अलजाइमर - गृहलक्ष्मी कहानियां

महेश दर्पण

21st January 2021

काकी एक सौम्य, सशक्त और अनुशासित महिला थीं। जीवन का प्रत्येक चरण उनके अनुशासन से बंधा था, लेकिन समय ने अब उनके पांवों को बेड़ियों में बांध दिया था। फूल चुनती काकी का जीवन समय-चक्र ने कांटो से घिरा हुआ बना था। पढ़िए, यह सहज-सरल, लेकिन मर्मस्पर्शी कहानी-

अलजाइमर  - गृहलक्ष्मी कहानियां

लगा, जैसे वह चादर पर से कुछ उठाना चाहती हों, लेकिन उठा नहीं पा रहीं। यह काम वह इतनी तन्मयता से कर रही थीं कि मेरे वहां पहुंचने की उन्हें भनक तक न लगी। मैं बार-बार एक ही जैसा दृश्य देखकर चकित था, किंतु उनका धैर्य देखने लायक था। हर बार असफल होते ही, वह फिर एक बार दाएं हाथ की चारों अंगुलियां अंगूठे से जोड़तीं और फिर चादर तक बढ़ाकर, उस पर बने फूल को उठा लेना चाहतीं। चादर पर रखा हुआ होता तो शायद वह इस कोशिश में कामयाब हो भी जातीं, लेकिन फूल तो चादर पर छपा हुआ था। जैसे ही वह उसे उठाने की कोशिश करतीं, चादर का एक हस्सा उनकी अंगुलियों की पकड़ में आकर उठ जाता। कुछ देर उठा रहता, लेकिन फिर उनकी अंगुलियों की पकड़ से छूटकर आ गिरता। उसके गिरते ही वह चकित होकर देखती रह जातीं, लेकिन कुछ देर बाद फिर इसी कोशिश में जुट जातीं।

उनकी यह कोशिश लगातार देखी तो मन हुआ कि आगे बढ़ उन्हें रोकूं और समझाऊं कि वे जिस फूल को उठाना चाह रही हैं, वह कभी उनके हाथ में नहीं आ सकता। जैसे ही मैंने इस मंशा के साथ कदम बढ़ाया, जुगनू ने मेरा हाथ पकड़ लिया, 'नहीं दद्दा, अब इन्हें रोकना-टोकना ठीक नहीं। इसी बहाने कम से कम अपना हाथ तो चला रही हैं। किसी भी तरह की हरकत इनके लिए ज़रूरी है।'

यकीन ही नहीं हुआ कि यह वही काकी हैं, जिनके सामने फूल तो क्या पत्थर तक नाचने लगते थे। जिनकी एक हरकत तो क्या, आवाज़ पर ही पूरा का पूरा घर हिल उठता था। मजाल किसी की कि बगैर उनकी इजाज़त के कुछ करने तो लगे!

उनका एक पांव सीधा बंधा हुआ था, जिस पर रॉड पड़ी थी। दूसरा पांव वह कभी मोड़ लेतीं, तो कभी दीवार की तरफ ले जाने की कोशिश करने लगतीं, लेकिन चादर का फूल रह-रह कर उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था।

'अलजाइमर' हां, यही था वह रोग, जिसने उन्हें गिरफ्त में ले लिया था। इसकी खबर पाकर मैं कैसा महसूस कर रहा था, यह बता नहीं सकता। बस, देख रहा था। बीमारी ने उन्हें इस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया था कि वह अपनी सुध-बुध ही खो बैठी थीं। स्मृति जैसे कहीं लोप ही हो गई थी। अतीत और वर्तमान से कटी वे ऐसे समय में जी रही थीं, जो उन्हें उनकी प्रकृति के विपरीत बेचारा बनाए दे रहा था। यह मैं देख नहीं पा रहा था, तभी उनकी नज़र मुझ पर पड़ गई। मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही उन्होंने हाथ जोड़ दिए। मैं, जो आज तक उनके पैर छूता आया था, यह देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। जुगनू नज़रें बचाने लगा, ङ्क्षकतु काकी के शब्दों ने मेरी हैरानगी और बढ़ा दी। 'आप सज्जन बहुत हैं। आते कीजिए रहा...' वह जो कह रही थीं, मैं समझ रहा था, पर यह सा$फ था कि ज़बान पर उनका वह अधिकार नहीं रह गया था। भूल तो वह रही ही थीं, जो सोच रही थीं, वह कह भी नहीं पा रही थीं।

मैं समझ रहा था कि दूसरों की तरह वह मुझे भी भूल चुकी हैं। मैं, जो उनकी शादी में एक छोटे बच्चे की तरह शरीक हुआ था, जिसे शादी के तुरंत बाद से ही उन्होंने बरसों अपने बच्चे की तरह पाला था, उनका जितना प्रेम मुझे मिला था, शायद ही उनके बच्चों को नसीब हुआ हो। यह यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि मुझे पहचान नहीं रही हैं। हाथ जोड़कर जिस तरह उन्होंने मुझसे आते रहने का आग्रह किया, उसे सुनकर तो मैं जमीन में ही गड़ गया था, लेकिन फिर किसी तरह अपने आंसुओं को ज़ब्त करता मैं उनके करीब जाकर बैठ गया। खामोश बैठा मैं देख रहा था काकी की हथेलियां, जिन्हें वे थोड़ी-थोड़ी देर बाद मिलाकर अपनी आंखों के करीब ले जातीं और फिर देर तक देखती रहतीं।

काकी मायके से जोशी थीं। याद आया, एक बार मैंने उनसे पूछा तो था, 'काकी, आप शादी के बाद अचानक पंत हो गईं अजीब सा तो लगता होगा!'

याद है, काकी की वह हल्की-सी चपत, जो उस रोज़ मेरी गुद्दी पर पड़ी थी। काकी जैसे बहुत पीछे जा पहुंची थीं 'अरे गनुआ, तुझे ये अचानक क्या सूझी रे! चल, इधर आ। बताती हूं।'

अतीत कभी-कभी कैसा फिल्म-सा उतर आता है हमारे सामने! मैं ऐसी फिल्म का एक टुकड़ा देख रहा हूं। काकी बता रही हैं, 'ठीक कह रहा है रे तू। पहले मैं जोशी ही थी। जोशी बहुत पहले हुआ करते थे ज्योतिषी। मेरे  दादा ज्योतिषी थे। रेखाएं देखकर भविष्य बताने वाले हुए। बड़ी ख्याति थी उनकी। किसी का भविष्य बताना आसान काम हुआ क्या। सच बोलना पड़ता है इस काम में। पूछने वाले से कुछ भी छिपाना गलत हो जाने वाला हुआ। और कहीं कुछ गलत बता दिया मन रखने के लिए, तो फिर समझ लो, गई तुम्हारी सारी ज्योतिष विद्या, इसीलिए दादा जी कभी-कभी खामोश रह जाने वाले हुए। बहुत पूछने पर ही फिर बोल फूटते थे उनके, 'क्या बोलूं रे, कुछ हो भी तो रेखाओं में तेरी...'

काकी अपने बालपन में लौट जातीं तो उनकी स्मृतियां जैसे खिल उठतीं। एक रोज़ बताया था उन्होंने, 'एक दिन हेमा ने उनसे अपना भविष्य पूछने को हथेली फैला दी थी। एकदम चुप ही लगा गए कहा। जब बहुत देर तक दादा जी कुछ न बोले तो मुझसे न रहा गया, 'अरे बड़बाजूए कुछ बताओ तो सही। कितनी देर से हेमा हथेली फैलाए बैठी है!' तब कहीं होंठ हिले उनके, 'क्या बोलूं रे...?' बस, तभी मैं समझ गई कि क्या चल रहा है उनके भीतर।

तभी अचानक वह दृश्य जाने कहां बिला गया। मुझे अपने बचपन के वे दिन याद आने लगे, जब मैं काकी के साथ रहा करता था। काकी ही हुईं, काका तो सुबह के गए फिर रात को ही लौटा करते थे घर। काकी ने जो हथेलियां इस वक्त फैला रखी थीं आंखों के सामने, उन्हीं से जाने कितनी बार चपतियाया गया होऊंगा। काकी की बुढ़ा गई हथेलियां देखकर मैं सोच रहा था, जाने काकी को और क्या-क्या भोगना बदा है। तभी एक जिज्ञासा यह सर उठाने लगी कि जाने क्या कह रही होंगी उनकी हस्तरेखाएं। क्या इस उम्र में आकर भी अपना भविष्य देखने की इच्छा शेष रह जाती होगी!

उम्र तो खैर काकी की बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन काका के जल्द ही गुज़र जाने के कारण वह परिवार के बीच रहकर भी खुद को अकेला महसूस करने लगी थीं। रही-सही कसर पूरी कर दी थी उनके पैर की हड्डी ने। जाने कैसे उस रोज़ काकी खुद को संभाल न सकीं। दो सीढ़ी एक-साथ उतर जाने की वजह से पैर मुड़ गया और वे गिर पड़ीं। हड्डी भी ऐसी टूटी कि रॉड लगाने के साथ ही ट्रैक्शन की नौबत भी आ पहुंची। पैर को वह हिला न पाएं, इसलिए स्टील का फ्रेम लगाकर पैर कस दिया गया। कुछ रोज़ तो काकी उसे बर्दाश्त करती रहीं, लेकिन फिर चिड़चिड़ाने लगीं। हरदम उनकी यही कोशिश बनी रहती कि उसे खोल-खालकर फेंक दें, लेकिन कहां काकी के कमजोर पड़ गए हाथ और कहां वह मजबूती से कसा फ्रेम! अब वह इसी जद्दोजेहद से मुक्त हो जाने की घड़ी जानना चाहती हैं शायद। इसी कोशिश में वे बार-बार अपनी हथेलियां आंखों के करीब कर लेती हैं। इसके अतिरिक्त जैसे उन्हें और किसी चीज़ की कोई परवाह नहीं। भान भी है या नहीं है, कह पाना मुश्किल है। क्या महज़ तीन बरसों में किसी की दुनिया इस कदर बदल सकती है! दिल्ली आ पाना  पूरे तीन साल बाद संभव हुआ था। मैं अभी सोच ही रहा था कि काकी ने मेरी तरफ देखते हुए जुगनू से पूछा, 'अरे देख तो ज़रा, ये कौन आ खड़ा हुआ है यहां।'

जुगनू बेचारा उन्हें क्या जवाब देता! उसने मेरी तरफ भरी आंखों से देखा और बोला, 'दद्दा अब चलते हैं। इन्हें ज्यादा देर इस तरह देखता हूं तो मुझे जाने क्या होने लगता है। अभी रमा कुछ खिलाने को आएगी, तब तो आप देख भी नहीं पाएंगे।'

ष्रमाए रमा कौन?'

'अरे दद्दा, आप भूलने लगे हैं क्या। शादी के बाद  मेरी पत्नी कमला का नाम बदल कर रमा रख दिया था न।'

मैंने जुगनू को इतना टूटा हुआ इससे पहले कभी नहीं देखा था। यह वही जुगनू था, जिसे मैंने काकी से हज़ार बार पिटते देखा होगा। तब वह बच्चा हुआ करता था। अब लग रहा है काकी उस स्थिति में आ गई हैं। काकी की स्थिति तो और विचित्र हो चली थी। रमा ने पिछले दिनों मेरी पत्नी को फोन पर बताया भी था। 'भाभी, न खामोश रहते बनता है और न कुछ कहते। आपसे क्या छिपाना, इजा अब सब भूलने लगी हैं। एक दिन तो दोपहर डेड़ बजे कहने लगीं, ब्वारिए आज खाना नहीं देगी क्या?' जबकि खाना तो वह सवा बारह बजे ही खा चुकी थीं। मुश्किल यह है न कि उन्हें फिर से कुछ खाने को ऐसे में दे देती हूं तो पेट चलने का खतरा रहता है। आप तो जानती ही हैं, सब कुछ तो बेड पर ही होने वाला हुआ उनका। लेकिन दिक्कत ये ठहरी कि न दो तो खुद को ही बुरा लगने लगता है। भगवान किसी-किसी को इतना कष्ट क्यों देता होगा भाभी...' बात करते-करते रमा रुआंसी हो आई थी।

जुगनू मुझे और मैं जुगनू को देखते हुए काकी के कमरे से बाहर निकलने लगे तो मैंने गौर किया कि काकी फिर से चादर पर बने फूल उठाने की कोशिश में जुट गई थीं। फूलों से काकी को बड़ा लगाव था। वे रोज़ कुछ फूल तोड़ कर ले आतीं और कुछ को गुलदान में लगाकर बाकी पूजा के लिए रख देतीं। जुगनू बता रहा है, 'जब से इनकी यह हालत हो गई है, गुलदान इधर-उधर पड़े रहते हैं। हुए तो पूजा में फूल चढ़ा दिए जाते हैं और न हुए तो पहले जैसा कोई नियम जो क्या रह गया है अब। अब तो...'

जुगनू का लटक गया वाक्य बता रहा है कि सब उलट-पुलट गया है अब।

'दद्दा आप भोजन कर लेते, अपकी ट्रेन का टाइम हुआ चाहता है।' मेरे मुंह से जवाब में 'हूं-हां' जैसा कुछ निकला। दरअसल, जुगनू मुझे काकी से दूर कहीं भोजन कराना चाहता था, लेकिन मेरा मन काकी में ही अटका पड़ा था। तभी रमा दौड़ती हुई आई, 'अरे दद्दा, काकी कह रही हैं, 'वह सज्जन कहां गए, जो अभी मुझसे मिलने आए थे? मिलट भर में ही शकल दिखाकर चलते बने...'

मुझे लगा, हो न हो काकी की स्मृतियों में शायद मेरे लिए भी कोई जगह निकल आई है। मैं और जुगनू फौरन काकी के कमरे की तरफ दौड़े। काकी पलंग के सिरहाने पीठ टिकाए, आंखें बंद किए बैठी थीं। उनके दाएं हाथ की अंगुलियों में चादर का फूल वाला हिस्सा

अटका हुआ था। दूर कहीं देखती हुईं वे कुछ सोच रही थीं।

उन्हें देख, मैं इस सोच में पड़ गया कि क्या अलजाइमर का मरीज़ सोच भी नहीं सकता! तभी काकी बेहद मद्धम आवाज़ में बोलीं, 'क्यों रे तू तो भूल ही गया मुझे...' इस वक्त उनकी आंखों से आंखें मिला पाना मुश्किल हो गया। लेकिन ये पल भर की बात रही होगी। काकी फिर अपने फूल वाले खेल में उलझ गई थीं।

खाना खाते वक्त जुगनू बता रहा था, 'दद्दा, पिछले तीन महीने में यह पहला मौका है, जब उन्होंने किसी को पहचानने की कोशिश की है। ज़रूरी नहीं कि ये आपको पहचान ही रही हों। कभी-कभी तो मुझसे ही कहने लगती हैं, 'तू रोज़-रोज़ यहां क्यों आ जाता है रे!'

थोड़ी देर बाद मैं चलने को हुआ तो जुगनू कहने लगाए 'दद्दा, आप आते रहेंगे तो शायद इनकी याद्दाश्त लौट आए...' जुगनू के कंधे पर हाथ रखने के अलावा मैं कुछ न कर सका।

यह भी पढ़ें -अगले जन्म मोहे बेटी ही कीजो - गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji  

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

बौनापन - गृह...

बौनापन - गृहलक्ष्मी कहानियां

सवालों के दा...

सवालों के दायरे में जिंदगी - गृहलक्ष्मी...

एक तरफ उसका ...

एक तरफ उसका घर - गृहलक्ष्मी कहानियां

घिसटती जिन्द...

घिसटती जिन्दगी - गृहलक्ष्मी कहानियां

पोल

आपको कैसी लिपस्टिक पसंद है

वोट करने क लिए धन्यवाद

मैट

जैल

गृहलक्ष्मी गपशप

रम जाइए 'कच्...

रम जाइए 'कच्छ के...

गुजरात का कच्छ इन दिनों फिर चर्चा में है और यह चर्चा...

घट-कुम्भ से ...

घट-कुम्भ से कलश...

वैसे तो 'कुम्भ पर्व' का समूचा रूपक ज्योतिष शास्त्र...

संपादक की पसंद

मां सरस्वती ...

मां सरस्वती के प्रसिद्ध...

ज्ञान की देवी के रूप में प्राय: हर भारतीय मां सरस्वती...

लोकगीतों में...

लोकगीतों में बसंत...

लोकगीतों में बसंत का अत्यधिक माहात्म्य है। एक तो बसंत...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription