लोकगीतों में बसंत का चित्रण

डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम

22nd February 2021

बसंत ऋतु 6 ऋतुओं में से एक ऋतु है, जो फरवरी और मार्च से शुरू होती है। इस ऋतु में प्रकृति अपना अपूर्व सौंदर्य दर्शाती है। बसंत के इसी सौंदर्य और खूबसूरती के कारण इस पर कई लोकगीत रचे गए।

लोकगीतों में बसंत का चित्रण

लोकगीतों में बसंत का अत्यधिक माहात्म्य है। एक तो बसंत शीतकाल के बाद आता है, अन्य इस समय नवीन फसल के आने से भी लोगों में उमंग एवं उल्लास समाहित रहता है। किसानों तथा दूसरे लोगों को इस समय अन्न की कमी से नहीं जूझना पड़ता। बसंत ऋतु में मनुष्य को रोटी, कपड़ा और मकान तीनों समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है, क्योंकि शीतकाल के पश्चात् ज्यादा वस्त्रों तथा छत की उसे जरूरत महसूस नहीं होती। नवीन फसल का स्वागत वह लोक गीतों के द्वारा करता है। चूंकि लोक गीतों का मानव समाज में एक विशेष महत्त्व है। बसंत से जुड़े लोक गीतों में प्राकृतिक सौंदर्य की प्रमुखता होती है। इस मौसम की सबसे बड़ी खासियत यही होती है कि इसमें धरा नववधू की भांति कोमल लगती है। वह विविध वर्णों के फूलों से अपना शृंगार करती है। कोयल का कोमल कंठ वातावरण में अमृत घोल देता है। लगता है मानो नववधू के आगमन पर मधुर शहनाई बज उठी हो।

नीक लागे फगुनई बयार, कोयलिया बोले डारि-डारि।

अमवा की बगिया में सोहे बदुखा।

दुलहा के माथे पर सोहे सहरवा।

भुइयां नाचे लमनवा हमार कोइलिया॥

(गायक का कहना है कि आम के बाग में जो बौर सुशोभित हो रहा है, वह ऐसा लगता है मानो बसंत रानी से विवाह करने के लिए दूल्हे के माथे पर सेहरा चढ़ाया जा रहा है। ऐसे में कोयल का संगीत थिरकन उत्पन्न कर रहा है)।

चहुं ओर पकी फसल का सौंदर्य तथा धीमी-धीमी मदमाती बयार लोगों को खुशदिल कर देती है। समय बीतने के साथ बसंत रूपी नायक और ज्यादा बेहद अनुपम लगता है। तभी तो लोग कीर्तिमान करते हैं।

ले के सिनेमवा पहुंचल पहुनवां।

गोरिया के जाये को बा रे गवनवां॥

खूब कर ले सिंगार पटार कोइलिया।

गायक कहता है कि अनजाने स्थान पर जा रही नववधू के लिए प्रियतम से ज्यादा अपना कौन होगा। ऐसे में उसे पूर्ण रूपेण शृंगार कर लेना चाहिए।

फागुन मास में बसंत उमंग के साथ जीवन का संचार करता है। शिशिर से व्यथित नायिका जब बसंत में नायक को हासिल करती है तो उसकी तपस्या का फल उसे कुछ इस तरह मिल जाता है-

रंगइबो हम चुनरी यही फागुन मां।

फागुन मास पिया घर अइलन॥

हमरे सेजिया के फूल मुसकइलन।

मगन तन मन री एहि फागुन मां॥

गायिका की खुशी की सीमा नहीं रहती तथा आम के बाग में कोयल का मधुर स्वर सोने पर सुहागे का कार्य करता है। पूर्वा बयार का धीमा-धीमा झोंका नायिका के मिलन तथा उससे पैदा भावों को और ज्यादा प्रभावित करता है। वह कहती है-

सखी आयल मधुमास अंगनवां, सांच भइल जिनगी के सपनवां।

छपावे पच लुगरी एही फागुन में।

अर्थात् मधुमास के आगमन से मेरे आंगन में भी नया फूल पल्लवित हो रहा है। नायिका ने नायक के वियोग में बेहद पीड़ा पाई है, ऐसे मे वह प्रत्येक भांति से नायक को आकर्षित करना चाहती है। इसलिए वह अपने बच्चों को कांतियुक्त कपड़े धारण कर मनोहारी बना देती है।

बसंत का अवसर किसी के लिए सुख की खबर लाता है तो किसी के लिए दुख का। बसंत में पपीहे की आवाज विरहिणी के हृदय में विष सा घोल देती है। स्त्रियों का आभूषण के प्रति लगाव किसी से छिपा नहीं है। नायिका कहती है कि जहां बसंत ऋतु नूतन खुशी लेकर आता है, वहीं स्त्रियों के लिए सौंदर्य तथा नवीन वेशभूषा की जरूरत का एहसास भी कराता है। बसंत के आने पर स्त्रियां अपने अंदर अत्यधिक सौंदर्य तथा प्रेम भावना की अनुभूति करती हैं, जिसके लिए वस्त्रों तथा आभूषणों का खास योगदान है। यही कारण है कि स्त्री अपने पति से बसंत के आने पर आभूषणों की मांग भी एक लोकगीत में करती है-

चढ़त फगुनवां सइयां ले देत गहनवां, मनवाल गिलवा हमार ऐही फागुल के महिनवां मनवां लागल बा हमार।

कड़ा छड़ा पाजेब पहिनती डलतीं गले में हार। कंगना बिनु अंगिया मोर सूनी कइसे करूं सिंगार॥

(नायिका कहती है कि इस वर्ष बसंत पर मुझे एक कंगन ला दीजिए। कंगन के बिना मेरा पूरा शृंगार अधूरा है। सखियों के समक्ष सूनी कलाई देखकर मैं लज्जा से गड़ जाती हूं।)

पति वियोग स्त्री के लिए अभिशाप के समान होता है। ऐसे में वह नायक के विदेश जाने पर उपालंभ देती है-

छलकत गगरिया मोर निरमोहिया, छलकत गगरिया मोर।

रहि-रहि चंदनिया चंदा के निहारे घई-घई अचरवा के छोर॥

पनिघट पपीहा पिउ पिउ पुकारे

पियवा गइन कौने और निरमोहिया, छलकत गगरिया मोर॥

(गायिका कहती है कि मेरी यौवन रूपी गगरिया छलकती जा रही है। अगर ऐसे में भी तुम न आए तो यह मौका कब आएगा। जब मैं पनघट जाती हूं तो पपीहा मेरी अग्नि और भी भड़का देता है। बसंत के इस मनोरम मौसम में मेरा प्रिय किस देश को चला गया है। इस मौसम में तो पक्षी भी अपने घर लौटकर प्रेमालाप कर रहे हैं।

मोरवा के ठोरवा मोरीनिया सिखावे, भरि-भरि ढोरवा के लेल।

भंवरा लुभालि कमलनी अंगवा कइसन सनेहिया कजोर निरमोहिया...

(विरहिणी कहती है कि वास्तविक प्रेम तो कमलिनी तथा भ्रमर का है जो अपनी प्रियतमा से विमुख न होकर हर दशा में फूल का रसास्वादन करता है। एक मेरा नायक है, जिसे न समय का ख्याल है और न ही मेरा।

महुआ के कुंचवा मदन रस टपके, बहे पुरवइया सजोर निरमोहिया।

छलकत गगरिया मोर।

बहती हुई पुरवाई उसकी विरह को और भी बलवती कर रही है-

सखी फागुन का अजबे बहार अंचरवा फहरल करे।

साझ सकारे घर के दुआरे भीतर-बाहर अरु पिछवारे।

कोइलिया गाव मलहार अंचरवा...।

एक तरफ बसंत की बयार तथा दूसरी तरफ कोमल की मधुर कूक। नायिका फिर कहती है कि अगर मेरे सम्मुख नहीं रहना था तो मेरा गौना ही क्यों कराया? उसे अपने पीहर की याद सता जाती है। वह कहती है कि मैं अपने पीहर में उमंग तथा उल्लास से रहती थी, गुड़ियों से खेलती थी, क्यों मुझे तड़पाया। मेरे यौवन पर बसंत का असर देखकर सभी मुझे ताने देते हैं, प्रिय तुम कब आओगे?

यह भी पढ़ें -ज्ञान, कला और वाणी की देवी- सरस्वती

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

नूतन उत्साह ...

नूतन उत्साह का प्रतीक बसंत पंचमी

लक्ष्मी के स...

लक्ष्मी के साथ गणेश आराधना क्यों?

जिन्होंने बद...

जिन्होंने बदल दिया शहादत के मायने...

मां सरस्वती ...

मां सरस्वती के प्रसिद्ध मंदिर

पोल

आपको कैसी लिपस्टिक पसंद है

वोट करने क लिए धन्यवाद

मैट

जैल

गृहलक्ष्मी गपशप

रम जाइए 'कच्...

रम जाइए 'कच्छ के...

गुजरात का कच्छ इन दिनों फिर चर्चा में है और यह चर्चा...

घट-कुम्भ से ...

घट-कुम्भ से कलश...

वैसे तो 'कुम्भ पर्व' का समूचा रूपक ज्योतिष शास्त्र...

संपादक की पसंद

मां सरस्वती ...

मां सरस्वती के प्रसिद्ध...

ज्ञान की देवी के रूप में प्राय: हर भारतीय मां सरस्वती...

लोकगीतों में...

लोकगीतों में बसंत...

लोकगीतों में बसंत का अत्यधिक माहात्म्य है। एक तो बसंत...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription