आखिर कब तक?

यशोधरा वीरोदय

19th February 2021

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड से लेकर हाल ही में हैदराबाद और उन्नाव में हुए वीभत्स रेपकांड और इनके बाद भी महिलाओं के साथ लगातार होती जघन्य घटनाएं, हर किसी के मन में एक सवाल उठाती हैं... आखिर कब तक?

आखिर कब तक?

21वीं सदी के एक नए साल के मुखाने पर खड़े होकर हम भविष्य की ओर बड़ी आस लिए देख रहे हैं, पर क्या एक बेहतर कल का सपना एक बेहतर समाज के बिना संभव है? वो समाज जिसमें आधी आबादी खुद को सुरक्षित ना महसूस कर सके, वो दुनिया जहां हर पल किसी स्त्री की अस्मिता दांव पर लगी हो, उसमें एक बेहतर कल की उम्मीद कितनी जायज है? जी हां, समय के साथ देश-दुनिया तेजी से बदल रही है... तकनीकि से लेकर जीवनशैली और सामाजिक ढांचे में काफी बदलाव आ चुका है। पर आधी आबादी यानि कि महिलाओं की स्थिति आज भी उतनी ही दयनीय है, जितनी कि सालों पहले थी या कह सकते हैं, उससे भी बद्तर हो चुकी है। महिलाओं के साथ यौन हिंसा के मामले इस कदर बढ़ चुके हैं कि अब देश में आक्रोश का माहौल बन चुका है, लेकिन फिर भी ऐसी घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। निर्ममता के साथ रेप और लड़कियों को मार देने की घटनाएं हर रोज खबरों के रूप में सामने आ रही हैं और ऐसी वारदातों को देखने-सुनने के साथ ही ज़ेहन में एक ही सवाल उठता है कि आखिर कब तक ये सब यूं चलता रहेगा, इसके लिए कौन जिम्मेदार है... कानून, प्रशासन, समाज या हमारी सोच?

गौर करने वाली बात ये भी है कि आज समाज का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के साथ हो रही यौन हिंसा के खिलाफ अपनी आवाज मुखर कर रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर हर छोटे बड़े शहरों में अब ऐसी घटनाओं के विरोध में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, पर फिर भी इस समस्या के समाधान का कोई आसार नहीं दिख रहा है। ऐसे में सबसे पहला सवाल तो ये उठता है कि इच्छा होने के बावजूद हम महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाने में क्यों नाकाम हैं? हर कोई चाहता है कि उसकी बहन बेटी सुरक्षित रहे पर महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर प्रश्न चिह्नï क्यों लगा हुआ है? आखिर इसके पीछे की वजह क्या है? सवाल बड़ा है, ऐसे में हमने इस मुद्दे पर कानून विशेषज्ञ से लेकर आपराधिक मनोवैज्ञानिक, महिला आयोग और बुद्धजीवी वर्ग से बात कर उनके नजरिए को जानने की कोशिश की है। 

 

लचर कानून व्यवस्था

तीन तलाक जैसे मुद्दों से लेकर महिलाओं के हक के लिए लंबे समय से अपनी आवाज बुलंद करने वाली समाजसेवी शाइस्ता अम्बर कहती हैं कि असल में इसके पीछे हमारी लचर कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली जिम्मेदार हैं। हमारे यहां न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित परिवार के हौसले जहां न्याय की आस में दम तोड़ देते हैं, तो वहीं अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं। वहीं पुलिस और प्रशासन भी उतने सक्रिय ढ़ंग से काम नहीं करता, जितनी जरूरत होती है। जब भी परिजन अपनी बच्चियों के साथ किसी अनहोनी की आशंका लिए पुलिस के पास जाते हैं, तो पुलिस का ढुलमुल रवैया ही देखने को मिलता है, उतनी देर में अपराधी अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते हैं और एक लड़की की अस्मिता और भविष्य से खिलवाड़ हो चुका होता है। 

 

सामाजिक ढांचा और परिवेश

जानीमानी क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट अनुजा कपूर का कहना है कि सोशल बिहेवियर के लिए नेचर और नचर दो चीजें कारक होती हैं। नेचर जहां व्यक्ति का प्रकृति प्रद्दत स्वभाव होता है, तो वहीं नचर यानि कि परवरिश व्यक्ति की सोच समझ को सही दिशा देती है। ऐसे में देखा जाए तो रेप जैसी घटनाओं के लिए काफी हद तक गलत परवरिश जिम्मेदार है। अगर बच्चे को शुरुआती दौर से सही और गलत के बीच का फर्क समझाया जाए तो परिणाम काफी हद तक सकारात्मक हो सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि जब भी बच्चा कोई गलत हरकत करे तो उसे तुरंत उसकी उपयुक्त सजा दें, सजा इसलिए ताकि उसे ये एहसास हो कि उसने कुछ गलत किया और आगे से ऐसा करने से वो डरे। वहीं अगर बच्चा कुछ अच्छा करता है तो हमें उसे प्रोत्साहित भी करना चाहिए। यही चीजें बच्चे को एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करती है। 

लेकिन बतौर अभिभावक ज्यादातर लोग इन्ही बातों में असफल रहते हैं और नतीजन बच्चों में अपराध करने का साहस भर जाता है, जो कई बार यौन हिंसा के रूप में सामने आता है। जी हां, महिलाओं के साथ हो रही यौन हिंसा के लिए हमारा सामाजिक ढाचा और परिवेश भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। जहां रेप भले ही कानूनी तौर पर अपराध है, पर सामाजिक नजरिए से देखा जाए तो ये लैंगिक वैमनस्य का परिणाम है, जहां रेप कभी प्रतिशोध तो कभी अतिरेक के रूप में सामने आता है। यहां तक कि समाज का एक वर्ग इसे पुरुषों की क्षणिक भूल के रूप में देखता है। ऐसे में इस तरह की सोच के बीच बड़े होते किशोर के लिए रेप कोई अपराध नहीं बल्कि पुरुषत्व को साबित करने का तरीका बन जाता है।

 

क्या कानून बन चुका है पेंचीदा 

हैदराबाद के आरोपियों के एनकाउंटर ने बेशक त्वरित न्याय का नमूना पेश कर लोगों को वो क्षणिक सुख देने का काम किया, जिसकी कामना सभी कर रहे थे। पर इस प्रकरण के साथ ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या हमारी न्याय प्रणाली और हमारी कानून व्यवस्था इतनी पेंचीदा हो चुकी है कि अब हम एनकाउंटर के जरिए त्वरित न्याय की आस लगा रहे हैं। इस पर विधि और कानून जानकार और लंबे समय से पत्रकारिता कर रही वरिष्ठ पत्रकार माला दीक्षित का कहना है कि असल में कानून उतना पेंचीदा नहीं है बल्कि हमारे पास ढांचागत संसाधनो की कमी है। माला दीक्षित के शब्दों में हमारे पास ढ़ांचागत संसाधनो, जैसे कि पुलिस से लेकर जेल और जजों तक की कमी है, नतीजन कानूनी कार्यवाई में समय लग ही जाता है, जिसके चलते लोगों का सिस्टम से भरोसा उठ रहा है। 

 

कैसे आएगा बदलाव

अब बात करें कि इन विपरीत परिस्थितियों में हम बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, तो कहते हैं ना कि समस्या में ही समाधान होता है। ऐसे में अगर हम इस समस्या पर ध्यान दें तो काफी हद तक हम इनसे निजात पाने में सफल हो सकते हैं। जैसे कि अगर हमारी न्याय प्रक्रिया धीमी है, तो सबसे पहले तो हमें न्याय व्यवस्था के लिए ढांचागत संसाधनो की कमी दूर करनी होगी।

 

न्याय व्यवस्था की ढांचागत संसाधनो की कमी हो दूर

माला दीक्षित के अनुसार, रेप और यौन हिंसा के मामलों में न्याय में देरी का कारण इच्छा शक्ति नहीं बल्कि ढ़ांचागत संसाधनों की कमी है। हमारे यहां बजट का 0.1 से भी कम हिस्सा न्याय व्यवस्था पर खर्च होता है और इसका परिणाम ये है कि जितनी संख्या में हमें पुलिस बल, जेल और जजों की आवश्यकता है, उससे कहीं कम संख्या में ये सारे संसाधन मौजूद हैं। ऐसे में अगर हमें त्वरित न्याय चाहिए तो सबसे पहले तो हमें न्याय व्यवस्था की ढांचागत संसाधनों की कमी दूर करनी होगी।

 

नाबालिग अपराधी के लिए भी हो कठोर सजा का प्रावधान

निर्भया केस के बाद से रेप के लिए दोषी नाबालिग आरोपियों की सजा को लेकर देश में एक बड़ी बहस छिड़़ चुकी है कि नाबालिगों के लिए उचित सजा क्या है। मानवाधिकार संगठनो को छोड़ दें तो अधिकांश लोगों की यही मांग है कि रेप के नाबालिग अपराधियों को भी समान सजा देनी चाहिए। इस पर ऑल इंडिया महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर का भी कहना है कि अगर कोई नाबालिग रेप करने का दुस्साहस रखता है, तो जाहिर तौर पर वो उस जुर्म की वाजिब सजा का भी भागीदार होता है। आंकड़ों की बात करें तो 2016 में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के 38 हजार मामले दर्ज किए गए हैं, जिसमें 2000 से अधिक केस में नाबालिग लड़के दोषी पाए गए हैं। ऐसे में रेप के दोषी नाबालिगों के लिए उचित दंड के निर्धारण के लिए पुन:विमर्श की आवश्यकता है। 

 

सकारात्मक अभिव्यक्ति से संभव है बदलाव 

इसके अलावा अगर हम सामाजिक सोच में बदलाव की बात करें तो क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट अनुजा कपूर कहती हैं कि हमारे यहां गलत चीजें बहुत तेजी से फैलती हैं, ऐसे में अगर इसे रोकना है तो पॉजिटिव मैनिफेस्टेशन (सकारात्मक अभिव्यक्ति) की आवश्यकता है। जैसे कि हैदराबाद में रेप और पीड़िता को जलाने की घटना के बाद हर जगह से लड़कियों को रेप के बाद जलाने की खबरें सामने आने लगी हैं, जो मॉस हिस्टीरिया यानि कि सामूहिक उन्माद का परिणाम है। इसलिए गलत चीजों के चलन को रोकना है तो अच्छी चीजों को उदाहरण के रूप में सामने रखना होगा। जैसे कि अगर कहीं रेप की कोशिश करते हुए कोई अपराधी पकड़ा जा रहा है तो उस खबर को सामने लाना चाहिए, ताकि ऐसी खबरों से अपराधियों के मन में डर बैठे और वो ऐसा करने से बाज आए। इस तरह से सकारात्मक बदलाव के लिए समाज में सकारात्मक अभिव्यक्ति जरूरी है। 

यह भी पढ़ें -स्किन का रखे ख्याल 'फास्टिंग' के सहारे

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

बालकनी को कै...

बालकनी को कैसे दें गार्डन लुक?

ऑनलाइन खरीदा...

ऑनलाइन खरीदारी में ध्यान रखने योग्य बातें...

देसी घी यानी...

देसी घी यानी एक संपूर्ण औषधि

फटी एड़ियों स...

फटी एड़ियों से निजात दिलाए कुछ घरेलू उपाय...

पोल

आपको कैसी लिपस्टिक पसंद है

वोट करने क लिए धन्यवाद

मैट

जैल

गृहलक्ष्मी गपशप

रम जाइए 'कच्...

रम जाइए 'कच्छ के...

गुजरात का कच्छ इन दिनों फिर चर्चा में है और यह चर्चा...

घट-कुम्भ से ...

घट-कुम्भ से कलश...

वैसे तो 'कुम्भ पर्व' का समूचा रूपक ज्योतिष शास्त्र...

संपादक की पसंद

मां सरस्वती ...

मां सरस्वती के प्रसिद्ध...

ज्ञान की देवी के रूप में प्राय: हर भारतीय मां सरस्वती...

लोकगीतों में...

लोकगीतों में बसंत...

लोकगीतों में बसंत का अत्यधिक माहात्म्य है। एक तो बसंत...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription