सबूत - गृहलक्ष्मी कहानियां

डॉ. के. रानी

21st January 2021

प्रिया और नवल की शादी को पूरे पांच बरस हो गये थे। वे अपने पारिवारिक जीवन से बहुत खुश थे। काम की अधिकता और जीवन का आनंद उठाने के लिये शादी के शुरुआती दो बरस तक तो उन्होंने परिवार बढ़ाने के बारे में सोचा तक नहीं। अपनी सास माया के दबाव के आगे प्रिया इस बारे में सोचने के लिये मजबूर हो गयी।

सबूत  - गृहलक्ष्मी कहानियां

'नवल, मम्मी पूछ रही थी कि मुझे दादी कब बना रही हो?'

'तो तुमने क्या कहा?'

'सच बता दिया कि अभी हमने इस बारे में सोचना शुरू नहीं किया हैं। सुनकर वे नाराज हो गयी थीं। अब हमें भी कुछ सोचना पड़ेगा नवल।'

'इसमें सोचना क्या है?' नवल बोले।

'नौकरी और बच्चे के साथ घर परिवार के जिम्मेदारी बढ़ जायेगी।'

'जिसे दादी बनने का शौक है वही बच्चे भी खिलाएगा।' नवल मजाकिये लहजे में बोला तो प्रिया का तनाव दूर हो गया। दोनों ने उसी समय परिवार बढ़ाने का निर्णय लिया। वक्त बीता पर माया की इच्छा पूरी न हो सकी। हारकर प्रिया डॉक्टर के पास गयी तो पहले उन्होंने ढेर सारे टेस्ट करवाए और बोली-

'अभी एक साल तक कोई उम्मीद मत रखना प्रिया। पहले तुम्हारा इलाज होगा तभी तुम मां बन सकोगी।'

यह सुनकर प्रिया को बहुत बुरा लगा। ऊपर से सास का सारा गुस्सा उसी पर उतरा। माया बोली- 'मुझे तो पहले ही शक था। आज डॉक्टर ने भी यह बात साबित कर दी। पता नहीं मुझे पोते का मुंह देखने के लिये कितना और तरसना होगा?'

'मम्मी थोड़ा सब्र रखो, सब ठीक हो जायेगा।' नवल बोला।

'क्या खाक सब्र रखूं? पांच साल तो बीत गये। एक साल तक अभी इलाज चलेगा। उसके बाद भी क्या भरोसा? शायद मेरे कर्म ही खराब थे जो यह दिन देखना पड़ रहा है।'

'आप अपने को मत कोसिये मम्मीजी। कमी मुझ में हैं, मैं डॉक्टर के कहे अनुसार दवाई लूंगी तो जल्दी ही खुशखबरी आ आयेगी हमारे घर में।' प्रिया बोली। मम्मी के उखड़े मूड को देखकर वे दोनो वहां से सरक गये। डॉक्टर की बात से प्रिया पहले ही दु:खी थी ऊपर से सास की जली-कटी बातें जले पर नमक छिड़क रहीं थी।

'प्रिया, मम्मी की बात का बुरा मत मानना। तुम जानती हो उनकी सारी उम्मीदें हम पर लगी रहती हैं। ऐसे में वे कुछ कह भी दें तो उसे गंभीरता से न लेना।' नवल बोला। उसकी बात से प्रिया थोड़ा अश्वस्त हो गयी थीं। उसने सिर हिलाकर अपना समर्थन पति को जतला दिया था। भीतर से वे दोनों ही दुखी थे।

साल भर के इलाज के बाद डॉक्टर प्रिया से संतुष्ट थी। तीन माह बीत जाने पर सब कुछ ठीक होते हुए भी उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आयी तो वे बोली- 'प्रिया अब मुझे नवल के भी टेस्ट करने होंगे। तुम उसे भी यहीं बुला लो।'

'हम दोनो एक दो दिन में आ जायेंगे मैडम।' प्रिया तुरन्त बोली। वह जानती थी नवल इस मामले में थोड़ा संवेदनशील है। अत: माहौल बनाकर ही उनसे बात करनी होगी। शाम को प्रिया ने नवल को डॉक्टर की कही बात बता दी।

'ये क्या मजाक है? पहले डॉक्टर ने कहा तुममें कमी है। अब मुझ पर भी शक कर रही है।'

'आखिर टेस्ट कराने में बुराई भी क्या है? डॉक्टर का शक दूर हो जायेगा। प्लीज चलोगे न कल मेरे साथ।'

'मैं अकेले ही चला जाऊंगा।' नवल बोला था। दूूसरे दिन नवल बुझे मन से जांच के लिये चला गया। नवल की रिर्पोट भी निराशाजनक थीं। उसे यह बात डॉक्टर ने स्पष्ट कर दी थी।

'नवल तुम्हारी स्पर्म काउटिंग भी सामान्य से कहीं कम है। मेरी राय है कि तुम्हें भी कुछ महीने तक दवाईयां लेनी पड़ेंगी।'

'जी, ठीक है।' कहकर नवल ने वहां से विदा ली। उसकी बात सुनकर नवल का मूड़ बड़ा उखड़ा हुआ था। उसकी शक्ल देखकर ही प्रिया समझ गयी थी कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है। प्रिया के पूछने से पहले ही नवल बोल पडा, 'डॉक्टर के चक्कर में पड़ो तो वे भी मरीज को छोड़ना नहीं चाहते।'

'क्या कहा डॉक्टर ने?' उत्तर में नवल ने अपनी रिर्पोट थमा दी। थोड़ी देर तक वह भी सकते में आ गयी फिर अपने को संयत करके बोली, 'थोड़े दिन दवाई खाने में क्या हर्ज है? मैं भी खा रही हूं, डेढ़ साल से।'

'क्या कह रही हो तुम? तुम औरत हो और मैं मर्द। जो भी सुनेगा क्या समझेगा मेरे बारे में?' नवल बोला। पहली बार नवल के मुंह से औरत मर्द में भेद की बात सुनकर प्रिया को बुरा लगा। उसे नवल से यह उम्मीद नहीं थी। फिर भी बात संभालते हुए वह ऊपर से बोली, 'कोई सुनेगा क्यों? यह बात तुम मैं और डॉक्टर जानते हैं, चौथा कोई नहीं।'

'मुझे नहीं पड़ना इस झमेलेे में। तुम्हें ठीक नहीं कर पा रही है तो उसने यह नई बात छेड़ दी है।' नवल अभी तक उखड़ा हुआ था। नवल के इस नये रूप से प्रिया भौचक्की थी। बहुत मनाने पर नवल दवाई लेने के लिये तैयार हो गया था।

और एक साल ऐसे ही बीत गय॥ नवल नेे दवाई का कोई प्रभाव न देखकर दवाई लेनी छोड़ दी। इस बार प्रिया ने कोई प्रतिकार नहीं किया। वह भली भांति जानती थी कि हर पति पुरुष भी होता है। उसके पौरुष को कोई चुनौती दे तो वह कभी सहन नही कर सकता। जो बात प्रिया ने बड़ी सहजता से स्वीकार कर इलाज कराया था वही बात नवल पचा नहीं पा रहा था।

प्रिया में अब कोई कमी नहीं थी पर डॉक्टर की सलाह पर अभी भी वह कुछ विटामिन और अन्य गोलियां ले रही थी। नवल के रूख को देखते हुये प्रिया ने उससे कुछ नहीं कहा और अपने भविष्य को भगवान के आसरे पर छोड़ दिया।

एक दिन अचानक प्रिया को उबकाईयां आने लगी। उसने डॉक्टर से जांच करायी तो उसने प्रिया को चौका दिया- 'बधाई हो प्रिया, तुम्हारी वर्षों की इच्छा पूरी होने जा रही है।"

'ये क्या कह रही हैं आप?'

'मैं सच कह रही हूं, तुम्हारा टेस्ट पॉजिटिव है। तुम प्रेगनेंट हो। भगवान करे आगे सब कुछ ठीक ठाक रहे और तुम एक सुंदर स्वस्थ बच्चे को जन्म दो।'

'मुझे अभी तक विश्वास नहीं हो रहा डॉक्टरण।'

'ऐसा ही होता है प्रिया जब अचानक मन की मुराद पूरी होती है।'

यह खबर सुनकर प्रिया के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उसने फोन पर यह खुशखबरी तुरन्त नवल को दी। उसने प्रिया को बधाई तो दी पर उसके आवाज का ठंडापन प्रिया साफ महसूस कर रही थी। शाम तक प्रिया बड़ी बैचैन थी। नवल से बात कर वह अपनी खुशियां उसके साथ बांटना चाहती थी। नवल के आते ही प्रिया उससे लिपट गयी।

'मुझे अभी तक विश्वास नहीं आ रहा है नवल।'

'इसमें अविश्वास की कौन सी बात है? अभी तुम जवान हो।'

'और तुम भी तो अभी जवान हो।' प्रिया चहकी।

प्रिया आज आने वाले मेहमान को लेकर नवल से ढेरों बाते करना चाहती थी लेकिन नवल को इसमें ज्यादा रस नहीं आ रहा था। उसने बातों का रूख दूसरी ओर मोड़ दिया।

'मिस्टर चोपड़ा कैसे हैं?'

'अच्छे हैं। अचानक तुम्हें उनकी याद कैसे आ गयी?'

'तुम्हारी इस हालत सेें सबसे अधिक तकलीफ तुम्हारे बॉस ही को तो होगी।'

'ठीक कहते हो। मैंने अभी इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं।' प्रिया बोली। नवल ने अखबार खोल दिया। उसे पढ़ने के बहाने वह लगातार प्रिया के साथ बातें करने से बचता रहा। प्रिया अपने बच्चे की कल्पनाओं में डूबी थी। अचानक उसे वह सब मिल गया था जिसकी उसने आस ही छोड़ दी थी। आज उसे अपने अलावा कुछ भी नहीं सूझ रहा था। वह सोचने लगी आज यदि उसकी सासजी जिंदा होती तो कितनी खुश होती। पिछले साल पोते की आस मन में लिये वह इस दुनिया से चली गयी थी।

भविष्य की कल्पनाओं में डूबी प्रिया को कब नींद आ गयी पता न चला। सुबह से वह फिर अपने काम में व्यस्त हो गयी। कुछ देर बाद वे दोनो ऑफिस चले गये। शाम को भी नवल ने अपने घर आने वाले नये मेहमान के प्रति कोई जिज्ञासा नहीं दिखाई। पुरुष के मन को न समझ पाने के कारण प्रिया भी इस विषय में चुप ही रही। वह अपनी सारी बातें ऑफिस में अपनी सहेली आशा से बांट लेती।

तीन महीने बीत गये। प्रिया महसूस कर रही थी कि नवल दिन प्रति दिन गुमसुम होते जा रहे थे। घर पर वह प्रिया से उतनी ही बात करते जितनी बहुत जरूरी होती। प्रिया इसका कारण नहीं समझ पा रही थी। परेशान होकर उसने इस बारे में नवल के दोस्त अशोक से बात की।

'मुझे समझ नहीं आ रहा है नवल को क्या हो गया है?'

'यही मैं तुमसे पूछने वाला था भाभी।'

'पिछले तीन महीने से उनका व्यवहार एकदम बदल गया है।'

'घर पर कुछ अनबन तो नहीं हुयी या फिर कोई बाहर का आदमी तुम्हारे बीच में तो नहीं आ गया?'

'नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। हां बाहर से तो नहीं पर घर में नया मेहमान आने वाला है।'

'सच भाभी, यह तो खुशखबरी है।' अशोक बोला।

'पर पता नहीं क्यों नवल की इस हालत के कारण मुझे अजीब सा लगता है। उसे बच्चे के आने की कोई खुशी नहीं है।'

'भाभी तुम चिंता मत करो, मैं उसे समझाउंगा। यह खबर सुनकर मन खुश हो गया।' कहकर अशोक चला गया। प्रिया के ऑफिस में भी यह बात फैल गयी थी कि प्रिया मां बनने वाली है। प्रिया के बॉस मिस्टर चोपड़ा उसका विशेष ध्यान रखते। कभी उसे घर तक छोड़ देते। अगले दिन अशोक और नवल की भेंट हो गयी। अशोक उसी का इंतजार कर रहा था।

'क्या बात है नवल, बड़े चुप और उदास से दिख रहे हो।'

'ऐसी कोई बात नहीं है।'

'चलो थोड़ी देर बाहर घूमने चलते हैं। बहुत दिन हुये हमने किसी रेस्त्रां में साथ-साथ चाय तक नहीं पी।' अशोक बोला।

'फिर कभी चलेंगे अशोक।' नवल ने उसे टालने के लिये कहा।

'फिर नहीं आज और अभी।'

'आज कोई खास बात है?' नवल ने पूछा।

'हां, चलो चलते हैं।'

बड़े बुझे मन से नवल अशोक के साथ चल पड़ा। बात अशोक ने ही छेड़ी।

'बधाई हो नवल। तुम पापा बनने वाले हो।'

'तुम्हें किसने बताया?'

'ऐसी खुशखबरी कहीं छुपती है? मुझे जैसे ही पता चला तुरन्त यहां आ गया। तुमने यह बात मुझसे छुपाई क्यों?'

'बता भी देता तो क्या फर्क पड़ जाता?'

'यह तुम क्या कह रहे हो? तुम्हे शादी के पूरे सात वर्ष बाद यह खुशी नसीब हुयी है। खुशकिस्मत हो तुम नवल जो यह शुभ दिन देखने को मिल रहा है।'

'खुशकिस्मत तो प्रिया है, जो मां बनने के सपने को हकीकत बदलते देख रही है। बाप का क्या है?'

'ये कैसी बात कर रहे हो तुम? प्रिया तुम्हारी पत्नी है और तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली है। ऐसे समय तुम्हें खुद खुश रहकर उसे भी खुश रखना होगा नवल।'

'वह तो मां बनने की खुशी में बहुत उत्साहित है। मेरी खुशी से उसे क्या फर्क पड़ता है?'

'तुम पर ईश्वर की मेहरबानी है नवल जो तुम्हें ऐसी पत्नी मिली है। कोई और होता तो इस वक्त तुम्हारे रूखे व्यवहार से अवसाद में घिर सकता है।'

'तुम्हें कैसे पता कि मेरा व्यवहार रूखा है?' नवल ने पूछा तो क्षणभर को अशोक डगमगा गया पर फिर संभलकर बोला-

'तुम्हारी बातें सुनकर कोई भी यह बात कह सकता है। मैं तुम्हारा बचपन का दोस्त हूं, क्या होता जा रहा है तुम्हें? कोई परेशानी है तो मुझसे कहो।'

'ऐसी कोई परेशानी नहीं है। सब प्रिया के बारे में ही सोचते हैं। घर, बाहर, ऑफिस और मेरे दोस्त भी। किस्मत वाली है प्रिया।'

'प्रिया की किस्मत तुम्हारे साथ जुड़ी है। वह अकेले क्या कर सकती है?' अशोक बोला।

'तुम कहना क्या चाहते हो?'

'यही कि ऐसे समय में पत्नी का संबल बनो। उसे खुश रखो ताकि आने वाला मेहमान भी स्वस्थ हो।'

'और कुछ कहना है तुम्हें इस बारे में।'

'नहीं।'

'तो कुछ और बात करो। सभी औरतें मां बनती हैं चाहे जैसे भी बनी हो। पता नहीं तुम इस बात को क्यों तूल दे रहे हो?'

अशोक को समझते देर न लगी कि नवल को प्रिया के चरित्र पर शक है। शायद उसे उम्मीद न थी कि वे कभी मां-बाप बन सकेंगे। तभी तो हकीकत को सामने देखकर भी वह स्वीकार करने के लिये तैयार न था। अशोक असमंजस में था कि वह यह बात प्रिया को कैसे बताए?

शाम को नवल देर से घर लौटा। प्रिया ने पूछा-

'आज बड़ी देर कर दी।'

'अशोक के साथ था।' नवल बोला तो प्रिया थोड़ी आश्वस्त हुयी। अगले दिन ऑफिस पहुंचते ही प्रिया ने अशोक को फोन मिलाया।

'प्रिया बोल रही हूं। कल नवल से तुम्हारी बात हुयी थी?'

'हां, हमने काफी समय एक साथ बिताया।'

'कुछ पता चला?'

'मुझे लगता है कि उसे कुछ गलतफहमी हो गयी है।'

'किस बारे में?'

'यह तो तुम्हें ही पता करना होगा भाभी। दरअसल मैं पूछ नहीं सका। असल में मैं इस बारे मे ज्यादा पूछकर कोई मर्यादा नहीं लांघना चाहता था।'

प्रिया को समझने में देर न लगी कि अशोक क्या कहना चाहता है। थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करके प्रिया ने बात खत्म कर दी। प्रिया को नवल से सपने में भी ऐसी उम्मीद न थी। बहुत सोच विचार कर प्रिया इस नतीजे पर पहुंची कि नवल की सोच संकीर्ण जरूर है पर अविश्वसनीय नहीं। डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार नवल में भी कमी थी जिसे दवा के सेवन से दूर किया जा सकता था। संतान की आस छोड़कर नवल ने दवाई से किनारा कर लिया था। ऐसे में बच्चे की संभावना ने शायद नवल को कहीं बहुत गहरे आहत कर दिया था। हो सकता है उसे प्रिया के चरित्र पर शक हो।

'हां, यही बात होगी तभी वह मुझसे कुछ न कहकर अंदर ही अंदर घुट रहे हैं।' प्रिया के मन में हूक उठी। दिनभर वह उधेड़बुन में रही। आखिर में उसने निश्चय कर लिया कि आज वह किसी निष्कर्ष पर पहुंचकर रहेगी। शाम को नवल के घर आते ही प्रिया ने इच्छा जताई।

'डॉक्टर ने कहा है कि मुझे सुबह-शाम टहलना चाहिये। सुबह तो हम दोनो को जरा भी फुर्सत नहीं होती। मैं शाम को ही टहलने जाऊंगी।'

'जैसी तुम्हारी इच्छा।'

'तुम भी तो चलोगे ना मेरे साथ। मैं अकेले-अकेले बोर हो जाऊंगी।' प्रिया बोली।

'नहीं। मैं नहीं आ सकता।'

'प्लीज मेरी खातिर आज तो चलो।'

'मैं इस समय बहुत थका हुआ हूं प्रिया।'

'देख रही हूं तुम्हें मुझमें और हमारी होने वाली संतान में कोई दिलचस्पी नहीं है।' प्रिया नाराज होते हुए बोली।

'मुझे दिलचस्पी हो न हो इससे क्या फर्क पड़ता है? औरों को तो है तुममें दिलचस्पी।'

'ताना मारने के बजाए साफ-साफ बताओं तुम कहना क्या चाहते हो?' प्रिया बोली।

'यह मुझसे अच्छी तरह तुम जानती हो। फिर भी अंजान बन रही हो।'

'अंजान तो तुम बने गये हो मेरे लिये। लगता है साथ जीने-मरने के कसमें सब बेमानी हो गयी है। इतनी जल्दी भरोसा उठ गया तुम्हारा मुझसे।'

'हाथ कंगन को आरसी क्या? सब कुछ देखकर भी चुपचाप सहन कर रहा हूं मैं।'

'मैंने कोई पाप नहीं किया है। हमेशा पत्नी का फर्ज निभाया है और अब जब मुझे तुम्हारे सहारे की जरूरत है तब तुम मुझसे मुंह फेर रहे हो।'

'तुम्हारी वफा का परिणाम तुम्हारी कोख में फल-फूल रहा है प्रिया। इससे अधिक और क्या सबूत हो सकता है?'

'इसके ऊपर भी कोई सबूत है नवल। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। मैं तुम्हेें अपनी वफादारी का सबूत दूंगी। इसके लिये तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।'

'कहां?'

'डॉक्टर के पास, शायद तब तुम्हें विश्वास हो जाए।' प्रिया बोली तो नवल ने कोई उत्तर नहीं दिया। प्रिया ने उसकी चुप्पी को स्वीकृति मान लिया और अगले ही दिन वह डॉक्टर से मिलने पहुंच गयी। सारी बातें सुनकर वह बोली-

'क्या इस सबके बाद तुम्हारी गृहस्थी पहले की तरह चल सकेगी?'

'बिल्कुल चलेगी डॉक्टर। शक की सुई मुझ पर है। जब मेरे मन में कोई खोट नहीं है तो फिर कैसी शिकायत? जो कुछ नवल भोग रहा है अगर उसकी जगह मैं होती तो मेरी भी यही हालत हो सकती थी। आपने नवल की रिर्पोट पढ़ी है। उसके बाद भी मेरा सामान्य तरीके से प्रेगनेंट होना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इस चमत्कार को एक पुरुष का मन स्वीकार नहीं कर पा रहा है। उसे सबूत देना जरूरी है डॉक्टर।'

'बहुत बड़ा दिल है तुम्हारा प्रिया।'

'हमने साथ जीने-मरने की कसमें खायी थी। नवल का आत्मविश्वास डगमगा रहा है। उसे सहारा देना मेरा फर्ज है।' प्रिया बोली।

डॉक्टर ने एक हफ्ते बाद की तारीख टेस्ट के लिये दे दी थी। बस नवल को राजी करना बाकी था। बात प्रिया ने ही छेड़ी थी।

'तुम्हें डॉक्टर ने बुलाया है।'

'किसलिये?'

'टेस्ट के लिये।'

'अब क्या कसर रह गयी है? दुनिया की नजर में कोई कमी नहीं है मुझमे। मां बनने वाली हो तुम।'

'इसी बात की तो पुष्टि करनी है।' प्रिया बोली।

'इसके लिये बहुत देर हो गयी है।'

'नहीं अभी भी वक्त बाकी है। तुम्हें मेरी और बच्चे की खातिर आज डॉक्टर के पास जाना होगा नवल।' प्रिया बोली। इस बार नवल ने कोई प्रतिकार नहीं किया। डॉक्टर के पास जाकर थोड़ी देर मे जांच पूरी हो गयी।

रिपोर्ट एक हफ्तेे बाद आनी थी। प्रिया ने जानबूझकर नवल को ही उसे लाने भेजा था। वह उस समय बुरी तरह चौंक गया जब उसके हाथों मे डीएनए रिपोर्ट आयी। उसे पढ़कर नवल की आंखे फैली रह गयी। शक की कोई गुंजाइश न थी। प्रिया के मन से भी आज बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। शाम को नवल ऑफिस से लौटा तो बड़ा आश्वस्त लग रहा था। उसका खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया था। वह आज प्रिया को आग्रह कर वह अपने साथ घूमाने के लिये ले गया। दोनो चुपचाप चल रहे थे। प्रिया ने अपने अंदर उठने वाले प्रश्नों को पहले ही दबा दिया था। पति के दर्द को कम करके वह अपने को भी बड़ा हल्का महसूस कर रही थी।

नवल बोला, 'तुमने यह सब क्यों किया? मुझे बताया तक नहीं। मैं तो समझा कि यह बच्चे के लिये कोई टैस्ट है।'

'क्या करती? तुम अंदर ही अंदर घुटते जा रहे थे। इसके कारण न तुम खुलकर जी पा रहे थे और न मैं।'

'दुनिया क्या कहेगी?'

'मुझे दुनिया की नहीं तुम्हारी नजरों की फिक्र है नवल। मुझे दुनिया की नजरों से उतरना मंजूर है, पर तुम्हारी नजरों से गिरना मैं झेल नहीं पा रही थी।' प्रिया बोली तो नवल निरुत्तर हो गया। उसे आज अपने व्यवहार और पत्नी पर अविश्वास के कारण खुद पर बहुत ग्लानि हो रही थी।

मां बनने के सुखद एहसास को जहां प्रिया कई महीनो से महसूस कर रही थी वहीं पिता बनने का गर्व एवं जिम्मेदारी का अहसास आज पहली बार नवल के चेहरे एवं चाल-ढाल से परिलक्षित हो रहा था।

यह भी पढ़ें -भरवां बैंगन का साहित्य में योगदान - गृहलक्ष्मी कहानियां

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