वीर पुत्र - शिवाजी और उनकी शासन प्रणाली

अनुज श्रीवास्तव

22nd February 2021

मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान योद्धा एवं कुशल प्रशासक थे। शिवाजी ने अपने पराक्रम के बल पर तत्कालीन मुगल साम्राज्य को भी चुनौती दी। शिवाजी महाराज के बारे में विस्तार से जानें लेख से-

वीर पुत्र - शिवाजी और उनकी शासन प्रणाली

सदियों पहले जब भारत अत्याचारी मुगल शासकों के अधीन था तो आजादी का आंदोलन चलाने एक योद्धा का जन्म हुआ। यह प्यारा सा शिशु 19 फरवरी, 1630 को शाहजी भोसले व जीजाबाई के घर पैदा हुआ। इस शिशु का नाम शिवा रखा गया, भारत  के इतिहास में यह शिशु छत्रपति वीर शिवाजी  के नाम से प्रसिद्ध  हुआ। शिवाजी का जन्म पुणे के शिवनेरी दुर्ग में मराठा परिवार में हुआ था।  माता जीजाबाई एक वीर और धार्मिक महिला थीं। शिवाजी अपने मां से बहुत प्रभावित थे। शिवाजी भारत के महान योद्धा एवं रणनीतिकार थे जिन्होंने 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने प्रभुत्तासंपन राज्यों की स्थापना की, उन्होंने अपने निरंतर संघर्ष, संकल्पशक्ति व वीरता से उस असंभव सपने को भी साकार कर दिखाया। उन्होंने साधनहीन होने पर भी एक विशाल व शक्तिशाली सेना बनायीं। अनेक किले व भवन बनाये, जो मराठा व भारतीय इतिहास में अमर हो गए। उन्होंने लगान वसूली का मैत्रीपुर्ण तरीका अपनाया। इस विनम्र शासक के शासनकाल काल में लगान वसूली के लिए कठोर व्यवहार नहीं होता था। उन्होंने कई वर्ष औरंगजेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। माता जीजाबाई की शिक्षाओं  व अभिभावक दादा कोंडवदेव के नैतिक मूल्यों ने शिवाजी को शक्तिशाली मुगल साम्राज्य से लड़ने की प्रेरणा दी। सन् 1674  में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति बने। शिवाजी ने अपनी अनुशासित सेना एवं सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और फारसी  के स्थान पर मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया। 

आरंभिक जीवन 

शिवाजी का बाल्यकाल कोई सुखद नहीं कहा जा सकता। उन्हें अपने पिता का सरंक्षण भी न के बराबर  मिला। ऐसी परिस्थितिओं में भी उनके द्वारा एक स्वतंत्र साम्राज्य की स्थापना निश्चय ही एक आश्चर्य कहा जा सकता है। इस आश्चर्य के पीछे जिन दो महान विभूतियों का हाथ रहा है वह हैं माता जीजाबाई तथा दादाजी कोंडवदेव। इन्हीं दो मार्गदर्शक की छत्रछाया में शिवाजी का बाल्यकाल बीता और उनके भावी जीवन की नींव पड़ी। शिवाजी बचपन से ही बुद्धिमान थे, उन्होंने रामायण-महाभारत का गहन अध्ययन किया। 

शिवाजी से छत्रपति शिवाजी बनने का सफर 

शिवाजी का सपना था मराठों का अलग  राज्य हो, इसी सपने को लेकर शिवाजी 18 साल की उम्र से ही सेना इकट्ठा करने लगे। धीरे-धीरे एक अलग मराठा राज्य बनाने के उद्देश्य से शिवाजी ने आस पास के छोटे-छोटे राज्यों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया और उन्हें जीत लिया। शिवाजी ने पुणे के आस पास के कई किलों को जीत लिया और नए किलों का निर्माण भी कराया। 

शिवाजी को स्वत्रंत राज्य की स्थापना करने में दक्षिण में बीजापुर और अहमदाबाद के सुल्तान और दिल्ली में मुगल बादशाह से संघर्ष करना पढ़ा।

शिवाजी महाराज को मारने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अपने प्रमुख सेनापति अफजल को एक विशाल सेना के साथ पुणे की तरफ भेजा। अफजल खान ने शिवाजी को मारने के लिए चालाकी से उन्हें अपने तम्बू में संधि करने बुलाया। शिवाजी अपने कुछ सिपाहियों के साथ अफजल से मिलने गए। उसने जैसे ही शिवाजी को मारने के लिए खंजर उठाया शिवाजी ने उसे एक ही वार में मार गिराया। उधर दिल्ली में औरंगजेब भी शिवाजी को अपने राज्य के लिए खतरे की तरह देखने लगा। औरंगजेब ने शिवाजी  को मारने के लिए सूबेदार शाहिस्ता खान को भेजा। शिवाजी ने उसे भी परास्त कर दिया। उसके बाद औरंगजेब ने जयसिंह को शिवाजी के पास भेजा। जयसिंह के समझाने  पर  औरंगजेब  से संधि करने औरंगजेब  के दरबार में आ गए। दरबार में शिवाजी को उचित सम्मान नहीं मिला जिस पर उन्होंने रोष जाताया। शिवाजी के स्वतंत्र व्यवहार से औरंगजेब असंतुष्ट हो गया और उसने शिवाजी को कैद कर दिया। शिवाजी  कुछ समय बाद औरंगजेब की कैद से योजना बनाकर निकल गए। इसके बाद 1670 में सूरत पर आक्रमण करके उन्होंने बहुत सी संपत्ति इकट्ठी कर ली। शिवाजी का रायगढ़ में पंडित गंगाभट्ट द्वारा राज्याभिषेक हुआ और शिवाजी छत्रपति शिवाजी हो गए। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के कुछ दिन बाद ही उनकी माता जीजाबाई का देहांत हो गया। शिवाजी  का राज्य उत्तर में रामनगर से लेकर दक्षिण में कारवार तक फैल गया। उन्होंने अपने गुरु की चरण पादुका रखकर शासन किया और उनके नाम पर सिक्के बनवाये। 1680 में शिवाजी महाराज का देहांत हो गया।

एक योग्य शासक

शिवाजी महाराज एक कुशल शासक, योग्य सेनापति थे, उन्होंन अपनी योग्यता के बल पर मराठों को संगठित करके  अलग मराठा साम्राज्य की स्थापना की। शिवाजी ने अपनी राज्य व्यवस्था के लिए 8 मंत्री नियुक्त किये। उन्हें अष्ट प्रधान कहा जाता था, जिसमें पेशवा का पद सबसे महत्त्वपूर्ण होता था।

साम्राज्य की सुरक्षा के लिए शिवाजी ने एक अनुशासित सेना बनायीं जिन्हें नगद वेतन भी दिया जाता था। उन्होंने एक जहाजी बेड़ा भी बनाया इसलिए शिवाजी को आधुनिक नौ सेना का जनक भी कहा जाता है। 

मराठा प्रणाली के अष्ट प्रधान

1. पेशवा (प्रधानमंत्री )

2.अमात्य ( मजूमदार )

3.मंत्री

4.सचिव

5.सुमंत

6.सेनापति

7.पंडित राव

8.न्यायधीश

एक महान युग प्रवर्तक 

शिवाजी अपने ही पराक्रम और बुद्धिमता से मराठा साम्राज्य के संस्थापक बने उन्होंने इतिहास में एक नए अध्याय की रचना की एक नवीन युग का प्रारम्भ किया। तत्कालीन मुगल सम्राट को भी प्रत्यक्ष चुनौती देने में वह पीछे नहीं रहे। 15 वर्ष की आयु में उन्होंने पूना की जागीर को स्वतंत्र करने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। इसी लघु आरम्भ को उन्होंने अपनी भावी महानता का आधार बनाया। उनके इन महान गुणों को भारतीय ही नहीं पाश्चात्य समीक्षकों को भी आकृष्ट है। शिवाजी ने मराठा जाति में नवीन जीवन फूंक दिया। 

आदर्श राजनीतिज्ञ 

शिवाजी की सभी सफलताएं उनके एक आदर्श राजनीतिज्ञ होने का प्रमाण है। उनकी अद्भुत राजनीतिक सूझ बूझ के समझ के आगे विश्व के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ नट हो जाते थे उन्होंने अपनी राजनीतिक चतुरता से अपने सभी शत्रुओं के दांत खट्टे कर दिए थे। उनकी योग्यता तथा राजनीतिक ज्ञान से उनका राज्य अल्प समय में है एक सम्पन राज्य बन गया था, जिसका निर्माण भी उन्होंने स्वयं ही किया था। 

अद्भुत प्रशासक  

शासन संचालन के लिए राजनीतिक ज्ञान के साथ ही तीव्र प्रशासनिक योग्यता का होना अनिवार्य है। शिवाजी ने स्वतंत्र समाज की स्थापना के बाद कई नियमों में अमूल परिवर्तन किया। उनकी अष्ट प्रधान की योजना उनके इसी प्रशासनिक परिवर्तन का एक अंग थी। वह स्वयं एक जागीरदार रहे थे। और अपने बाहुबल से एक स्वतंत्र शासक बने थे। अत: उन्होंने तत्कालीन शासकों में प्रचलित वेतन के बदले जागीर की प्रथा को समाप्त कर दिया, क्योंकि ये ही जागीरदार शक्ति सम्पन्न होकर राज्यों के लिए संकट उत्पन कर देते थे।

यह भी पढ़ें -वृंदावन के 5 खास मंदिरों के दर्शन

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