स्वयं का दीया बनो - ओशो

ओशो

9th February 2021

अंधेरे में जो अकेले चलने का साहस करता है, बिना प्रकाश के उसके भीतर साहस का प्रकाश पैदा होना शुरू हो जाता है और जो सहारा खोजता है, वह निरंतर कमजोर होता चला जाता है। भगवान को आप सहारा न समझें, और जो लोग भगवान को सहारा समझते हैं, वे गलती में हैं। उन्हें भगवान का सहारा नहीं उपलब्ध हो सकेगा।

स्वयं का दीया बनो - ओशो

एक साधु के आश्रम में एक युवक बहुत समय से रहता था। फिर ऐसा संयोग आया कि युवक को आश्रम से विदा होना पड़ा। रात्रि का समय है। बाहर घना अंधेरा है। युवक ने कहा, 'रोशनी की कुछ व्यवस्था करने की कृपा करें।' उस साधु ने दीया जलाया। उस युवक को हाथ में दीया दिया। उसे सीढ़ियां उतारने के लिए खुद उसके साथ हो लिया और सीढ़ियां पार कर चुका और आश्रम का द्वार भी पार कर चुका तो उस साधु ने कहा, अब मैं अलग हो जाऊं। क्योंकि इस जीवन के रास्ते पर बहुत दिनों तक कोई किसी का साथ नहीं दे सकता है। अच्छा है कि इसके पहले मैं विदा हो जाऊं कि तुम साथ के आदी हो जाओ। इतना कहकर उस घनी रात में, उस अंधेरी रात में उसने अपने हाथ से दीये को फूंककर बुझा दिया। वह युवक बोला, यह क्या पागलपन हुआ? अभी तो आश्रम से बाहर भी नहीं निकल पाए, साथ भी छोड़ दिया और दीया भी बुझा दिया। उस साधु ने कहा, दूसरों के जलाए हुए दीये का कोई मूल्य नहीं है। अपना ही दीया हो तो अंधेरे में काम देता है। किसी दूसरे के दीये काम नहीं देते। खुद के भीतर प्रकाश निकले तो रास्ता प्रकाशित होता है, और किसी तरह रास्ता प्रकाशित नहीं होता। 

मैं निरंतर सोचता हूं लोग सोचते होंगे कि मैं आपके हाथ में कोई दीया दे दूंगा, जिससे आपका रास्ता प्रकाशित हो जाए तो आप गलती में हैं। आपके हाथ में कोई दीया होगा तो मैं उसे बड़ी निर्ममता से फूंककर बुझा दूंगा। मेरी मंशा और मेरा इरादा यही है कि आपके हाथ में अगर कोई दूसरों का दिया हुआ प्रकाश हो तो मैं उसे फूंक दूं। उसे बुझा दूं। आप अंधेरे में अकेले कूद जाएं। कोई आपका संगी-साथी हो तो उसे भी छीन लूं। और तभी जब आपके पास दूसरों का जलाया हुआ प्रकाश न रह जाए। दूसरों का साथ न रह जाए। तब आप जिस रास्ते पर चलते हैं, उस रास्ते पर परमात्मा आपके साथ हो जाता है और आपकी आत्मा का  दीया जलने की संभावना पैदा हो जाती है। 

 

सारी जमीन पर ऐसा हुआ है। सत्य की तो बहुत खोज है। परमात्मा की बहुत चर्चा है। लेकिन, ये सारे कमजोर लोग कर रहे हैं। जो साथ छोड़ने को राजी नहीं हैं, जो दीया बुझाने को राजी नहीं हैं, अंधेरे में जो अकेले चलने का साहस करता है, बिना प्रकाश के उसके भीतर साहस का प्रकाश पैदा होना शुरू हो जाता है और जो सहारा खोजता है, वह निरंतर कमजोर होता चला जाता है। भगवान को आप सहारा न समझें, और जो लोग भगवान को सहारा समझते हैं, वे गलती में हैं। उन्हें भगवान का सहारा नहीं उपलब्ध हो सकेगा। 

कमजोरों के लिए जगत् में कुछ भी उपलब्ध नहीं होता, और जो शक्तिहीन हैं, और जिनमें साहस की कमी है, धर्म उनका रास्ता नहीं है। दिखता उल्टा है। दिखता यह है कि जितने कमजोर हैं, जितने साहसहीन हैं, वे सभी धार्मिक होते हुए दिखाई पड़ते हैं।

कमजोरों को, साहसहीनों को, जिनकी मृत्यु करीब आ रही है, उनको घबराहट में, भय में धर्म का ही मार्ग मालूम होता है। इसलिए धर्म के आस-पास कमजोर लोग इक हो जाते हैं। जबकि बात उल्टी है। धर्म तो उनके लिए है, जिनके भीतर साहस हो, जिनके भीतर शक्ति हो, जिनके भीतर बड़ी दुर्दम्य हिम्मत हो और जो कुछ अंधेरे में अकेले बिना प्रकाश चलने का दुस्साहस कर सकें। 


तो यह मैं प्राथमिक रूप से आपसे कहूं। दुनिया में यही वजह है कि जबसे कमजोरों ने धर्म को चुना है, तबसे धर्म कमजोर हो गया और सारी दुनिया में कमजोर ही धार्मिक हैं। जिनमें थोड़ी सी हिम्मत है, वे धार्मिक नहीं हैं। जिनमें थोड़ा-सा साहस है, वे नास्तिक हैं। जिनमें साहस की कमी है, वे सब आस्तिक हैं। 


भगवान की तरफ सारे कमजोर इक_ हो गए हैं, इसीलिए दुनिया में धर्म नष्ट होता चला जा रहा है। इन कमजोरों को भगवान तो बचा ही नहीं सकता, ये कमजोर भगवान को कैसे बचाएंगे, कमजोरों की कोई रक्षा नहीं है, और कमजोर भी किसी की रक्षा कैसे करेंगे? 

सारी दुनिया में, मनुष्य के इतिहास के इन दिनों में, इन क्षणों में जो धर्म का अचानक ह्रास और पतन हुआ है, इसका बुनियादी कारण यही है। तो मैं आपको कहूं, अगर आपमें साहस हो तो ही धर्म के रास्ते पर चलने का मार्ग खुलता है। न हो, तो दुनिया में बहुत रास्ते हैं। धर्म अपने में ही हो सकता है। जो आदमी भय के कारण भयभीत होकर धर्म की तरफ आता हो, वह गलत आ रहा है क्योंकि सारे धर्म-पुरोहित आपको भय देते हैं, नर्क का भय, स्वर्ग का प्रलोभन, पाप-पुण्य का भय। प्रलोभन घबराहट पैदा करते हैं। वे घबराहट के द्वारा आपमें धर्म का प्रेम पैदा करना चाहते हैं। और यह आपको पता है कि भय से कभी प्रेम पैदा नहीं होता और जो प्रेम भय से पैदा होता है, वह प्रेम झूठ होता है, उसका कोई मूल्य नहीं होता। आप भगवान से डरते हैं, तो आप नास्तिक आस्तिक नहीं हो सकते। कुछ लोग कहते हैं, जो भगवान से डरे वह आस्तिक है। बात ठीक नहीं है। जो ईश्वर से डरता है, वह ईश्वर से डरने वाला आस्तिक है। यह बिल्कुल झूठी बात है। ईश्वर से डरने वाला कभी आस्तिक नहीं हो सकता। क्योंकि डरने से कभी प्रेम पैदा नहीं होता और जिससे हम भय करते हैं, उसे हम प्राणों से बहुत घृणा करते हैं। भय के साथ भीतर घृणा छिपी रहती है जो लोग भगवान से भयभीत हैं, वे भगवान के शत्रु हैं, और उनके मन में भगवान के प्रति घृणा होगी।


मैं आपसे कहूं, ईश्वर से भय मत खाना। ईश्वर से भय खाने का कोई कारण नहीं है। इस सारे जगत् में अकेला ईश्वर ही है, जिससे भय खाने का कोई कारण नहीं है, और सारी चीजें भय खाने से हो सकती हैं, लेकिन हुआ उल्टा है, और मैं बड़े-बड़े धार्मिकों को यह कहते सुनता हूं कि ईश्वर का भय खाओ, ईश्वर का भय खाने से पुण्य पैदा होगा। ईश्वर का भय खाने से सच्चरित्रता पैदा होगी। यह निहायत झूठी बातें हैं। भय से कहीं सदाचार पैदा हुआ है? जैसे हमने रास्ते पर पुलिस खड़ी कर रखी है, वैसे हमने परलोक में भगवान को खड़ा कर रखा है। वह एक बड़े पुलिसवाले की हैसियत से है। एक बड़े कांस्टेबिल की हैसियत का है। भगवान को जिन्होंने कांस्टेबिल बना दिया है, उन लोगों ने धर्म को बहुत नुकसान पहुंचाया है।

भगवान के प्रति भय से कोई विकसित नहीं होता। भगवान के प्रति तो बड़ा अभय चाहिए और अभय का अर्थ क्या होगा? अभय का अर्थ होगा कि जो लोग श्रद्धा करते हैं, वे लोग भय के कारण श्रद्धा करते हैं। इसलिए श्रद्धा को मैं धर्म की आधारभूत पर्त नहीं मानता। आपने सुना होगा कि जिसको धार्मिक होना हो, उसे श्रद्धालु होना चाहिए।


श्रद्घा, धर्म के लिए आधार नहीं रह जानी चाहिए। ज्ञान, विवेक, शोध, धर्म का अंश हो जाना चाहिए। अगर यह हो सका तो धर्म से बड़ा विज्ञान इस जगत् में दूसरा नहीं है और जिन लोगों ने धर्म को खोजा और जाना, उससे बड़े वैज्ञानिक नहीं हुए। उनकी अप्रतिम खोज है। मनुष्य के जीवन में उस खोज से बहुमूल्य कुछ भी नहीं है। उन सत्यों की थोड़ी-सी भी झलक मिल जाए तो जीवन अपूर्व आनंद और अमृत से भर जाता है।  


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