भारतीय संस्कृति का महापर्व -'कुम्भ'

शशिकांत 'सदैव'

22nd February 2021

कुम्भ हमारी भारतीय संस्कृति का अत्यंत प्राचीन महापर्व है, जो कि बारह साल में एक बार आता है। इस बार यह 15 जनवरी से 4 मार्च 2019 तक प्रयाग (इलाहाबाद) में मनाया जाएगा। कुम्भ हमारी संस्कृति के साथ-साथ हमारी आस्था का भी प्रतीक है। महाकुम्भ का अर्थ क्या है? क्यों यह बारह साल में एक बार आता है तथा इसका सांस्कृतिक महत्त्व क्या है? जानिए इस लेख से।

भारतीय संस्कृति का महापर्व -'कुम्भ'

कुंभ पर्व विश्व में किसी भी धार्मिक प्रयोजन हेतु भक्तों का सबसे बड़ा संग्रहण है। कुम्भ का संस्कृत में अर्थ है- कलश ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है। कलश यानी 'घट' अर्थात घड़ा। आस्था कहती है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत कलश को दानवों से बचाने के लिए दैवीय शक्तियां 12 दिन तक उसे ब्रह्मïड में छिपाने की कोशिश करती रहीं। इस दौरान उन्होंने जिन-जिन स्थानों पर अमृत कलश को रखा, वे स्थान कुम्भ के स्थान हो गए।

महाकुंभ की महिमा

मान्यता है कि जो पुण्य कार्तिक माह में हजार बार गंगा स्नान से प्राप्त होता है, माघ माह के सौ स्नान एवं वैशाख में एक लाख नर्मदा स्नान करने पर जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य कुम्भ पर्व में एक स्नान से प्राप्त होता है।

स्कंद पुराण के अनुसार

गोदाया यक्तलं प्रोक्तं द्विगुण भवेत, चतुर्गुणंतु सिंहस्थ ह्यतिच रेतुषद गुण

अर्थात्, गोदावरी में स्नान एवं दान करने का जो पुण्य प्राप्त होता है वह संगम स्थल पर दोगुने रूप में प्राप्त होता है। यही पुण्य सिंहस्थ में चौगुने रूप में प्राप्त होता है। यदि सिंहस्थ में बृहस्पति का परिभ्रमण हो तो यह षट् गुण रूप में प्राप्त होता है। कुम्भ स्नान की शास्त्रों में खूब महिमा गान है।

अश्वमेघ सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च, लक्षं प्रदक्षिण भूमे: कुम्भस्नानेन तत्फलम्।

अर्थात्, हजार बार अश्वमेघ यज्ञ करने से, 100 बार वाजपेयी यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है वही फल एक बार कुम्भ स्नान करने से मिलता है।

तान्येव य: पुमान, योगेसोमृतस्वायकल्पते, देवा नमंति तत्रस्थान, यथा रग्डा धनाधिपान।

अर्थात्, मनुष्य कुम्भ योग में स्नान करता है, वह अमरत्व यानी मुक्ति की प्राप्ति करता है। जिस प्रकार दरिद्र मनुष्य धनवान को नम्रतापूर्वक अभिवादन करता है ठीक उसी प्रकार कुम्भ पर्व में स्नान करने वाले मनुष्य को देवगण नमस्कार करते हैं।

क्यों लगता है कुम्भ मेला?

कुम्भ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुम्भ से अमृत बूंदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए थे तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया था। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हें दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर सभी देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुम्भ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र 'जयंत' अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस युद्ध के दौरान जयंत ने अमृत कलश को उसकी सुरक्षा हेतु 12 स्थानों पर रखा, जिससे अमृत की कुछ बूंदे कलश रखे जाने वाले स्थानों पर गिरीं। इन 12 स्थानों में से 8 स्थान स्वर्ग में स्थित एवं 4 स्थान पृथ्वी पर स्थित प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक थे। इसीलिए इन चारों स्थानों पर प्रत्येक 12 वर्ष के पश्चात महाकुम्भ का मेला आयोजित किया जाता है। 'स्कन्द पुराण' में यह भी कहा गया है कि 'देवताओं व दानवों का युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत को देवताओं में बांट दिया परंतु एक दानव देव रूप धारण कर अमृत पीने में सफल हो गया।' इस पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक काट दिया। अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, बृहस्पति और चन्द्रमा ने विशेष सहायता की थी। सूर्य ने कलश को फूटने से बचाया, चन्द्रमा ने कलश से अमृत को गिरने से रोका और बृहस्पति ने अमृत कलश को राक्षसों के पास जाने से रोका। यही कारण है कि सूर्य, बृहस्पति और चन्द्र ग्रहों के विशिष्ट संयोग से ही कुम्भ महापर्व का योग बनता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहां-जहां अमृत बूंद गिरी थी, वहां-वहां कुम्भ पर्व होता है।

कब और कहां लगता है कुम्भ मेला? 

कुम्भ पर्व बृृहस्पति के सिंह राशि में होने पर होता है। हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन-इन चार स्थानों पर प्रति बारहवें वर्ष कुम्भ मेला का आयोजन होता है। हरिद्वार तथा प्रयागराज के मेले कुम्भ के नाम से और उज्जैन व नासिक के सिंहस्थ के नाम से जाने जाते हैं।

कुम्भ और मेष राशि में सूर्य होने पर हरिद्वार में, मेष राशि में गुरु और मकर राशि में सूर्य होने पर प्रयाग तथा सिंह राशि में गुरु और मेष राशि में सूर्य होने पर उज्जैन में कुम्भ पर्व होता है। सिंह राशि में गुरु और सिंह राशि में ही सूर्य जब होता है, तब नासिक पंचवटी में सिंहस्थ महाकुम्भ पर्व मनाया जाता है।

महाकुम्भ का ज्योतिष विज्ञान

इस ब्रह्मांड को भरा हुआ कुम्भ ही कहा गया है। वैज्ञानिक इसी से दिन, रात, महीने और 12 महीनों का एक वर्ष की गणना करते रहे हैं। पृथ्वी एक दिन में अपनी धुरी पर एक बार और 12 महीनों में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है। यह हम सभी जानते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड में दो तरह के पिंड हैं, ऑक्सीजन प्रधान और कार्बन डाइऑक्साइड प्रधान। ऑक्सीजन प्रधान पिंड 'जीवनवर्धक' होते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड प्रधान पिंड 'जीवनसंहारक'। जीवनवर्धक पिंडों और तत्त्वों का सर्वप्रधान केंद्र होने के नाते ग्रहों में बृहस्पति का स्थान सर्वोच्च माना गया है।

शुक्र सौम्य होने के बावजूद संहारक है। शायद इसीलिए पुराणों ने बृहस्पति की देवों और शुक्र की आसुरी शक्तियों के गुरु के रूप में कल्पना की है। शनि ग्रह जीवन संहारक तत्त्वों का खजाना है। सूर्य के द्वादशांश को छोड़ दें, तो शेष भाग जीवनवर्धक है। सूर्य पर दिखता काला धब्बा ही वह हिस्सा है, जिसे जीवन संहारक कहा गया है। अमावस्या के निकट काल में जब चंद्रमा क्षीण हो जाता है, तब संहारक प्रभाव डालता है। शेष दिनों में खासकर पूर्णिमा के निकट दिनों में चंद्रमा जीवनवर्धक हो जाता है। मंगल रक्त और बुद्धि दोनों पर प्रभाव डालता है। बुध उभय पिंड है। जिस ग्रह का प्रभाव अधिक होता है, बुध उसके अनुकूल प्रभाव डालता है। छाया ग्रह राहु-केतु तो सदैव ही जीवन संहारक यानी कार्बन डाइऑक्साइड से भरे पिंड हैं। इनसे जीवन की अपेक्षा करना बेकार है।

ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। 

महाकुम्भ का महापूजन

सर्वप्रथम वस्त्र धारण करें। संभव हो तो श्वेत वस्त्र धारण करें। चंदन आदि धारण करें। संगम की मिट्टी का चंदन सर्वमान्य होता है। दान पदार्थों को तैयार रखें और दान करने के लिए संकल्प करें। इंद्रियों को संयत रखकर नियमपूर्वक काम, क्रोध और लोभ से दूर रहें। किसी भी प्रकार के पाप की प्रवृत्ति से बचें। 

स्नान विधि

स्नान का सर्वोत्तम काल अरुणोदय काल है। सूर्योदय से पहले पूर्वी क्षितिज में जो प्रकाश नजर आता है, उसे अरुणोदय कहते हैं। अरुणोदय काल में भी स्नान के लिए वह समय सर्वोत्कृष्ट है, जब तारे दिखाई पड़ रहे हों। इसके बाद सूर्योदय तक का काल जब तारे छुप चुके हों, अपेक्षाकृत कुछ कम महत्त्व का है। सूर्योदय के बाद प्रात: काल स्नान के लिए सामान्य माना गया है।

स्नान विधि: हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, द्रव्य लेकर, मन को शांत रखते हुए, पूर्व दिशा की ओर मुंह करके, मन में अथवा वाणी से संकल्प करना चाहिए।

स्नान मंत्र: नग्न शरीर स्नान न करें। साफ-सुथरे एवं शुद्ध वस्त्र धारण करके शुद्ध अवस्था में गंगा स्नान करें। सर्वप्रथम सिर से स्नान करें।

गंगा, यमुना, सरस्वती, कृष्णा, कावेरी, ब्रह्मपुत्र आदि कई ऐसी पवित्र नदियां हैं, जिनमें स्नान करते समय सर्वप्रथम पैर का स्पर्श अनुचित माना गया है। इस कारण स्नान करते समय सर्वप्रथम थोड़ा सा जल अपने हाथों में लेकर सिर पर छिड़कना चाहिए। तत्पश्चात सारे अंग को नहलाया जा सकता है।

कुंभ पर्व पर तांबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य देना अति लाभकारी है। अर्घ्य देने से नेत्र दोष, नव ग्रह दोष, पितृ दोष नष्टï होते हैं। अर्घ्य देने के लिए सूर्योदय के कुछ बाद, लोटे में जल लेकर, हृदय के साथ लगाकर, धीरे-धीरे जल को अटूट धार से गिराना चाहिए। नव ग्रह शांति एवं काल सर्प योग शांति, विष कन्या दोष आदि की शांति भी कुम्भ पर्व पर उचित मानी गयी हैं।

क्या करें दान?

कुम्भ पर्व के समय, धर्म सिंधु के अनुसार, 8 दान मुख्य माने गये हैं तथा इनकी विशेषताएं अति लाभकारी हैं। ये आठ दान इस प्रकार हैं:

1. तिल 2. लोगा, अथवा लोहे से निर्मित वस्तुएं 3. कपास, अथवा कपास से निर्मित वस्तुएं 4. सोना, अथवा सोने से बनी वस्तुएं, 5. नमक 6. सप्त धान्य 7. पृथ्वी एवं 8. गाय।

महाकुम्भ में शाही स्नान की शाही परंपरा

भारत के सांस्कृतिक महत्त्व को प्रदर्शित करने वाले इस महान स्नान पर्व में देश के कोने-कोने से साधु-संतों का जमावड़ा तो होता ही है, साथ ही इसमें विभिन्न मठों के शंकराचार्यों का भी आगमन होता है।

सूर्य, गुरु एवं चंद्र की विविध स्थितियों के अनुसार कुम्भ पर्व के आयोजन पर भिन्न-भिन्न चारों स्थलों का शाही स्नान होता है। तदनुसार विभिन्न अखाड़ों के महंतों का स्नान होता है। इसके पश्चात शंकराचार्यों का स्नान होता है। इसके बाद महामंडलेश्वरादि का स्नानादि होता है।

सिंहस्थ की बात शाही स्नान के बगैर पूरी नहीं होती। शाही स्नान सिंहस्थ की विशिष्ट परंपरा है। इसीलिए शुरुआत से लेकर अब तक सिंहस्थ में शाही स्नान होता आ रहा है और उसका महत्त्व आज भी बरकरार है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद में जिन 13 अखाड़ों को शामिल किया है, उनको शैव तथा वैष्णव-इन दो श्रेणियों में विभक्त किया गया है। शैव अखाड़ों में जूना दत्ता, निरंजनी, अग्नि, आनंद, निर्वाणी आवाहन, अटल आवाहन, जूना उदासीन, निर्मल पंचायती अखाड़ों का समावेश है। वैष्णव अखाड़ों में दिगंबर, निर्मोही तथा निर्वाणी का समावेश है। सिंहस्थ से प्राचीन समय से वास्ता रखने वालों का दावा है कि सन् 1771 तक शैव तथा वैष्णव दोनों अखाड़ों के साधु-संन्यासी एक साथ ही स्नान करते थे। पर 1772 में शाही स्नान का पहला सम्मान किसे दिया जाए, इसे लेकर गिरी तथा पुरी इन दो वर्गों के नागा साधुओं में जबर्दस्त टकराव हुआ। जिसका परिणाम यह हुआ कि शैव तथा वैष्णव के अखाड़ों के साधु-संन्यासी एक दूसरे के कट्टर विरोधी बन गए। शैव तथा वैष्णव साधुओं के इस घमासान में 12 हजार साधु मारे गए। जब तत्कालीन पेशवा सरकार ने यह देखा कि शैव तथा वैष्णव साधुओं का विवाद बहुत चरम पर पहुंच गया है तो राजा श्रीमंत सदाशिव रामभाऊ पेशवा ने हस्तक्षेप किया और साधुओं के एक गुट को त्र्यंबकेश्वर के चक्रतीर्थ पर तो दूसरे गुट को नासिक के रामकुंड पर शाही स्नान करने की अनुमति दी। तब से अब तक सिंहस्थ में उसी तरह से शाही स्नान का आयोजन किया जाता रहा है। बताया जाता है कि साधुओं के बीच हुए टकराव के कारण ब्रिटिश सरकार ने 1775 से 1822 तक सिंहस्थ कुम्भ मेला स्थगित कर दिया था इस तरह 47 साल तक लगातार कुम्भ मेले का आयोजन नहीं हुआ। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने सन् 1823 से सूर्योदय से पहले नागा साधुओं का स्नान सुनिश्चित किया।

युनेस्को ने विश्व धरोहर में किया शामिल

बता दें कि यूनेस्को द्वारा कुम्भ को विश्व की सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल किया गया है। यूनेस्को के अधीनस्थ संगठन इंटरगर्वनमेंटल कमिटी फोर द सेफगार्डिंग ऑफ इन्टेंजिबल कल्चरल हेरीटेज ने दक्षिण कोरिया के जेजू में हुए अपने 12वें सत्र में कुम्भ मेले को 'मावनता के अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूचीÓ में शामिल किया था। इसके बाद से ही केंद्र और राज्य सरकार कुम्भ की भव्यता पूरी दुनिया को दिखाने की पुरजोर कोशिश में लगी है। 

इस कुम्भ में विशेष

इस बार क्या कुछ तैयारियां की जा रही हैं कुम्भ मेले को लेकर आइए उनपर एक नजर डाले। 


प्रयाग में कुम्भ से पहले बनेगा कलश रूपी संग्रहालय

प्रयाग में कुम्भ मेले की तैयारियां जोरों पर है। यहां कुम्भ से पहले दर्शकों के लिए कलश रूपी भव्‍य संग्रहालय बनाने की तैयारी की जा रही है। इस संग्रहालय में प्रयाग के इतिहास के साथ ही मोम से बनीं मूर्तियां भी देखने को मिलेंगी। प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई मंचों से ऐलान किया था कि उनकी सरकार प्रयाग में होने वाले कुम्भ को धार्मिक पहचान दिलाने की पूरी कोशिश करेगी। कलश रूपी संग्रहालय तीन मंजिला होगा। इसमें प्रयाग की धार्मिक, ऐतिहासिक और अन्य जानकारियां डिजिटल स्क्रीन पर दिखाई जाएंगी। 

रोडवेज बसों की अधिक संख्या 

प्रयाग में साल 2019 में लगने वाले अर्ध कुम्भ मेले में रोडवेज की 10 हजार बसें लगाई जाएंगी। मेले को लेकर पूर्वांचल पर खास फोकस किया जाएगा क्योंकि रोडवेज की बसों से सबसे ज्यादा यात्री इसी इलाके से आने की उम्मीद है।

जल मार्गों से भी जुड़ेंगा प्रयाग

कुम्भ में सभी क्षेत्रों से लोग पहुंचते हैं इसलिए कुम्भ से पहले प्रयाग को देश के तमाम बड़े शहरों से रेल व सड़क रास्तों के साथ हवाई व जल मार्गों से भी जोड़ दिया जाएगा। 

टेंट सिटी बसाई जाएगी

कुम्भ में काफी बड़ी संख्या में विदेशी मेहमान भी पहुंचते हैं इसी के तहत विदेशी मेहमानों को ठहराने के लिए छतनाग के आसपास के क्षेत्र में एक टेंट सिटी बसाई जाएगी जहां करीब 5,000 कॉटेज बनाए जाएंगे। सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर विदेशी भाषाओं के जानकार गाइडों की तैनाती की जाएगी। 

2500 हेक्टेयर में मेला क्षेत्र बसाया जाएगा

इस बार कुम्भ मेले का क्षेत्रफल सबसे अधिक रहने की सम्भावना है। इस बार 2500 हेक्टेयर में मेला क्षेत्र बसाया जाएगा, जिसमें 20 सेक्टर होंगे। हर सेक्टर में 1,000 से लेकर 2,000 बेड के रैन बसेरे होंगे। साथ ही साथ पूरे मेले के दौरान शहर के सभी प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों जैसे कैथलिक चर्च, प्रयाग विश्वविद्यालय, खुसरो बाग और अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए नैनी ब्रिज और कर्जन ब्रिज को लाइटों से जगमग किया जाएगा। 

संत करेंगे नई परम्परा की शुरुआत 

प्रयागराज में कुम्भ के दौरान अखाड़ों से जुड़े कई साधु-संत देहदान की घोषणा कर एक नई परंपरा की शुरुआत करेंगे। उन्होंने बताया संत अपना शरीर चिकित्सा विज्ञान के लिए दान करें, जिससे मेडिकल की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी शरीर क्रिया विज्ञान का अध्ययन करें और मानवता की सेवा करें। 

सबसे बड़ा पार्किंग स्थल 

कुम्भ मेले में इस बार अब तक का सबसे बड़ा पार्किंग स्थल बनाया जाएगा। कुम्भ में करीब 6 लाख वाहनों के लिए 1193 हेक्टेयर जमीन पर 120 पार्किंग स्थल बनाए जाएंगे। 

कुम्भ गान बनाया जाएगा 

कुम्भ गान के जरिए कुम्भ की महिमा का बखान किए जाने का प्रयास होगा। 

बड़ी संख्या में बनेंगे शौचालय 

कुम्भ में श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की कोई समस्या न हो इसके लिए इस बार पांच हजार शौचालय बनाए जाएंगे। यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक होगी। 

चप्पे - चप्पे पर होगी सुरक्षा 

कुम्भ मेले में इस बार 5 करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए इस बार सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किये जाएंगे। मेला स्थल तक जाने वाले सभी रास्तों पर कड़ी सुरक्षा होगी। 

प्रत्येक गांव को मिलेगा न्योता 

कुम्भ में शामिल होने के लिए योगी सरकार देश के हर गांव को न्योता भेजेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद भी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आमंत्रित करेंगे। 

यह भी पढ़ें -आत्मसंयम का अभ्यास

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