घट-कुम्भ से कलश तक

हनुमान प्रसाद उत्तम

22nd February 2021

धार्मिक कृत्यों में अल्पना अथवा आटे से पूरे गए चौक पर 'कलश' की प्रतिष्ठï, धार्मिक अनुष्ठïन का अंग माना जाता है। आज भी पूरे देश में मंगल विधान के लिए जल पूरित कलश की स्थापना करने की परंपरा है।

घट-कुम्भ से कलश तक

वैसे तो 'कुम्भ पर्व' का समूचा रूपक ज्योतिष शास्त्र और पुराण साहित्य के मिथकों से जीवन्त रहा है। इस वर्ष इलाहाबाद (प्रयाग) में कुम्भ ऌपर्व उसी जन-विश्वास का साकार आयोजन है।

कुम्भ पर्व की मूल आस्था श्री मद्भागवत महापुराण में वर्णित सागर-मंथन से प्राप्त 'अमृत कलश' के रूपक से जुड़ी हुई है। विष्णु के निर्देश पर देव-दानवों ने मिलकर सागर-मंथन किया था जिसमें चौदह रत्न प्राप्त हुए थे। सबसे पहले कालकूट विष निकला और सबसे अंत में आयुर्वेद प्रवर्तक धन्वन्तरि का अवतरण हुआ जिनके हाथों में 'अमृत कलश' था। कालकूट पीकर शिव मृत्यंजय नीलकंठ हो गए किंतु अमृत घट के लिए देवों और दानवों में संघर्ष शुरू हो गया। जीवन का स्वार्थ जो था। छीना-झपटी में दैत्यों के हाथों 'अमृतघट' पड़ गया। तभी पक्षीराज गरुड़ अपने पूरे वेग से झपट कर उसे ले उड़े और पक्षी पर ले आए। इस अमृत घट से जहां-जहां अमृत कण छलके, वहीं-वहीं कुम्भ पर्व मनाया जाता है।

एक अन्य पुराण कथा के अनुसार देवगुरु बृहस्पति का संकेत पाकर इन्द्र पुत्र जयंत अमृतघट लेकर भाग खड़ा हुआ। तब मोहांध दैत्यगण भी उसके पीछे दौड़े। तब बारह दिन (मनुष्यों के बारह वर्ष) तक देव-दानव युद्घ चलता रहा। युद्घ-काल में जयंत के हाथों पकड़े कुम्भ से अमृत कण छलके और वे त्रिलोकी में बारह स्थानों में गिरे। आठ स्थान देवलोक में और चार स्थान भरत-भूमि में गिरे थे चार स्थान हैं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। चारों ही पुण्य सलिला सरिता (गंगा-यमुना-सरस्वती संगम, शिप्रा और गोदावरी) तट-तीर्थों के रूप में विख्यात है। इन चारों तीर्थों पर, छ: वर्षों में अर्द्घकुम्भ (कुम्भी) आयोजन का भी विधान है।

'अमृतघट' संबंधी पुराण मिथकों में खगोलीय गृह-नक्षत्रों की स्थिति और ऋतु-परिवर्तन-चक्र के संबंध में भी बारह माह अथवा बारह राशियों पर संक्रमण करते हुए सूर्य की दशा भी संकेतिक है। देव-दानव संघर्ष के दौरान अमृतघट की सुरक्षा के प्रतीक के रूप में सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, शनि और गरुड़ का योगदान महत्त्वपूर्ण है। चन्द्रमा ने अमृत को कुम्भ से गिरने नहीं दिया, देवगुरु बृहस्पति ने अमृत को दैत्यों से बचाया, सूर्य ने घट को फटने या फूटने नहीं दिया और शनि ने महत्वाकांक्षी-लोभी राजपुत्र जयंत से अमृतघट की रक्षा की। अत: आज जब हम भारतीय, जन आस्था से जुड़े इस महाकुम्भ पर्व के उल्लास से जुड़ते हैं, तब हम सौरमंडल की ज्योतिष से भी स्वयमेव जुड़ जाते हैं। वास्तव में सूर्य की गति से जुड़ा हुआ यह कुम्भ पर्व, इस सूर्य देश में सहस्रों वर्षों से संस्कार बनकर जन-मानस की निष्ठï-विश्वास से जुड़ता रहा है। आज भी मिथकीय यह कुम्भ पर्व, अमृत-विष रूप (अमृत-कुम्भ और विष कुम्भ) में सद् और असद् के बीच द्वंद्व अन्तश्चेतना से जुड़ा हुआ है, जो जीवन और मृत्यु की दो अनिवार्यताओं को व्यंजित करता है और इसी अमृत जीवन को पाने के लिए अपार जन-समूह बिना किसी निमंत्रण के, सरिता-सागर तटों की ओर उमड़ता देखा जाता है।

अब विचारणीय यह है कि उक्त घट-कुम्भ या कलश शब्द के प्रतीक रूप का विकास कैसे हुआ? वास्तव में देखना यह है कि पुराण-विश्वास के घट-कुम्भ या कलश का मूल स्रोत क्या रहा है? जीवन की इस चिरंतन धारा का शोध जब हम नैदिक साहित्य में करते हैं, तब हमें वहां 'कुम्भ' विचार के बीज-बिंदु अथवा सूत्र अवश्य मिल जाते हैं।

अथर्ववेद में वर्णित है - 

पूर्ण: कुम्भोधिं आहितस्तं बहुधा नु सन्त:।

स हमा विश्वाभुवनानि प्रत्यङ कालं तमाहु परमे व्योमन्॥

अर्थात् 'काल' (समय व्याप्ति) के ऊपर भरा हुआ कुम्भ (विश्व ग्लोब) वर्तमान है जिसे हम अनेक प्रकार से देखते हैं। वह काल सब (भुवनानि सन्त्ता वालों) के सामने गतिशील रूप में विद्यमान है। उस काल को बुद्घिमान लोग ऊंचे (परमे व्योमन) रक्षा स्थान में बताते हैं। लगभग इसी प्रकार का उल्लेख ऋग्वेद में भी है जहां इन्द्र, सूर्य या विद्युत, नव-घट की तरह मेघों का भेदन करते हैं। अत: यह घट अथवा अमृत की व्यंजना करता है। इस शरीर रूप घटाकार में आत्मरूप 'अमृत तत्त्व' विद्यमान है जिस पर आशक्ति मूलक लोभ - मोहादि वृत्तियों के आवरण आच्छादित रहते हैं किंतु विचारवान मनुष्य शरीर रूप घट में निहित ब्रह्म रूप जल तत्त्व का साक्षात्कार अथवा नारायण (नाराआपो, अयनं-सागर, यस्य अर्थात् विष्णु) रूप महासागर में व्याप्त अमृत तत्त्व का अनुभव कराता रहता है। 

'कलश' मिट्टी से लेकर धातुओं (लौह, कांस्य, रजत, स्वर्ण) तक से निर्मित होते हैं और ये अनेक प्रकार से वैभव-सम्पन्नता की भूमिका चरितार्थ करते हैं। ये मूलत मृत्तिका निर्मित ही होते थे जो शीतल जल के पात्र के रूप में उल्लेखित है। हां, यज्ञों में सोमरस की प्रतिष्ठï के लिए काष्ठ निर्मित 'द्रोण कलश का भी उल्लेख मिलता है। वैसे, अथर्ववेद में खोदकर निकाले गए तथा घट में लाए गए एवं वर्षा से प्राप्त जल के सुखकारी-कल्याणकारी होने की कामना की गई है-

शं न: रवनित्रिमा आप: शमु या कुम्भ 

आमृत: शिवा न: सन्तु वार्षिकी:।

यही 'कुम्भ' यज्ञादि संबंधी कर्मकांड के विकास में अपना पूरा शास्त्र निर्मित करता रहा है। इन धर्म-ग्रंथों में यज्ञ-कलश की लम्बाई-चौड़ाई-ऊंचाई तथा परिधि आदि के संबंध में भी पूरी जानकारी मिलती है। हेमाद्रि व्रत खंड में, कलश (कलस) की व्युत्पति के पीछे देवताओं का पृथक-पृथक कलाओं को एकत्र करने के लिए, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित 'अमृत कलश' का आधार बताया है-

कलां कलां गृहीत्वा च देवानां विश्व कर्मणा।

निर्मितोऽयं सुरैर्यस्मात् कलशस्तेन उच्यते॥

वैसे भी 'कलश' शब्द का विग्रह करें, तो क (जल) से 'लस' (शोभित) होता है जो, वह कलश। यज्ञों में एक से लेकर एक सौ आठ कलशों की स्थापना का जहां उल्लेख मिलता है, वहीं गंगा-यमुना सरिताओं की आकृतियों में अमृत-जल पूरित कलशों की शोभा मंगल विद्यायिनी भी बताई गई है। मांगल्य कार्यों में नव ग्रहों के लिए नव-कलशों के नाम तक उल्लेखित हैं। ये हैं-गोह्म, उपगोह्म, मरुत, मयूख, मनोहा, कृषि भद्र, तनुशोधक, इन्द्रियध्र और विजय। इनके स्थान कोणों का भी उल्लेख है। कालिका पुराण का उल्लेख है कि कलश के मुख में विष्णु, ग्रीवा में शंकर और मूल में ब्रह्मï विद्यमान रहते हैं और मध्य में मातृगणों का निवास रहता है। यहीं नहीं, सप्त सागर, सप्त द्वीप, ग्रह-नक्षत्र एवं चारों वेद भी कलश में स्थित हैं-

कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्र समाश्रित:। 

मूले तत्र स्थितो ब्रह्म मध्ये मातृगणा स्मृता॥

कुक्षौ तु सागरा सर्वे सप्त द्वीपा वसुंधरा। 

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद सामवेहि अथर्वण:।

'पिंडे सो ब्रह्मïण्डे' के योग-विचार में यह व्यापक सृष्टि घट-कलश में ही विद्यमान है। इसीलिए कर्मकांड में कुम्भ कलश को 'वरुव' स्वरूप माना गया है और पूरित चौक अल्पना, रंगोली पर स्थाणित करके, अमृतमयी मंगल कामना के लिए नाना विधि कलश का पूजन-विधान भी बताया गया है। इस प्रकार घट-कुम्भ-कलश संबंधी प्रतीक-विचार का प्रभाव इतना बढ़ा कि महात्मा गांधी की मां के गुरु भाव में प्रतिष्ठित, गुजरात क्षेत्र में जन्में महामति प्राणनाथ (सन् 1618-1994) ने सन् 1679 ई. में 'कलस हिन्दूस्तानी' की रचना ही कर डाली। यह रचना श्रीमद्भागवत प्रेरित है। आपके अनुसार सारे संसार की भूमि में भारत भूमि ही पवित्र है जिसमें 'रास' में प्रकाश का उदय होता है और उसके ऊपर कलश-प्रकाश की स्थापना होती है। अमृत प्रकाश से परिपूर्ण होने के कारण ही यह 'कलश' (घट, कुम्भ, पिंड, शरीर, पिंड ब्रह्मïण्ड) सबके लिए विचारणीय है। देखिए-

भोम भली भरत खंड की, जहां आई निध नेहेचल।

और सारी जिमी खारी, खारे जल मोह जल॥

रास नो प्रकाश थयो, ते प्रकाशसनों प्रकाश।

ते ऊपर वली कलस धरुं, ते मा करुं अति अजवास॥

रास कह्यो कछु सुन के, अब तो भूल अंकूर।

कलस होत सबन को, नूर पर नूर सिर नूर॥

अमृत-प्रकाश से भरपूर कुम्भ-कलश-विचार, अमृत प्रकाश की साधना का प्रतीक-विचार बनकर आज भी धार्मिक कृत्यों में जन-आस्था में विद्यमान है।  

यह भी पढ़ें -दान द्वारा सुख-समृद्धि

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