धर्म की साधना होती है, शिक्षा नहीं

ओशो

18th February 2021

इस दुनिया में दो-तीन अरब लोग हैं। चार-छ: अरब आंखें हैं। एक अंधे आदमी की दो आंखों का जो मूल्य है, वह छ: अरब आंखों का नहीं है। मैं आपसे यह कहना चाहूंगा। अपने भीतर श्रद्घा की जगह विवेक को जगाने के उपाय करने चाहिए और विवेक को जगाने के क्या नियम हो सकते हैं, उस संबंध में थोड़ी-सी बात आपसे कहूं।

धर्म की  साधना होती है,  शिक्षा नहीं

पहली बात, जन्म के साथ प्रत्येक मनुष्य को, दुर्भाग्य से, किसी-न-किसी धर्म में पैदा होने का मौका मिलता है। दुनिया अच्छी होगी तो हम यह दुर्भाग्य कम कर सकेंगे। लेकिन अभी यह है और तब परिणाम यह होता है कि जगत् में विवेक का कोई जागरण नहीं होता। बाल मन होता है। चुपचाप चीजें स्वीकार कर लेने की मन:स्थिति होती है। तब सारे धर्मों के सत्य उसके मन में प्रवेश करा दिए जाते हैं। तब उसके मन में सारी बातें डाल दी जाती हैं। वह उनपर श्रद्धा करने लगता है।

मैं एक गांव में गया तो वहां एक अनाथालय देखने गया। वहां कोई पचास बच्चे थे। उस अनाथालय के संयोजक ने मुझसे कहा कि इनको हम धार्मिक शिक्षा भी देते हैं। मुझे यह समझकर कि मैं साधु जैसा हूं, उसने सोचा कि ये खुश होंगे कि मैं इनको धर्म की शिक्षा देता हूं। मैंने उनसे कहा, इससे बुरा काम दूसरा नहीं है दुनिया में क्योंकि धर्म की शिक्षा आप क्या देंगे? धर्म की कोई शिक्षा होती है? धर्म की साधना होती है। शिक्षा नहीं होती है।

अभी मैं सुन रहा हूं कि एक बहुत बड़े वैज्ञानिक ने अमरीका में एक संस्था खोली है, जहां वे प्रेम की शिक्षा देते हैं। यह तो बड़ी बेवकूफी की बात है। यह तो बड़ी मूर्खतापूर्ण बात है। उस संस्था से जो लोग प्रेम की शिक्षा लेकर निकलेंगे, इस जगत् में वे प्रेम कभी न कर पाएंगे- स्मरण रखें। कैसे प्रेम करेंगे? वे जब भी प्रेम करेंगे तभी शिक्षा बीच में आ जाएगी। अगर उनके भीतर प्रेम उठेगा तब उनके सिखाए हुए ढंग बीच में आ जाएंगे और वे अभिनय करने लगेंगे, प्रेम नहीं कर सकेंगे। जब भी उनके हृदय में कुछ कहने को होगा, तब वे उन किताबों से कहेंगे- जिनमें लिखा हुआ है कि प्रेम की बातें कैसे कहनी चाहिए? और तब वैसा आदमी जो प्रेम में शिक्षित हुआ है प्रेम से वंचित हो जाएगा और यह मैं कहता हूं, जो धर्म में शिक्षित होगा वह धर्म से वंचित हो जाएगा क्योंकि धर्म तो प्रेम से भी बड़ा गूढ़ है। बड़े रहस्य की चीज है। प्रेम को तो कोई सीख भी ले। धर्म को कैसे सीख सकेगा? धर्म की कोई लर्निंग नहीं होती। यह कोई गणित थोड़े है। फिजिक्स थोड़े है, कोई भूगोल थोड़े है कि आपने समझा दिया और लोगों ने याद कर लिया और परीक्षा दे दी। धर्म की कोई परीक्षा हो सकती है? अगर धर्म की परीक्षा नहीं हो सकती तो शिक्षा भी नहीं हो सकती। जिस चीज की भी परीक्षा हो सके उसकी ही शिक्षा हो सकती है।

तो मैंने उनको कहा, आप बड़ा बुरा कर रहे हैं। उन बच्चों को मन में बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। क्या शिक्षा देते होंगे? वे बोले, आप क्या कहते हैं, अगर धर्म की शिक्षा न होगी तो लोग जल्दी बिगड़ जाएंगे। मैंने कहा, दुनिया में इतनी धर्म की शिक्षा है। लोग बने हुए दिखाई पड़ रहे हैं? दुनिया में इतनी धर्म की शिक्षा-जितनी बाइबिल बिकती है कोई किताब नहीं बिकती, जितनी गीता पढी जाती है, कोई किताब नहीं पढ़ी जाती। जितने रामायण के पाठ होते हैं, कौनसी किताब के होते होंगे? कितने संन्यासी हैं, कितने साधू हैं? एक-एक धर्म के कितने प्रचारक हैं? कैथलिक ईसाइयों के प्रचारकों की संख्या ग्यारह लाख है और इसी तरह सारी दुनिया के धर्मप्रचारकों की संख्या है। यह इतना प्रचार, इतनी शिक्षा, इसके बाद आदमी कोई बना हुआ तो मालूम नहीं होता। इससे बिगड़ी शक्ल और क्या होगी, जो आदमी की आज है।

तो मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि धर्म-शिक्षा से आदमी नहीं ठीक होगा। मैंने उनको कहा, यह गलत बात है। फिर मैं समझूं आप क्या शिक्षा देते हैं। उन्होंने कहा, इनसे कोई भी प्रश्न पूछिए, ये हर प्रश्न का उत्तर देंगे। मैंने कहा, यही दुर्भाग्य है। सारी दुनिया में किसी से भी पूछिए, 'ईश्वर है?' कह देगा 'है'। यही खतरा है। जिनको पता नहीं है वे कहते हैं, 'है' और परिणाम यह होगा कि वह धीरे-धीरे अपने इस उत्तर का खुद विश्वास कर लेंगे कि ईश्वर है, और तब इनकी खोज समाप्त हो जाएगी। मैंने इन बच्चों से पूछा, 'आत्मा है?' वे सारे बच्चे बोले, 'है'। उनसे पुन: मैंने पूछा 'आत्मा कहां हैं?' उन सबने अपने हृदय पर हाथ रखा और कहा, 'यहां।' मैंने एक छोटे से बच्चे से पूछा, 'हृदय कहां हैं?' वह बोला, 'यह हमें सिखाया नहीं गया। यह हमें बताया नहीं गया।' मैं उन संयोजक को कहता था कि ये बच्चे जब बड़े हो जाएंगे तो यही बातें दोहराते रहेंगे, और जब भी प्रश्न उठेगा, आत्मा है? तो यांत्रिक मैकेनिकल रूप से इनके हाथ भीतर चले जाएंगे। ये कहेंगे, यहां। यह बिल्कुल झूठा हाथ होगा। यह सीखे की वजह से चल जाएगा।

आपके जितने उत्तर हैं, परमात्मा के संबंध में, धर्म के संबंध में, वह सब सीखे हुए हैं। विवेक-जागरण के लिए पहली शर्त है, जो भी सीखा हो सत्य के संबंध में, उसे कचरे की भांति बाहर फेंक दें, जो आपके मां-बाप ने, आपकी शिक्षा ने, आपकी परंपरा ने सिखाया हो उसे कचरे की भांति बाहर फेंक देना। धर्म इतनी ओछी बात नहीं है कि कोई सिखा सके। उसमें आपके मां-बाप का, आपकी परंपरा का मैं अपमान नहीं कर रहा हूं। उसमें मैं धर्म की प्रतिष्ठा कर रहा हूं। स्मरण रखें, मैं यह नहीं कह रहा हँ कि परंपरा बुरी बात है। मैं यह कह रहा हूं कि धर्म इतनी बड़ी बात है कि परंपरा नहीं सिखा सकती। मैं यह कह रहा हूं कि धर्म इतनी बड़ी बात है कि कोई मां-बाप नहीं सिखा सकते। मैं यह कह रहा हूं कि धर्म इतनी बड़ी बात है कि कोई पाठशाला नहीं सिखा सकती। जो लोग समझते हैं कि सिखाया जा सकता है धर्म, उनको धर्म की महिमा का पता नहीं है।

पहली बात है जिज्ञासा। स्वतंत्र जिज्ञासा। और जो सिखाया गया है, उसे कचरे की भांति फेंक देने की जरूरत है। इसके लिए साहस चाहिए। अपने वस्त्र छोड़कर नग्न हो जाने के लिए उतने साहस की जरूरत नहीं है, जितने साहस की जरूरत उन मन के वस्त्रों को छोड़ने के लिए है, जो परंपरा आपको सिखा देती है, और उन ढांचों को तोड़ने के लिए जो समाज आपको दे देता है। हम सबके मन बंधे हुए हैं एक ढांचे में, और उस ढांचे में जो बंधा है, वह सत्य की उड़ान को नहीं ले सकेगा। इसके पहले कि कोई सत्य की तरफ अग्रसर हो, उसे सारे ढांचे तोड़कर मिटा देने होंगे। मनुष्य ने जितने भी विचार परमात्मा के संबंध में सिखाए हैं, उसे उन्हें छोड़ देना होगा।  

यह भी पढ़ें -ग्रह नक्षत्र भी देते हैं सिरदर्द

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