शीत युद्ध - गृहलक्ष्मी कहानियां

पूनम पाठक

21st January 2021

जब से वो आई थी, मेरा जीना हराम हो गया था। घर के सभी सदस्यों पर तो जैसे उसने जादू ही कर दिया था। उसको काबू करने की मेरी तमाम कोशिशें नाकाम हो गई थीं, जिससे वो मेरी आंखों में भी चुभने लगी। वैसे भी मेरा उससे कोई खास लगाव का रिश्ता नहीं था, क्योंकि वह मेरे ससुराल से आई थी।

शीत युद्ध  - गृहलक्ष्मी कहानियां

 इस नाते भी हमारा छत्तीस का आंकड़ा ही सही बैठता था। कितनी बार उसे मैंने अपने कड़े तेवर दिखाए थे, पर उसके कान पे तो जैसे जू भी नहीं रेंगती थी। वैसे तो उसे मेरे छोटे जेठ जी लाए थे, अत: उनके सामने तो खासतौर से मुझे बड़ी एहतियात बरतनी पड़ती थी। हां उनकी पीठ फिरते ही उसे मेरे प्रकोप का सामना करना पड़ता था। पर वो भी कम चतुर न थी। उम्र में बहुत छोटी होने के बावजूद वो मुझे बराबरी की टक्कर दिया करती, मेरे साफ-सुथरे घर में जगह-जगह सू-सू करकेउसने मेरी नाक में दम कर दिया था।

एक दिन तो हद ही हो गई। मैंने घर का सभी काम निपटाकर चैन की सांस ली ही थी कि उसने आकर पोट्टी कर दी। मेरे गुस्से का पारावार न था। पतिदेव ऑफिस तथा बच्चे स्कूल गए थे, अत: मैंने जेठ जी की ओर प्रश्नवाचक नजरों से देखा तो वे बड़े ही सहज भाव से मुस्कुराकर बोले, 'बहू अभी ये बहुत छोटी है। धीरे-धीरे सब सीख जाएगी।' मरती क्या न करती, बेमन से उठकर मुझे ही पोट्टी साफ करनी पड़ी।

पिछली कुछ घटनाओं ने जैसे उसकी हिम्मत बढ़ा दी थी। मानो मैं सेर तो वो सवा सेर। कुछ दिनों बाद छोटे जेठ जी की घर वापसी थी। मेरी तमाम कोशिशों के बाद भी मैं जेठ जी के संग उसकी वापसी पक्की न कर पाई, जिसके लिए मैंने अपनी ही कमअक्ली को बहुत कोसा, पर क्या फायदा! फिलहाल तो भाग्य भी उसी का साथ दे रहा था।

मेरी व्यथा का तो जैसे कोई अंत ही न था। एक दिन पड़ोसी के पास सिर्फ पांच-दस मिनट के लिए ही गई थी। घर वापस आकर क्या देखती हूं, मेरा 8000 रुपये का नया मोबाइल (जो कि मेरे पतिदेव ने बड़े ही प्यार से मेरे जन्मदिन के तोहफे के रूप में दिया था) टुकड़े-टुकड़े हो जमीन पर पड़ा है। मेरी गलती बस इतनी ही थी कि उसे मैंने बेड पर छोड़ दिया था। उसकी सिम को भी उसने बुरी तरह चबा डाला था। अपने प्यारे से मोबाइल की ये हालत देखकर मेरा दिल भर आया और मैंने मन ही मन ठान लिया कि अब या तो वो इस घर में रहेगी या फिर मैं। आखिर मैं इस घर की मालकिन थी और वो एक कुतिया... परंतु हे मेरे भगवान!! ये मैंने क्या सोच लिया। उसे कुतिया कहने पर तो सख्त पाबंदी थी। मुझे याद है एक बार गुस्से में मेरे मुंह से कुतिया शब्द निकलने पर मेरे ही बच्चों ने कड़ा एतराज़ जताया था, 'मम्मी वो कुतिया नहीं है, उसका नाम एंजिल है।' और मैं खिसियाकर रह गई थी।

खैर, शाम को पतिदेव के घर आते ही मैंने उनके सामने अपना दांव खेला और खूब नमक-मिर्च लगाकर उनकी चहेती की करतूत बताई। 'अच्छा!!' उन्होंने अपने चश्मे का कांच साफ करते हुए ऐसे कहा कि मैं आश्वस्त हो गई कि अब एंजिल की खैर नहीं। जल्दी से किचन में आकर चाय-नाश्ता तैयार करने लगी। दोनों कानों को कमरे से आने वाली आहट पर लगा दिया। थोड़ी देर बाद चाय लेकर आई तो क्या देखती हूं कि पतिदेव और दोनों बच्चे बड़े ही प्यार से एंजिल के साथ खेलने में मस्त हैं। मुझे देख ये थोड़े सकपकाते हुए बोले, 'मैंने अच्छे से इसकी डांट लगा दी है। अब ये तोड़-फोड़ नहीं करेगी।' मेरे अरमानों पर एक बार फिर से पानी फिर गया। क्या ये वही शख्स है, जो मुझसे ज़रा सा दूध उबल जाने पर भी खरी-खोटी सुनाने से बाज़ नहीं आते, आज एंजिल द्वारा किए गए इतने बड़े नुकसान पर भी शांति से काम ले रहे हैं। न चाहते हुए भी बात हज़म करनी पड़ी।

फिर तो आए दिन हमारे घर में एंजिल द्वारा की गई तबाही के मंज़र नज़र आने लगे। कभी बच्चों की बार्बी का सर-पैर कटा हुआ मिलता तो कभी हमारी चप्पलें, बच्चों की टाई-बेल्ट यहां तक कि इनकी कमीज़ की बांहें, पिलो कवर क्या-क्या नहीं काटा गया जनाब! अब तो लगभग रोज़ ही मुझे ज़ोर का झटका धीरे से लगता है। तब से अभी तक हमारे बीच का ये शीतशुद्ध जारी है। सब-कुछ मेरी नाक के नीचे हो रहा है और मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। अब आप ही मेरे लिए ईश्वर से प्रार्थना कीजिए कि मैं एंजिल के ज़ुल्मों को सहकर भी जि़ंदा रह सकूं।

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