ही था, समाज में औरतों पर ज्यादती कोई नई बात नहीं है। रात को मार खाकर सूजे हुए हाथों से पत्नी अपने पति के बूट पालिश करती मिले तो यह कोई हैरानी की बात नहीं होना चाहिए। पति चाहे कितने बड़े ओहदे पर हो, पढ़ा लिखा हो, औरत को प्रताड़ना देना उसका अधिकार है। उसकी मां, बहन, भाभी सभी के साथ यह सदियों से होता आया है। इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं है उनके लिए।

मेरे अड़े रहने और तलाक की मांग करने पर मेरा पति बिफर गया। वह दो महीने की छुट्टी  पर आया, मगर मैं अपने मायके में ही रही थी। बेटा पैदा होने की खबर सुनकर भी मेरे ससुराल वाले नहीं आए। अब मेरे मां-बाप मुझ पर दबाव डालने लगे कि मुझे उन लोगों को एक मौका और देना चाहिए। उधर मेरी ससुराल वाले अपनी अमीरी के दम्भ में प्रचार करने लगे कि वे अपने बेटे की दूसरी जगह शादी कर देंगे।

पति के साथ रहने से इंकार करने के कारण मैंने अपने पति के अहम पर चोट कर दी। उस शाम मैं अपने बेटे को अंदर सुलाकर बाहर आंगन में बैठी थी। मेरा पति चुपके से आया और मेरे चेहरे पर तेजाब उड़ेलकर भाग गया। तेजाब से मेरा चेहरा, आंखें, गर्दन, छाती, हाथ, पैर और कपड़े सब जल गए। जैसे मुझे जलती हुई आग के हवाले कर दिया गया हो।

असहनीय पीड़ा से चीखते-चीखते मैं बेहोश हो गई। मुझ पर लगातार कई सर्जरी हुईं मगर किसी तरीके से मैं पहली वाली स्थिति में नहीं लौट पाई। मेरे माता-पिता प्राइवेट इलाज नहीं करवा सकते थे, सो मेरा इलाज सरकारी हस्पतालों में ही हुआ। कितनी लंबी लाइनों में लगाने के बाद और महीनों इंतजार के बाद इन हस्पतालों में सर्जरी के लिए डॉक्टर समय देते थे।

मेरे पति द्वारा मुझ पर तेजाब का वह हमला पहले से ही नियोजित था। तेजाब फेंकने के बाद वह उसी रात विदेश भाग गया था। किसी ने उसका कुछ नहीं बिगाड़ा। मेरे एक पड़ोसी ने उसे आते हुए देखा था। कोई दूसरा ऐसा नीच काम मेरे साथ क्यूं करता। मेरे माता-पिता कानूनी लड़ाई लड़ने लायक ही नहीं थे। मेरे पति के पास लाखों रुपये थे। पुलिसवालों की जेबें भरी जा चुकी थीं। ऐसे में हम गरीबों के लिए कौन लड़ता। अखबार वालों की अपनी मजबूरियां थीं। हर रोज तो ऐसे केस हो रहे थे, जहां लड़कियों पर तेजाब से हमले हो रहे थे। मेरा केस भी सुॢखयों में रहा, मगर कुछ रोज में ही सब भूल गए।

इस घटना ने मुझे और मेरे आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया। मेरा संपूर्ण अस्तित्व खत्म हो गया। मुझ से मेरी पहचान छीन ली गई। अब मुझे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों या पड़ोसियों को बताने की जरूरत नहीं रह गई थी कि मैं तलाक क्यूं चाहती थी। अगर उस समय मेरी बात को कोई गंभीरता से लेता तो मेरा जीवन कुछ और ही होता। मगर इस कठोर समाज से मेरा वास्तविक संघर्ष तो अभी आरंभ ही हुआ था। तेजाब में झुलसे मेरे भयानक काले चेहरे ने तो मानो मेरी दुनिया ही बदल कर रख दी थी। अब मैं पहली वाली किरण तो कतई नहीं थी। मेरे अपने भी मेरा चेहरा देखना पसंद नहीं करते थे। बच्चों को मेरा मुंह देख लेने पर डर लगता था। मैंने अपने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था। मुझे घर की किचन या बेडरूम में जाने की मनाही होने लगी, क्योंकि अब मेरे मायके में मेरी भाभी की चलती थी। मम्मी-पापा भी उसकी तरफदारी करते।

कोई मेहमान आता तो लिविंग रूम में जाने के लिए मुझे मना किया जाता। बस में या सार्वजनिक स्थान पर लोग मुझे तिरस्कारभरी नजर से देखते। मेरे साथ वाली सीट पर न बैठते। अगर घर के दरवाजे की घंटी बजती और मैं कहीं सामने बैठी होती तो मुझसे कहा जाता कि मैं अंदर के कमरे में जाकर बैठूं।

अपने ही बेटे से मिलने, बात करने व उसे अपनी गोद में बिठाने को मैं तरस गई थी। मेरा बेटा सबसे चोरी-चोरी मेरे अंधेेरे कमरे में मुझसे मिलने आता। मेरे जले हुए निशानों पर विक्स लगाता। मुझे फल खिलाता, मगर उसके लिए अब मैं कुछ नहीं कर पा रही थी, सो मैंने उसे अपने भाई-भाभी के रहमोकरम पर छोड़ दिया था। अब मुझे लगातार यह अहसास हो रहा था कि मेरे पति ने तो मुझ पर एक बार ही तेजाब डालकर अपनी नफरत का इजहार किया था, मगर यह बेरहम समाज मुझ पर हर रोज विषैले हमले कर रहा है। लोगों की उपेक्षा मेरे लिए अब बर्दाश्त से बाहर थी। मैं अपना दुख-दर्द भूल जाना चाहती थी। मैंने अपनी नियति को स्वीकार कर लिया था, मगर यह जालिम समाज हर रोज क्षण प्रति क्षण मेरे साथ तिरस्कार पूर्ण रवैया अपनाता जा रहा था। इस घृणा का तो कहीं अंत नजर नहीं आ रहा था।

अब मेरे मन में अपने जैसे लोगों का ख्याल आया, जो मेरी ही तरह हर रोज समाज की मानसिक प्रताड़ना का शिकार होकर दिन-रात दोजख की भट्टी में झौंके जा रहे थे। मुझे अखबारों से पता चला कि अकेले मेरे महानगर में तकरीबन आठ हजार लोग ऐसे हैं, जो जलने की वजह से झुलस गए हैं। शेष भारत में तो इनकी संख्या लाखों में होगी। ये लोग गुमनामी और तिरस्कार की स्थिति में दिन-रात दुखी मन से बस किसी तरह समय को धकेल रहे हैं।

मैं सोचने लगी कि ये लोग भी मेरी तरह ही कुंठा और अवसाद में रहते होंगे। क्या उनके लिए समाज में कोई निदान नहीं है। कोई उनके लिए क्या कर रहा है। फिर मैं यह सोचने लगी कि हम जले हुए लोग मिलकर अपने लिए क्या कर सकते हैं। लोग हमसे मिलना नहीं चाहते तो कोई बात नहीं, हम लोग तो आपस में मिल-बैठ सकते हैं। कई दिनों तक मैं सोचती रही कि मेरे पास जो साधन हैं, उनसे क्या कुछ किया जा सकता है। हमारे जैसे डरावने लोगों की जिंदा कब्रें क्या अंधेरे बंद कमरे ही हैं। कोई मुझसे हमदर्दी क्यूं नहीं दिखाता। कोई आकर क्यूं नहीं कहता कि घर से बाहर निकलो, हम सब तुम्हारे साथ हैं। मैंने फैसला कर लिया कि मैं अपनी ही नहीं, बल्कि अपने जैसे कम से कम एक व्यक्ति की मदद जरूर करूंगी।

मेरी कानून की पढ़ाई अधूरी रह गई थी, मगर कुछ प्वॉइन्ट्स मुझे पता थे। मैंने अदालत जाकर कानून के कारकूनों से बातचीत की। तेज़ाब डाट कॉम नामक संस्था शुरू की। ऐसे मुद्दे उठाए, जो मेरे लिए आसान थे। अखबार में तेज़ाब बेचने पर प्रतिबंध लगाने, पीड़िता को सर्जरी करवाने व अन्य मसलों पर अखबारों में लेख भेजे। ऑन लाइन कैंपेनिंग शुरू की।

दो ही दिन में बीस हजार लोग मुझसे जुड़ गए। लोगों को मेरा नाम अभी विस्मृत नहीं हुआ था। तेजाब की शिकार हुई औरतों के लिए सरकार ने कई कदम उठाए। उनके लिए कानून बनाए, मगर यह सब अधूरा है, जब तक कि समाज संवेदनशील नहीं होगा, मन से यह महसूस नहीं करेगा कि ऐसी घटना किसी के साथ कभी भी हो सकती है तथा ऐसे लोगों को उपेक्षा नहीं सहयोग और प्यार देना चाहिए। हम उन्हें ऐसे अकेला नहीं छोड़ सकते। कानून अपनी जगह काम करता है, मगर समाज की संवेदनशीलता और सहयोग पीड़ितों के घावों को जल्दी भर देता है। फिर कोई बदसूरत चेहरा उतना बुरा नहीं लगता। जिन अंधेरों में मैं जी रही थी, वहां अब पहचान और अपने लोगों के प्यार की रोशनी है। अब मुझे कई जगह बुलाया जाता है, मेरे हौसले और जज्बे की तारीफ होती है। मुझ जैसे कई लोग तेजाबी दंश की मार से व्यथित लोगों को आशा की राह दिखाने में जुटे हैं। लोग अब मेरा चेहरा देखे बिना ही मुझे पहचान लेते हैं और कहते हैं कि किरण ने वाकई जिंदादिली से अपने जीवन को नई दिशा दी है। 

यह भी पढ़ें -महंगाई और ज़ायका - गृहलक्ष्मी कहानियां

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मेरा चेहरा पहले ऐसा नहीं था। मैं बहुत सुंदर थी। मेरी जल्दी शादी होने के पीछे वही मेरा प्लस प्वाईंट था। 23 साल की उम्र में एक दिन मुझे पता चला कि एक बड़े घर से मेरा रिश्ता आया है। मेरी मम्मी और पापा के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वे बस एक ही बात की रट लगा रहे थे कि इतने बड़े घर के लोगों ने खुद अपने घर की बहू बनाने के लिए मेरी मांग की थी। कितनी किस्मत वाली थी मैं।

लड़का  नेवी में था। आमदनी अच्छी थी। घर को अन्य जगहों से भी आय थी। मेरे मां-बाप अपने रिश्तेदारों को बताते थकते नहीं थे कि मेरे भावी ससुरालवालों ने कहां-कहां जायदाद बना रखी है।

सगाई होने के एक महीने के अंदर ही मेरी शादी भी हो गई। सब कुछ जैसे किसी फिल्म का सीन था। मुझे मिस से मिसेज बनने में केवल महीने भर का समय लगा। मैं खुश थी या उत्साहित अधिक थी, मुझे सही नहीं पता, मगर जितनी तेजी से यह ज्वार चढ़ा, उतनी ही तेजी से सारा उफान उतर भी गया। शादी की रात ही मुझे समझ आ गया था कि अब इस तूफान से उबर पाना मुझ नादान के बस का नहीं है। ससुराल पहुंचते ही मुझे अहसास हुआ कि मेरे लिए गलत पति चुन लिया गया है।

मेरा पति सुंदर था और आकर्षक भी, मगर शराब का बेहद शौकीन था। मेरा अनुमान गलत निकला कि मैं उसे अपनी सुंदर अदाओं के बल पर ठीक कर लूंगी। दो महीने की शादी के दौरान ही मेरा जीना मुश्किल हो गया। मैं अपने मम्मी-पापा के पास आ गई। मैंने उनसे साफ कह दिया कि मैं अपने पति के साथ नहीं रह सकती। मुझे अपनी सारी जिंदगी बर्बाद नहीं करनी।

मेरे मम्मी-पापा ने विस्तार से मेरे मोहभंग का कारण पूछा। मेरे पास कई कारण थे, मगर वे हर बात को झुठलाते, मेरे पति की तरफदारी करते। बस मेरी एक बात पर उनकी जुबान बंद हो जाती, जब मैं कहती कि मेरा पति सेक्सुअली पर्वट है और यह कि उसे नॉर्मल सेक्स करना नहीं आता। शराब पीकर वह सारी रात बेसुध सोया रहता है।

मेरी एक ही जिद थी कि मुझे तलाक चाहिए। यह शब्द सुनते ही मेरे माता-पिता भड़क जाते। कहते कि अभी तो मेरा पति विदेश में है। उसके आने पर कुछ सोचा जा सकता है। आठ महीने तक मैं अनिश्चय की स्थिति में रही। मेरे पेरेंट्स ने दबाव बढ़ाया कि मैं ससुराल जा कर रहूं, मगर मैं अपने फैसले से टस से मस न हुई। मेरे ससुराल वालों ने मेरे खिलाफ प्रचार करना शुरू कर दिया, मगर मैंने उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी ग्रेजुएशन के बाद वकालत करने की ठान ली। मेरे फैसले से मेरे रिश्तेदार परेशान हो गए और मेरे माता-पिता को कई तरह की सलाहें देने लगे। मेरे पड़ोसी भी मुझ पर कई तरह के सवाल उठाने लगे।

हर किसी का कहना था कि मुझे अपनी शादी को किसी तरह बचाना चाहिए। उसके लिए समझौता करना चाहिए। शादी को बचाना हर आदर्श पत्नी की पहली जिम्मेदारी है। मेरे पेट में बच्चा पल रहा था। कम से कम उसके लिए ही मुझे अपनी शादी खराब नहीं कर लेनी चाहिए। तलाक शब्द सुनते ही सब बिदकने लगते। वे कहते कि समझदार औरतें तलाक की बात नहीं करती। कोई भी हमदर्द नहीं था मेरा। मेरी परेशानी सुनने को कोई तैयार नहीं था। कोई भी मेरे पति की असहनीय हरकतों के बारे में बात करने को तैयार नहीं था। कारण एक ही था, समाज में औरतों पर ज्यादती कोई नई बात नहीं है। रात को मार खाकर सूजे हुए हाथों से पत्नी अपने पति के बूट पालिश करती मिले तो यह कोई हैरानी की बात नहीं होना चाहिए। पति चाहे कितने बड़े ओहदे पर हो, पढ़ा लिखा हो, औरत को प्रताड़ना देना उसका अधिकार है। उसकी मां, बहन, भाभी सभी के साथ यह सदियों से होता आया है। इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं है उनके लिए।

मेरे अड़े रहने और तलाक की मांग करने पर मेरा पति बिफर गया। वह दो महीने की छुट्टïी पर आया, मगर मैं अपने मायके में ही रही थी। बेटा पैदा होने की खबर सुनकर भी मेरे ससुराल वाले नहीं आए। अब मेरे मां-बाप मुझ पर दबाव डालने लगे कि मुझे उन लोगों को एक मौका और देना चाहिए। उधर मेरी ससुराल वाले अपनी अमीरी के दम्भ में प्रचार करने लगे कि वे अपने बेटे की दूसरी जगह शादी कर देंगे।

पति के साथ रहने से इंकार करने के कारण मैंने अपने पति के अहम पर चोट कर दी। उस शाम मैं अपने बेटे को अंदर सुलाकर बाहर आंगन में बैठी थी। मेरा पति चुपके से आया और मेरे चेहरे पर तेजाब उड़ेलकर भाग गया। तेजाब से मेरा चेहरा, आंखें, गर्दन, छाती, हाथ, पैर और कपड़े सब जल गए। जैसे मुझे जलती हुई आग के हवाले कर दिया गया हो।

असहनीय पीड़ा से चीखते-चीखते मैं बेहोश हो गई। मुझ पर लगातार कई सर्जरी हुईं मगर किसी तरीके से मैं पहली वाली स्थिति में नहीं लौट पाई। मेरे माता-पिता प्राइवेट इलाज नहीं करवा सकते थे, सो मेरा इलाज सरकारी हस्पतालों में ही हुआ। कितनी लंबी लाइनों में लगाने के बाद और महीनों इंतजार के बाद इन हस्पतालों में सर्जरी के लिए डॉक्टर समय देते थे।

मेरे पति द्वारा मुझ पर तेजाब का वह हमला पहले से ही नियोजित था। तेजाब फेंकने के बाद वह उसी रात विदेश भाग गया था। किसी ने उसका कुछ नहीं बिगाड़ा। मेरे एक पड़ोसी ने उसे आते हुए देखा था। कोई दूसरा ऐसा नीच काम मेरे साथ क्यूं करता। मेरे माता-पिता कानूनी लड़ाई लड़ने लायक ही नहीं थे। मेरे पति के पास लाखों रुपये थे। पुलिसवालों की जेबें भरी जा चुकी थीं। ऐसे में हम गरीबों के लिए कौन लड़ता। अखबार वालों की अपनी मजबूरियां थीं। हर रोज तो ऐसे केस हो रहे थे, जहां लड़कियों पर तेजाब से हमले हो रहे थे। मेरा केस भी सुॢखयों में रहा, मगर कुछ रोज में ही सब भूल गए।

इस घटना ने मुझे और मेरे आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया। मेरा संपूर्ण अस्तित्व खत्म हो गया। मुझ से मेरी पहचान छीन ली गई। अब मुझे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों या पड़ोसियों को बताने की जरूरत नहीं रह गई थी कि मैं तलाक क्यूं चाहती थी। अगर उस समय मेरी बात को कोई गंभीरता से लेता तो मेरा जीवन कुछ और ही होता। मगर इस कठोर समाज से मेरा वास्तविक संघर्ष तो अभी आरंभ ही हुआ था। तेजाब में झुलसे मेरे भयानक काले चेहरे ने तो मानो मेरी दुनिया ही बदल कर रख दी थी। अब मैं पहली वाली किरण तो कतई नहीं थी। मेरे अपने भी मेरा चेहरा देखना पसंद नहीं करते थे। बच्चों को मेरा मुंह देख लेने पर डर लगता था। मैंने अपने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था। मुझे घर की किचन या बेडरूम में जाने की मनाही होने लगी, क्योंकि अब मेरे मायके में मेरी भाभी की चलती थी। मम्मी-पापा भी उसकी तरफदारी करते।

कोई मेहमान आता तो लिविंग रूम में जाने के लिए मुझे मना किया जाता। बस में या सार्वजनिक स्थान पर लोग मुझे तिरस्कारभरी नजर से देखते। मेरे साथ वाली सीट पर न बैठते। अगर घर के दरवाजे की घंटी बजती और मैं कहीं सामने बैठी होती तो मुझसे कहा जाता कि मैं अंदर के कमरे में जाकर बैठूं।

अपने ही बेटे से मिलने, बात करने व उसे अपनी गोद में बिठाने को मैं तरस गई थी। मेरा बेटा सबसे चोरी-चोरी मेरे अंधेेरे कमरे में मुझसे मिलने आता। मेरे जले हुए निशानों पर विक्स लगाता। मुझे फल खिलाता, मगर उसके लिए अब मैं कुछ नहीं कर पा रही थी, सो मैंने उसे अपने भाई-भाभी के रहमोकरम पर छोड़ दिया था। अब मुझे लगातार यह अहसास हो रहा था कि मेरे पति ने तो मुझ पर एक बार ही तेजाब डालकर अपनी नफरत का इजहार किया था, मगर यह बेरहम समाज मुझ पर हर रोज विषैले हमले कर रहा है। लोगों की उपेक्षा मेरे लिए अब बर्दाश्त से बाहर थी। मैं अपना दुख-दर्द भूल जाना चाहती थी। मैंने अपनी नियति को स्वीकार कर लिया था, मगर यह जालिम समाज हर रोज क्षण प्रति क्षण मेरे साथ तिरस्कार पूर्ण रवैया अपनाता जा रहा था। इस घृणा का तो कहीं अंत नजर नहीं आ रहा था।

अब मेरे मन में अपने जैसे लोगों का ख्याल आया, जो मेरी ही तरह हर रोज समाज की मानसिक प्रताड़ना का शिकार होकर दिन-रात दोजख की भट्टी में झौंके जा रहे थे। मुझे अखबारों से पता चला कि अकेले मेरे महानगर में तकरीबन आठ हजार लोग ऐसे हैं, जो जलने की वजह से झुलस गए हैं। शेष भारत में तो इनकी संख्या लाखों में होगी। ये लोग गुमनामी और तिरस्कार की स्थिति में दिन-रात दुखी मन से बस किसी तरह समय को धकेल रहे हैं।

मैं सोचने लगी कि ये लोग भी मेरी तरह ही कुंठा और अवसाद में रहते होंगे। क्या उनके लिए समाज में कोई निदान नहीं है। कोई उनके लिए क्या कर रहा है। फिर मैं यह सोचने लगी कि हम जले हुए लोग मिलकर अपने लिए क्या कर सकते हैं। लोग हमसे मिलना नहीं चाहते तो कोई बात नहीं, हम लोग तो आपस में मिल-बैठ सकते हैं। कई दिनों तक मैं सोचती रही कि मेरे पास जो साधन हैं, उनसे क्या कुछ किया जा सकता है। हमारे जैसे डरावने लोगों की जिंदा कब्रें क्या अंधेरे बंद कमरे ही हैं। कोई मुझसे हमदर्दी क्यूं नहीं दिखाता। कोई आकर क्यूं नहीं कहता कि घर से बाहर निकलो, हम सब तुम्हारे साथ हैं। मैंने फैसला कर लिया कि मैं अपनी ही नहीं, बल्कि अपने जैसे कम से कम एक व्यक्ति की मदद जरूर करूंगी।

मेरी कानून की पढ़ाई अधूरी रह गई थी, मगर कुछ प्वॉइन्ट्स मुझे पता थे। मैंने अदालत जाकर कानून के कारकूनों से बातचीत की। तेज़ाब डाट कॉम नामक संस्था शुरू की। ऐसे मुद्दे उठाए, जो मेरे लिए आसान थे। अखबार में तेज़ाब बेचने पर प्रतिबंध लगाने, पीड़िता को सर्जरी करवाने व अन्य मसलों पर अखबारों में लेख भेजे। ऑन लाइन कैंपेनिंग शुरू की।

दो ही दिन में बीस हजार लोग मुझसे जुड़ गए। लोगों को मेरा नाम अभी विस्मृत नहीं हुआ था। तेजाब की शिकार हुई औरतों के लिए सरकार ने कई कदम उठाए। उनके लिए कानून बनाए, मगर यह सब अधूरा है, जब तक कि समाज संवेदनशील नहीं होगा, मन से यह महसूस नहीं करेगा कि ऐसी घटना किसी के साथ कभी भी हो सकती है तथा ऐसे लोगों को उपेक्षा नहीं सहयोग और प्यार देना चाहिए। हम उन्हें ऐसे अकेला नहीं छोड़ सकते। कानून अपनी जगह काम करता है, मगर समाज की संवेदनशीलता और सहयोग पीड़ितों के घावों को जल्दी भर देता है। फिर कोई बदसूरत चेहरा उतना बुरा नहीं लगता। जिन अंधेरों में मैं जी रही थी, वहां अब पहचान और अपने लोगों के प्यार की रोशनी है। अब मुझे कई जगह बुलाया जाता है, मेरे हौसले और जज्बे की तारीफ होती है। मुझ जैसे कई लोग तेजाबी दंश की मार से व्यथित लोगों को आशा की राह दिखाने में जुटे हैं। लोग अब मेरा चेहरा देखे बिना ही मुझे पहचान लेते हैं और कहते हैं कि किरण ने वाकई जिंदादिली से अपने जीवन को नई दिशा दी है। 

यह भी पढ़ें -महंगाई और ज़ायका - गृहलक्ष्मी कहानियां


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