पक्षाघात में आयुर्वेदिक चिकित्सा

सिद्धार्थ शंकर

23rd February 2021

पक्षाघात या लकवा मारना एक बहुत ही तकलीफदेह बीमारी है। इसमें शरीर काफी पीड़ा से गुजरता है। पक्षाघात शरीर के जिस अंग पर होता है उस भाग में कोई हलचल नहीं होती। पक्षाघात क्या है, क्या हैं इसके कारण, लक्षण एवं निवारण? आइए जानते हैं।

पक्षाघात में आयुर्वेदिक चिकित्सा

प्रज्ञापराध एवं खराब आहार-विहार के कारण क्रुद्ध हुई वायु दक्षिण या वाम शरीर के किसी भी आधा भाग का विनाश कर देती है तथा शारीरिक चेष्टाओं का नाश और वाणी में रुकावट उत्पन्न कर देती है तो ऐसी बीमारी को पक्षाघात कहते हैं। पक्षाघात में वैकल्पिक मांसपेशियों की चेष्टाओं की क्रिया क्षमता का नाश हो जाता है। इसमें सर्वांगक या स्थानिक चेतना शक्ति की कमी होती है। संचालन और चेतना दोनों का आंशिक नाश होने पर पक्षाघात या अर्धांगवात कहा गया है।

इस रोग का मुख्य कारण रुक्ष, शीत, जूठा आहार-विहार, अधिक रात्रि जागरण, ज्यादा व्यायाम, धातुक्षय, चिन्ता, शोक, क्रोध, वेगरोध, आमदोष, मर्मांभिघात, मानसिक तनाव आदि कारणों से वात क्रुद्ध होकर शारीरिक चेष्टाओं की क्रिया शून्य होती है।

मुख्य लक्षण

1. कु्रद्ध वायु शरीर के किसी भी आध:भाग अधर गया सर्वांगवात से शारीरिक चेष्टाओं का नाश और वाणी में रुकावट या अर्दिंत का होता है।

2. रुजा पर्वंस्तम्भ का होना।

3. वाक्वाणी में रुकावट।

4. अंग का सोना।

5. स्पर्श ज्ञान का न होना।

6. स्पन्दन गात्र सुप्तता।

ये लक्षण एकांग पक्षाघात एवं सर्वांग पक्षाघात में पाये जाते हैं।

सम्प्राप्ति

स्रोतो दुष्टि के कारण विकार वायु के कारण रक्तवाहिनियां खराब हो जाती हैं। क्वाचित् जहर प्रकोप (आमदोष)एवं शीत आदि कारणों से खराब रक्त वाहिनियों में रक्त इकट्ठा ज्यादा होता है। परिणामस्वरूप मस्तिष्कवात वह केन्द्रों में रक्तभर की वृद्धि होने से पक्षाघात हो जाता है। अगर रुधिर संग्रह ज्ञान केंद्र के समीप होता है तो रोगी का ज्ञान सर्वांश या न्यूनांश में नष्ट होता है। इस रोग में शरीर का संचालन कुछ मात्रा में होता रहता है। शारीरिक चेष्टाओं की क्रिया शून्यता के कारण रोगी चंचल हो जाता है। इस प्रकार रक्त वाहिनियों और वात वाहिनियों के प्रहार होने से यह रोग हो जाता है। वर्तमानानुसार पक्षाघात (अधरंग) को हेमीप्लेजिया कहते हैं। हेमीप्लेजिया में शरीर के किसी एक भाग की मांसपेशियों में शिथिलता पाई जाती है। वर्तमान चिकित्सा विज्ञान इस रोग के निम्न कारण मानता है-

1. थ्रम्बोसिस का होना

2. इम्वोलिज्म

3. रक्तस्राव

4. उच्च रक्तचाप जन्य मस्तिष्क विकार

5. धमनी शोथ

6. मस्तिष्कगत संक्रमण

7. गंभीर शिरोभिघात

8. अपस्मार

9. मस्तिष्कगत अर्बुद

10. जन्मजात विकार

11. मस्तिष्कगत शोध, आदि कारणों से एकांग पक्षाघात एवं सर्वांग पक्षाघात होता है। इसलिए चिकित्सा करने से पूर्व उपरोक्त रोगोंत्पादक कारणों की सही जानकारी एवं प्रयोगशाला परीक्षण करना अनिवार्य है।

चिकित्सा सिद्धांत

पक्षाघात के कारण जानने के बाद जितना जल्दी हो सके चिकित्सा करनी चाहिए। इस रोग में शोधन एवं संशोधन चिकित्सा का खास महत्त्व है। संशोधन चिकित्सा में पूर्व कर्मस्नेहज एवं स्वेदन कर्म मुख्य हैं। बाद कर्म में वमन, विरेचन, वस्ति, नस्य आदि कर्मों का खास महत्त्व है। पक्षाघात के रोगियों को स्वेदन अवगाहन तर्पण परिषेक, लेप, आस्था पनवस्ति, अनुवासन वस्ति, पिण्डस्वेद, कटिस्वेद, शिरोधारा आदि पंचकर्म के उपक्रमों का खास महत्त्व है। योग्य चिकित्सक की देख-रेख में यह उपचार किया जाना चाहिए। चिरकालीन पेचीदा व्याधियों में संशोधन चिकित्सा खास रूप से उचित है। पक्षाघात के रोगियों को आमपाचन हेतु उपचार करना चाहिए। स्नेहन के लिए पिण्डस्वेद, पोट्टलीस्वेद, नाड़ीस्वेद, बलातगर एरण्ड, निर्गुंण्डी, रास्ना, कुलज्जनवात शामक द्रव्यों का उपयोग करना लाभदायक है।

मस्तिष्कगत प्रहार एवं शोध ग्रन्थी आदि में शिरो धारा एवं नस्य का उपयोग खास लाभदायक पाया गया है। अभ्यंग में महानारायण तेल जहर गर्भ तेल एवं क्षीर वला तेल पंच गुण तेल का प्रयोग लाभकारी है। शोथ की अवस्था में महामाष तेल एवं प्रसारिणी तेल लाभदायक है। जीर्ण रोगियों में मल्ल तेल साथ में मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है। गुणकारी औषधियां निम्न प्रकार से इस्तेमाल करना लाभदायक है।

1. महावात विध्वंसन रस 125 मि. ग्राम, एकांगवीर रस 250 मि.ग्रा. मधु से।

सहपान में महारास्नादि रस 50 एम.एल. की मात्रा में दिन में तीन बार इस्तेमाल करें।

2. वृहत् वात चिन्ता मणि 250 मि. ग्राम।

एकांगवीर रस 125 मि. ग्राम।

दिन में दो बार शहद के साथ प्रात: सायं लें।

3. कपि कच्छु चूर्ण 3 ग्राम।

वचाचूर्ण 500 मि. ग्राम। गरम जल से दिन में दो बार भोजनोत्तर दशमूलारिष्ट मुख्य 50 एम.एल. जल के साथ मिलाकर प्रयोग करें।

पंचकर्म चिकित्सा में संशोधन चिकित्सा पर खास ध्यान देने की जरूरत है।

चिकित्साकाल

रोगी को आवश्यकतानुसार 2 से 3 मास तक इसके अलावा अर्धांगवात रिरस 250 मि. ग्राम की मात्रा में दिन में दो बार शहद के साथ रोगी आवश्यकतानुसार प्रयोग करें। बार-बार शरीर पर झटके आने पर इस औषधि का अच्छा असर पाया गया है। यह औषधि कफ असर प्रकृति वाले एवं स्थूल वाले व्यक्ति के लिए भी लाभदायक है। जीर्ण पक्षाघात की अवस्था होने पर अर्धांगवात सारी रस 250 मि. ग्राम एकांगवीरस 125 मि. ग्राम, एकांगवीरस 125 मि. ग्राम मधु के साथ दिन में दो बार। मधु सहपान के रूप में दे दार्व्यादि रस, दशमूल रस एवं महारास्नादि रस 50 से 100 मि.ली. की मात्रा में दिन में दो बार इस्तेमाल करने से लाभ होता है

पथ्य में मूंग की दाल, जौ-गो धूम मिश्रित रोटी, ताजी मट्ठा सौन्धव लवण एवं काली मिर्च मिलाकर इस्तेमाल करें। तेज गरम मिर्च मसाले गुरु अन्न पक्षाघात के रोगी को कुपथ्य है। टहलना हल की कसरत करना ज्यादा लाभदायक है। 

यह भी पढ़ें -पौष्टिक एवं संतुलित आहार से पाएं दीर्घायु

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