बाल मजदूरी की आग में झुलसता बचपन

ज्योति प्रकाश खरे

18th February 2021

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकलन के अनुसार पूरे विश्व में लगभग 12 करोड़ बाल श्रमिक हैं जिनमें से अकेले भारत में ही 3 करोड़ बाल श्रमिक हैं। सबसे अधिक बाल श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, जो प्राय: बंधुआ मजदूर के रूप में खेतों में या ईंट भट्टो पर कार्य करते हैं।

बाल मजदूरी की आग में झुलसता बचपन

नन्हीं-नन्हीं आखेंं, जिनमें सजते हैं बड़े-बड़े सपने, भले ही देश को अपने सुनहरे भविष्य की तस्वीर नजर आती हो, मगर जब यही आंखें विपरीत परिस्थितियों में श्रम के कठोर यथार्थ की आंच में तपती हुई स्वयं अपने भविष्य की ओर देखती हैं तो वहां अंधेरे के सिवा कुछ भी नजर नहीं आता। वैसे तो विश्व के प्राय: सभी देशों में किसी-न-किसी रूप में बाल-श्रमिक देखे जा सकते हैं, लेकिन यदि इस समस्या को भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के संदर्भ में देखा जाये, तो यहां प्राय: हर क्षेत्र में और विपरीत परिस्थितियों में बाल श्रमिक मजदूरी करते मिल जायेंगे। यह विडम्बना ही कही जायेगी कि जो बच्चे देश के भावी राष्ट्र निर्माता कहे जाते हैं, वे बचपन में ही कमरतोड़ परिश्रम से इस कदर तोड़ दिये जाते हैं कि जवान होकर वे देश की कौन कहे, स्वयं अपना बोझा भी उठाने लायक नहीं रह जाते। दरअसल भारत में करोड़ों ऐसे बच्चे हैं जिन्हें उनकी खेलने-खाने और समुचित शिक्षा प्राप्त करने की उम्र में ही आजीविका की भट्टो में झोंक दिया गया है।

कस्बाई बाजारों के ढाबों और चाय की दुकानों से लेकर शहरों में स्थित छोटे-मोटे होटलों तक में मासूम बच्चों को कप-प्लेट या जूठे बर्तन धोते, नाक साफ करते, मालिकों की गालियां, मार सहते और ग्राहकों की सेवा में हरदम तत्पर देखा जा सकता है। इन असंगठित क्षेत्रों के अलावा कई संगठित उद्योगों, जैसे- जम्मू और कश्मीर और मिर्जापुर के कालीन-उद्योग, केरल, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश के बीड़ी-उद्योग, शिवकाशी (तमिलनाडु) के आतिशबाजी एवं माचिस उद्योग, फिरोजाबाद के कांच-उद्योग और पश्चिम बंगाल के हथकरघा उद्योग में बड़ी संख्या में मासूमों की श्रम शक्ति लगी हुई है। 

अमानवीय परिस्थितियों में जीवन जीेते बाल मजदूर

बाल श्रमिकों के सस्ते श्रम पर ही ये उद्योग फल-फूल रहे हैं। इन उद्योगों में लाखों की संख्या में बाल मजदूर काम करते हैं, जिनकी स्थिति लगभग गुलामों-सी है। इनमें से अधिकांश उद्योग स्वास्थ्य और जीवन के लिए खतरनाक हैं। फिर भी, पेट की खातिर ये बाल श्रमिक शिक्षा, खेलकूद और पौष्टिक भोजन से वंचित रह कर भी अत्यंत ही अमानवीय परिस्थितियों में अपना जीवन खतरे में डालकर काम करने को मजबूर हैं। यही उनकी दिनचर्या होती है और यही उनकी नियति भी। 

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के अंतर्गत समाविष्ट अनुच्छेद-24 के अन्तर्गत कहा भी गया है कि '14 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जायेगा या किसी अन्य परिसंकटमय नियोजन में नहीं लगाया जायेगा।' तात्पर्य यह कि 14 वर्ष या उससे कम आयु के बच्चे को किसी भी खतरनाक कार्य में नहीं लगाया जायेगा। संविधान की धारा-39 में बच्चों को दमन एवं शोषण के विरुद्ध संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि ये सभी प्रावधान संविधान के पन्नों तक ही सीमित रह गये हैं और सरकार व्यावहारिक रूप में बच्चों का शोषण रोकने के लिए कोई कारगर कदम अब तक नहीं उठा सकी है। फिर भी इस दिशा में कुछ प्रयास तो किये ही गये हैं, मसलन- न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, खदान कानून 1952 और फैक्ट्री कानून 1966, और वितरण संरक्षण अधिनियम 1971 इत्यादि में बाल मजदूरों के हित में अनेक प्रावधान किये गये हैं। लेकिन बाल श्रमिकों से संबंधित कानून उनका शोषण रोकने की दिशा में अधिक कारगर नहीं सिद्ध हो रहे हैं। लेकिन बाल श्रम से संबंधित कानूनों को सफलता नहीं मिल पाने के पीछे एक कारण यह भी है कि ये कानून सिर्फ संगठित क्षेत्रों पर ही लागू हो पाते हैं, जबकि असंगठित क्षेत्रों, जैसे- खेतों, ढाबों, होटलों और लघु उद्योगों इत्यादि में बाल मजदूरों की स्थिति जस-की-तस बनी हुई है और इन क्षेत्रों में बाल श्रमिकों की संख्या भी सर्वाधिक है। 

दरअसल बाल श्रमिकों की समस्या मूलत: निर्धनता से जुड़ी हुई है। इसलिए इस समस्या को सुलझाने के लिए सबसे पहले गरीबी को कम करना या समाप्त करना आवश्यक है और बच्चों को उनका बचपन लौटाना उससे भी कहीं ज्यादा आवश्यक।  

बच्चों से जुदा होता उनका बचपन

आज के बच्चों के पास सब कुछ है, सिवाय 'बचपन' के। डा. राधाकृष्णन ने शिक्षा आयोग का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा था, 'मैं उस दिन की कल्पना करता हूं, जब भारत के विद्यालय राष्ट्र का बौद्धिक-सांस्कृतिक नेतृत्व करेंगे। नया परिवेश बनाने में उनकी भूमिका निर्णायक होगी।' लेकिन आज की शिक्षा से इस दिशा में किसी भी तरह के योगदान की कल्पना नहीं की जा सकती। ऊंची-से-ऊंची नौकरी पाने की रौ में पढ़ाई का उद्देश्य सिर्फ इतना रह गया है कि किसी तरह क्लास में ऊंचा रैंक पा लिया जाये और ऊंचे रैंक पाने के इस तनाव में क्लास का प्रत्येक बच्चा एक-दूसरे से धीरे-धीरे अलग होता जाता है।

आज के परिवार में 'मानवीय संवेदनाएं' खत्म हो रही हैं, आधुनिक परिवारों से दादा-दादी के कटने का खामियाजा सबसे अधिक बच्चे को भुगतना होता है। शहरी परिवारों में अमूमन माता-पिता दोनों काम करते हैं, उनके पास बच्चे को देने के लिए टेलीविजन है, वीडियो और एयर कंडीशनर तो हैं, लेकिन उसकी भावनाओं को समझने के लिए समय नहीं है। नतीजा यह होता है कि बच्चे को अपने मन में आयी अच्छी-बुरी कोई भी भावना को 'साझा' करने के लिए सामने कोई नहीं मिलता और एक असंतोष उसके मन में घर करने लगता है।

आधुनिकता की होड़ में हम खुद भी बच्चे को समय से पूर्व ही परिपक्व करने का प्रयास करते हैं। बच्चों की स्वाभाविक आकांक्षाएं और माता-पिता की उम्मीदें भी एक अनचाहे टकराव को जन्म देती हैं, जिससे बच्चे अपने प्राकृतिक स्वभाव से मुक्त हो जाते हैं।

बच्चों की रुचियों के अनुरूप उन्हें उत्साहित नहीं किया जाता, बल्कि माता-पिता अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। बचपन से ही बोझिल पाठयक्रम और भारी बस्ते के नीचे बच्चे को इस तरह दबा दिया जाता है कि पढ़ाई से उसके मन में अरुचि हो जाती है और जो शिक्षा उसे सामाजिक मूल्यों से जोड़ कर राष्ट्र का एक योग्य नागरिक बना सकती थी, वह रोजी-रोटी कमाने की बाध्यता बन कर रह जाती है। 

आज के विखंडित समाज मेें यह हम कैसे सोच सकते हैं कि हमारे बच्चे फूलों के बीच खेलते बड़े  हों? खिलौनों में आज शायद  सबसे अधिक बिक्री बंदूकों की ही होती है। बचपन में खिलौनों का संग-साथ भावी जीवन मे आदतों, रुचियों और शैली को भी रेखांकित करता है।

शैशव यदि स्वाधीन नहीं है, खेल भरा नहीं है, उसमें दुलार-उल्लास, क्रीड़ा-लीला और आनंद नहीं है, तो मुक्त मन और मौलिक सृजनात्मकता के विकास की कल्पना भी दूभर है।

यह भी पढ़ें -पेड़ों से बंधी जीवन की डोर

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