बलात्कार जीवन का अंत नहीं.....।

प्रेमलता यदु

4th February 2021

हमें क‌ई बार यह जुमला सुनने को मिलता है कि बेटी की इज्जत शीशे के समान होती है एक बार टूट जाए तो फिर नहीं जुड़ती। हमें अपनी यह सोच भी बदलनी होगी। बलात्कार जैसी घटनाओं से किसी भी पीड़िता की इज्जत कम नहीं होती। हमें उसे उतना ही मान सम्मान देने की जरूरत है, जितना हम औरों को देते हैं...

बलात्कार जीवन का  अंत नहीं.....।

जब भी किसी प्रकार की कोई दुर्घटना घटित होती है,हम क्या करते हैं? पीड़ित को संबल देते हैं, उसकी पीड़ा को कम करने का प्रयास करते हैं। पूरा परिवार उस घटनाक्रम से उसे बाहर निकालने की पूर्ण चेष्टा में लग जाता है, चाहे उस हादसे में पीड़ित ने अपना कोई अंग खो दिया हो, या फिर पूर्ण रूप से अपाहिज ही क्यों ना हो गया हो। परिवार का हर सदस्य उसकी ताकत बन साथ खड़ा रहता है,ताकि उसका मनोबल बना रहे, लेकिन बलात्कार या बलात्कार के पश्चात जिन्हें मार दिया जाता है या जो समाज और लोकलाज के भय से स्वयं अपने जीवन का अंत कर लेती हैं, उनका अध्याय ही समाप्त हो जाता है या फिर सारा परिवार और समाज उस पीड़िता के लिए सहानुभूति एवं दया दिखाते हुए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ते हुए सड़क पर उतर आता है किंतु उस पीड़िता का क्या, जो बलात्कार के बाद अधमरी लाश के रुप में बच जाती है। उसके प्रति सभी का रवैया क्यों पूरी तरह से बदल जाता है? 

क्यों समाज और समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग में यह बहस छिड़ जाती है कि इस घटना के पीछे गलती किसकी थी? और फिर अंत में पीड़िता को ही परम्पराओं एवं संस्कृति की दुहाई देते हुए दोषी के कटघरे में यह कहते हुए खड़ा कर दिया जाता है कि लड़कियों को अपने हद में रहना चाहिए, उन्हें अपनी अस्मिता और सीमा को ध्यान रखते हुए छोटे कपड़े नहीं पहनने चाहिए। देर रात तक घर से बाहर अकेले नहीं घूमना चाहिए। हमारे समाज में यह सारी बंदिशें केवल लड़कियों पर ही क्यों लगाई जाती है? लड़कों को क्यों कुछ नहीं कहा जाता? क्यों उन्हें उनकी हदें नहीं बताई जाती। क्यों उन्हें नारी जाति के सम्मान के प्रति जागरूक नहीं किया जाता? ऐसे अनेक सवाल हैं जो अब तक निरुत्तरित ही हैं। 

सदियों से हमारा पुरूष प्रधान समाज नारी को अपनी जागीर समझता आया है। उस पर हुकूमत करता रहा है। उसे विलासिता की वस्तु समझ कर उसके अंग के साथ खेलता रहा उसे नोंचता रहा। आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा और समाज की आधी आबादी चुप्पी साधे बैठी रहेगी।

हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना बेहद जरूरी है।उसका विरोध करना ही चाहिए वरना इसे हमारी मौन स्वीकृति समझ ली जाएगी, लेकिन उसके साथ ही साथ हम सभी का यह कर्तव्य भी बनता है कि हम पीड़िता के संग हुए हादसे की चर्चा बार-बार कर उसके आत्मसम्मान की धज्जियां ना उडा़एं, चर्चाएं उसके जख्मों को कुरेदने का कार्य करती हैं। जो हादसा हो चुका है उसकी भरपाई किसी भी सूरत में संभव नहीं, चाहे दोषियों को किसी भी प्रकार की सजा क्यों ना दे दी जाए। चाहे उन्हें फांसी पर लटका दिया जाए, भीड़ के हवाले कर दिया जाए, लिंग भंग कर दिया जाए या फिर बीच चौराहे में खड़ा कर गोली ही क्यों ना मार दिया जाए। इन सब से पीड़िता का दर्द भले ही यह सोच कर थोड़ा कम हो जाएगा कि उसके दोषियों को सज़ा मिल गई परन्तु दोषियों को केवल सज़ा दे देना ही पर्याप्त नहीं है। पीड़िता को उसके दर्द से बाहर निकालना भी बेहद जरूरी है क्योंकि जब भी इस प्रकार की कोई घटना घटित होती हैं पीड़िता का केवल शरीर ही ज़ख्मी नहीं होता उसकी अंतरात्मा भी पूर्ण रूप से घायल हो जाती है।

बलात्कार के दौरान अमानवीय तरीके से उसे रौंदा जाता है, जिसकी वजह से कई बार ऐेसा देखा गया है पीड़िता अवसाद में चली जाती है या फिर आत्महत्या जैसे जघन्य कदम उठा लेती है क्योंकि मान सम्मान और झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए उसका अपना परिवार ही उससे मुंह फेर लेता है। समाज उसे हेय की दृष्टि से देखने लगता है। हर तरफ से घूरती निगाहें उसे प्रश्न करने लगती है।

पीड़िता दोषी नहीं होते हुए भी दोषी ठहरा दी जाती है। वह स्वयं की ही नज़रों में गिर जाती है। उसका आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास टूट कर चूर चूर हो जाता है और आजीवन उसे इस दंश को सहना पड़ता है। उस वक्त उसे सहारे की, अपनेपन की और अपने लोगों की जरूरत होती है, मुंह फेरने या दोष देने का नहीं। वह समय हौसला प्रदान करने का होता है। पीड़िता का मनोबल बढ़ाने का होता है। उसे शक्तिशाली बनाने और घटना को दरकिनार कर आगे बढ़ जाने का होता है। ऐसा सोचना थोड़ा कठिन और अव्यवहारिक जरूर है, लेकिन जब तक हमारे समाज में बलात्कार के बाद पीड़िता को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा, उसे खुले दिल से नहीं अपनाया जाएगा, इस प्रकार के अपराध नारी जाति को जलील करने के लिए होते ही रहेंगे, क्योंकि कई बार बलात्कार जैसे अपराध केवल बदले की भावना से पीड़िता को समाज में बेइज्जत करने के लिए किए जाते हैं।

आज भी हमारे समाज में लोगों की सोच यही है यदि किसी के साथ दुष्कर्म जैसी दुर्घटना घट गई तो पीड़िता किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रही। वह अपवित्र हो गई। वह अपवित्र कैसे हुई? जब उसके संग कुकर्म करने वाला अपवित्र नहीं हुआ तो भला वह कैसे अपवित्र हो सकती है। यह हमारे समाज की दोहरी मानसिकता को दर्शाता है। इस प्रकार की अवधारणा से हमें बाहर निकलना होगा। समाज की संरचना में बदलाव की जरूरत है। दुष्कर्म होने पर किसी भी पीड़िता को सर झुका कर चलने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए और ना ही उसे शर्मसार होने की जरुरत है क्योंकि उसने कुछ गलत नहीं किया है।

हमें क‌ई बार यह जुमला सुनने को मिलता है कि बेटी की इज्जत शीशे के समान होती है एक बार टूट जाए तो फिर नहीं जुड़ती। हमें अपनी यह सोच भी बदलनी होगी। बलात्कार जैसी घटनाओं से किसी भी पीड़िता की इज्जत कम नहीं होती। हमें उसे उतना ही मान सम्मान देने की जरूरत है, जितना हम औरों को देते हैं तभी समाज में बदलाव आएगा अन्यथा कभी नहीं।

हमें अपने घर और आस-पास में संपूर्ण नारी जाति को शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत और सक्षम बनाना होगा। साथ ही साथ हमें उन्हें यह यकीन दिलाना होगा कि हम उनके साथ हैं। जिस प्रकार हम किसी दुर्घटना या हादसा होने के उपरांत उसे भुला कर आगे बढ़ जाते हैं ठीक वैसे ही बलात्कार को भी केवल एक दुर्घटना के रूप में ही देखें और फिर एक नई शुरुआत के लिए बढ़ जाएं क्योंकि बलात्कार का अर्थ जीवन का अंत नहीं।

यह भी पढ़ें -पेड़ों से बंधी जीवन की डोर

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

स्त्री ही क्...

स्त्री ही क्यों करती हैं पुरुष की मंगल कामना?...

विश्वास की ज...

विश्वास की जड़ें उखाड़ फेको - ओशो

धर्म का अर्थ...

धर्म का अर्थ - ओशो

इंसानियत की ...

इंसानियत की खातिर - गृहलक्ष्मी कहानियां

पोल

आपको कैसी लिपस्टिक पसंद है

वोट करने क लिए धन्यवाद

मैट

जैल

गृहलक्ष्मी गपशप

रम जाइए 'कच्...

रम जाइए 'कच्छ के...

गुजरात का कच्छ इन दिनों फिर चर्चा में है और यह चर्चा...

घट-कुम्भ से ...

घट-कुम्भ से कलश...

वैसे तो 'कुम्भ पर्व' का समूचा रूपक ज्योतिष शास्त्र...

संपादक की पसंद

मां सरस्वती ...

मां सरस्वती के प्रसिद्ध...

ज्ञान की देवी के रूप में प्राय: हर भारतीय मां सरस्वती...

लोकगीतों में...

लोकगीतों में बसंत...

लोकगीतों में बसंत का अत्यधिक माहात्म्य है। एक तो बसंत...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription