फिर लौटा आयुर्वेद का जमाना

शशिकांत 'सदैव'

8th February 2021

एक युग था जब लोग रोगों की चपेट में नहीं आते थे और अगर आ भी जाते थे तो स्वस्थ होने के लिए आसपास में ही मौजूद वैद्य के पास चले जाते थे या फिर घर में ही इतने घरेलू उपचार होते थे कि रोग घरेलू-नुस्खों व आस-पास पाई जाने वाली वनस्पति के माध्यम से ठीक हो जाता था। घरेलू नुस्खों से समृद्ध चिकित्सा पद्धति का नाम है आयुर्वेद। इसके विषय में कई रोचक जानकारी पढ़ें इस लेख से।

फिर लौटा आयुर्वेद का जमाना

समय के चलते, आज प्रकृति भी दूषित हो गई है जिसके कारण हर चीज मिलावटी एवं अशुद्ध मिलती है। इसी अशुद्धता के कारण मानव जीवन में रोगों का भी प्रकोप बढ़ा है लेकिन समय की कमी के कारण लोग इन रोगों से मिनटों में ठीक हो जाना चाहते हैं जिसके लिए कई केमिकल वाली अप्राकृतिक दवाइयों का प्रयोग होने लगा है।

ये दवाइयां रोगी को ठीक तो कर देती हैं परंतु कई बार कुछ हद तक यह रोग को जड़ से खत्म करने में अक्षम रहती है या फिर इनसे जनित दुष्प्रभाव शरीर में कई अन्य रोग या व्याधियां उत्पन्न कर देते हैं।

एलोपैथिक दवाओं का मूल- आयुर्वेद 

दवाइयां देसी हों या विदेशी, प्राकृतिक हों या अप्राकृतिक, सत्य तो यह है कि वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेद से ही जुड़ी होती हैं। भले ही उनके 'रैपर' (आवरण, खोल) बदल गए हों परंतु भीतरी संघटक (सामग्री) कहीं न कहीं आयुर्वेद से ही जुड़ी होती है। हर रोग के इलाज के लिए हम दवाइयों पर ही आश्रित हैं। परंतु आज जमाना धीरे-धीरे बदल रहा है, वापस अपनी जड़ों की ओर रुख कर रहा है अर्थात् हम आज फिर आयुर्वेद की ओर उन्मुख हो रहे हैं, पुन: प्राकृतिक चिकित्सा एवं उपचार को अपना रहे हैं। आयुर्वेद में मात्र औषधियां ही नहीं बल्कि निरोगी एवं स्वस्थ रहने के विभिन्न उपचार, उपाय एवं चिकित्साएं भी हैं जिनके माध्यम से न केवल जटिल एवं असाध्य रोगों को ठीक किया जा सकता है बल्कि उनके होने से भी बचा जा सकता है। 

इस आधुनिक युग में हम जिन 'ऐलोपैथिक औषधियों' का सेवन करते हैं उनका भी मूल आयुर्वेद ही है। कोई भी रोग हो या कोई भी स्वास्थ्य संबंधी शोध सभी का आधार आयुर्वेद ही रहा है। बिना आयुर्वेद के कोई भी चिकित्सा, कोई भी औषधि, कोई भी शोध अधूरा है। आज हम जिन विदेशी दवाइयों का प्रयोग करते हैं वह और कुछ नहीं आयुर्वेद का ही दूसरा रूप है। ये दवाइयां हमारे रोगों को ठीक करने में हमारी मदद करती हैं परंतु हमें निरोगी नहीं बनातीं अर्थात् आयुर्वेद में ऐसे कई आयाम एवं नुस्खे हैं जिन्हें साधारण जन अपनाएं तो बिना किसी रोग के लंबी उम्र जी सकता है। ये विदेशी दवाएं न केवल कीमती होती हैं बल्कि इनका दुष्प्रभाव भी अधिक होता है और यदि इन दवाइयों का अधिक सेवन किया जाए तो शरीर में कई अन्य रोग पनपने की आशंका बनी रहती है। परंतु आयुर्वेद  में जिस माध्यम से मानव जीवन के स्वास्थ्य संबंधी उपचार एवं उपाय बताए गए हैं वह न केवल जातक को स्वस्थ एवं चिर-आयु रखते हैं बल्कि प्रकृति से जुड़े होने के कारण इनके कोई साइड इफेक्ट यानी दुष्प्रभाव भी नहीं होते हैं।

विदेशी भी अपना रहे हैं आयुर्वेद

यह बड़ी विडम्बना की बात है कि भारत की आयुर्वेद पद्धति को भारतीय कम विदेशी अधिक उपयोग में लाते हैं या फिर यह हमारे देश के लोगों की नियति है, यह धारणा है कि हम कोई चीज तभी अपनाते हैं, जब यह विख्यात हो जाए या फिर विदेश से होकर लौटती है। भारत में योग सदियों पुराना है परंतु जब वह विदेश से योगा बनकर लौटता है तो हम अधिक ध्यान देते हैं व उसके महत्त्व एवं उपयोग को समझते हैं। योगा और कुछ नहीं हमारे आयुर्वेद में योग का ही आधुनिक नाम है। फिर इसे 'एरोबिक्स' कहें या 'वर्क आउट' कहें सभी आयुर्वेद की ही उपज हैं। क्यों व कैसे भारत का आयुर्वेद भारत का कम विदेशियों का ज्यादा है? यह विषय शोचनीय एवं बहस का हो सकता है। बहरहाल सत्य तो यह है कि आज जमाना आयुर्वेद का है। विश्वभर में इसके चमत्कारिक प्रभाव एवं परिणाम दोनों देखने को मिल रहे हैं। लोग भारत के इस ज्ञान से पुन: भिन्न-भिन्न माध्यमों से जुड़ रहे हैं। फिर वह जड़ी-बूटियों द्वारा इलाज हो या स्पर्श चिकित्सा द्वारा, योग एवं ध्यान द्वारा हो या संगीत द्वारा।

सभी चिकित्साओं का आधार

जिसे आज विदेशी शोध या अपना आविष्कार कहते हैं वह सब हमारे आयुर्वेद में सदियों से उपलब्ध है। कुछ भी नया या अलग नहीं। हां, समय के चलते नामों में थोड़ा फेर-बदल हुआ है। वह 'रेकी' हो या 'ध्यान', 'संगीत चिकित्सा' हो या 'स्पर्श चिकित्सा', 'शल्य चिकित्सा' हो या 'त्वचा प्रत्यारोपण' (प्लास्टिक सर्जरी) सभी का उल्लेख आयुर्वेद में है। वो बात और है कि विज्ञान इसे आज समझ रहा है और महत्त्व दे रहा है। ये ही नहीं आयुर्वेद में ऐसी कई जड़ी-बूटियां, फूल-पत्तियां, पेड़-पौधे आदि हैं जिनके प्रयोग से कई असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। सूर्य, रत्न, चुंबक, मृदा, जल, यज्ञ, गंध, स्पर्श, वायु, मुद्रा, संगीत, योग, ध्यान, मंत्र, पूजा-पाठ, ज्योतिष-वास्तु मनोविज्ञान, सम्मोहन आदि सभी चिकित्सा विज्ञान एवं उपचार सब आयुर्वेद की ही उपज हैं और यह सभी माध्यम आज उत्तम स्वास्थ्य एवं सुखी जीवन को बिताने में किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाए जा रहे हैं।

आज जमाना है आयुर्वेद का इस बात की पुष्टि करने के लिए यूं तो कई नाम हैं परंतु एक नाम है 'स्वामी रामदेव जी महाराज' का, जिन्होंने आयुर्वेद के दम पर पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है व आयुर्वेद द्वारा कई असाध्य एवं जटिल रोगों को ठीक कर आयुर्वेद का लोहा मनवा दिया है जिसके चलते आज भारत के ही लोग नहीं तमाम अन्य देश भी आयुर्वेद की ओर उन्मुख हो रहे हैं। आज बड़ी से बड़ी हर शख्सियत फिर वह देश की हो या विदेश की, नेता हो या अभिनेता सभी न केवल रामदेव जी बल्कि किसी न किसी अन्य माध्यम से आयुर्वेद से जुड़ रहे हैं।

मन को शांत तथा एकाग्र करता है आयुर्वेद

अक्सर हम यही सोचते हैं आयुर्वेद यानी जड़ी-बूटियां एवं फूल-पत्तियों से बनी औषधियां आदि। आयुर्वेद का अर्थ इतना ही नहीं इसका विस्तार बहुत व्यापक है। आयुर्वेद में मात्र तन को ही नहीं मन को भी निरोगी एवं स्वस्थ रखने का खजाना दिया है। यह तो आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शरीर से ज्यादा लोग मन से बीमार होते हैं। मन रुग्ण एवं अशांत होगा तो शरीर पर उसका सीधा कुप्रभाव पड़ेगा और मन को स्वस्थ रखना इतना सरल नहीं। अशांत एवं बेचैन मन ही विकारों का कारण है। भीतरी तनाव ही अवसाद पैदा करता है जिससे कई अन्य शारीरिक रोग भी जन्म लेने लगते हैं। चिंता, भय एवं असंतुष्टि का भाव मानव को चैन से स्वस्थ जीवन जीने नहीं देता। शास्त्रों में कहा भी गया है 'चिंता चिता सब एक समान' कहने और लिखने में मात्र एक बिंदु का अंतर है परंतु यह भेद जीवन और मृत्यु से जुड़ा है। इसी चिंता से मुक्ति दिलाता है भक्ति, भजन और ध्यान का आध्यात्मिक मार्ग। यह सब भी आयुर्वेद का हिस्सा हैं। यह सब न केवल हमारे मन को शांत एवं एकाग्र कर हमारे भीतरी विकास एवं रूपांतरण में हमारी मदद करता है, बल्कि हमारे अंदर से क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, प्रतिस्पर्धा आदि को दूर कर हमारे भीतर संतुष्टि, प्रेम एवं सद्भाव की भावना पैदा करता है तथा आत्मविश्वास भी देता है। डॉक्टर भी कहते हैं हमारे अधिकतर रोगों का कारण हमारा मन होता है और रोगों से मुक्त होने के लिए दवाइयों से ज्यादा हमारा आत्मविश्वास काम करता है।

मीडिया में छाया आयुर्वेद

आज कोई संगीत चिकित्सा अपना रहा है तो कोई रेकी, कोई कुंडलिनी जागरण करवा रहा है तो कोई प्राणायाम, ज्योतिष अपने तंत्र-मंत्र एवं रत्न आदि से उपचार कर रहे हैं तो कई पुरानी विधियों का नए ढंग से आविष्कार कर उन्हें रोग मुक्त एवं जीवन रूपांतरण करने में उपयोग कर रहे हैं। परंतु फिर भी जिसे हम नया कह रहे हैं वह नया नहीं पुराना है। 'स्पा' को ही ले लीजिए आधुनिकता के बढ़ते इस चलन में 'स्पा' और कुछ नहीं सुगंध, स्पर्श, रोशनी एवं जल चिकित्सा का ही मिश्रित नाम है और यह सभी चिकित्साएं युगों पुराने आयुर्वेद से ही उत्पन्न हुई हैं। आज कोई हस्ताक्षर या लेखनी पढ़कर इन्सान के भविष्य एवं उसके मस्तिष्क में झांकने का हुनर दिखा रहा है तो कोई हिप्नोटिज्म (सम्मोहन) द्वारा इलाज करने में जुटा हुआ है। ये सारी विधाएं कोई नई नहीं हैं बस इन्हें आज टी.वी. (प्रचार-प्रसार) के माध्यम से और भी ग्लैमराइज्ड रूप मिल गया है।

तनाव में कारगर 

समय के साथ बढ़ते तनाव को देखते हुए हंसी को भी औषधीय रूप मिल गया है। जबकि यह सत्य है कि हंसने से तनाव कम होता है, मांसपेशियां खुलती हैं, रक्त का संचार व दबाव शरीर में ठीक रहता है। यही कारण है कि व्यायामशाला हो या टी.वी., रेडियो आदि पर बढ़ते हंसी के कार्यक्रमों का उद्देश्य लोगों को हंसाना है। यही नहीं आज बड़ी-बड़ी इंटरनेशनल कंपनियों में सप्ताह या माह के अंत में ऐसी कई 'स्ट्रेस आउट क्लासेस' होती हैं फिर उसमें जोर-जोर से हंसना हो, ताली बजाना हो, ध्यान क्रिया हो या फिर किसी संत आदि के प्रवचन। स्वस्थ एवं दुरुस्त रहने के ये सभी आयाम नए नहीं पुराने हैं। एक्यूप्रेशर कुछ और नहीं ताली बजाने का नया रूप है। हमारी हथेलियों में ऐसे कई बिंदु (स्थान) होते हैं जिनको दबाने से हमारे शरीर से संबंधित रोग एवं कष्ट दूर होते हैं। नियमित ताली बजाना कोई फैशन नहीं स्वयं को स्वस्थ रखने का आधुनिक माध्यम है।

आज भी प्रामाणिक आयुर्वेद

सौंदर्य के क्षेत्र में शरीर को सुडौल एवं खूबसूरत बनाने के लिए भी जो आज कल व्यायाम, कसरत एवं उपचार चल रहे हैं वह भी कोई नये नहीं हैं। अगर कोई कंपनी चेहरे की खूबसूरती या शारीरिक ताकत का कोई प्रॉड्क्ट भी बनाती है तो अपने विज्ञापनों में लोगों को आकर्षित करने के लिए यही लिखती है 'आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से भरपूर' फिर वह गोरे होने की क्रीम हो या नहाने का साबुन। प्रयोग में आने वाला हर सौंदर्य प्रसाधन यही दावा करता है कि हमारे प्रॉडक्ट में 'कोई केमिकल नहीं, टोटली नैचुरल है' और हम शीघ्र आकर्षित हो जाते हैं। इन विज्ञापनों और उनके प्रॉडक्ट्स में सत्य कितना है कहना मुश्किल है परंतु यह तो सही है कि सभी आयुर्वेद के नाम का प्रयोग कर रहे हैं, केमिकल को छोड़ आयुर्वेद को प्राथमिकता दे रहे हैं। आयुर्वेद की शक्ति को पहचान रहे हैं। फिर वस्तु को बनाने वाला उत्पादक हो या उनका उपयोग करने वाला उपभोक्ता, बड़े-बड़े डॉक्टर हों या उनकी चिकित्सा प्रणाली, धर्म गुरु हों या ब्यूटी एक्सपर्ट्स, आयुर्वेद की शरण में जा रहे हैं और आज एक आम आदमी से लेकर खास आदमी तक सब आयुर्वेद को अपनाना चाहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि आयुर्वेद का जमाना फिर लौट रहा है। 

यह भी पढ़ें -त्वचा की प्राकृतिक औषधि-मुल्तानी मिट्टी

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