देश का भविष्य हैं बच्चे: पंडित नेहरू

सरिता शर्मा

18th February 2021

14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाए या फिर नेहरू जयंती, दोनों ही एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को जितना प्रेम अपने राष्ट्र से था उतना ही राष्ट्र के भविष्य कहे जाने वाले नन्हे-मुन्ने बच्चों से भी था। डालते हैं एक नजर इस आलेख से।

देश का भविष्य हैं बच्चे: पंडित नेहरू

भारतीत्र स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी जी के सान्निध्य में नेहरू जी एक सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे। 1947 में भारत के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर 1964 में अपने अंतिम समय तक उनके द्वारा किए सराहनीय कार्यों के कारण उन्हें आधुनिक भारत का वास्तुकार भी कहा जाता है।

नेहरू जी उच्चकोटि के लेखक भी थे। स्वतंत्रता की लड़ाई हेतु जब वे जेल गए तो उन्होंने स्वयं को व्यस्त रखने के लिए लेखन को चुना और कई लेख व पुस्तकें लिखीं। नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा को 'टूवर्ड फ्रीडम' नामक पुस्तक के रूप में लिखा, जिसे 1936 में अमेरिका में प्रकाशित किया गया था। इसके अतिरिक्त 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' नामक पुस्तक लिखी जिस पर धारावाहिक सीरिज भी बनी और बहुत ही लोकप्रिय हुई। उन्होंने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करते हुए स्वयं खादी की जैकेट और टोपी पहनना शुरू कर दिया जिसे आज तक नेहरू जैकेट व नेहरू टोपी के नाम से जाना जाता है। 

जब हमारा देश आजाद हुआ तो पहले प्रधानमंत्री के रूप में पं. जवाहर लाल नेहरू ने देश की बागडोर अपने हाथों में ले ली और कई प्रकार की पंचवर्षीय योजनाओं को क्रियान्वित करके देश की तरक्की के लिए नए रास्ते विकसित किए।

भारत के प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्रता प्राप्ति की पूर्व संध्या पर नेहरू जी ने एक ऐतिहासिक भाषण दिया- 'आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी तो भारत स्वतंत्रता की एक नई सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत कम आता है, जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जाते हैं। जब एक युग का अंत होता है और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा अपने मन की बात कह सकती है। यह एक संयोग ही है कि इस पवित्र मौके पर हम समर्पण के साथ भारत और उसकी जनता की सेवा और उससे भी बढ़ कर सारी मानवता की सेवा की प्रतिज्ञा ले रहे हैं।'



नेहरू को जितना प्रिय देश था उतना ही लगाव और स्नेह बच्चों से भी था। उनके कोट में लाल गुलाब और दिल में बच्चे तो जैसे सदा साथ रहते हों। नेहरू जी बच्चों से बहुत प्यार करते थे। एक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते हुए अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा सा समय निकाल कर बच्चों से मिलते, उनके साथ खेलते व खूब बातें करते। उनका मानना था कि बच्चों का मन साफ और कोमल होता है। उनके सामने कोई भी बात हुई हो, उनके बालमन पर इसका बहुत गहरा असर पड़ता है। अत: उन्हें दिए जाने वाले संस्कारों और ज्ञान की बात पर विशेष ध्यान केंद्रित करना हर परिवार की जिम्मेदारी है।

14 नवंबर को बाल दिवस मनाने का यही मतलब था कि पण्डित नेहरू जिनका जन्मदिन भी इसी दिन आता है, उन्हें व उनके बच्चों के प्रति प्रेम को याद किया जाए। बच्चे उन्हें प्यार से चाचा नेहरू कह कर बुलाते थे। वैसे देखा जाए तो बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई जब बच्चों के कल्याण के लिए विश्व कांफ्रेस में कई योजनाओं की घोषणा की गई थी। सन् 1954 में इस दिन को मनाने के लिए दुनिया भर में इसे मान्यता मिली।

पण्डित नेहरू जी कहते थे कि बच्चे देश का भविष्य हैं, अत: उन्हें शिक्षित अवश्य करना चाहिए। वे बालश्रम के सख्त खिलाफ थे।

बाल दिवस का इंतजार स्कूल के बच्चे बड़ी बेसब्री से करते हैं क्योंकि इस दिन बच्चों को स्कूल की यूनिफॉर्म नहीं पहननी पड़ती और ना हीं पढ़ाई होती है। अनेको प्रतियोगिताएं इस दिन प्रायोजित की जाती हैं ताकि बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा को पहचान कर उन्हें आगे की ओर अग्रसर किया जा सके।

इस अवसर पर केंद्र व राज्य सरकारें बच्चों के कल्याण से जुड़ी अनेक प्रकार की घोषणाएं करती हैं ताकि एक दिन वे देश के योग्य नागरिक बन सकें। विश्वभर में बाल दिवस अलग-अलग दिन पर मनाया जाता है। कुछ भी हो, सबका मकसद सिर्फ एक ही होता है। बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाना। भारत में यह दिन पण्डित जवाहरलाल नेहरू जी के जन्मदिन यानि 14 नवंबर को मनाया जाता है लेकिन विश्वभर में इसे 20 नवंबर को अंतर्राष्ट्रीय बाल-दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन बच्चों से जुड़े मुद्दों के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए भी मनाया जाता है।

20 नवंबर को बाल दिवस का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि इसी दिन संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने बाल-अधिकारों की घोषणा की थी। बाल-अधिकारों को चार अलग-अलग भागों में बांटा गया है - जीवन जीने का अधिकार, संरक्षण का अधिकार, सहभागिता और विकास का अधिकार।

14 नवंबर के दिन नेहरू जी को याद करते हुए हमें उनके संदेश को नहीं भूलना चाहिए जोकि हमारे बच्चों को प्यार, सुरक्षा और समान अवसर देने को प्रेरित करता है।  

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