आजकल की लड़कियों की पहली पसंद - गृहलक्ष्मी कहानियां

अलका सिन्हा

18th January 2021

हमें आज दर्द का एहसास तभी क्यों होता है, जब वह खुद हमें ही या हमारे अपनों को ही होता है? जब एक अपराधी सज़ा से बचता है, उसी पल सौ अपराधों की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है। प्रस्तुत है ऐसी ही एक सटीक-सशक्त और प्रासंगिक कहानी-

आजकल की लड़कियों की पहली पसंद - गृहलक्ष्मी कहानियां

मेहता की खुशी का ठिकाना नहीं था। लग रहा था जैसे उसके पैरों में पंख लग गए हों। अपनी लाडली बेटी नैना के नाम गाड़ी बुक कराते हुए उसने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत पर हस्ताक्षर किए थे।

उसे याद है, पढ़ाई के दौरान वह अक्सर ऐसे सपने देखा करता था कि कभी वह इतना पैसा कमाएगा कि अपनी पसंद की जिस चीज पर हाथ रख देगा, वह उसकी हो जाएगी। कहीं-न-कहीं उसे विश्वास भी था कि वह दिन जरूर आएगा, मगर इतनी जल्दी और इस तरह...? ये बात उसकी खुशी को कई गुना बढ़ा रही थी। उसने खूब देख-समझकर गाड़ी की डिलीवरी के लिए आने वाली दस तारीख लिख दी। गाड़ी का रंग, उसका ब्रैंड- सब नैना की पसंद के थे। उसने पहले ही ये सब जानकारी नैना से ले ली थी।

'अच्छा बताइए, आप अपने अठारहवें जन्मदिन पर क्या तोहफा लेना चाहेंगी- फॉरन टूर? गोल्ड ज्यूलरी? या फिर अ ब्रैंड न्यू कार?'

'ऑफकोर्स अ ब्रैंड न्यू कार, लेकिन...'

'लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, कौन-सी कार, उसका ब्रैंड, कलर और दूसरी सभी विशेषताएं भी बताई जाए।' मेहता ने नाटकीयता से पूछा था।

'माइ स्वीट पापा... क्या इस बार मेरे जन्मदिन पर मुझे कार मिलने वाली है...?' नैना ने खुशी से चहकते हुए अपनी पसंद बताई थी।

'ऐसा मैंने कब कहा?... बहरहाल, इस सर्वे में भाग लेने के लिए आपका हाॢदक धन्यवाद।' कहते हुए नाटकीयता से मेहता दूसरी तरफ घूम गया था, 'मी लॉर्ड, मैं दावे से कह सकता हूं कि नई कार आजकल की लड़कियों की पहली पसंद है और वह ठहाका लगा कर हंस पड़ा था।'

इन बातों को दोहराते हुए वह खुशी से फूला नहीं समा रहा था। वह ख्यालों में देख रहा था कि अपनी पसंद की कार गैराज में खड़ी देख नैना कितनी खुश होगी।

मेहता जानता है, सुनंदा उससे कभी संतुष्ट नहीं हो सकती, इसलिए वह नैना की खुशी में ही संतुष्ट हो जाता है। कहीं एक कसक-सी उठती है। सुनंदा का चेहरा ज़ेहन में घूम जाता है, एक आक्रोश हर समय उसके चेहरे पर छाया रहता है। अब मेहता का काम ही वकालत का है तो वह क्या करे! उसने कोई उससे झूठ बोलकर तो शादी की नहीं। यह बात तो वह विवाह से पहले ही जानती थी। मना कर देती शादी से। कोई प्रेम-व्रेम का चक्कर भी नहीं था कि दिल आ गया हो।

'लॉयर्स प्रॉफेशन इज़ अ लायर्स प्रॉफेशन', वह कहती है, 'झूठ के दम पर कमाया पैसा मुझ पर खर्च मत करना।'

मेहता का मन उदास हो गया। उसका काम उसके हिस्से आए केस को जिताना है और वह किसी को बेवकूफ बनाकर नहीं, बल्कि तर्कों के आधार पर अपना केस जीतता है। उसकी तर्क-शक्ति का लोहा सभी मानते हैं। यही कारण है कि आज वह एक ऐसे वकील के रूप में जाना जाता है, जिसके केस का जीतना निश्चित है, मगर सुनंदा उसकी जीत से कभी खुश नहीं हुई।

'तुम जैसे वकीलों ने कानून को दुकान बना रखा है, जो चाहे खरीद ले।' सुनंदा कहती है, 'वकालत का मकसद न्याय दिलाना है, मुजरिमों को बचाना नहीं।'

यों उसके पास सुनंदा की हर आपत्ति का जवाब होता है। फिर भी सुनंदा से बात करने के बाद वह एक तरह की ग्लानि महसूस करने लगता है। बहस हार जाने के बाद भी सुनंदा की अकड़ कम नहीं होती, जैसे कह रही हो कि वह बहस में हारी है, सिद्धांत में नहीं।

एक दिन नैना ने भी अपनी मां की तरह पूछा था, 'पापा, क्या आपको मुजरिमों को बचाने के पैसे मिलते हैं?'

'किसी को फैसले से पहले ही मुजरिम मान लेना कितना सही है?' मेहता इस सवाल से तिलमिला गया था। फिर भी, उसने नैना को समझाया था, 'बेटे, मैं गलत या झूठी रिपोर्ट के आधार पर नहीं, बल्कि कानून में दिए गए प्रावधानों के आधार पर अपने क्लाइंट को बचाता हूं। इसमें गलत क्या है?'

'सही-गलत तो अपने जमीर से पूछो, उससे बड़ी कोई अदालत नहीं।' कहते हुए सुनंदा ने मुंह फेर लिया था।

यह तो सही है कि मुजरिम की तरफ से केस लड़ने पर उसे मुंह मांगे पैसे मिलते हैं और इसलिए उसकी स्वाभाविक दिलचस्पी इन केसों के प्रति होती है।

वह अक्सर स्वयं से बहस करने लगता है और खुद ही में हारता-जीतता रहता है। खुद को तीसमार खां समझने वाला नामी वकील नरेश मेहता अपने ही केस का निपटारा नहीं कर पाता। वह दो मुख्तलिफ हिस्सों में बंट जाता है और अपने पक्ष में दलील दे-देकर थकता रहता है। फिर किसी बिंदु पर पहुंच कर मुकदमा अनिश्चित काल के लिए मुल्तवी रख, खुद को सोच की गिरफ्त से बरी कर लेता है।

वह समझ नहीं पा रहा कि आज इतनी बड़ी जीत के मौके पर उसने यह भीतरी अदालत क्यों खोल ली है। वैसे यह कोई नई बात नहीं। हर मुकदमे को जीतने के बाद उसका अंतर्मन उससे मुल्तवी पड़े इस केस पर बहस की पैरवी करने लगता है। तब उसे लगता है, जैसे वह खुद ही अपना बैरी है, जो अपनी जीत की खुशी भी नहीं मना पाता। शोरूम से उठते हुए उसने एक बार फिर इस जिरह-बहस से खुद को बरी किया और एक भरपूर अंगड़ाई के साथ वह अपनी पुरानी कार में जा बैठा।

शनि, इतवार और सोमवार... उसने मन-ही-मन हिसाब लगाया- मंगलवार, दस फरवरी... ताजेराते हिंद... माबदौलत अपनी चश्मेनूर बेटी नैना की खिदमत में, उसकी अठारहवीं सालगिरह पर उसकी बेहद पसंदीदा कार का तोहफा पेश करते हैं... वह मन ही मन उस दृश्य की कल्पना कर रहा है, जो उसके लिए बहुत बड़ी खुशी लेकर आने वाला है। तीन दिन बिताना कितना मुश्किल होगा, यहां एक-एक मिनट बिताना भारी पड़ रहा है।

मेहता चाहता था कि नैना को जन्मदिन पर सरप्राइज दे, मगर वह चाहकर भी अपने उत्साह पर काबू नहीं रख पा रहा था। उसने कलाई घुमा कर देखा, सात बज रहे थे। नैना अपनी कोचिंग-क्लास से निकल चुकी होगी, उसने अंदाजा लगाया। नैना से मिलने की व्यग्रता में उसने घर की तरफ गाड़ी मोड़ ली।

घर पहुंचा तो नैना को अजीब-सी दशा में पाया। उसके दो बार पुकारने पर भी नैना ने कोई जवाब नहीं दिया। वह पत्थर बनी दीवार को निहारती रही।

'क्या हुआ है इसे?' आखिर सुनंदा से ही पूछना पड़ा।

'तू घबराती क्यों है? तूने तो बहुत बहादुरी का काम किया है।' कहते हुए सुनंदा ने नैना को अपने कलेजे में छिपा लिया।

'क्या किया है इसने?' मेहता कुछ समझ नहीं पाया, मगर किसी अनजानी आशंका से उसका मन सिहर उठा।

नैना कुछ समझ नहीं पा रही थी कि उसने जो किया है, वह कितना सही है, जबकि सुनंदा उसका हौसला बढ़ा रही थी।

'पापा, मेट्रो के पीछे की तरफ जो सड़क है न, मैं उस रास्ते से लौट रही थी कि एक लड़का मेरे पीछे...' वह फिर सुबक पड़ी।

'हुआ क्या?' मेहता लगभग चीख पड़ा था।

'वह वहशी मुझ पर हावी होना चाहता था। उसने मुझे पीछे से पकड़ लिया और मुझे घसीटता हुआ झाड़ियों की तरफ ले गया।' नैना अभी भी सदमे में थी।

'तुमने सौ नंबर पर क्यों नहीं फोन किया? या मुझे फोन कर लेती...' मेहता के सिर में हथौड़े-से बजने लगे।

'जैसे पुलिस पता नहीं क्या कर लेती? कानून तो किसी न किसी आधार पर छोड़ ही देता... तूने बिल्कुल ठीक किया।' सुनंदा आश्वस्ति से उसकेबाल सहला रही थी।

'क्या किया तुमने?' मेहता की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा।

'मैंने झाड़ियों में पड़ा शीशे का टुकड़ा उठा लिया और शरीर के जिस अंग से वह मेरी जिंदगी तबाह करता, पूरी ताकत के साथ मैंने उस पर ही वार किया और उसे उसके शरीर से अलग कर डाला...' नैना की सांस तेज हो गई थी।

'अब वह किसी का जीवन बर्बाद करने के लायक नहीं रहा... कम से कम एक वहशी दरिंदे से तो सुरक्षित हो गईं ये लड़कियां...' सुनंदा का आत्मालाप जारी था, 'जो काम तुमने किया, वह तो कानून भी नहीं कर पाता, तुम्हारे पापा ही बचा लेते इन्हें...' 'सुनंदा!' मेहता चीख पड़ा।

'चिल्लाओ मत', सुनंदा की आवाज उसकी आवाज पर हावी हो गई थी, 'पिछले दिनों जिस बलात्कारी को जुविनाइल कह कर बचा लिया था तुमने, ये वही तो था...'

'...तुम महेन्दर यादव की बात कर रही हो?' मेहता को लग रहा था, जैसे उसके दिमाग की नस फट जाएगी।

'जरूरी नहीं कि इसका भी नाम महेन्दर यादव ही हो। मगर जुविनाइल लड़के बलात्कार करके बच सकते हैं, ऐसा तुम सिद्ध कर चुके हो।Ó सुनंदा शेरनी की तरह दहाड़ रही थी, 'आप अभी भी बेशक उसका ही केस लीजिएगा, मिस्टर मेहता। इसमें आपको मुंह-मांगी फीस मिलेगी।' वितृष्णा और कसक से सुनंदा की आवाज और भी तीखी हो गई थी, '...इस बार तो तुम्हें बहुत मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी। पिछले की नजीर ही काफी रहेगी।' सुनंदा की आवाज से नैना अपने-आप में वापस लौट आई थी।

'क्या आपको नहीं लगता पापा कि केस जीतने के मकसद से आप लोग पीड़ितों के बदले मुजरिमों के बचाव के लिए काम करने लगे हैं और अपनी रक्षा के लिए हमें कानून अपने हाथ में लेना पड़ रहा है...'

'तुम चिंता मत करो, नैना। मैं तुम्हें जरा-सी भी सजा नहीं होने दूंगा', मेहता खुद को आश्वस्त कर रहा था।

'मैं सजा से नहीं डरती पापा, मगर जिंदगी भर किसी और के किए की सजा भोगने से बेहतर है कि मैं अपने किए की सजा भुगतूं...' नैना की आवाज में चुनौती थी, 'वैसे फिलहाल मैं भी जुविनाइल की ही कैटेगरी में आती हूं...' नैना के चेहरे पर एक विद्रूप हंसी उभर आई थी।

'...और हां पापा, आप अपने सर्वे का परिणाम बदल दीजिएगा। आजकल की लड़कियां कार से अधिक हथियार पसंद करने लगी हैं...' वह आत्मविश्वास से कह रही थी। 

 

यह भी पढ़ें - दूसरी पारी - गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं- Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://bit.ly/39Vn1ji  

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

नैना फिर से ...

नैना फिर से जी उठी...

घिसटती जिन्द...

घिसटती जिन्दगी - गृहलक्ष्मी कहानियां

एहसास  - गृह...

एहसास - गृहलक्ष्मी कहानियां

अपना- अपना आ...

अपना- अपना आसमान - गृहलक्ष्मी कहानियां

पोल

आपको कैसी लिपस्टिक पसंद है

वोट करने क लिए धन्यवाद

मैट

जैल

गृहलक्ष्मी गपशप

रम जाइए 'कच्...

रम जाइए 'कच्छ के...

गुजरात का कच्छ इन दिनों फिर चर्चा में है और यह चर्चा...

घट-कुम्भ से ...

घट-कुम्भ से कलश...

वैसे तो 'कुम्भ पर्व' का समूचा रूपक ज्योतिष शास्त्र...

संपादक की पसंद

मां सरस्वती ...

मां सरस्वती के प्रसिद्ध...

ज्ञान की देवी के रूप में प्राय: हर भारतीय मां सरस्वती...

लोकगीतों में...

लोकगीतों में बसंत...

लोकगीतों में बसंत का अत्यधिक माहात्म्य है। एक तो बसंत...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription