वास्तविक सच्चाई को समझना - मुनिश्री तरुणसागरजी

मुनिश्री तरुणसागरजी

24th February 2021

जीवन में सच्चाई दो प्रकार की होती है। एक व्यवहारिक सच्चाई और दूसरी वास्तविक सच्चाई। बेटा मेरा है, जमीन-जायदाद मेरी है। यह व्यवहारिक सच्चाई है, वास्तविक सच्चाई नहीं है। वास्तविक सच्चाई तो यह है कि तुम्हारी आत्मा को छोड़कर तुम्हारा कोई नहीं है। यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है।

वास्तविक सच्चाई को समझना - मुनिश्री तरुणसागरजी

आदमी कर्म करे लेकिन कर्तापन का बोझ अपने सिर पर लेकर नहीं घूमे। आज का आदमी बच्चों को कम, गलतफहमियां ज्यादा पालता है। इन्हीं गलतफहमियों के भार से वह सारी जिंदगी दबा रहता है। मुर्गा यह सोचता है कि मैंने बांग दी इसलिए सूरज निकला है। बैलगाड़ी के नीचे चलने वाला कुत्ता सोचता है कि इस बैलगाड़ी को मैं खींच रहा हूं। आदमी भी तो सोचता है कि इस घर-परिवार, समाज को मैं चला रहा हूं। तो मुर्गा, कुत्ते और आदमी के भ्रम में क्या अंतर है? भगवान महावीर ने कहा: तू 'कर्तृत्व-बुद्धि' को छोड़ दे और साक्षित्व की साधना कर। याद रखो: 'मैं' की मृत्यु ही महावीर है। अहंता और ममता भक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

एक व्यक्ति नदी में पांव डालकर बैठा था और वह अपने पैर हिला रहा था। किसी ने पूछा: भाई साहब! आप क्या कर रहे हैं? उसने कहा: देखते नहीं, मैं पांव हिला रहा हूं इसलिए नदी बह रही है। व्यक्ति का भ्रम ठीक ऐसा ही है। यह सब प्रकृति और अपने नियम से चलता है। चलाने का जो भाव है, उससे मुक्त होने, उससे ऊपर उठने की जरूरत है।

जीवन में सच्चाई दो प्रकार की होती है। एक व्यवहारिक सच्चाई और दूसरी वास्तविक सच्चाई। बेटा मेरा है, पत्नी मेरी है, जमीन-जायदाद मेरी है, दुकान मेरी है। यह व्यवहारिक सच्चाई है, वास्तविक सच्चाई नहीं है। वास्तविक सच्चाई तो यह है कि तुम्हारी आत्मा को छोड़कर तुम्हारा कोई नहीं है। यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है।

सम्राट सिकन्दर को जीवन की वास्तविक सच्चाई जीवन के आखिरी समय में समझ में आई तभी तो सिकन्दर ने अपने सैनिकों से कहा था कि मृत्यु के बाद मेरे दोनों हाथ जनाजे से बाहर निकाल कर रखना। लोगों ने इसका कारण पूछा तो सिकन्दर ने कहा था- ताकि दुनिया देख ले सिकन्दर ने जोड़ा तो बहुत लेकिन आज खाली हाथ जा रहा है।

सिकन्दर जब गया जग से, 

सभी हाली बहाली थे।

पड़ी थी संपदा सारी, 

मगर दो हाथ खाली थे॥

आदमी संसार में रहे लेकिन सत्य को सामने रखकर जिये, सच्चाई को न भूले। सच्चाई यही है कि संसार के हर प्रेम के पीछे एक स्वार्थ होता है। दुनिया स्वार्थी है। दुनिया का प्रेम निश्छल नहीं कहा जा सकता। एक दिन इस प्रेम की सच्चाई हर आदमी के सामने आती है लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है।

मुल्ला नसरुद्दीन सोफासेट पर बैठकर टी.वी. देख रहा था। मुल्ला की पत्नी आई और बाजू में स्टूल लगाकर उस पर बैठकर टी.वी. देखने लगी। मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा: भाग्यवान! यहां मेरे पास आकर बैठो। वहां क्यों बैठ गई? मुल्ला की पत्नी ने कहा: मैं आपकी बराबरी कैसे कर सकती हूं, आपके बराबर कैसे बैठ सकती हूं? मुल्ला को लगा आहा देखो! मेरे से कितना प्यार करती है। मुल्ला ने पूछा: अगर मैं स्टूल पर बैठ गया तो फिर तुम क्या करोगी? मुल्ला की बीवी ने कहा: फिर मैं चौकी लगाकर उस पर बैठ जाऊंगी। मुल्ला को लगा: आहा वाकई में मुझसे कितना प्यार करती है। मुल्ला ने फिर पूछा: मान लो। मैं चौकी पर बैठ गया तो? पत्नी ने कहा: तो क्या? मैं नीचे फर्श पर बैठ जाऊंगी। पर तुमसे नीचे ही बैठूंगी क्योंकि तुम मुझसे बड़े हो। मुल्ला को फिर लगा देखो! यह मुझसे कितना प्यार करती है। मुल्ला ने आगे पूछा: मान लो। मैं फर्श पर बैठ गया तो? मुल्ला की पत्नी बोली: तो मैं गड्ढा करके उसमें बैठ जाऊंगी। मुल्ला सुनकर बड़ा खुश हुआ कि इसे मुझसे कितना प्यार है। मेरे लिए इसके दिल में कितना सम्मान है। मुल्ला नसरुद्दीन ने आगे और पूछ लिया कि अगर मैं गड्ढे में बैठ गया तो तुम क्या करोगी? पत्नी बोली: तो मैं उस पर मिट्टी डालकर उस पर बैठ जाऊंगी।

अब हुआ दूध का दूध और पानी का पानी। तो व्यवहारिक सच्चाई के साथ वास्तविक सच्चाई को भी समझाना। दुनिया में रहो, लेकिन इस बात को मत भूलो कि दुनिया दुरंगी है। बहुरंगी है। कभी भी वह गिरगिट की तरह रंग बदल सकती है। तुम्हारा बेटा कभी भी पड़ोसी बन सकता है। मित्र रातों-रात दुश्मन बन सकता है। मैं तो तुमसे सिर्फ यही चाहता हूं कि तुम इस सच को समझो कि माता-पिता, सगे संबंधियों की छत्रछाया एक दिन सिर से उठ जायेगी लेकिन धर्म की छत्रछात्र ही एक ऐसी छाया है जो सदैव बनी रहती है। 

यह भी पढ़ें -कैसे और क्यों रखें उपवास?

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