हुनर और हौंसले से बनाई अपनी पहचान

गृहलक्ष्मी टीम

19th January 2021

देश-दुनिया में कुछ सकारात्मक परिवर्तन की सोच लेकर आने वाली दृढ़ एवं आत्मविश्वासी महिलाओं की कमी नहीं है, जिन्होंने खुद के साथ-साथ दूसरों के जीवन को भी संवारा है।

हुनर और हौंसले से बनाई अपनी पहचान

युवाओं के लिएप्रेरणा स्रोत 

अक्षरा लालवानी (फाइनेंशियल एडवाइजर)

कुछ कर गुज़रने की चाहत के साथ आगे बढ़ी अक्षरा लालवानी ने खुद को हर मकाम पर साबित कर दिखाया है। अपने ख्वाबों को पूर्ण करने की चाहत लिए हुए अक्षरा ने 16 साल की उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। काम सीखने के जुनून की बदौलत उन्होंनें कई अलग-अलग आर्गनाइज़ेशंस में काम किया और तजुर्बा हासिल किया। अक्षरा बचपन से ही कड़ी प्रतिस्पर्धी थीं और आगे बढ़ने के लिए उत्सुक थीं। मुंबई के जय हिंद कॉलेज से अर्थशास्त्र में पढ़ाई करने के बाद अक्षरा एक फाइनेंशियल एडवाइजर और इन्वेस्टमेंट बैंकर बन गईं। वह अपने करियर को सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखना चाहतीं थीं। उनके पास प्रभावी ढंग से संवाद करने की कला है, इसलिए उन्होंने 23 साल की उम्र में एक पीआर फर्म शुरू की और इस तरह कम्युनिकेट इंडिया का जन्म हुआ। बतौर युवा वो जीवन में सभी उंचाइयों को छूना चाहती हैं अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए यंग एंटरप्रीन्योर के तौर पर काम किया। उनका मकसद ऐसी महिलाओं को मंच दिलाना था, जो विवाह के बाद केवल घर संभालने में इस कदर मसरूफ हो जाती हैं कि उन्हे अपने मुस्तकबिल को दोबारा संभालने का वक्त नहीं मिल पाता है। इसके अलावा वो युवाओं को आगे बढ़ाने में भी बेहद मददगार साबित हो रही हैं। हालांकि वो जीवन में कई मुश्किल दौर से भी गुज़री हैं। मगर उनके इरादों में एक इंच भी कमी नहीं आई और वो पहले से भी ज्यादा हिम्मत के साथ आगे बढ़ीं। अक्षरा की जर्नी को आठ साल हो गए हैं अक्षरा का कहना है कि कम्युनिकेट इंडिया एक स्ट्रेटजिक फुल सर्विस फर्म है, जो ग्राहकों के साथ उनके कम्युनिकेशन और मार्केटिंग उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए काम करती है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली एक विविध टीम कॉर्पोरेट, बुनियादी ढांचा, यात्रा और पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाएं, सौर ऊर्जा, सीमेंट, रियल एस्टेट, खाद्य और पेय और अन्य सेवाएं शामिल हैं। वह कहती हैं छोटी कंपनियों से लेकर बड़ी फर्मों तक हम आकार, क्षेत्र या भौगोलिक स्थिति के बावजूद ब्रांड बनाने में मदद करते हैं। कम्युनिकेट इंडिया में 90:10 का अनुपात है। अर्थात 100 में से 90 महिलाएं और 10 पुरुष काम करते हैं क्योंकि अक्षरा का मानना है कि जहां भी संभव हो महिलाओं को योग्यता के मुताबिक अधिकार प्रदान करना चहिए। उनके मुताबिक महिलाएं बहुत स्थिरता, व्यापक दृष्टि और टेबल पर मल्टी टास्किंग क्षमताओं को लाती हैं। इस मसरूफियत भरी जिंदगी  में जहां हर कोई सिर्फ अपने बारे में सोच रहा है वहीं अक्षरा युवाओं और खासतौर से जीवन में कुछ करने की चाहत रखने वाली महिलाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटी हुई हैं। अक्षरा के इन नेक इरादों को हमारा सलाम। 

शिल्पकारों को दिलाई पहचान 

शीला लुंकड़ (आर्किटेक्ट)

'जब आंखों में अरमान लिए, मंजिल को अपना मान लिया। फिर मुश्किल क्या आसान है, जब ठान लिया तो ठान लिया।' ऐसी ही सोच और जज्बे के साथ शीला लुंकड़ पली बढ़ी। पेशे से आर्किटेक्ट  शीला बचपन से ही नई-नई चीजों को बनाने में दिलचस्पी रखती थी और उसी में उन्हें $खुशी मिलती थी। बुलंद इरादों से भरपूर शीला लुंकड़ ने एक प्रोजेक्ट के लिए पारंपरिक बुनकर और दस्तकारों के साथ कार्य किया था। इस प्रोजेक्ट के बाद लोगों ने उनसे आग्रह किया कि वो उन्हीं कलाकारों से अपना काम कराना चाहते हैं जिन्होंने इस प्रोजेक्ट पर काम किया है। उसी वक्त शीला समझ चुकी थीं कि लोग दस्तकारों, शिल्पकारों, बुनकरों द्वारा बनाई वस्तुएं खरीदना चाहते हैं, उनसे काम कराना चाहते हैं, लेकिन उन तक पहुंचना उनके लिए बेहद कठिन होता है। बस इसी का समाधान ढूंढने के लिए उन्होंने अपने स्टार्टअप डायरेक्ट क्रिएट की नींव रखी, जिसका मकसद कलाकारों की कला को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है। इस काम के शुरुआती दौर में उन्हें लोगों से कुछ खास प्रोत्साहन नहीं मिला। मगर फिर भी वो अपने जज्बे और काम करने के जुनून की बदौलत अपनी ख्वाबों को उड़ान भरने के लिए डटी रहीं और अपनी हिम्मत के दम पर आगे बढ़ीं। जी हां, उन्होंने सभी बातों को दरकिनार करते हुए अपने स्टार्टअप को स्थापित करने का कार्य आरंभ कर दिया। उनका मुख्य उद्देश्य कलाकारों को कला से जोड़े रखना था और यह तब ही संभव हो सकता है जब वह अपनी कला से पर्याप्त पैसे कमा पाएंगे। उन्होंने पारंपरिक शिल्प की मांग में कमी के कारणों को समझने की कोशिश की और देखा कि शिल्पकार आज भी उसी डिजाइन में वस्तुओं को बना रहे हैं, जो वो पुराने समय से बनाते आ रहे हैं। शीला ने इसका हल ढूंढ़ा और अपने प्लेटफॉर्म से डिजाइनरों को जोड़ा और उनकी मदद से शिल्पकारों, दस्तकारों और बुनकरों को नए माॢकट ट्रेंड से अवगत कराया। निरंतर प्रयास और कड़ी मेहनत के बलबूते उन्होंने डायरेक्ट क्रिएट से देश के छोटे-छोटे गांव, कस्बों के लगभग 3000 कलाकारों को अभी तक जोड़ा है और उन्हें कमाई के शानदार अवसर के साथ-साथ देश-विदेश में पहचान भी दिलवाई है। डायरेक्ट क्रिएट पर होम और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स बनाने वाले कलाकारों की संख्या अधिक है। सबसे ज्यादा मांग कला से जुड़ी वस्तुओं, परिधान और घर की सजावट के उत्पादों की है। शीला का मकसद डायरेक्ट क्रिएट को ऐसे देशों में भी स्थापित करना है जहां की पारंपरिक शिल्पकारी लुप्त होने के कगार पर है। उनका यह मानना है कि किसी भी नए काम को करने से आपको अनुभव के साथ-साथ वो खुशी भी मिलती है, जिसकी तुलना आप किसी चीज से नहीं कर सकते।

रोशनी की किरण 

अंजू बिष्ट (एनजीओ कार्यकर्ता)

कहते हैं, ज़रूरत आविष्कार की जननी है। अपनी मूलभूत सुविधाओं को पूर्ण करने के लिए तो हर कोई प्रयास करता है मगर जो दूसरों की जरूरतों को पूर्ण करने के लिए प्रयासरत हों, जो दूसरों की आकांक्षाओं को खुद से ज्यादा तवज्जो दे या दूसरों के जीवन को संवारने की कामना करें। ऐसे गिने चुने लोगों की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। उन्हीं लोगों में शुमार है अंजू बिष्ट। इसमें कोई दो राय नहीं कि शहरों में आप आसानी से सभी सुख सुविधाओं को प्राप्त कर सकते हैं। मगर दूर दराज के गांव और कस्बों की जिंदगी शहरों से काफी जुदा है, जहां आप पर्यावरण की गोद में बैठकर सुख सुविधाओं से थोड़ा दूर हो जाते हैं। ऐसे जीवन को आसान बनाने के लिए अंजू बिष्ट ने एक खास मुहिम शुरू की है। अंजू बिष्ट महिलाओं के जीवन को सुखद बनाने की कोशिश में जुटी हुई हैं। अंजू एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती हैं। यूएस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने बतौर इंजीनियर कई जगह नौकरी की और अपने मुस्तिकबिल को संवारा। फिलहाल अंजू 18 साल से केरल में बसी हुई हैं और एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं। वहां सौखयम नाम की एक एनजीओ में बतौर को डायरेक्टर काम कर रही हैं। ये एनजीओ रीयूज़एबल पैड्स बनाने का काम कर रही है। जो गांव में बसी महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रहे हैं। दूर दराज के इलाकों में पैड्स का मिलना तो दूर उसके बारे में सोचना भी संभव लगता है। मगर इसे सौखयम ने अपने प्रयासों से संभव कर दिखाया है। इन पैड्स की खास बात ये है कि इन्हे बनाना फाईबर से तैयार किया जाता है, जो पूरी तरह से वाशएबल है और सालों साल इन पैड्स का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद पैड को सिलने के लिए काटन का कपड़े इस्तेमाल किया जाता है। इस एनजीओ में इस वक्त 32 महिलाएं काम कर रही हैं। साथ ही 11 वालिंटियर्स हैं, जो बाकी सामान की देखरेख करते हैं। अंजू बताती हैं कि उनके सामने जो सबसे पहला प्रश्न था, वो था लो कॉस्ट पैड बनाने का ताकि गांव की औरतें भी उसे इस्तेमाल कर सकें और अपनी हाईजीन का ख्याल रखें। देखते ही देखते पेड़ काटकर पैड बनाने की मुहिम शुरू हो गई। दरअसल, बनाना फाईबर भी सेलुलस फाईबर की तरह ही होता है। ऐसे में बनाना फाईबर से तैयार होने वाले पैड्स सस्ते और रीयूज़एबल हैं। डिमांड के हिसाब से देश के साथ-साथ विदेशों में भी इन पैड्स की सप्लाई की जाती है। एनजीओ ने पैड्स बनाने का काम आरंभ करके कई महिलाओं को रोज़गार भी प्रदान किया है, जो वाकई काबिले तारीफ है। बुलंद हौसलों के साथ आगे बढ़ी अंजू बिष्ट के लिए बस इतना ही कहेंगे कि ऐसे लोग मुद्दतों में पैदा हुआ करते हैं, जो दूसरों के लिए आगे बढ़कर काम करते हैं।

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