सोच बदलो, देश बदलो

पंकज के. सिंह

19th February 2021

भारत आज अनेक मोर्चों पर संघर्ष करता दिखाई पड़ रहा है। समस्त प्रकार के संसाधनों और प्रतिभाओं के बावजूद यदि हम अपने सपनों के भारत का निर्माण नहीं कर पा रहे हैं, तो उसके लिए हमारी मानसिकता उत्तरदायी है। नि:संदेह अनेक सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध यह संघर्ष बहुत पुराना है। इसके लिए समग्र समाज की मानसिक क्रांति की आवश्यकता है।

सोच बदलो, देश बदलो

पुरातन घिसी- पिटी मान्यताएं और कुप्रथाएं आसानी से नहीं जातीं। यह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेती हैं। अनेक वैज्ञानिक प्रगति और उच्च शिक्षा के बावजूद भारत में जाति- भेद और लैगिंक असमानता आज भी समाज में व्याप्त है। अवैज्ञानिक और अतार्किक आधार पर बेटे और बेटियों में भेद किया जा रहा है। देश के लिए विडंबना ही कहा जाएगा कि जिस देश में नारी पूजनीय है, उसी देश में महिलाओं की स्थिति दयनीय है। महिलाओं ने स्वयं को निरंतर प्रत्येक क्षेत्र में सफलतापूर्वक सिद्ध किया है। घर- परिवार और चूल्हे-चौके से लेकर सत्ता के गलियारों तक महिलाओं की गूंज ने साबित कर दिया है कि वह अबला नहीं है और राष्ट्र तथा समाज के निर्यात में हरसंभव योगदान दे सकती है। 

खेल जैसे क्षेत्र में भी भारतीय महिलाओं ने शानदार उपलब्धियां अर्जित कर संपूर्ण विश्व को चमत्कृत कर दिया है। आज भारत की बेटियां ओलंपिक जैसी स्पर्धाओं तक में पदक ला रही हैं। जब वे उपलब्धियां अर्जित करती हैं, तो हम फूले नहीं समाते। हम यह भी भूल जाते हैं कि हम ही इन्हें पैदा होने के अधिकार तक से वंचित करते आ रहे हैं। बार-बार अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर अपने आप को साबित करने वाली महिलाओं को पुरुष प्रधान मानसिकता वाले समाज ने कभी भी नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शहरों में भी लोगों की मानसिकता नहीं बदली है।

अनेक लोग आज भी घर में लड़की के पैदा होने पर शोक व्यक्त करते हैं और लड़का पैदा होने पर जश्न मनाते हैं। वास्तव में यह लैंगिक असमानता हमारे घरों से ही शुरू होती है। घरों से निकलकर ही यह हमारे कार्यस्थलों व सामाजिक मंचों तक जाती है। हमें यह समझना और स्वीकार करना होगा कि नारी ही सृष्टि की वास्तविक धुरी और प्रेरणा है। वह घर से लेकर बाहर तक अपनी प्रतिभा व प्रबंधन क्षमता का कुशलतापूर्वक परिचय दे रही है। हमें यह सोचना चाहिए कि यदि स्त्रियां नहीं होंगी, तो यह समाज और सभ्यता उचित रूप में कैसे संचालित हो सकेगी। इस सृष्टि के संचालन का आधार मातृशक्ति में ही निहित है। यदि कन्याएं पैदा ही नहीं होंगी, तो आखिर सृष्टि का संचालन कैसे संभव होगा?

धार्मिक अनुष्ठानों और पर्वों पर हम कन्या पूजन के लिए लड़कियों की तलाश करते हैं। हम सामान्य जीवन में कन्याओं को देवी घोषित अवश्य करते हैं, किंतु यह देवी स्वयं हमारे घर में जन्म ले, तो हमें परेशानी होती है। इस प्रकार के दोहरे और पाखंडपूर्ण आचरण को त्याग देने की आवश्यकता है। हमें मां चाहिए, पत्नी चाहिए, लेकिन बेटी नहीं। ऐसा ढोंग क्यों? यह नितांत अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक दृष्टिकोण है। भारतीय समाज इस पुरातनपंथी, अतार्किक दृष्टि को जितना शीघ्र त्याग दे, उतना ही उसके लिए यह कल्याणकारी होगा। अब हम उस दौर में आ गए हैं, जब लड़कियां, लड़कों से कहीं आगे निकल गई हैं। भारतीय प्रधानमंत्री ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का अभियान जब प्रारंभ किया, तो संपूर्ण देश में सभी ने खुले हृदय से इसका स्वागत किया, किंतु मात्र अभियानों का स्वागत और समर्थन कर देने भर से यह समाज बदलने वाला नहीं है। प्रतिकात्मक समर्थन दे देने मात्र से समाज की मानसिक जड़ता समाप्त नहीं होगी। हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बदली हुई सोच को अपने जीवन का मौलिक अंग बनाना होगा। हम बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, किंतु निजी जीवन में अपना आचरण और सोच नहीं बदलते।

यदि समाज में वास्तविक सुधार लाना है तथा बेटियों को सुरक्षित रूप से आगे बढ़ाना है, तो इसके लिए हमें सर्वप्रथम बेटों को उचित संस्कार देना होगा। उन्हें उच्च नैतिक आदर्शों और व्यावहारिक गुणों से युक्त बनाना होगा। बेटे अगर लड़कियों के प्रति सम्मान का भाव ले आएंगे, तो बेटियां भी बेटों की तरह सुरक्षित और स्वतंत्रतापूर्वक बाहर निकल सकेंगी।  

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