मनी कंट्रोल: महिलाएं भी लें आर्थिक निर्णय

चयनिका निगम

4th February 2021

हमेशा से औरतों को आर्थिक निर्णय लेने के काबिल नहीं समझा गया है। लेकिन अब समय बदल चुका है।

मनी कंट्रोल: महिलाएं भी लें आर्थिक निर्णय
महिलाओं को अक्सर आर्थिक मामलों से दूर रखा जाता है। माना जाता है कि काफी पढ़ाई कर लेने के बाद भी महिलाएं पैसों को जोड़ने से जुड़ा फैसला वैसा नहीं ले पाएंगी, जैसा पुरुष कर लेते हैं। अब अब पुरुषों ये कर लेते और महिलाएं वो वाला मामला पलट चुका है। महिलाएं कई सारे ऐसे काम कर रहीं हैं, जो अब तक पुरुष ही किया करते थे। दरअसल अब समय बदल चुका है। इसलिए महिलाओं को आर्थिक मामलों में दूरी बनाने के लिए कहना बिलकुल सही नहीं है। बल्कि इस वक्त तो महिलाएं ज्यादा बेहतरी से आर्थिक निर्णय ले पा रही हैं। सिर्फ आर्थिक ही नहीं बल्कि कई सारे दूसरे क्षेत्रों में भी महिलाओं की पकड़ अच्छी ही हुई है। इसलिए आप हर घर के आर्थिक मामलों में महिलाओं का दखल मानिए जरूरी हुआ ही है, ऐसा जरूरी भी है पर क्यों जान लीजिए- 
अब और मजबूरी नहीं-
पहले का समय था, जब पति की मृत्यु के बाद महिलाएं अक्सर अकेली हो जाया करती थीं। वो पति के रहते कभी भी कोई निर्णय ले ही नहीं पाई थीं फिर अचानक से वो खुद को मजबूर पाने लगती थीं। और ऐसे ही अपनी जिंदगी किसी और के सहारे बिताने को मजबूर रहती थीं। मगर अब ऐसा नहीं संभव है। अब सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान नहीं बल्कि कई दूसरी चीजें भी अच्छी जिंदगी जीने के लिए जरूरी होती हैं। इसके लिए फाइनेंशियल मामलों को निपटाने की आदत काफी काम आती हैं। 
बराबरी का हक-
पैसों से जुड़े निर्णय लेने के लिए ये बिलकुल भी जरूरी नहीं है कि कमाया ही जाए। अधिकतर महिलाएं जब घर संभाल रही होती हैं तो उनके पास समय होता ही नहीं है कि वो खुद कमाने जाने के बारे में कुछ सोच भी पाएं। अब ऐसे में क्या वो कभी पैसों से जुड़े निर्णय ले ही नहीं पाएंगी या उन्हें ये हक कभी दिया ही नहीं जाएगा कि वो फाइनेंस को समझ सकें? अगर ऐसा है तो ये गलत है, आदमी और औरत को बराबरी का हक मिलना ही चाहिए। फिर भले ही पति बाहर कमाने जा रहे हैं लेकिन घर का ख्याल रखने का 24 घंटे वाला काम तो महिलाएं ही करती हैं। सिर्फ खाना बनाने के निर्णय के बाद परिवार के लिए पैसे जोड़ने का काम भी महिलाएं आखिर क्यों न करें। 
महिलाएं ज्यादा अच्छी निवेशक-
जानकारों की मानें तो महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अच्छी निवेशक होती हैं। वो निवेश करते समय ज्यादा चीजों के बारे में सोच पाती हैं। दरअसल उनको घर और परिवार की जरूरतों के बारे में ज्यादा पता होता है। पुरुषों की तुलना में वो सबकी जरूरतों को अच्छे से समझ पाती हैं। और इस समझ का फायदा निवेश करते समय पूरी तरह से होता है। 
खर्चे कम-
हमारे भारतीय परिवेश में आज भी लड़कियां बाहर कम ही निकलती हैं। बाहर कम निकलती हैं तो खर्चे भी कम होते हैं। लेकिन पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है। वे बाहर भी खूब निकलते हैं और अक्सर उनसे खर्चे भी होते हैं। या कहें महिलाओं की ऐसी सोच होती है कि वो पहले घर के बारे में सोचती ही हैं तो खर्चे भी सीमित होते हैं।
सिर्फ पुरुषों का अधिकार क्षेत्र नहीं-
फाइनेंस सिर्फ पुरुषों का अधिकार क्षेत्र बिलकुल नहीं है। यह कहीं नहीं लिखा है कि पैसों से जुड़े काम सिर्फ पुरुष ही कर सकते हैं। आंकड़ों की समझ आपको फाइनेंस से जुड़े निर्णय लेने में पूरी मदद करती है। ये समझ पुरुषों को भी हो सकती है और औरतों को भी। जैसे बाकी किसी क्षेत्र में महिलाओं को कमजोर समझना गलत है, ठीक वैसे ही आर्थिक मामलों में भी महिलाओं को कमजोर समझना सही नहीं है। 
भविष्य से जुड़ा मामला-
घर के आर्थिक मामलों को ज्यादातर बार भविष्य से जोड़ कर देखा जाता है। ये पूरे परिवार के भविष्य के लिए किया गया निर्णय है। इसलिए इसे सिर्फ पुरुषों की जिम्मेदारी तो वैसे भी नहीं मानना चाहिए। इसमें रिश्ते की गाड़ी के दोनों पहियों को बराबरी से हिस्सेदार मानते हुए दोनों की राय के आधार पर ये किया जाना चाहिए। 
अपने खर्चे खुद करें-
ज्यादातर परिवारों में आज भी महिलाएं क्योंकि कमाती नहीं हैं इसलिए वो अपने खर्चों के लिए दूसरों पर निरभर हैं, जबकि ऐसा होना गलत है। हर इंसान को किसी पर तब तक निर्भर नहीं होना चाहिए, जब तक कोई बड़ी शारीरिक या मानसिक परेशानी न हो। इसलिए जरूरी है कि महिलाएं कमाएं भी और घर के खर्चों, अपने खर्चों को खुद संभालें। वो कहें कि मैं आपके खर्चे उठा लूंगी।

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