योग का वैज्ञानिक आधार

योगाचार्य भारतभूषण

8th February 2021

योग को आज पूरे विश्व में मान्यता प्राप्त है। विज्ञान भी योग के चमत्कार को नमस्कार करता है? अनुसंधानों से यह सिद्ध भी हो चुका है कि योग के द्वारा रोगोपचार संभव है योग के इस वैज्ञानिक विशेषण को आइए पढ़े लेख में।

योग का वैज्ञानिक आधार
एक समय था कि जब योग विद्या के बारे में बहुत सी भ्रांतियां फैली हुई थीं और थोड़ी बहुत आज भी हैं। इसका कारण है योग विद्या के विज्ञान का सही-सही ज्ञान न होना। एक समय में कुछ लोग कांच के ऊपर चलना, आग पर चलना, हाथ से जंजीर तोड़ देना, खुद को जमीन के अंदर दबा लेना हाथ से राख भस्म व सोने की जंजीर, घड़ी आदि बातों को योग के चमत्कार का नाम देकर अंधविश्वास फैलाते थे और ऐसा माना जाता था कि यह योग विद्या केवल साधु संन्यासियों के लिये ही है। इस तरह योग के विषय में कई भ्रांतियां प्रचलित थीं।
पिछले कुछ एक दशक में विवेकानन्द, स्वामी कुवल्यानंद, स्वामी शिवानंद महर्षि योगी, आचार्य श्री रजनीश, गुरुकुल कागड़ी विश्वविद्यालय के योग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. ईश्वर भारद्वाज, मोरारजी देसाई योग संस्थान दिल्ली, बाबा रामदेव आदि के प्रयासों से योग विद्या का वैज्ञानिक स्वरूप लोगों के समक्ष प्रस्तुत हुआ तथा योगविद्या जन साधारण के लिये उपयोगी हो गयी।
योग विद्या के सही विज्ञान का अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है कि कई लोगों के लिये योग का अर्थ कुछ आसनों तथा प्राणायाम तक ही सीमित है। सामान्यत: आज के युग को स्वास्थ्य व चिकित्सा और व्यायाम की पद्धति के रूप में समझा जाता है। अनुसंधानों से यह सिद्ध भी हो चुका है कि योग के द्वारा रोगोपचार संभव है परंतु योग के द्वारा शरीर को स्वस्थ व निरोगी रखना यह योग का मर्यादित उपयोग हो सकता है। योग का पूर्ण उद्देश्य नहीं हो सकता हां योग को एक पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में जीवन शैली का अंग बनाया जा सकता है, क्योंकि हर चिकित्सा पद्धति का अपना महत्त्व व उपयोग है। योग का पूर्ण उद्देश्य तो परमात्मा प्राप्ति व दुख मुक्ति ही है।

योग की वैज्ञानिक पद्धति

जन समूह व साधकों के बीच योग के भिन्न-भिन्न व कई प्रकार के मार्ग व विधियां प्रचलित हैं। जैसे ज्ञान योग, कर्म योग, संन्यास योग, हठयोग, मंत्र योग, तंत्र योग, कुण्डलिनी योग, भक्ति योग, आदि। तो यह विचारणीय है कि योग की वैज्ञानिक पद्धति कौन सी है। इस संबंध में योग की प्राचीन व प्रमाणिक पुस्तकें 'गोरक्षशतक' व 'शिव संहिता' में योग के जिन प्रकारों का वर्णन मिलता है उन सभी में सबसे मुख्य 'राजयोग' है, क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग के संबंधित तथ्य कहे गये हैं। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टïग योग का ही दूसरा नाम है।
महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का प्रवर्तक भी कहा जाता है। योग दर्शन का मूल ग्रंथ महर्षि पतंजलि द्वारा रचित 'पातंजल सूत्र' या 'योग सूत्र' है। अष्टïग योग दो शब्दों की संधि से बना है अष्टï+अंग अर्थात् ऐसा योग मार्ग जिसमें 8 अंग व चरण हों। 
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि ये योग के 8 चरण हैं, देखा जाये तो यह योग का सम्पूर्ण विज्ञान एक ही वाक्य में है। इन 8 अंगों का क्रमबद्ध व सूत्रबद्ध पालन ही योग का विज्ञान कहलाता है। ये आठ अंग परस्पर गहन संबध रखते हैं। इनके क्रम को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। जैसे सामान्य जन योग के तीसरे व चौथे अंग का ही बहुतायत में पालन कर रहे हैं और प्रथम व द्वितीय अंग (यम तथा नियम) का पालन नहीं करते हैं। साथ ही अन्य अंगों का पालन भी नहीं करते हैं। इन 8 अंगों का क्रमबद्ध पालन ही योग को एक जीवन इकाई व परिपूर्ण बनाता है।
(1)यम-यह योग का प्रथम अंग है यम आसक्तियों व कुऌप्रवृलत्तियों को नष्टï करने के लिए उपयुक्त है। मनुष्यों का अन्य प्राणियों के साथ व्यवहार कैसा है यह उसके चित्त की शुद्धता पर निर्भर करता है। इसलिए सबसे पहले इस व्यवहारिक जीवन को यमों के द्वारा शुद्ध व दिव्य बनाना होता है। योग में यमों की संख्या 5 है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मïचर्य तथा अपरिग्रह। मनुष्य का मन चंचल है तथा क्षण-क्षण में बदलता रहता है। यम पालन का अर्थ है 'जीवन ऊर्जा को दिशा देना'। मनुष्य के पास ऊर्जा सीमित है। वृद्धावस्था आते-आते ऊर्जा कम होती चली जायेगी। योग विज्ञान यमों के पालन के द्वारा मनुष्य की ऊर्जा को इकट्ïठा करके एक शुभ दिशा में प्रविष्ट कराना चाहता है।
2नियम- योग का दूसरा अंग व चरण नियम है। सदाचार के पालन की दिशा में पांच प्रकार के नियम बताये गये हैं- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान। नियमों का संबंध केवल अपने व्यक्तित्व व अन्तकरण के साथ होता है। इसके पालन से व्यक्ति में दिव्यता व शुद्धि और पवित्रता का जन्म होता है। नियम का अर्थ है 'ऐसा जीवन जो अव्यवस्थित  न हो ऐसा जीवन जिसमें सुनिश्चित अनुशासन हो'। 
(3)आसन- योग का तीसरा चरण है आसन आज समाज में योग के इस अंग से सभी परिचित हैं सामान्य जन शरीर की कुछ विशेष स्थिति व आकृति को आसन समझते हैं, जबकि पतंजलि ने किसी भी ऐसे आसन का वर्णन नहीं किया है जिनका प्रचलन आज सर्वविदित है। पतंजलि आसन को परिभाषित करते हुए कहते हैं 'स्थिरसुखमासनम' अर्थात्ï जो स्थिर व सुखदायी हो वह आसन है। शरीर की एक ऐसी स्थिति जिसमें स्थिर व सुखदायी ठहरा जा सके वह आसन कहलाती है। आसन का यह अनुभव वही ले सकता है जिसने योग के पहले दो अंग यम-नियम का पालन किया हो। जिसने संयम व नियमित्ता का जीवन जीया हो। शास्त्रों में आसनों के विषय में कहा गया है कि-    
आसनों का अभ्यास एक वैज्ञानिक पद्धति है। प्रयोगों से आज यह बात सिद्ध हो चुकी है कि आसनों का शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
कई वैज्ञानिकों ने शरीर की भिन्न-भिन्न स्थिति पर प्रयोग किये तथा यह जानने का प्रयास किया कि शरीर की खड़ी, बैठी हुई, सीधा लेटी हुई, व उल्टा लेटी हुई स्थिति में व्यक्ति के चित्त में परिवर्तन होते हैं। उनकी चंचलता किसी स्थिति में अधिक थी और किसी स्थिति में कम थी। खड़ी स्थिति में चंचलता सर्वाधिक थी। वैज्ञानिकों ने पाया की ग्रेविटेशन का हमारे शरीर पर प्रभाव पड़ता है। पिरामिड पर शोध करते हुए पाया गया कि पिरामिड अपनी विशेष प्रकार की आकृति के कारण एक विशेष ऊर्जा से युक्त है, जैसे एक मंदिर की आकृति है नीचे से चौड़ी व ऊपर से संकरी। इसी प्रकार योग में भी ध्यान के जो आसन प्रयोग किए जाते हैं सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन आदि भी पिरामिड व मंदिर की तरह नीचे चौड़े व ऊपर की ओर संकरे हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि शरीर की इन स्थितियों में मन शीघ्रता से शान्त हो जाता है और गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव शरीर पर ज्यादा नहीं होता।
(4)प्राणायाम- योग की वैज्ञानिक प्रक्रिया का चतुर्थ अंग है 'प्राणायाम'। आसन के द्वारा जब हमारा शरीर एक सुखी व शांत अवस्था में आ गया तो अब शरीर की शांत अवस्था में श्वास को नियमित व नियंत्रित किया जा सकता है। मानसिक व आध्यात्मिक उन्नति के साथ शारीरिक उन्नति के लिए भी प्राणायाम एक विशेष महत्त्व रखता है। सामान्य अर्थों में श्वास के नियंत्रण को प्राणायाम कहा गया है। प्राणायाम शब्द दो शब्दों 'प्राण' और 'आयाम' से मिलकर बना है। 'प्राण' यह हमारी जीवनी शक्ति है और 'आयाम'  शब्द का अर्थ प्राणगति का विस्तार तथा ऐच्छिक नियंत्रण है। 
प्राणों केचलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल तथा स्थाणु हो जाता है। अत: योगी को श्वास पर नियन्त्रण करना चाहिए।
इस प्रकार कह सकते हैं कि श्वास का चित्त की स्थितियों पर प्रभाव पड़ता है। प्रयोगों और अनुभवों में देखा जाए तो जैसे- क्रोध में, कामवासना में, भय में, उद्धिगनता आदि मनोभाव में श्वास की गति अस्थिर व भिन्न-भिन्न होती है। प्रेम में, करुणा में, मैत्री में, भावुकता आदि  मन की वृत्तियों में श्वास की गति भिन्न होती है। मन की भाव दशा और श्वास प्रक्रिया के बीच एक गहन संबंध है। मन की भाव दशा बदलने से श्वास की गति तत्काल परिवर्तित व प्रभावित हो जाती है। जब मन की भिन्न दशाओं में श्वास की गति अव्यवस्थित हो सकती है तो क्या यह संभव नहीं है कि यदि श्वासों पर नियन्त्रण कर लिया जाये तो मन व उसकी वृत्तियों को नियंत्रित किया जा सकता है। यह घटना संभव है। श्वास नियन्त्रण से। इसी कारण योग प्राणायाम को एक महत्त्वपूर्ण अंग मानता है।
(5)प्रत्याहार- प्रत्याहार योग का पांचवां अंग है। प्रत्याहार दो शब्दों से मिलकर बना है, प्रत्य+आहार। प्रत्यय का अर्थ इन्द्रियों से है व आहार का अर्थ इन्द्रियों के भोगे जाने वाले विषयों से है। योग सूत्र में प्रत्याहार की परिभाषा देते हुये कहा गया है कि इन्द्रियों की बाह्यï वृत्तियों को सब ओर से समेट कर मन में विलीन करने के अभ्यास का नाम प्रत्याहार है। इन्द्रियों को विषयों की ओर न जाने देना ही प्रत्याहार है। हमारी इन्द्रियों की ऊर्जा बाहर की तरफ गति करती रहती है। बाहर जाती ऊर्जा को अंदर की ओर मोड़ना, गति देना ही प्रत्याहार है। प्रत्याहार का अर्थ है 'अब हमारी इन्द्रियां संसार में भाग नहीं रही है भटक नहीं रही है, अब अंदर अपने केंद्र की ओर लौट रही है'। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में होती हैं।
(6)धारणा-प्रत्याहार के द्वारा जब इन्द्रियां अंतर्मुखी हो जाती हैं तो उसके बाद योग का छठा चरण धारणा आता है। चित्त का किसी स्थान विशेष में बाधना धारणा कहलाता है। चित्त का किसी स्थान विशेष जैसे- नाभि, नासिकाग्र, भ्रकुटी, ब्रहमरन्ध, चन्द्र, तारे, वृक्ष, मोमबत्ती की लौ आदि पर स्थिर करना धारणा है। किसी एक बिंदु पर एकाग्र होना धारणा है। सारे मंदिर, धारणा के अभ्यास के लिए निर्मित किये गये। यदि हम किसी विषय पर ध्यान कर रहे हैं तो वह धारणा है। दूसरे शब्दों में कहें तो धारणा का अर्थ है 'धारण करने की क्षमता'।
मन का एकाग्र होना एक बहुत कठिन बात है। हमारे भीतर असंख्य विचार हमेशा गतिमान रहते हैं। यदि हम मन को एकाग्र करने बैठें तो मन निर्विचार नहीं होता है। तब मन को एकाग्र करने के लिये योग में धारणा का अभ्यास बताया गया है। किसी एक ही विचार के साथ लंबे समय तक स्थिर रहना, एक विचार को लंबे समय तक धारण किये रखना 'धारणा' है। 
(7)ध्यान- ध्यान योग का सातवां चरण है। अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध व निर्मल मौन में चले जाना। योग सूत्र में ध्यान को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि 'धारणा में चित्त जिस वस्तु में लगता है वह वृत्ति इस प्रकार समान प्रवाह से लगातार बहती रहे कि दूसरी कोई और वृत्ति बीच में न आये, तब उसको ध्यान कहते हैं'। एक बिंदु पर की गयी धारणा जब सतत प्रवाह में बहने लगती है तो ध्यान कहलाती है। धारणा में हम जिस बिंदु पर एकाग्र हैं ध्यान में वह बिंदु भी छूट जाता है। अधिकांश लोग समझते हैं कि ध्यान की कोई विधि होती है विधि तो धारणा की हो सकती है। ध्यान है विचारों व क्रियाओं से मुक्त होना। जैसे-जैसे ध्यान गहन होता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थिर होने लगता है। ध्यान में इंद्रियां मन के साथ विलीन होने लगती हैं। मन बुद्धि के साथ होने लगता है और बुद्धि आत्मा में लीन होने लगती है।
ध्यान का विज्ञान- आज वैज्ञानिक खोजों व अनुसंधानों से ज्ञात हो चुका है कि ध्यान मनुष्य को स्वास्थ्य प्रदान करता है। हम सामान्यत: यह सोचते हैं कि बीमारी का संबंध शरीर से होता है तथा बीमारी शरीर में आती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बीमारी शरीर में ही नहीं मन में भी उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य मन भी है और शरीर भी है। आचार्य रजनीश इस संबंध में कहते हैं कि 'आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है उसका नाम शरीर है तथा आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ के बाहर रह जाता है उसका नाम आत्मा है। अदृश्य शरीर का नाम आत्मा है तथा दृश्य आत्मा का नाम शरीर है ये दो चीजें नहीं हैं ये दो अस्तित्त्व नहीं हैं बल्कि एक ही अस्तित्त्व की दो भिन्न तरंग अवस्थायें हैं'।
इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि यदि शरीर में कोई बीमारी है तो उसका प्रभाव अंतस में भी पड़ता है और अंतस में कुछ घटित हो तो उसका प्रभाव बाहर शरीर पर पड़ेगा। जिस प्रकार यदि किसी बड़े तलाब में पत्थर फेंकने से उसमें जो तरंग व कंपन्न पैदा होंगे वे तरंग व कंपन्न तालाब के अंतिम छोर तक पहुंच जायेंगे और कभी-कभी ये कंपन्न वापस वहीं लौट आयेंगे जहां कंपन्न का केंद्र था। उसी प्रकार यदि मनुष्य के शरीर में कुछ घटित हो तो उसका प्रभाव अन्तकरण, आत्मा व मन तक भी पहुंच जायेगा और यदि मन व आत्मा में कोई परिर्वतन हो तो उसका प्रभाव शरीर में भी होगा शरीर में जो व्याधि है उसकी चिकित्सा तो दवाइयों से की जा सकती है लेकिन दवाईयों से अन्तकरण की चिकित्सा तो नहीं की जा सकती। प्राकृति चिकित्सा के 10 मूलभूत सिद्धातों में से एक सिद्धांत है कि कोई भी चिकित्सा आत्मा, मन व शरीर तीनों के लिए होनी चाहिए। तब प्रश्न यह उठता है कि आत्मा व मन की चिकित्सा किसके द्वारा की जाये? इनकी चिकित्सा की औषधि है 'ध्यान'। तो कहा जा सकता है कि यदि मनुष्य को पूर्ण स्वास्थ प्राप्त करना है तो औषधि के साथ-साथ ध्यान भी परम आवश्यक है।
(8)समाधि- समाधि योग का आठवां व अंतिम अंग है। जब योगी को अपने ध्येय विषय व स्वयं का कुछ भी ज्ञान नहीं रहता तब यह स्थिति 'समाधि' कहलाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जब ध्यान का अनुभव इतना गहरा हो जाता है कि अपने होने का अनुभव शून्य जैसा हो जाता है तो वह अवस्था समाधि कहलाती है। समाधि ऐसी स्थिति है जहां सारी व्याधियों का समाधान हो जाता है। समाधि पूर्ण स्वास्थ्य है।
मस्तिष्क का एक भाग भावनाओं से युक्त होता है व दूसरा भाग बुद्ध व विचारों से युक्त। जब किसी कारण से दोनों के बीच असंतुलन उत्पन्न हो जाता है तब हमारे विचार तथा भावनाओं में सामन्जस्य उत्पन्न नहीं होता। इस तरह मस्तिष्क की क्रिया में असंतुलन होने उलझन व कष्ट पैदा होते हैं। समाधि की स्थिति में इन सबका उपाय हो जाता है और दिव्य शक्ति व ज्ञान की प्राप्ति भी होती है।

वैज्ञानिकता के पक्ष में नई खोजें व प्रमाण

योग-शास्त्र को आध्यात्मिक शास्त्र होने के साथ-साथ एक मनोविज्ञान का शास्त्र भी कहा जा सकता है, क्योंकि योग शास्त्र का प्रारंभ ही चित्त वृत्तियों के शुद्धिकरण से होता है।
भारतीय दार्शनिक चिन्तन में तो इस दिशा में  प्रारम्भ से ही खोजे होती रही हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञान भी अब इस दिशा में प्रयासरत है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों द्वारा अभी तक केवल चेतन व अचेतन मन का ही अध्ययन किया जाता रहा है। उनके द्वारा मन की इससे गहन परत 'सुपर चेतन' का अध्ययन किया जाना अभी शेष है। योग एक ऐसा विज्ञान है जो अहंकार की मूल समस्या का समाधान करके एक उच्च ऊर्जा में विलय कर सकता है। इस उच्च ऊर्जा को कुछ और नहीं सुपर चेतन कहा गया है। सुपर चेतन को ईश्वर के समतुल्य माना जा सकता है। भारतीय दर्शनों में अंयआत्मा, ब्रह्मï, प्रज्ञानम्ï ब्रह्मï, चिदानन्दोअहम, तत्त्वमसि आदि सूत्रों में जिस सत्ता को परमात्मा माना गया है। उसी को विज्ञान की भाषा में 'सुपर चेतन' कहते हैं।
आधुनिक विज्ञान की एक नवीनतम खोज है 'क्वांण्टम कण' ये कण सूक्ष्म एवं अनन्त ऊर्जाओं के स्रोत हैं। इन कणों ने वैज्ञानिकों को हतप्रभ व आश्चर्यचकित किया हुआ है। भारतीय योग में परमात्मा को एक अनन्त ऊर्जा स्रोत की संज्ञा दी है। इसी आधार पर सुविख्यात वैज्ञानिक माइकल टालवोल ने अपने शोध अध्ययन 'मिस्ट्रिसिज्म एण्ड द न्यू फिजिक्स में भारतीय तंत्र एवं योगविद्या की वैज्ञानिकता प्रमाणित की है। 'एसलीन इंस्टीट्यूट' के मनोवैज्ञानिक 'लगरैंस लीसेन' ने महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों पर कई सफल वैज्ञानिक प्रयोग सम्पन्न किये हैं। क्वांटम कण और तरंग सिद्धान्त में ब्रह्मïड को ऊर्जा तरंगों का संद्यनिता रूप माना गया है। इसके अनुसार सृष्टि का कण-कण तरंगों से निर्मित है। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या श्रोडिंगर के कैट मत एवं जान ए हीलर की सुपर स्पेस की परिकल्पना में हुई है। इसकी व्याख्या में यही बताया गया है कि संसार के सभी क्रियाकलापों के मूल में एक ही शक्ति क्रियाशील है। जो विभिन्न रूपों में दृश्य होती है। योग व भारतीय अध्यात्म विज्ञान की धारणा ही नहीं अपितु अनुभव भी है कि कण-कण परमात्मा की शक्ति है।
जर्मन भौतिक शास्त्री मैक्स प्लैंक ने पहली बार बताया कि प्रकाश एक तरंग नहीं वरन् क्वांटा नामक ऊर्जा इकाई से बना है। जो प्राणतत्त्व की ओर संकेत करता है और यदि भारतीय योग में देखें तो योग में प्राण का महत्त्व सर्वविदित है। 
इस युग के बौद्धिकता के शिखर समझे जाने वाले स्टीफन हाकिन्स ने स्पष्ट किया कि ब्लैक होल में स्पेसटाइम समाप्त हो जाता है। यदि योग की दृष्टि से इस बात को देखें तो यह समाधि की स्थिति है जिसमें समय शून्य हो जाता है।
इसके अतिरिक्त स्टीफन हॉकिन्स ने बताया कि ब्लैक होल त्रिआयामी होता है और इसकी पूंछ में फोटान कण घूमते रहते हैं। विज्ञानी माइकल टालबोल ने इसकी समानता कुण्डलिनी शक्ति से स्थापित करने का प्रयास किया है। उनके अनुसार कुण्डलिनी शक्ति भी ब्लैक होल के समान सोई पड़ी है परंतु जब जागृत होती है तो प्रचण्ड बलयाकार तरंगों के सदृश ऊपर उठती है। ब्लैक होल व कुण्डलिनी दोनों ही अपरिमित एवं अनन्त शक्ति के भंडार होते हैं। दोनों की ही गति को वलयाकार माना गया है।
जॉन ए हीलर ने अपने शोध 'द सूपर नेचर एण्ड द नेचर ऑफ क्वाण्टम जिआ मेट्रोडायनेमिक्स में अंतरिक्ष का जो वर्णन किया है उसे माइकल टालबोल ने शिव की जटा केसमान बताया है और कहा है कि जैसे शिव जटा को खोला और समेटा जा सकता है इसी तरह विद्युत धाराओं व बार्महोल के संकुचन व प्रसार सम्भव है। यदि योग शास्त्र की दृष्टि से देखें तो यह सहस्रार का चक्र जाग्रत होने का वर्णन हो सकता है।
आधुनिक विज्ञानवेत्ता क्वाण्टम के तरंग व कण सिद्धान्त को योग के नाद व बिंदु के सिद्धान्त के समान मानते हैं। उनका मानना है कि नाद का अर्थ है तरंग और बिन्दु का अर्थ है कण। ब्रह्मïण्ड के निर्माण के साथ चेतना का प्रवाह तरंग या नाद के रूप में हुआ। यदि दूसरी ओर देखें तो भारत के आध्यात्मविद समस्त जगत की अभिव्यक्ति का कारण शब्द या नाद ब्रह्मï को मानते हैं।
वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि प्रकृति के अंतराल में एक ध्वनि प्रतिक्षण गुंजायमान होती रहती है जिसके कारण परमाणुओं में परस्परिक संघात द्वारा गति उत्पन्न होती है और सृष्टि का समस्त क्रियाकलाप चलता है। यदि योग की दृष्टि से देखें तो यह ध्वनि ही 'ऊं' है जिसे योग सूत्र में वाचक शब्द 'प्रणव' कहा गया है।
सत्प्रेम ने 'द एडवेंचर ऑफ कॉशनेस' में कहा है कि चेतना का विस्तार पदार्थ जगत की बहुआयामी सृष्टि करता है यह वही ऊर्जा है जो जड़ एवं चेतना सभी को बांधे रखती है। इसे ही 'कान्शंस फोर्स' या 'चिंताम्रि' कहा गया है। श्री अरविन्द ने अपने ग्रन्थ 'सिन्थेसिस ऑफ योग' में इस शक्ति को ब्रह्मïडीय चेतना का नाम दिया है सर्वत्र एक ही शक्ति प्रवाहित होती रहती है। सृष्टि का एक कण इसके बाहर नहीं है सर्वत्र एक ही शक्ति है दो नहीं। अत: एक छोटे से कण के शक्तिहीन हो जाने से समूचा ब्रह्मïड ही शक्तिहीन हो जाता है।
आइंस्टीन का सूत्र- श्व=रूद्ग२ में इसी तत्त्व का प्रकटीकरण हुआ है। 
जान.सी. लीली ने अपने ग्रंथ 'द ह्यूमैन कम्प्यूटर' में मानव मन को शक्तिशाली तरंग के रूप में निरुपित किया है। योग शास्त्र में तो प्रारम्भ से ही मन को चंचल कहा गया है और इसके एकाग्र करने का उपाय भी बताया गया है यदि उपरोक्त तथ्यों को समझा जाये तो पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने यह खोजें बाह्य उपकरणों की सहायता से की परंतु भारतीय मनीषियों ने ये खोजें समाधि की स्थिति में ज्ञान प्रकट होने से कीं, क्योंकि भारतीय ऋषियों को एक रहस्य प्रकट हो गया था कि जो पिण्ड अर्थात् शरीर में है। वही ब्रह्मïड में व्याप्त है।
यदि निष्कर्ष रूप में देखा जाए तो प्राचीन काल के ये आध्यात्मिक निष्कर्ष आधुनिक विज्ञान के प्रयोगों की कसौटी पर भी सर्वथा सत्य प्रमाणित हो रहे हैं। आध्यात्मिक सत्यों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता के आधार पर यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि योग एक सर्वांगीर्ण विज्ञान है और यह वर्तमान विज्ञान से नि:संदेह उच्च स्तरीय एवं उन्नत तो है ही और इसका सार्थक अनुशीलन निश्चितरूपेण भारत में पुन: विश्वगुरु बनाने में 
सहायक होगा।

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एक समय था कि जब योग विद्या के बारे में बहुत सी भ्रांतियां फैली हुई थीं और थोड़ी बहुत आज भी हैं। इसका कारण है योग विद्या के विज्ञान का सही-सही ज्ञान न होना। एक समय में कुछ लोग कांच के ऊपर चलना, आग पर चलना, हाथ से जंजीर तोड़ देना, खुद को जमीन के अंदर दबा लेना हाथ से राख भस्म व सोने की जंजीर, घड़ी आदि बातों को योग के चमत्कार का नाम देकर अंधविश्वास फैलाते थे और ऐसा माना जाता था कि यह योग विद्या केवल साधु संन्यासियों के लिये ही है। इस तरह योग के विषय में कई भ्रांतियां प्रचलित थीं।
पिछले कुछ एक दशक में विवेकानन्द, स्वामी कुवल्यानंद, स्वामी शिवानंद महर्षि योगी, आचार्य श्री रजनीश, गुरुकुल कागड़ी विश्वविद्यालय के योग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. ईश्वर भारद्वाज, मोरारजी देसाई योग संस्थान दिल्ली, बाबा रामदेव आदि के प्रयासों से योग विद्या का वैज्ञानिक स्वरूप लोगों के समक्ष प्रस्तुत हुआ तथा योगविद्या जन साधारण के लिये उपयोगी हो गयी।
योग विद्या के सही विज्ञान का अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है कि कई लोगों के लिये योग का अर्थ कुछ आसनों तथा प्राणायाम तक ही सीमित है। सामान्यत: आज के युग को स्वास्थ्य व चिकित्सा और व्यायाम की पद्धति के रूप में समझा जाता है। अनुसंधानों से यह सिद्ध भी हो चुका है कि योग के द्वारा रोगोपचार संभव है परंतु योग के द्वारा शरीर को स्वस्थ व निरोगी रखना यह योग का मर्यादित उपयोग हो सकता है। योग का पूर्ण उद्देश्य नहीं हो सकता हां योग को एक पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में जीवन शैली का अंग बनाया जा सकता है, क्योंकि हर चिकित्सा पद्धति का अपना महत्त्व व उपयोग है। योग का पूर्ण उद्देश्य तो परमात्मा प्राप्ति व दुख मुक्ति ही है।
योग की वैज्ञानिक पद्धति
जन समूह व साधकों के बीच योग के भिन्न-भिन्न व कई प्रकार के मार्ग व विधियां प्रचलित हैं। जैसे ज्ञान योग, कर्म योग, संन्यास योग, हठयोग, मंत्र योग, तंत्र योग, कुण्डलिनी योग, भक्ति योग, आदि। तो यह विचारणीय है कि योग की वैज्ञानिक पद्धति कौन सी है। इस संबंध में योग की प्राचीन व प्रमाणिक पुस्तकें 'गोरक्षशतकÓ व 'शिव संहिताÓ में योग के जिन प्रकारों का वर्णन मिलता है उन सभी में सबसे मुख्य 'राजयोगÓ है, क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग के संबंधित तथ्य कहे गये हैं। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टïांग योग का ही दूसरा नाम है।
महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का प्रवर्तक भी कहा जाता है। योग दर्शन का मूल ग्रंथ महर्षि पतंजलि द्वारा रचित 'पातंजल सूत्रÓ या 'योग सूत्रÓ है। अष्टïांग योग दो शब्दों की संधि से बना है अष्टï+अंग अर्थात् ऐसा योग मार्ग जिसमें 8 अंग व चरण हों। 
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि ये योग के 8 चरण हैं, देखा जाये तो यह योग का सम्पूर्ण विज्ञान एक ही वाक्य में है। इन 8 अंगों का क्रमबद्ध व सूत्रबद्ध पालन ही योग का विज्ञान कहलाता है। ये आठ अंग परस्पर गहन संबध रखते हैं। इनके क्रम को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। जैसे सामान्य जन योग के तीसरे व चौथे अंग का ही बहुतायत में पालन कर रहे हैं और प्रथम व द्वितीय अंग (यम तथा नियम) का पालन नहीं करते हैं। साथ ही अन्य अंगों का पालन भी नहीं करते हैं। इन 8 अंगों का क्रमबद्ध पालन ही योग को एक जीवन इकाई व परिपूर्ण बनाता है।
1यम- यह योग का प्रथम अंग है यम आसक्तियों व कुऌप्रवृलत्तियों को नष्टï करने के लिए उपयुक्त है। मनुष्यों का अन्य प्राणियों के साथ व्यवहार कैसा है यह उसके चित्त की शुद्धता पर निर्भर करता है। इसलिए सबसे पहले इस व्यवहारिक जीवन को यमों के द्वारा शुद्ध व दिव्य बनाना होता है। योग में यमों की संख्या 5 है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मïचर्य तथा अपरिग्रह। मनुष्य का मन चंचल है तथा क्षण-क्षण में बदलता रहता है। यम पालन का अर्थ है 'जीवन ऊर्जा को दिशा देनाÓ। मनुष्य के पास ऊर्जा सीमित है। वृद्धावस्था आते-आते ऊर्जा कम होती चली जायेगी। योग विज्ञान यमों के पालन के द्वारा मनुष्य की ऊर्जा को इकट्ïठा करके एक शुभ दिशा में प्रविष्टï कराना चाहता है।
2नियम- योग का दूसरा अंग व चरण नियम है। सदाचार के पालन की दिशा में पांच प्रकार के नियम बताये गये हैं- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान। नियमों का संबंध केवल अपने व्यक्तित्व व अन्तकरण के साथ होता है। इसके पालन से व्यक्ति में दिव्यता व शुद्धि और पवित्रता का जन्म होता है। नियम का अर्थ है 'ऐसा जीवन जो अव्यवस्थित  न हो ऐसा जीवन जिसमें सुनिश्चित अनुशासन होÓ। 
3आसन- योग का तीसरा चरण है आसन आज समाज में योग के इस अंग से सभी परिचित हैं सामान्य जन शरीर की कुछ विशेष स्थिति व आकृति को आसन समझते हैं, जबकि पतंजलि ने किसी भी ऐसे आसन का वर्णन नहीं किया है जिनका प्रचलन आज सर्वविदित है। पतंजलि आसन को परिभाषित करते हुए कहते हैं 'स्थिरसुखमासनमÓ अर्थात्ï जो स्थिर व सुखदायी हो वह आसन है। शरीर की एक ऐसी स्थिति जिसमें स्थिर व सुखदायी ठहरा जा सके वह आसन कहलाती है। आसन का यह अनुभव वही ले सकता है जिसने योग के पहले दो अंग यम-नियम का पालन किया हो। जिसने संयम व नियमित्ता का जीवन जीया हो। शास्त्रों में आसनों के विषय में कहा 
गया है कि-      
आसनों का अभ्यास एक वैज्ञानिक पद्धति है। प्रयोगों से आज यह बात सिद्ध हो चुकी है कि आसनों का शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
कई वैज्ञानिकों ने शरीर की भिन्न-भिन्न स्थिति पर प्रयोग किये तथा यह जानने का प्रयास किया कि शरीर की खड़ी, बैठी हुई, सीधा लेटी हुई, व उल्टा लेटी हुई स्थिति में व्यक्ति के चित्त में परिवर्तन होते हैं। उनकी चंचलता किसी स्थिति में अधिक थी और किसी स्थिति में कम थी। खड़ी स्थिति में चंचलता सर्वाधिक थी। वैज्ञानिकों ने पाया की ग्रेविटेशन का हमारे शरीर पर प्रभाव पड़ता है। पिरामिड पर शोध करते हुए पाया गया कि पिरामिड अपनी विशेष प्रकार की आकृति के कारण एक विशेष ऊर्जा से युक्त है, जैसे एक मंदिर की आकृति है नीचे से चौड़ी व ऊपर से संकरी। इसी प्रकार योग में भी ध्यान के जो आसन प्रयोग किए जाते हैं सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन आदि भी पिरामिड व मंदिर की तरह नीचे चौड़े व ऊपर की ओर संकरे हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि शरीर की इन स्थितियों में मन शीघ्रता से शान्त हो जाता है और गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव शरीर पर ज्यादा नहीं होता।
4प्राणायाम- योग की वैज्ञानिक प्रक्रिया का चतुर्थ अंग है 'प्राणायामÓ। आसन के द्वारा जब हमारा शरीर एक सुखी व शांत अवस्था में आ गया तो अब शरीर की शांत अवस्था में श्वास को नियमित व नियंत्रित किया जा सकता है। मानसिक व आध्यात्मिक उन्नति के साथ शारीरिक उन्नति के लिए भी प्राणायाम एक विशेष महत्त्व रखता है। सामान्य अर्थों में श्वास के नियंत्रण को प्राणायाम कहा गया है। प्राणायाम शब्द दो शब्दों 'प्राणÓ और 'आयामÓ से मिलकर बना है। 'प्राणÓ यह हमारी जीवनी शक्ति है और 'आयामÓ  शब्द का अर्थ प्राणगति का विस्तार तथा ऐच्छिक नियंत्रण है। 
प्राणों केचलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल तथा स्थाणु हो जाता है। अत: योगी को श्वास पर नियन्त्रण करना चाहिए।
इस प्रकार कह सकते हैं कि श्वास का चित्त की स्थितियों पर प्रभाव पड़ता है। प्रयोगों और अनुभवों में देखा जाए तो जैसे- क्रोध में, कामवासना में, भय में, उद्धिगनता आदि मनोभाव में श्वास की गति अस्थिर व भिन्न-भिन्न होती है। प्रेम में, करुणा में, मैत्री में, भावुकता आदि  मन की वृत्तियों में श्वास की गति भिन्न होती है। मन की भाव दशा और श्वास प्रक्रिया के बीच एक गहन संबंध है। मन की भाव दशा बदलने से श्वास की गति तत्काल परिवर्तित व प्रभावित हो जाती है। जब मन की भिन्न दशाओं में श्वास की गति अव्यवस्थित हो सकती है तो क्या यह संभव नहीं है कि यदि श्वासों पर नियन्त्रण कर लिया जाये तो मन व उसकी वृत्तियों को नियंत्रित किया जा सकता है। यह घटना संभव है। श्वास नियन्त्रण से। इसी कारण योग प्राणायाम को एक महत्त्वपूर्ण अंग मानता है।
5प्रत्याहार- प्रत्याहार योग का पांचवां अंग है। प्रत्याहार दो शब्दों से मिलकर बना है, प्रत्य+आहार। प्रत्यय का अर्थ इन्द्रियों से है व आहार का अर्थ इन्द्रियों के भोगे जाने वाले विषयों से है। योग सूत्र में प्रत्याहार की परिभाषा देते हुये कहा गया है कि इन्द्रियों की बाह्यï वृत्तियों को सब ओर से समेट कर मन में विलीन करने के अभ्यास का नाम प्रत्याहार है। इन्द्रियों को विषयों की ओर न जाने देना ही प्रत्याहार है। हमारी इन्द्रियों की ऊर्जा बाहर की तरफ गति करती रहती है। बाहर जाती ऊर्जा को अंदर की ओर मोड़ना, गति देना ही प्रत्याहार है। प्रत्याहार का अर्थ है 'अब हमारी इन्द्रियां संसार में भाग नहीं रही है भटक नहीं रही है, अब अंदर अपने केंद्र की ओर लौट रही हैÓ। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में होती हैं।
6धारणा- प्रत्याहार के द्वारा जब इन्द्रियां अंतर्मुखी हो जाती हैं तो उसके बाद योग का छठा चरण धारणा आता है। चित्त का किसी स्थान विशेष में बाधना धारणा कहलाता है। चित्त का किसी स्थान विशेष जैसे- नाभि, नासिकाग्र, भ्रकुटी, ब्रहमरन्ध, चन्द्र, तारे, वृक्ष, मोमबत्ती की लौ आदि पर स्थिर करना धारणा है। किसी एक बिंदु पर एकाग्र होना धारणा है। सारे मंदिर, धारणा के अभ्यास के लिए निर्मित किये गये। यदि हम किसी विषय पर ध्यान कर रहे हैं तो वह धारणा है। दूसरे शब्दों में कहें तो धारणा का अर्थ है 'धारण करने की क्षमताÓ।
मन का एकाग्र होना एक बहुत कठिन बात है। हमारे भीतर असंख्य विचार हमेशा गतिमान रहते हैं। यदि हम मन को एकाग्र करने बैठें तो मन निर्विचार नहीं होता है। तब मन को एकाग्र करने के लिये योग में धारणा का अभ्यास बताया गया है। किसी एक ही विचार के साथ लंबे समय तक स्थिर रहना, एक विचार को लंबे समय तक धारण किये रखना 'धारणाÓ है। 
7ध्यान- ध्यान योग का सातवां चरण है। अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध व निर्मल मौन में चले जाना। योग सूत्र में ध्यान को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि 'धारणा में चित्त जिस वस्तु में लगता है वह वृत्ति इस प्रकार समान प्रवाह से लगातार बहती रहे कि दूसरी कोई और वृत्ति बीच में न आये, तब उसको ध्यान कहते हैंÓ। एक बिंदु पर की गयी धारणा जब सतत प्रवाह में बहने लगती है तो ध्यान कहलाती है। धारणा में हम जिस बिंदु पर एकाग्र हैं ध्यान में वह बिंदु भी छूट जाता है। अधिकांश लोग समझते हैं कि ध्यान की कोई विधि होती है विधि तो धारणा की हो सकती है। ध्यान है विचारों व क्रियाओं से मुक्त होना। जैसे-जैसे ध्यान गहन होता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थिर होने लगता है। ध्यान में इंद्रियां मन के साथ विलीन होने लगती हैं। मन बुद्धि के साथ होने लगता है और बुद्धि आत्मा में लीन होने लगती है।
ध्यान का विज्ञान- आज वैज्ञानिक खोजों व अनुसंधानों से ज्ञात हो चुका है कि ध्यान मनुष्य को स्वास्थ्य प्रदान करता है। हम सामान्यत: यह सोचते हैं कि बीमारी का संबंध शरीर से होता है तथा बीमारी शरीर में आती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बीमारी शरीर में ही नहीं मन में भी उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य मन भी है और शरीर भी है। आचार्य रजनीश इस संबंध में कहते हैं कि 'आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है उसका नाम शरीर है तथा आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ के बाहर रह जाता है उसका नाम आत्मा है। अदृश्य शरीर का नाम आत्मा है तथा दृश्य आत्मा का नाम शरीर है ये दो चीजें नहीं हैं ये दो अस्तित्त्व नहीं हैं बल्कि एक ही अस्तित्त्व की दो भिन्न तरंग अवस्थायें हैंÓ।
इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि यदि शरीर में कोई बीमारी है तो उसका प्रभाव अंतस में भी पड़ता है और अंतस में कुछ घटित हो तो उसका प्रभाव बाहर शरीर पर पड़ेगा। जिस प्रकार यदि किसी बड़े तलाब में पत्थर फेंकने से उसमें जो तरंग व कंपन्न पैदा होंगे वे तरंग व कंपन्न तालाब के अंतिम छोर तक पहुंच जायेंगे और कभी-कभी ये कंपन्न वापस वहीं लौट आयेंगे जहां कंपन्न का केंद्र था। उसी प्रकार यदि मनुष्य के शरीर में कुछ घटित हो तो उसका प्रभाव अन्तकरण, आत्मा व मन तक भी पहुंच जायेगा और यदि मन व आत्मा में कोई परिर्वतन हो तो उसका प्रभाव शरीर में भी होगा शरीर में जो व्याधि है उसकी चिकित्सा तो दवाइयों से की जा सकती है लेकिन दवाईयों से अन्तकरण की चिकित्सा तो नहीं की जा सकती। प्राकृति चिकित्सा के 10 मूलभूत सिद्धातों में से एक सिद्धांत है कि कोई भी चिकित्सा आत्मा, मन व शरीर तीनों के लिए होनी चाहिए। तब प्रश्न यह उठता है कि आत्मा व मन की चिकित्सा किसके द्वारा की जाये? इनकी चिकित्सा की औषधि है 'ध्यानÓ। तो कहा जा सकता है कि यदि मनुष्य को पूर्ण स्वास्थ प्राप्त करना है तो औषधि के साथ-साथ ध्यान भी परम आवश्यक है।
8समाधि- समाधि योग का आठवां व अंतिम अंग है। जब योगी को अपने ध्येय विषय व स्वयं का कुछ भी ज्ञान नहीं रहता तब यह स्थिति 'समाधिÓ कहलाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जब ध्यान का अनुभव इतना गहरा हो जाता है कि अपने होने का अनुभव शून्य जैसा हो जाता है तो वह अवस्था समाधि कहलाती है। समाधि ऐसी स्थिति है जहां सारी व्याधियों का समाधान हो जाता है। समाधि पूर्ण स्वास्थ्य है।
मस्तिष्क का एक भाग भावनाओं से युक्त होता है व दूसरा भाग बुद्ध व विचारों से युक्त। जब किसी कारण से दोनों के बीच असंतुलन उत्पन्न हो जाता है तब हमारे विचार तथा भावनाओं में सामन्जस्य उत्पन्न नहीं होता। इस तरह मस्तिष्क की क्रिया में असंतुलन होने उलझन व कष्टï पैदा होते हैं। समाधि की स्थिति में इन सबका उपाय हो जाता है और दिव्य शक्ति व ज्ञान की प्राप्ति भी होती है।
वैज्ञानिकता के पक्ष में नई खोजें व प्रमाण
योग-शास्त्र को आध्यात्मिक शास्त्र होने के साथ-साथ एक मनोविज्ञान का शास्त्र भी कहा जा सकता है, क्योंकि योग शास्त्र का प्रारंभ ही चित्त वृत्तियों के शुद्धिकरण से होता है।
भारतीय दार्शनिक चिन्तन में तो इस दिशा में  प्रारम्भ से ही खोजे होती रही हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञान भी अब इस दिशा में प्रयासरत है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों द्वारा अभी तक केवल चेतन व अचेतन मन का ही अध्ययन किया जाता रहा है। उनके द्वारा मन की इससे गहन परत 'सुपर चेतनÓ का अध्ययन किया जाना अभी शेष है। योग एक ऐसा विज्ञान है जो अहंकार की मूल समस्या का समाधान करके एक उच्च ऊर्जा में विलय कर सकता है। इस उच्च ऊर्जा को कुछ और नहीं सुपर चेतन कहा गया है। सुपर चेतन को ईश्वर के समतुल्य माना जा सकता है। भारतीय दर्शनों में अंयआत्मा, ब्रह्मïा, प्रज्ञानम्ï ब्रह्मïा, चिदानन्दोअहम, तत्त्वमसि आदि सूत्रों में जिस सत्ता को परमात्मा माना गया है। उसी को विज्ञान की भाषा में 'सुपर चेतनÓ कहते हैं।
आधुनिक विज्ञान की एक नवीनतम खोज है 'क्वांण्टम कणÓ ये कण सूक्ष्म एवं अनन्त ऊर्जाओं के स्रोत हैं। इन कणों ने वैज्ञानिकों को हतप्रभ व आश्चर्यचकित किया हुआ है। भारतीय योग में परमात्मा को एक अनन्त ऊर्जा स्रोत की संज्ञा दी है। इसी आधार पर सुविख्यात वैज्ञानिक माइकल टालवोल ने अपने शोध अध्ययन 'मिस्ट्रिसिज्म एण्ड द न्यू फिजिक्सÓ में भारतीय तंत्र एवं योगविद्या की वैज्ञानिकता प्रमाणित की है। 'एसलीन इंस्टीट्ïयूटÓ के मनोवैज्ञानिक 'लगरैंस लीसेनÓ ने महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों पर कई सफल वैज्ञानिक प्रयोग सम्पन्न किये हैं। क्वांटम कण और तरंग सिद्धान्त में ब्रह्मïांड को ऊर्जा तरंगों का संद्यनिता रूप माना गया है। इसके अनुसार सृष्टिï का कण-कण तरंगों से निर्मित है। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या श्रोडिंगर के कैट मत एवं जान ए हीलर की सुपर स्पेस की परिकल्पना में हुई है। इसकी व्याख्या में यही बताया गया है कि संसार के सभी क्रियाकलापों के मूल में एक ही शक्ति क्रियाशील है। जो विभिन्न रूपों में दृश्य होती है। योग व भारतीय अध्यात्म विज्ञान की धारणा ही नहीं अपितु अनुभव भी है कि कण-कण परमात्मा की शक्ति है।
जर्मन भौतिक शास्त्री मैक्स प्लैंक ने पहली बार बताया कि प्रकाश एक तरंग नहीं वरन् क्वांटा नामक ऊर्जा इकाई से बना है। जो प्राणतत्त्व की ओर संकेत करता है और यदि भारतीय योग में देखें तो योग में प्राण का महत्त्व सर्वविदित है। 
इस युग के बौद्धिकता के शिखर समझे जाने वाले स्टीफन हाकिन्स ने स्पष्टï किया कि ब्लैक होल में स्पेसटाइम समाप्त हो जाता है। यदि योग की दृष्टिï से इस बात को देखें तो यह समाधि की स्थिति है जिसमें समय शून्य हो जाता है।
इसके अतिरिक्त स्टीफन हॉकिन्स ने बताया कि ब्लैक होल त्रिआयामी होता है और इसकी पूंछ में फोटान कण घूमते रहते हैं। विज्ञानी माइकल टालबोल ने इसकी समानता कुण्डलिनी शक्ति से स्थापित करने का प्रयास किया है। उनके अनुसार कुण्डलिनी शक्ति भी ब्लैक होल के समान सोई पड़ी है परंतु जब जागृत होती है तो प्रचण्ड बलयाकार तरंगों के सदृश ऊपर उठती है। ब्लैक होल व कुण्डलिनी दोनों ही अपरिमित एवं अनन्त शक्ति के भंडार होते हैं। दोनों की ही गति को वलयाकार माना गया है।
जॉन ए हीलर ने अपने शोध 'द सूपर नेचर एण्ड द नेचर ऑफ क्वाण्टम जिआ मेट्रोडायनेमिक्सÓ में अंतरिक्ष का जो वर्णन किया है उसे माइकल टालबोल ने शिव की जटा केसमान बताया है और कहा है कि जैसे शिव जटा को खोला और समेटा जा सकता है इसी तरह विद्युत धाराओं व बार्महोल के संकुचन व प्रसार सम्भव है। यदि योग शास्त्र की दृष्टिï से देखें तो यह सहस्रार का चक्र जाग्रत होने का वर्णन हो सकता है।
आधुनिक विज्ञानवेत्ता क्वाण्टम के तरंग व कण सिद्धान्त को योग के नाद व बिंदु के सिद्धान्त के समान मानते हैं। उनका मानना है कि नाद का अर्थ है तरंग और बिन्दु का अर्थ है कण। ब्रह्मïाण्ड के निर्माण के साथ चेतना का प्रवाह तरंग या नाद के रूप में हुआ। यदि दूसरी ओर देखें तो भारत के आध्यात्मविद समस्त जगत की अभिव्यक्ति का कारण शब्द या नाद ब्रह्मïा को मानते हैं।
वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि प्रकृति के अंतराल में एक ध्वनि प्रतिक्षण गुंजायमान होती रहती है जिसके कारण परमाणुओं में परस्परिक संघात द्वारा गति उत्पन्न होती है और सृष्टिï का समस्त क्रियाकलाप चलता है। यदि योग की दृष्टिï से देखें तो यह ध्वनि ही 'ऊंÓ है जिसे योग सूत्र में वाचक शब्द 'प्रणवÓ कहा गया है।
सत्प्रेम ने 'द एडवेंचर ऑफ कॉशनेसÓ में कहा है कि चेतना का विस्तार पदार्थ जगत की बहुआयामी सृष्टिï करता है यह वही ऊर्जा है जो जड़ एवं चेतना सभी को बांधे रखती है। इसे ही 'कान्शंस फोर्सÓ या 'चिंताम्रिÓ कहा गया है। श्री अरविन्द ने अपने ग्रन्थ 'सिन्थेसिस ऑफ योगÓ में इस शक्ति को ब्रह्मïांडीय चेतना का नाम दिया है सर्वत्र एक ही शक्ति प्रवाहित होती रहती है। सृष्टिï का एक कण इसके बाहर नहीं है सर्वत्र एक ही शक्ति है दो नहीं। अत: एक छोटे से कण के शक्तिहीन हो जाने से समूचा ब्रह्मïांड ही शक्तिहीन हो जाता है।
आइंस्टीन का सूत्र- श्व=रूद्ग२ में इसी तत्त्व का प्रकटीकरण हुआ है। 
जान.सी. लीली ने अपने ग्रंथ 'द ह्यूमैन कम्प्यूटरÓ में मानव मन को शक्तिशाली तरंग के रूप में निरुपित किया है। योग शास्त्र में तो प्रारम्भ से ही मन को चंचल कहा गया है और इसके एकाग्र करने का उपाय भी बताया गया है यदि उपरोक्त तथ्यों को समझा जाये तो पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने यह खोजें बाह्यï उपकरणों की सहायता से की परंतु भारतीय मनीषियों ने ये खोजें समाधि की स्थिति में ज्ञान प्रकट होने से कीं, क्योंकि भारतीय ऋषियों को एक रहस्य प्रकट हो गया था कि जो पिण्ड अर्थात् शरीर में है। वही ब्रह्मïांड में व्याप्त है।
यदि निष्कर्ष रूप में देखा जाए तो प्राचीन काल के ये आध्यात्मिक निष्कर्ष आधुनिक विज्ञान के प्रयोगों की कसौटी पर भी सर्वथा सत्य प्रमाणित हो रहे हैं। आध्यात्मिक सत्यों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता के आधार पर यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि योग एक सर्वांगीर्ण विज्ञान है और यह वर्तमान विज्ञान से नि:संदेह उच्च स्तरीय एवं उन्नत तो है ही और इसका सार्थक अनुशीलन निश्चितरूपेण भारत में पुन: विश्वगुरु बनाने में 
सहायक होगा।

 

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